इन्फ्रास्ट्रक्चर
टीका उत्पादन में वृद्धि- क्यों अनिवार्य लाइसेन्स से वैक्सीन अभाव की पूर्ति शीघ्र नहीं होगी

30 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने भारत में कोविड-19 प्रबंधन का स्वप्रेरणा से संज्ञान लेते हुए पूछा कि वैक्सीन विनिर्माण के लिए क्यों पेटेंट अधिनियम के खंड 92 के तहत अनिवार्य लाइसेन्स जारी नहीं किए जा सकते।

यह एक आकर्षित करने वाली संभावना लग सकती है लेकिन इस दिशा में कई सारी व्यवहार्य समस्याएँ आएँगी। संभवतः इसलिए ही केंद्र ने अनिवार्य लाइसेन्स जारी करना शुरू नहीं किया है। यदि केंद्र अनिवार्य लाइसेन्स दे भी दे, तो कम ही संभावना है कि इससे टीका आपूर्ति की स्थिति में कोई सकारात्मक परिवर्तन आएगा।

अनिवार्य लाइसेन्स का अर्थ होता है कि सरकार पेटेंट धारक की अनुमति के बिना किसी पेटेंट को लाइसेन्स जारी कर सकती है यदि कोई असाधारण स्थित हो, जैसे अभी हम एक महामारी के बीच हैं। सामान्य परिस्थितियों में टीका जैसे उत्पादों का विनिर्माण पेटेंट धारक की अनुमति के बिना नहीं हो सकता है।

कोवैक्सीन भारत की बौद्धिक संपदा है लेकिन कोविशील्ड नहीं

कोवैक्सीन की बौद्धिक संपदा (आईपी), एकमात्र भारतीय आईपी वैक्सीन है जिसे स्वीकृति मिली हुई है। कोविशील्ड की बौद्धिक संपदा एस्ट्राज़ेनेका की है जिसका उप-लाइसेन्स सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया को मिला है।

इस प्रकार से भारतीय बौद्धिक संपदा के अनिवार्य लाइसेन्स नियम का प्रश्न इस बात से सीमित हो जाता है कि ट्रिप्स समझौते में क्या है। भारत ट्रिप्स समझौते पर छूट का समर्थन कर रहा है जिससे पेटेंट की बाधा के बिना टीका का विनिर्माण किया जा सके।

कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में यह एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है लेकिन पश्चिमी देश इसका विरोध कर रहे हैं। अंततः, भारत के पास केवल कोवैक्सीन के अनिवार्य लाइसेन्स जारी करने का विकल्प बचता है लेकिन यह न तो हमारी वैक्सीन समस्या का राम-बाण है, न ही कोवैक्सीन के उत्पादन को बढ़ाने में सहायता करेगा।

कोवैक्सीन

पैनसिया बायोटेक सहायता करेगा लेकिन यह कोई राम-बाण नहीं है

कोवैक्सीन को बनाने के लिए जैसी सुविधाएँ चाहिए, वे असली बाधाएँ हैं। बायोसेफ्टी के लेवल-3 मानकों के अनुसार उत्पादन सुविधा का स्तर होना चाहिए जो भारत में सिर्फ भारत बायोटेक एवं पैनसिया बायोटेक के पास है।

हमें आवश्यकता है कि ये सुविधाएँ तब उत्पादन करें, जब हमें टीके की सर्वाधिक आवश्यकता है, न कि तब जब महामारी समाप्ति पर होगी। ये दोनों कंपनियाँ भारत सरकार के उकसावे पर वार्ताएँ कर रही हैं।

इसके अलावा दो केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू)- भारतीय इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड तथा भारत इम्यूनोलॉजिकल्स एवं बायोलॉजिकल्स लिमिटेड को कोवैक्सीन के विनिर्माण के लिए अनुमति और वित्तीय सहायता मिल गई है।

