इन्फ्रास्ट्रक्चर
मुंबई मेट्रो- क्यों एक्टिविस्ट आरे कॉलोनी को लेकर गलत हैं

आशुचित्र- आरे बचाओ विरोध के कारण मेट्रो लाइन 3 के निर्माण में जितनी देरी होगी, उतना ही नुकसान आम मुंबईवासी का होगा।

250 किलोमीटर से अधिक की मेट्रो लाइनों के निर्माणाधीन होने से पूरी मुंबई में चहल-पहल है। छह लाइनें कमीशन की जा चुकी हैं और तीन अन्य को अनुमति दी गई है।

हालाँकि मेट्रो लाइन 3 पर एक प्रस्तावित कार शेड (डिपो) सर्वाधिक चर्चा में है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसके निर्माण हेतु आरे कॉलोनी नामक क्षेत्र में पेड़ काटे जाने हैं। यह क्षेत्र ही लाइन 3 के कार शेड का प्रस्तावित स्थान है।

लाइन 3 महत्त्व्पूर्ण इसलिए है क्योंकि यह मुंबई की एक मात्र और पहली भूमिगत मेट्रो लाइन है। 33.5 लंबे इस कॉरिडोर की कल्पना बृहत मुंबई में ट्रैफिक कम करने के लिए की गई है क्योंकि यह कई व्यापारिक जिलों, हवाई अड्डे और शैक्षणिक संस्थानों को जोड़ेगी।

उत्तर-दक्षिण दिशा में आरे कॉलोनी से कफ परेड तक की यात्रा करने वाली इस लाइन पर 1, 2, 4, 6, 7 और 8 लाइनों से बदलाव की सुविधा विभिन्न स्टेशनों पर होगी। कुल 27 स्टेशनों में से इस लाइन पर मात्र एक स्टेशन ही भूमि स्तर पर होगा, अन्य सभी भूमिगत स्तर पर होंगे।

30,000 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली यह लाइन प्रतिदिन 2.5 लाख लीटर ईंधन बचाएगी जिसका वार्षिक मूल्य 550 करोड़ रुपये होता है। ईंधन की खपत में कमी से उत्सर्जन में भी कमी आएगी जिसके कारण प्रति वर्ष 6,800 टन कम उत्सर्जन होगा।

इससे मुंबई की सड़कों पर से 4,56,771 वाहन कम किए जा सकेंगे। यहाँ तक सब ठीक था। समस्या अब यह है कि सक्रिय कार्यकर्ता आरे कॉलोनी में डिपो बनाने की सरकार की योजना का विरोध कर रहे हैं।

प्राधिकारी आरे कॉलोनी के निर्णय पर इसलिए पहुँचे थे क्योंकि अन्य विकल्पों की तुलना में इसमें कम लागत है और साथ ही भविष्य में विस्तार हेतु भूमि उपलब्धता की दृष्टि से भी यह उपयुक्त है। यह कॉलोनी 1951 में रोज़मर्रा की वस्तुओं के प्रसंस्करण और विक्रय के लिए बनाई गई थी।

3,166 एकड़ में फैली आरे मिल्क कॉलोनी में से महाराष्ट्र सरकार ने 30 हेक्टेयर (74 एकड़) भूमि डिपो निर्माण के लिए महाराष्ट्र सरकार ने दी है। इसमें से डिपो भवन के लिए 25 हेक्टेयर का ही प्रयोग किया जाएगा। यह आरे मिल्क कॉलोनी के क्षेत्र का 2 प्रतिशत है।

विवाद की समय-रेखा

मुंबई मध्यम वर्ग के कुछ लोग मेट्रो कार शेड हेतु पेड़ काटे जाने के विरोध में थे। उन्होंने शेड के लिए 2,298 पेड़ों की कटाई के विरोध में बॉम्बे उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की। साथ ही उन्होंने जागरूकता अभियान और हस्ताक्षर अभियान चलाए।

इसके बाद कई गैर-सरकारी संगठन उनके साथ हो लिये। नुक्कड़ नाटक और मानव शृंखला जैसे माध्यमों से विरोध किया गया। 2015 में आम आदमी पार्टी इसके समर्थन में उतरी। इसके बाद शिव सेना और महाराष्ट्र नव-निर्माण सेना से भी इन्हें समर्थन प्राप्त हुआ।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) ने स्थल के यथास्थिति के आदेश दिए। हालाँकि बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पीआईएल खारिज करते परियोजना पर से स्थगन हटा दिया। अंततः वृक्ष आयोग ने अगस्त में डिपो हेतु पेड़ काटे जाने की अनुमति दे दी।

तथ्य और मिथ्या

कई मुंबईवासी जो आरे को बचाने की बात कर रहे हैं, वे तथ्यों से अनभिज्ञ हैं। अधिकांश लोग आरे कॉलोनी के 2 प्रतिशत के भाग को संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान का पूरा निकटवर्ती क्षेत्र समझ रहे हैं।

