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नमामि गंगे- किस तरह मोदी के वाराणसी से गंगा में शून्य सीवेज जाएगा

आशुचित्र- कुछ समय पूर्व तक वाराणसी का सारा अनुपचारित सीवेज पवित्र गंगा में सीधे जाया करता था। देखें यह कैसे बदला है।

भाजपा से प्रधानमंत्री के उम्मीदवार और गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री ने जब 2014 में वाराणसी में गंगा को निर्मल और अविरल बनाने का अभियान शुरू करने का वादा किया था तब इसे चुनाव पूर्व एक ऐसी रणनीति के रूप में देखा गया जिसे शायद कभी भी पूरा नहीं किया जाएगा। 2015 के बजट में जब नमामि गंगे अभियान के आरंभ के लिए 20,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया तो सरकार ने यह साबित कर दिया कि वह इस अभियान के लिए गंभीर है। शायद ही किसी ने सोचा होगा कि स्थिति सच में ही बदल जाएगी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा 1985 में शुरू किए गए गंगा एक्शन प्लान के तहत वाराणसी में तीन मलजल उपचार संयंत्रों का निर्माण किया गया। जिसमें से पहला संयंत्र 1986 में दीनापुर में बनाया गया, दूसरा भगवानपुर में 1988 में, और तीसरा डीजल लोकोमोटिव वर्क्स मलजल उपचार संयंत्र को 1989 में बनाया गया। 1990 से लेकर 2014 तक दो दशकों में कोई महत्त्वपूर्ण क्षमता वृद्धि नहीं हुई जिसकी वजह से बनारस की उपचार क्षमता 102 मिलियन लीटर प्रतिदिन ही रही।

यह मोटे तौर पर अपर्याप्त है क्योंकि उत्तर प्रदेश जल निगम के नोडल विभाग के अनुसार वाराणसी में प्रत्येक दिन 309 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। कुछ डाटा के अनुसार 2035 तक इसके 400 लीटर होने की संभावना है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) सहित कई अन्य लोगों का कहना है कि अभी भी प्रत्येक दिन में 410 मिलियन लीटर मलजल उत्पन्न हो रहा है। यह विसंगति जो केवल वाराणसी तक ही सीमित नहीं है शायद इसलिए सामने आई है क्योंकि ऐा माना जाता है कि भेजे गए पानी  का 80 प्रतिशत अपशिष्ट पानी के रूप में वापस आ जाता है। (जैसे कि नमामि गंगे के पहले लेख में बताया गया था, मलजल का यह अनुमान गलत लगाया गया है।)

इस हिसाब से अगर देखा जाए तो नमामि गंगे परियोजना से पूर्व वाराणसी में  प्रतिदिन के 308 मिलियन लीटर सीवेज पानी के आँकड़े की विसंगति थी। सीधे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि निश्चित रूप से वाराणसी का 308 मिलियन लीटर मलजल प्रतिदिन गंगा में तो जाता ही था।

2014 से वाराणसी के तीनों सीवेज प्लांट पर काम शुरू किया गया। इसमें से दीनापुर में बना 140 मिलियन लीटर के सीवेज प्लांट का काम नवंबर 2018 में ख़त्म हो गया था। दीनापुर मलजल उपचार संयंत्र पर काम जापान अंतर्राष्ट्रीय सहयोग एजेंसी की देख-रेख में किया गया है। मोदी ने इस संयंत्र का उद्घाटन पिछले वर्ष नवंबर में किया था।

दीनापुर संयंत्र पर जल संसाधन के केंद्रीय राज्यमंत्री डॉ सत्यपाल सिंह

दूसरा संयंत्र 120 मिलियन लीटर प्रतिदिन की क्षमता का है गोइठा में है। इसपर काम शुरू हो गया है और खबर है कि 2019 नवंबर तक यह पूर्ण रूप से बनकर तैयार हो जायेगा।

