इन्फ्रास्ट्रक्चर
मेट्रो परियोजनाएँ वित्तीय रूप से कैसे बनें व्यवहार्य, राजस्व के अन्य स्रोत खोजने होंगे

मेट्रो पूंजी आधारित परियोजना है इसलिए जब हम सार्वजनिक परिवहन के रूप में मेट्रो परियोजनाओं को बढ़ावा देना चाह रहे हैं तो निवेश पर आय के विकल्प खोजना आवश्यक हो जाता है। विश्व में बहुत कम ही ऐसी परियोजनाएँ होंगी जिनपर जितना निवेश हुआ, वे उन्हें लौटा सकीं।

विकसित देशों में उच्च प्रति व्यक्ति आय के कारण अधिक किराया वसूलकर कम यात्री संख्या में भी मेट्रो परियोजनाएँ परिचालित की जा सकती हैं। लेकिन भारत में सब्सिडी आधारित टिकट होते हैं क्योंकि सरकारों का उद्देश्य इन परियोजनाओं के माध्यम से पैसा कमाना नहीं बल्कि लोगों को सार्वजनिक परिवहन का एक विकल्प देना होता है।

ऐसे में भारतीय मेट्रो के किराया निर्धारण में दो चुनौतियाँ होती हैं- परियोजना को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाना और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों को किफायती टिकट उपलब्ध कराना। यदि मेट्रो का किराया अधिक होगा तो लोग किसी और सार्वजनिक परिवहन को चुनेंगे। उदाहरण स्वरूप, जब दिल्ली में आठ वर्षों बाद मई 2017 में किराया दोगुना किया गया था तब प्रतिदिन यात्री संख्या में 3 लाख की गिरावट आई थी।

मेट्रो के लिए पूंजी प्रबंधन हेतु सार्वजनिक निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल को भी लाया गया लेकिन विश्व में कहीं भी पीपीपी निर्माण और रख-रखाव मॉडल पूर्णतः सफल नहीं हुआ। इसका एक कारण यह होता है कि वर्तमान में किराया निर्धारण को समझौते से बाहर रखा जाता है जिससे परियोजना की अनिश्चितता बढ़ती है।

निजी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए तकनीकी किराया हो जो फॉर्मूला आधारित मूल्यवृद्धि से जोड़ा गया हो। यदि अनुबंध में वास्तविक और तकनीकी किराए के अंतर को भरने का विकल्प हो तो इस समस्या को सुलझाया जा सकता है। लेकिन मेट्रो परियोजनाओं को एक सामाजिक परियोजना के रूप में देखा जाता है।

कई बार इन परियोजनाओं के लाभ को पर्यावरण लागत, इक्विटी लागत आदि में भी आँका जाता है। शंघाई मेट्रो 16 किलोमीटर तक की यात्रा के लिए 3 से 4 युआन वसूलती है जो कि काफी सस्ता और हर आय वर्ग के लोगों के आकर्षित करने के उद्देश्य से है। इसमें व्यक्तिगत वाहन की बजाय सार्वजनिक परिवहन चुनने से हुई लोगों की बचत और बेहतर वायु गुणवत्ता के लाभ को भी गिना जा सकता है।

शंघाई मेट्रो

किराया के अलावा मेट्रो को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाने में यात्री संख्या भी बड़ी भूमिका निभाती है। नियोजन के समय दिल्ली मेट्रो में यात्री संख्या का जितना आकलन किया गया था उसकी एक-चौथाई संख्या में ही लोग यात्रा करते हैं। विश्वभर में ऐसा ही कई परियोजनाओं के साथ हुआ। आवश्यक है कि भावी मेट्रो परियोजनाओं के लिए यात्रा माँग के बेहतर मॉडल विकसित किए जाएँ जो वास्तविक आकलन कर सकें।

यदि प्रति किलोमीटर प्रति दिन यात्री संख्या की बात करें तो देश की सबसे सस्ती कोलकाता मेट्रो दिल्ली मेट्रो से आगे है। फिर भी यात्री संख्या भरपूर होने के बावजूद कोलकाता मेट्रो घाटे में चल रही है। इस तथ्य से हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं कि मेट्रो परियोजनाओं को अपनी आय के लिए किराए से इतर विकल्प खोजने होंगे।

दिल्ली मेट्रो के कुल राजस्व का 50 प्रतिशत से भी कम यात्री किराया से आता है। वैश्विक रूप से मेट्रो परियोजनाओं की 30-40 प्रतिशत आय गैर-रेलवे परिचालन माध्यम से होती है। और इसलिए मेट्रो परियोजनाओं को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए गैर-किराया आधारित राजस्व मॉडल को विकसित किया जा रहा है।

राजस्व आय का एक बड़ा साधन मेट्रो स्टेशन और अन्य सुविधाओं के आसपास अचल भूमि के विकास में निहित है। हालाँकि ऐसा करने में कई विरोधों का भी सामना करना पड़ सकता है क्योंकि इस प्रकार का विकास नगर की सूरत बदलने का सामर्थ्य रखता है।

हॉन्ग कॉन्ग मेट्रो लाभ कमाने वाली परियोजनाओं में से एक है जिसने 2018 में  36 प्रतिशत यानी 1.5 अरब डॉलर का लाभ कमाया था। ऐसा कर पाने का कारण स्टेशन व्यवसाय और संपत्ति के किराए से कमाई रही। व्यावसायिक राजस्व स्रोतों को पूर्णतः खोलकर ही मेट्रो को वित्तीय रूप से व्यवहार्य बनाया जा सकता है।

