इन्फ्रास्ट्रक्चर
भारतीय विनिर्माण के लिए मेट्रो परियोजनाएँ क्या अवसर लेकर आई हैं

अगले दो से आठ वर्षों में मेट्रो परियोजनाओं पर कुल 5,354 अरब रुपये (1,315 किलोमीटर लंबी नियोजित मेट्रो लाइन) के निवेश का अनुमान है जो निर्माण काल में और उसके पश्चात भी रोजगार के कई अवसर देगा। ऐसे में भारत सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ आह्वान के साथ टेंडर शर्तें भारतीय कंपनियों को अवसर देने पर केंद्रित हो रही हैं।

स्थानीय विनिर्माण, पूंजी निवेश और रोजगार के अवसरों का लाभ मेट्रो रेल परियोजना के निर्माण कार्य के अलावा भी निम्न गतिविधियों में उठाया जा सकता है-

रोलिंग स्टॉक (ट्रेन, कोच, लोकोमोटिव, वेगन)

पिछले 15-20 वर्षों में भारतीय मेट्रो रेल उद्योग ने एक आयातक होने से निर्यातक बनने तक का लंबा सफर तय किया है। दिल्ली मेट्रो की शुरुआत में जर्मनी और दक्षिण कोरिया से पूर्ण रूप से निर्मित इकाइयाँ मंगवाई गईं थीं। वर्तमान में दिल्ली मेट्रो के तीसरे चरण (351 किलोमीटर की लंबाई) तक खरीदे गए 2,206 कोच में से 88 प्रतिशत भारत में निर्मित हैं।

भारत में बनने वाले कोच विश्व के अन्य स्थानों की तुलना में सस्ते पड़ते हैं। भारत में एक कोच का मूल्य 9-10 करोड़ रुपये होता है जो कि वैश्विक कीमत से 45-50 प्रतिशत सस्ता है। प्रति किलोमीटर के लिए छह-सात कोच के अनुमान से 1,315 किलोमीटर लंबी नियोजित परियोजनाओं में 1,000 अरब रुपये का निवेश अवसर है।

भारतीय मेट्रो प्रणाली में उपयोग होने वाले 75 प्रतिशत कोच भारत में निर्मित होने चाहिए, या संधि के माध्यम से या पूर्ण स्वामित्व वाली इकाइयों के द्वारा। इन शर्तों के कारण विदेशी विनिर्माता केंद्र सरकार के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत भारत में संयंत्र लगाने के लिए विवश हुए।

मोदी सरकार का मेक इन अंडिया कार्यक्रम

केंद्रीय पीएसयू भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड ने बेंगलुरु स्थित संयंत्र में मेट्रो रोलिंग स्टॉक की विनिर्माण सुविधाओं को उन्नत करने के लिए काफी निवेश किया है। आंध्र प्रदेश के श्रीसिटी में रोलिंग स्टॉक और अन्य उपकरणों के विनिर्माण के लिए एल्सटॉम की एक इकाई है। यहाँ से सिडनी मेट्रो के लिए निर्यात भी हुआ है।

चेन्नई स्थित इंटीग्रल कोट फैक्ट्री ने कोलकाता मेट्रो के लिए 456 कोच तैयार किए हैं। बॉम्बार्डियर ट्रांसपोर्टेशन का गुजरात के सावली में रोलिंग स्टॉक विनिर्माण संयंत्र है। बॉम्बार्डियर, एल्सटॉम, कावासाकी और मित्सुबिशी जैसे कंपनियों को इसक्षेत्र की तकनीक में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।

प्रणाली (सिग्नलिंग और संचार)

संचार आधारित ट्रेन नियंत्रण (सीबीटीसी) रेलवे सिग्नलिंग प्रणाली है जो दूरसंचार के माध्यम से ट्रेन और ट्रैक उपकरणों के बीच ट्रैफिक प्रबंधन और इंफ्रास्ट्रक्चर नियंत्रण करती है। इस प्रणाली के माध्यम से ट्रेन का सटीक स्थान आम प्रणाली से बेहतर पता तल पाता है। इससे रेलवे ट्रैफिक का बेहतर प्रबंधन होता है और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