हालाँकि, इन इकाइयों की उत्पादन क्षमता प्रति माह 1-1.5 करोड़ डोज़ बनाने तक ही सीमित है। ध्यान देने योग्य बात है कि कुछ सप्ताह पूर्व ही महाराष्ट्र के एक पीएसयू हैफकीन संस्थान को कोवैक्सीन के विनिर्माण का लाइसेन्स दिया गया है।

हालाँकि, उत्पादन सुविधा पर बायोसेफ्टी लेवल-3 की अनिवार्य आवश्यकता के कारण वहाँ से टीके का उत्पादन होने में एक वर्ष लग जाएगा। इस प्रकार अनिवार्य लाइसेन्सिंग से कोवैक्सीन के विनिर्माण को बढ़ावा देने का हमारा लक्ष्य तुरंत तो पूरा नहीं हो सकता।

पैनसिया बायोटेक को यह टीका बनाने का लाइसेन्स मिल सकता है और इसके लिए वार्ताएँ जारी हैं। हालाँकि, कोवैक्सीन की कितनी उत्पादन क्षमता पैनसिया के पास है, इससे संबंधित कोई रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं है। फिर भी, उत्पादन सुविधा को टीका विनिर्माण के लिए तैयार करने में एक या दो माह तो लगेंगे।

साथ ही, प्रति वर्ष 10 करोड़ स्पुतनिक-वी के उत्पादन की तैयारी पैनसिया ने कर ली है, हालाँकि ये टीके निर्यात बाज़ार के लिए होंगे। हम वर्तमान में जिस वैक्सीन अभाव का अनुभव कर रहे हैं, उसका कोई ऐसा समाधान नहीं है जो तुरंत फल दे सके।

 

स्पुतनिक-वी

यूएस भारत को संभावित रूप से जो 2 करोड़ एस्ट्राज़ेनेका के टीके भेजने वाला है, वह बस कुछ समय के लिए ही राहत दे सकेगा। दुर्भाग्यवश, उत्पादन क्षमता बढ़ाने में समय लगेगा और उसके बाद ही सामूहिक टीकाकरण गति पकड़ सकेगा।

कई प्रकार के टीके उत्पादन के विभिन्न स्तरों पर हैं या क्लिनिक अथवा ब्रिजिंग ट्रायल से गुज़र रहे हैं। हालाँकि, इन सबके परिणाम आने में समय लगेगा। मैंने पहले अपने लेख में निम्नलिखित बात कही थी-

कई सारे टीके अभी मार्ग में हैं। भारत में हमारे पास कई टीके हैं जो विनियामक स्वीकृति की प्रतीक्षा में हैं, जैसे ज़ाइडस कैडिला वैक्सीन, सीरम से दो और वैक्सीन, बायोलॉजिकल ई द्वारा बनाई गई एक वैक्सीन, साथ ही भारत बायोटेक से एक इंट्रानेज़ल वैक्सीन।

जॉनसन एंड जॉनसन भी भारत में अपनी वैक्सीन लाने के लिए तैयार है और एक ब्रिजिंग ट्रायल होने वाला है। नोवोवैक्स के साथ संयुक्त रूप से बनाए गए टीके की आपूर्ति सीरम भी सितंबर से करने की योजना बना रहा है।

इसके अलावा भारत में रूस की स्पुतनिक-वी की पहली खेपआ चुकी है जो अगले सप्ताह से लोगों को लगनी शुरू हो जाएगी। साथ ही जुलाई से इस रूसी टीके का भारत में घरेलू रूप से उत्पादन भी होने लगेगा।

ट्रिप्स की अगर छूट मिलती भी है तो वह जून के बाद होगी और उसके बाद भी व्यवहार्य रूप से उत्पादन क्षमता को बढ़ाने में चुनौतियों का सामना करना होगा। कोई सरल समाधान नहीं है और वास्तविकता यह है कि हमें धीरज रखना होगा।

जैसा दिखता, अनिवार्य लाइसेन्सिंग वैसा नहीं है, यह हमारे टीका अभाव को शीघ्र पूरा नहीं कर सकता है। वैक्सीन के विनिर्माण और वितरण के लिए समय और प्रयास आवश्यक हैं जो कई स्तरों पर किए जा रहे हैं।