श्रद्धांजलि
ईश्वरचंद्र विद्यासागर की डेढ़ सौ वर्ष पुरानी सोच स्वतंत्र भारत से अधिक प्रगतिशील है
आनंद कुमार - 27th September 2021

हैजे से पीड़ित कोई गरीब मजूदर सड़क के किनारे गिरा कराहता दिख जाए तो आप क्या करेंगे? गंदगी से लिपटे मनुष्य को अनदेखा करने का विकल्प शायद कई लोग चुन लें। ईश्वरचंद्र विद्यासागर और गिरीशचंद्र विद्यारत्न एक बार कालना जा रहे थे जब सड़क के किनारे गिरे एक हैजा पीड़ित मजदूर पर उनकी नज़र पड़ी।

एक ने उसकी गठरी उठाई और दूसरे ने मजदूर को। उसे अपने साथ लाकर ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने उसकी देखभाल और वैद्य का प्रबंध किया। कुछ दिनों बाद ठीक होने पर ये मजदूर दोनों को जीवन बचाने के लिए धन्यवाद देता लौट भी गया। जो बदले में आपका कुछ नहीं कर सकता, ऐसे व्यक्ति का उपकार करने में आप कितने तत्पर होते हैं, यही आपका चरित्र दर्शाता है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर का चरित्र ही था जो सवा सौ वर्ष बाद भी उन्हें जीवित रखता है।

वे बंगाल के थे, बिहार के थे, या झारखंड के, यह कहना आज के दौर में थोड़ा मुश्किल हो जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे जिस काल (26 सितंबर 1820 – 29 जुलाई 1891) के थे, उस काल में बंगाल, बिहार, ओड़िसा और झारखंड कोई अलग-अलग राज्य ही नहीं थे।

वे पश्चिमी मेदनीपुर के इलाके में जन्मे थे, और अपने अंतिम वर्ष उन्होंने संथालों के बीच शिक्षा का प्रसार करते हुए बिताए, जो कि अब झारखंड का जामतारा होता है। झारखंड की सरकार ने 26 सितंबर 2019 से जामतारा के करमाटांड प्रखंड (जहाँ वे रहते थे) का नाम ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर ब्लाक रख दिया।

अगर सरकारों के रवैये की बात की जाए तो करमाटांड के उस मकान का जिक्र तो होगा ही। ईश्वरचंद्र विद्यासागर 1873 में करमाटांड आ गए थे और उन्होंने यहाँ 18 वर्षों से भी अधिक का समय बिताया। जिस मकान में वे रहते थे, उसी में उन्होंने लड़कियों के लिए दिन का और वयस्कों के लिए रात्री-पाठशाला की शुरुआत कर दी।

जी हाँ, जो वयस्कों के लिए प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रमों में रात में चलने वाले विद्यालय नज़र आते हैं, उनकी नींव भी ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने ही डाली थी। इसी मकान में वे एक मुफ्त का होमियोपैथी दवाखाना भी चलाते थे ताकि वंचित जनजातीय समुदायों को कुछ स्वास्थ्य सेवाएँ मिल पाएँ।

इस मकान का नाम “नंदन कानन” था। उनकी मृत्यु के बाद यह मकान बेच दिया गया था और कई वर्ष बाद इसे तोड़ा ही जाने वाला था कि बंगाली समुदाय को इसका पता चल गया। बिहार के बंगाली संघ ने घरों से एक-एक रुपये का चंदा इकठ्ठा करना शुरू किया और इस तरह 29 मार्च 1974 को इस मकान को खरीदकर टूटने से बचा लिया गया।

अब यह मकान “नंदन कानन” वैसी ही स्थिति में है, जैसा था। यहाँ अब 141 वर्ष पहले ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय “विद्यासागर” द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली पालकी भी रखी होती है। इस तरह सरकारी प्रयासों से पहले, या कहिए कि सरकारी सहायता के बिना ही इस सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को बचाया गया।

सबसे प्रभावशाली बंगालियों के एक सर्वेक्षण में बीबीसी ने 2004 में उन्हें नौवें स्थान पर पाया था। अगर सोचा जाए कि ऐसा क्यों हुआ तो इसकी वजह ढूंढना कोई ख़ास मुश्किल नहीं होता। बांग्ला भाषा की वर्णमाला को चार्ल्स विल्किंस और पंचानन कर्मकार ने 1780 में छापेखाने में इस्तेमाल के उद्देश्य से लकड़ी पर उकेरा था। यह बहुत अच्छी वर्णमाला थी ऐसा नहीं कहा जा सकता।

विद्यासागर ने इसमें सुधार किए और 1855 में उनकी वर्णमाला की पुस्तक बोर्नो पोरिचय आनी शुरू हुई। इसके पहले भाग की सफलता को देखते हुए फिर इसी का दूसरा भाग भी आया। संस्कृत का विद्वान् होने के कारण उनका नाम ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय से ईश्वरचंद्र विद्यासागर हो गया था, और यही नाम उनका आज भी परिचय है।

बांग्ला साहित्य में वे गद्य की विधा के जनक माने जाते हैं। उन्होंने अपने हिसाब से संस्कृत से कालिदास की “अभिज्ञान शाकुंतलम्” का अनुवाद किया था। अपने हिसाब से कह देना इसलिए ज़रूरी हो जाता है क्योंकि उन्होंने जो अनुवाद किया है, उसमें शकुंतला और उसकी सहेलियाँ उस दौर की बंगाली लड़कियों जैसी ही हैं।