सीबीटीसी के साथ निरंतर स्वचालित ट्रेन नियंत्रण प्रणाली (सीएटीसी) होती है जिसके अधीन स्वचालित ट्रेन सुरक्षा (एटीपी), स्वचालित ट्रेन परिचालन (एटीओ) और ऑटोमेटिक ट्रेन सुपरविज़न (एटीएस) आते हैं जो ट्रैक साइड और ट्रेन के बीच रेडियो संचार स्थापित करते हैं। अनुमान है कि सीटीबीसी प्रणाली में 150-200 अरब रुपये का अवसर है।

एल्सटॉम

सिग्नलिंग के क्षेत्र में एल्सटॉम एक बड़ी कंपनी है। विश्व की 25 प्रतिशत से अधिक रेडियो सीबीटीसी प्रणाली एल्सटॉम के अर्बलिस समाधान से परिचालित है। भारत में एल्सटॉम ही अर्बलिस को लेकर आया और कोच्चि व लखनऊ मेट्रो में इसे लगाया। भारत की मेट्रो परियोजनाओं में 35-40 प्रतिशत सिग्नलिंग का काम एल्सटॉम ही कर रहा है।

एल्सटॉम का सिग्नलिंग समाधान

वित्तीय वर्ष 2018 में भारत की सभी सीबीटीसी परियोजनाएँ एल्सटॉम को मिली थीं। मुंबई मेट्रो के 58 किलोमीटर लंबे 2ए/2बी/7 लाइन, 32 किलोमीटर लंबे पुणे मेट्रो (700 करोड़ रुपये), 42 किलोमीटर लंबे बेंगलुरु मेट्रो के पहले चरण और मुंबई मेट्रो की लाइन 3 के लिए 850 करोड़ रुपये का काम भी एल्सटॉम को ही मिला था।

सिग्नलिंग प्रणाली का अधिकांश निर्माण बेंगलुरु में ही होता है, निर्यात के लिए भी। हालाँकि सिग्नलिंग अनुबंध के तहत मिला काम अलग-अलग भी हो सकता है जैसे मुंबई मेट्रो की लाइन 3 के लिए यह मानवरहित ट्रेन परिचालन (यूटीओ), कम्प्यूटर आधारित इन्टरलॉकिंग और केंद्रीकृत ट्रेन सुपरविज़न, प्लेटफॉर्म स्क्रीन द्वार, विद्युत व यात्रिक सुपरविज़न और डाटा अर्जन प्रणाली का काम करेगी।

इसके अलावा निप्पॉन सिग्नल (दिल्ली मेट्रो), थेल्स (हैदराबाद मेट्रो), बॉम्बार्डियर (दिल्ली, आगरा और कानपुर मेट्रो) व साइमन्स भी इस क्षेत्र की बड़ी कंपनियाँ हैं।कुछ आपूर्तिकर्ता ऐसे भी हैं जो पूरे रोलिंग स्टॉक के साथ प्रॉपल्ज़न सिस्टम भी देते हैं।

भारत में सीबीटीस प्रणाली विकसित करने के लिए दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) ने एक शोध परियोजना शुरू की है। अपेक्षा है कि इस परिय़ोजना से विकसित होने वाली एटीएस प्रणाली का उपयोग चौथे चरण में किया जाएगा। देश में सीबीटीसी प्रणाली विकसित हो जाने से लागत भी कम होगी।

अंतिम मील संयोजकता

मेट्रो जैसी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना की व्यवहारिकता अंतिम मील संयोजकता पर ही निर्भर करती है। जब मेट्रो में यात्री संख्या बढ़ाने पर ज़ोर दिया जाएगा तो अंतिम मील संयोजकता विकसित करने के लिए निवेश के कई अवसर खुलेंगे।