आरे बचाओ विरोधों का नेतृत्व करने वाली वेबसाइट दावा करती है कि आरे मुंबई का आखिरी हरित भूभाग है और शहर में प्राणवायु (ऑक्सीजन) का अभाव हो जाएगा यदि आरे नहीं रहा तो।

लेकिन तथ्य यह है कि भारत के पश्चिमी तट पर स्थित मुंबई में ऑक्सीजन उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त हरियाली और रोज़ बहने वाली हवा मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न हुए प्रदूषण को भी साफ करने में सक्षम है। 87 स्क्वायर किलोमीटर यानी 21,500 एकड़ में फैला संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान आरे कॉलोनी का सीमावर्ती है और मुंबई के शहरी क्षेत्र के अधीन ही आता है।

दूसरा दावा यह है कि आरे संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान हेतु एक बफर(प्रतिरोधी) का काम करता है जो मनुष्य और वन्यजीव के मध्य अप्रिय परस्पर प्रभाव को रोकेगा। यदि यह सत्य भी है तो तथ्य यह है कि मेट्रो कार शेड स्थल इस बफर सीमा में नहीं आता है। इसलिए इस तर्क पर विरोध करना व्यर्थ है।

अश्विनी भीड़े के ट्विटर से प्राप्त चित्र

दूसरा लोकप्रिय तर्क है कि बच्चों और युवाओं को प्रकृति के आनंद की अनुभूति कराने के लिए आरे एक अद्भुत स्थान है। तो यह स्पष्ट है कि इन सक्रिय कार्यकर्ताओं (एक्टिविस्ट) के लिए आरे सप्ताहांत पर समय व्यतीत करने के लिए मात्र एक पिकनिक स्थल है।

चिंताजनक यह बात है कि आरे को बचाने के नाम पर इन गलत जानकारियों का प्रचार हो रहा है। आरे बचाओं एक्टिविस्टों की मांग है कि भूमिगत डिपो बनाया जाए लेकिन यह छह गुना अधिक महंगा होगा और इसे बनने में तीन गुना अधिक समय लगेगा।

साथ ही भूमिगत विकल्प से वृक्षों के बचे रहने को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। दूसरा विकल्प कंजुरमार्ग भूमि का सुझाया जा रहा है। लेकिन यह मार्ग रेखा से दूर है और न्यायालय में विचाराधीन है जिसके कारण इसके अधिग्रहण में अधिक समय लगेगा।

साथी ही मुंबई मेट्रो रेल निगम कॉर्पोरेशन की प्रबंध निदेशक अश्विनी भिड़े ने सोमवार (9 सितंबर) को स्पष्ट कर दिया है कि आरे कॉलोनी में कार शेड के बिना लाइन 3 साध्य नहीं है। हालाँकि इसके बावजूद एक्टिविस्ट उनकी बातों और तथ्यों से सहमत नहीं हैं।

साइट विज़िट पर (सफेद हेल्मेट में) अश्विनी भीड़े

दुष्प्रभाव

मेट्रो कार शेड के इस विवाद में नुकसान मुंबई के आम आदमी का होगा जो कार में यात्रा नहीं कर सकता है और उसे असुविधाजनक लोकल ट्रोनों में यात्रा करने के लिए विवश होना पड़ेगा क्योंकि 16 लाख यात्रियों की क्षमता रखने वाली मेट्रो लाइन 3 बिना कार शेड के क्रियान्वित नहीं हो पाएगी।

यह भी सोचना चाहिए कि मेट्रो लाइन 3 की देरी से मुंबई के वातावरण में प्रति वर्ष 6,800 टन कार्बन उत्सर्जन जाता रहेगा क्योंकि मेट्रो लाइन 3 के न बनने से गाड़ियाँ मुंबई की सड़कों पर चलती रहेंगी।

दूसरी तरफ 2,200 पेड़ों की कटाई से प्रति वर्ष 50 टन कार्बन उत्सर्जन होगा। पर्यावरण परिवर्तन से लड़ने के लिए क्या आवश्यक है- 6,800 टन या 50 टन?

देरी के कारण परियोजना लागत में वृद्धि भी चिंता का विषय है। अभी तक मेट्रो लाइन 3 की लागत 7,000 करोड़ रुपये की बढ़त के साथ कुल 30,000 करोड़ रुपये हो गई है।

शहरी भारत के एक्टिविस्टों को अनसुना किए जाने वालों के लिए आवाज़ उठानी चाहिए। अपनी ऊर्जा और उत्साह को गलत दिशा के पर्यावरण मुद्दों के लिए व्यर्थ करने से कोई फल नहीं निकलेगा।

टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान मुंबई के छात्र गंपा साईदत्ता के लेख से प्राप्त जानकारियों के आधार पर।