कथासरित्सागर के 12वें खंड से लेकर उन्होंने बेताल पच्चीसी को भी बांग्ला स्वरूप दिया। आज जो हिंदी वाले “वेताल” के बदले “बेताल” शब्द नाम में दिखता है, उसके पीछे भी कहीं-न-कहीं यही वजह है कि शुरुआत में यह पुस्तक बांग्ला में “बेताल पञ्चविंशति” नाम से 1847 में आई थी (क्योंकि बांग्ला में व और ब एक होता है)।

सीता के वनवास के प्रसंग को वे सीतार बोनबास (1860) में लेकर आए और शेक्सपियर के कॉमेडी ऑफ़ एरर्स का उन्होंने भ्रांतिबिलास (1886) नाम से अनुवादित रूप प्रस्तुत किया। साहित्य में उनके दखल के अलावा उन्हें समाजसुधार के कार्यों के लिए जाना जाता है।

यह केवल भारत में ही संभव है कि किसी किस्म के सुधार की बात की जा सके। अन्यथा तो मंसूर और सरमद जैसे दंड मिल सकते हैं। विज्ञान के दृष्टिकोण से बात करने पर गैलीलियो जैसा हाल भी हो सकता है। जैसा कि हम लोग रामायण में आज पाते हैं कि मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ने रावण की मृत्यु के बाद मंदोदरी का विवाह विभीषण से करवाया था, कुछ वैसे ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर भी विधवा पुनर्विवाह के समर्थक थे।

जब उन्होंने इस दिशा में प्रयास करना आरंभ किया तो उन्हें राधाकांत देब के संगठन “धर्म सभा” का विरोध भी झेलना पड़ा। ऐसा कहा जाता है कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर के विधवा पुनर्विवाह के समर्थन के पत्र पर जितने हस्ताक्षर थे, उसकी तुलना में राधाकांत देब की चिट्ठी पर चार गुना हस्ताक्षर थे। इसके बाद भी लॉर्ड डलहौज़ी ने 1856 में विधवा पुनर्विवाह को मान्य करने का कानून लागू कर दिया था।

विवाह और उससे संबंधित विसंगतियों के समाज में घुस आने पर उन्होंने तीन अलग-अलग पुस्तकें लिखी थीं। उनकी बिधोबा बिबाह (1855) दो खंडो में प्रकाशित है। बहु बिबाह  पुस्तक का पहला भाग 1871 और दूसरा 1873 में आया। इसके अलावा उन्होंने बाल विवाह पर भी एक पुस्तक लिखी है।

फोर्ट विलियम से उस दौर में पाठ्यपुस्तक काफी प्रकाशित होते थे। इसलिए बच्चों के लिए लिखी केवल वर्णमाला की पुस्तक ही ईश्वरचंद्र विद्यासागर के नाम नहीं है, बल्कि उन्होंने कथामाला, चित्रावली, संस्कृत व्याकरण उपक्रमणिका और व्याकरण कौमुदी जैसी पुस्तकें भी लिखी थीं। उन्होंने इनके अलावा महाभारत पर 1860 में, ओती अल्प होइलो 1873 में, ब्रजविलास 1884 में और रत्नोपरीक्षा की 1886 में रचना की थी।

खानापूर्ति के नाम पर आज कुछ नेता शायद फिर से उन्हें याद कर लें, लेकिन जो वे करके गए, उसे हमने कितना आगे बढ़ाया है, यह फिर से सोचने की आवश्यकता है। जहाँ एक ओर बाल विवाह जैसे मुद्दों पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर 1880 के दौर में ही लिख रहे थे, वहीं दूसरी तरफ राजस्थान सरकार के नए नियम ने इसपर फिर से बहसें शुरू कर दी हैं। फिलहाल जो कानून इस मुद्दे पर हैं, वे एक विचित्र-सी दशा उत्पन्न करते हैं।

बाल विवाह करने-करवाने में सहयोग देने वाले सभी को जेल का प्रावधान है। सोचिए कि ऐसे में पीड़ित, यानी कि वह लड़की या लड़का जिसका जबरन बाल विवाह करवाया जा रहा है, वे क्या कर सकते हैं? अगर उन्होंने खुद ही इसकी शिकायत की तो जिनपर वे आश्रित हैं, वे जेल जायेंगे। जो कहीं शिकायत नहीं की तो खुद बाल विवाह झेलना होगा। इस स्थिति में कितनी संभावना है कि वे स्वयं शिकायत करेंगे?

इसके अलावा विवाह के मामले में (चाहे वह बहु विवाह हो या बाल विवाह) सबपर एक जैसे कानून भी लागू नहीं हैं। कहने के लिए यह कहा जाता है कि धर्म या आर्थिक स्थिति के हिसाब से कानून नहीं बदलता, लेकिन विवाह संबंधी कानूनों को देखने के बाद ऐसा लगता तो नहीं है। ईश्वरचंद्र विद्यासागर को, खानापूर्ति के लिए ही सही, जब याद करें तो एक बार प्रश्न विवाह संबंधी कानूनों पर भी पूछ लीजिएगा।