50 मिलियन लीटर प्रतिदिन की क्षमता वाले तीसरे संयंत्र को अस्सी जिले के लिए रमना शहर के एक इलाके में बनाया जा रहा है जो मार्च के अंत तक बनकर तैयार हो जाएगा। स्वच्छ गंगा के लिए राष्ट्र मिशन द्वारा संयंत्रों की सूचना हर महीने सामने आती है जिसमें से जनवरी में जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार संयंत्रों की प्रगति की सूचना इस लेख में प्रस्तुत है। सूचना के अनुसार संयंत्रों पर लगभग 40 प्रतिशत तक काम पूरा हो गया है।

रमना में 50 मिलियन लीटर प्रतिदिन की क्षमता वाले संयंत्र का निर्माण स्थल

50 मिलियन लीटर प्रतिदिन की क्षमता वाला रमना शहर में बनने वाला संयंत्र हाइब्रिड वार्षिक मॉडल के अंतर्गत बनाया जा रहा है। इस मॉडल के तहत 40 प्रतिशत तक पूंजी का निवेश सरकार द्वारा निर्माण संबंधी लक्ष्यों से बनाया जाता है। इससे काम समय से पूरा हो जाता है। बाकि की बची हुई लागत को परियोजना के अनुसार संरक्षण पर लगे पैसे पर निर्धारित किया जाता है। इस से काम लगतार चलता रहता है। इसके अलावा इस मॉडल पर आधारित बाकि के संयंत्र का काम मथुरा, हरिद्वार, कानपुर, उन्नाओ, फर्रुखाबाद और प्रयागराज में चल रहा है।

वाराणसी के सैटेलाइट शहर में आने वाले संयंत्र की इसी वर्ष दिसंबर में तैयार होने की संभावना है। दीनापुर में बन रहे 140 मिलियन लीटर वाले सीवेज संयंत्र के समापन से पूरे वाराणसी के मलजल की क्षमता 242 मिलियन लीटर प्रतिदिन हो गई है। गोइठा में 120 मिलियन लीटर वाले संयंत्र और रमना के 50 मिलियन लीटर वाले संयंत्र के बनकर तैयार होने के बाद वाराणसी की यह क्षमता बढ़कर 412 मिलियन लीटर हो जाएगी। इसका मतलब यह है कि 2014 से लेकर अब तक वाराणसी के मलजल के उपचार की क्षमता काफी बढ़ गई है।

मलजल उपचार संयंत्र तब तक अच्छी तरह काम नहीं करेंगे जब तक वाराणसी में सीवेज नेटवर्क ठीक से नहीं होगा। टूटे और गायब सीवेज नेटवर्क की वजह से गंगा एक्शन प्लान वाले समय में काफी कम पानी संयंत्रों तक पहुँचता था। इससे यह पता लगता है कि सीवेज नेटवर्क की कमी की वजह से संयंत्रों का सही इस्तेमाल नहीं हो रहा था। सीपीसीबी की 2013 की रिपोर्ट के अनुसार गंगा के आसपास 64 संयंत्रों में से 51 संयंत्रों का 60 प्रतिशत से भी कम इस्तेमाल किया जा रहा था।

इस समस्या से लड़ने के लिए सरकर ने 28 किलोमीटर लंबा सीवेज नेटवर्क बनाने का फैसला किया है जिसकी वजह से शहर का सारा गंदा पानी एक साथ संयंत्र तक पहुँच सके।

एक इंटरसेप्टर सीवर वरुणा नदी के किनारे बिछाया गया है और इसके पुख्ता हिस्से पर चौकाघाट, फुलवरिया और सरिया में तीन पंपिंग स्टेशन बनाए गए हैं। एक ऐसा ही इंटरसेप्टर अस्सी नदी के किनारे भी बनया गया है। शहर के पुराने गंदे नाले के भार को कम करने के लिए नए रहत सीवर ट्रंक को बनाया गया है। इसका मतलब है कि बनारस के तीनो संयंत्रों के लिए एक एक इंटरसेप्टर सीवर ट्रंक उपलब्ध है। 

इस प्रकार गंगा एक्शन प्लान की कमियों को नमामि गंगे ने पूरा किया है। जहाँ एक बार फिर चुनावों में खड़े होने केलिए तैयार हैं, वहीं उनका चुनाव क्षेत्र गंगा में शून्य मलजल को मुक्त करने के लक्ष्य को पूरा करने की कगार है।

प्रखर स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @prakhar4991 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।