इसके अलावा स्मार्ट कार्ड, विभिन्न साधनों से सफर करने वाले यात्रियों के डाटाबेस की रचना और एकीकरण निजी निवेश के द्वार खोलेगा। टेक्समैको रेल एंड इंजीनियरिंग को मुंबई मेट्रो की स्वचालित किराया प्रणाली (एएफसी) के डिज़ाइन, निर्माण, आपूर्ति, इंस्टॉलेशन, टेस्टिंग और कमिशनिंग के लिए 110 करोड़ रुपये का अनुबंध मिला है।

टेक्समैको की एक बैठक

विद्युत और अक्षय ऊर्जा में अवसर

मेट्रो प्रणाली में रेल चलाने और अन्य कार्यों में भी विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है। दिल्ली मेट्रो का 30 प्रतिशत परिचालन खर्च बिजली के लिए होता है। ऊर्जा आवश्यकता व्यस्ततम घंटे की ट्रैक्शन पावर और अन्य सुविधाओं से निर्धारित होती है।

मेट्रो चलने से पहले और परिचालन के दौरान बिजली की आवश्यकता रहती है। इस प्रकार 18.5 करोड़ रुपये प्रति किलोमीटर की दर से विद्युत ऊर्जा में 250 अरब रुपये के निवेश का अवसर है। बेंगलुरु मेट्रो के दूसरे चरण में 33 किलोमीटर के विस्तार का बिजली आपूर्ति अनुबंध एल्सटॉम को 604 करोड़ रुपये में मिला है।

इस अनुबंध के तहत एल्सटॉम रेल का 750 वोल्ट डीसी विद्युतीकरण करेगा, 33 किलोवोल्ट/415 वोल्ट के 30 ऑक्सिलरी सब-स्टेशन, 33 किलोवोल्ट/750 वोल्ट डीसी के 26 ट्रैक्शन सब-स्टेशन और वायाडक्ट के माध्यम से 33 किलोवोल्ट केबल का वितरण नेटवर्क बनाएगा।

साथ ही एल्सटॉम का काम होगा नए इंफ्रास्ट्रक्चर को पहले चरण की लाइनों की प्रणाली से एकीकृत करना, स्कैडा प्रणाली की वृद्धि के साथ। इसके अलावा पुणे मेट्रो में 28 किलोमीटर लंबी लाइन के विद्युतीकरण का काम भी एल्सटॉम को मिला है।

मेट्रो की बिजली के लिए अक्षय ऊर्जा पर भी काम किया जा सकता है। भारतीय रेलवे के लिए भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) ने मध्य प्रदेश के बीना में 1.7 मेगावाट क्षमता का सौर्य ऊर्जा संयंत्र शुरू किया है। यह भारतीय रेलवे के ट्रैक्शन सिस्टम को सीधे बिजली देगा।

सौर्य ऊर्जा के क्षेत्र में यह बहुत बड़ी उपलब्धि है क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा है कि ट्रैक्शन के लिए सीधे सौर्य ऊर्जा का उपयोग किया जा रहा है। भारतीय रेलवे के ट्रैक्शन सब-स्टेशन को भेल एकल चरण में 25 किलोवॉल्ट बिजली देता है। रेलवे के साथ भूमि सर्वेक्षण के मात्र साढ़े चार महीनों में भेल ने परियोजना को शुरू कर दिया।

इससे रेलवे के क्षेत्र में अक्षय ऊर्जा के उपयोग के द्वार खुल गए हैं। भारतीय रेलवे अपनी अतिरिक्त खाली पड़ भूमि पर सौर्य संयंत्र स्थापित करके रेलवे ट्रैक्शन को बिजली दे पा रही है और साथ ही 2030 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य की ओर भी अग्रसर है।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति और सम-सामयिक विषयों पर लिखते हैं। वे @c_aashish द्वारा ट्वीट करते हैं।