हॉन्ग कॉन्ग मेट्रो का व्यावसायिक स्थान

भारत की अधिकांश मेट्रो परियोजनाएँ भारी हानि उठा रही हैं। वित्तीय वर्ष 2019 में चेन्नई मेट्रो ने 183 करोड़ रुपये कमाए और कुल 714 करोड़ रुपये का घाटा उठाया। बेंगलुरु मेट्रो ने 536 करोड़ रुपये कमाए और 498 करोड़ रुपये का नुकसान उठाया। बेंगलुरु मेट्रो को नुकसान इसलिए उठाना पड़ा क्योंकि 2018 में नगर निगम ने बाहरी प्रचार होर्डिंग को प्रतिबंधित कर दिया।

मुंबई मेट्रो ने 322 करोड़ रुपये के राजस्व के साथ 236 करोड़ रुपये का नुकसान झेला। वित्तीय वर्ष 2019-20 में जयपुर मेट्रो को 26 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। दिल्ली मेट्रो ने 6,461 करोड़ रुपये का राजस्व कमाया जिसमें परिचालन में 30 प्रतिशत (1963 करोड़ रुपये) का लाभ भी हुआ लेकिन 7 प्रतिशत (464 करोड़ रुपये) का कुल नुकसान भी।

मेट्रो परियोजना में नुकसान होने का प्रमुख कारण है अनुमान से कम यात्री संख्या और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि परियोजनाएँ अंतिम छोर तक संयोजकता नहीं दे पातीं तथा निर्माणाधीन लाइनों के पूरा होने में देरी से भी वर्तमान में परिचालित लाइनों पर कम यात्री आते हैं। इसके अलावा व्यावसायिक भूमि की लीज़, प्रचार स्थान की लीज़, संपत्ति विकास, भूमि मुद्रीकरण आदि जैसे गैर-परिचालन राजस्व स्रोतों को खोलने पर विनियमन और अनुबंध का प्रतिबंध रहता है।

इसके लिए गुरुग्राम मेट्रो का उदाहरण देखें जिसपर निजी स्वामित्व था लेकिन कंसेशनेयर कंपनियाँ दिवालिया हो गईं। अक्टूबर 2019 में दिल्ली मेट्रो रेल निगम ने इसकी बागडोर संभाली। इसकी विफलता का कारण उच्च लागत, कम यात्री संख्या और खराब लोकेशन रहे। इसके राजस्व को 60 प्रतिशत स्रोत प्रचार रहे और मात्र 39 प्रतिशत राजस्व ही ट्रैफिक से आया।

गुरुग्राम मेट्रो में प्रचार

सितंबर 2016 और मई 2018 के बीच शहरी स्थानी निकाय विभाग द्वारा नियमों में किए गए कई परिवर्तनों से प्रचार अधिकारों में भारी कमी आई। मेट्रो के स्तंभों और मेट्रो स्टेशन के भवन पर सड़क की ओर रुख करने वाली दीवार पर प्रचार को प्रतिबंधित कर दिया गया। 20 लाख स्क्वायर फीट की भूमि के व्यावसायिक विकास को भी अनुमति नहीं मिल सकी।

इन परिस्थितियों में मेट्रो परियोजना के निर्माण काल से ही राजस्व के स्रोत खोजने शुरू कर देने चाहिए। विशेषकर ऐसा छोटे शहरों में किया जाना चाहिए जहाँ किराया बढ़ाने का अधिक विकल्प सरकार के पास नहीं होता। मेट्रो मार्ग में डिजिटल प्रचार किए जा सकते हैं। अंधेरी मेट्रो सुरंगों और फीके मेट्रो स्टेशनों पर डिजिटल प्रचार का विकल्प आकर्षक और राजस्व का अच्छा स्रोत बन सकता है।

कई मेट्रो रेल कंपनियाँ अचल संपत्ति संबंधित व्यापार करने वालों, होटल कंपनियों और आईटी कंपनियों से संपर्क कर खाली स्थान के मुद्रीकरण के तरीके तलाश रही हैं। उदाहरण स्वरूप, बेंगलुरु मेट्रो रेल निगम ने हार्डवेयर कंपनी इंटेल के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत स्टेशनों के नामकरण का अधिकार , 3,000 स्क्वायर फीट का व्यावसायिक स्थान और 1,000 स्क्वायर फीट स्थान प्रचार के लिए कंपनी को दिया जाएगा। इसके बदले में मेट्रो निगम को 100 करोड़ रुपये मिलेंगे।

कुछ मेट्रो रेल कंपनियाँ अपने अधिकार क्षेत्र की खाली पड़ी भूमि (स्टेशन के आसपास) पर कुछ इमारतों का निर्माण कर उन्हें लीज़ पर दे रहे हैं और यह किराया उनकी आय का स्रोत बन रहा है। ऐसा चेन्नई और बेंगलुरु में किया गया है। संपत्ति विकास का काम वे रियल एस्टेट कंपनियों को दे देते हैं।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति और सम-सामयिक विषयों पर लिखते हैं। वे @c_aashish द्वारा ट्वीट करते हैं।