इन्फ्रास्ट्रक्चर / भारती
मेकेदाटु बांध पर क्यों तमिलनाडु और कर्नाटक हो गए विरोधी

सप्ताह भर पूर्व, कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने कहा था कि कावेरी घाटी पर दीर्घ समय से लंबित मेकेदाटु बांध पर राज्य सरकार काम आगे बढ़ाएगी। अपेक्षा है कि यह परियोजना बेंगलुरु मेट्रोपॉलिटन शहर और आसपास के क्षेत्रों की पेयजल आवश्यकताओं की पूर्ति करेगी।

वहीं दूसरी ओर, तमिलनाडु के जल संसाधन मंत्री दुराई मुरुगन केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से दिल्ली में मिले और निवेदन किया कि केंद्र सरकार इस परियोजना को अनुमति न दे।

इससे पहले, येदियुरप्पा ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन को पत्र लिखकर कहा था कि इस विषय पर वार्ता हो जिससे चर्चा के बाद किसी निर्णय पर पहुँचा जा सके। हालाँकि, स्टालिन ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री के प्रस्ताव पर कोई मुखर प्रतिक्रिया नहीं दी है।

आज (12 जुलाई को) स्टालिन ने चेन्नई में एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। मुद्दा सिर्फ बेंगलुरु के निवासियों की पेयजल आवश्यकता और तमिलनाडु के किसानों की सिंचाई आवश्यकता का नहीं है, बल्कि यह पहले संजातीय विवादों को भी जन्म दे चुका है।

2016 में कावेरी पर विरोध प्रदर्शनों ने शीघ्र ही हिंसक रूप ले लिया था जिसमें दो लोगों की मृत्यु हो गई थी। कर्नाटक में प्रदर्शन भड़काने के लिए 300 से अधिक लोगों की गिरफ्तारी हुई थी। पुतले और बसें जलाई गई थीं, दूसरे राज्य के अधिष्ठानों को लक्ष्य किया गया था और व्यापार व विद्यालय बंद किए गए थे।

कावेरी जल विवाद

कावेरी नदी कर्नाटक जिले के कूर्ग में स्थित चेरंगला गाँव के निकट ब्रह्मगिरि शृंखला पर 1,341 मीटर की ऊँचाई पर तलकावेरी से बहती है। इसकी घाटी तमिलनाडु, कर्नाटक, केरल के राज्यों और पुडुचेरी के केंद्रशासित प्रदेश तक फैली हुई है।

दक्षिण कर्नाटक की पठार से तमिलनाडु के मौदानी क्षेत्र में शिवसमुद्रम् झरनों के माध्यम से कावेरी पहुँचती है और वहाँ से यह दो भागों में बटकर कई उतार-चढ़ाव से गुज़रती है। इस वेग का उपयोग शिवसमुद्रम् में स्थित ऊर्जा संयंत्र बिजली बनाने के लिए करता है।

अंततः नदी बंगाली की खाड़ी में जा मिलती है। मेकेदाटु का शाब्दिक अर्थ है ‘बकरी की छलांग’ जो कि पर्वतों के बीच एक चौड़ा मार्ग है जहाँ से नदी की दो शाखाएँ मिलने के बाद बहती हैं। इसके बाद बहती हुई कावेरी 64 किलोमीटर तक कर्नाटक और तमिलनाडु की सीमा की भूमिका निभाती है।

कावेरी सबसे विनियमित नदियों में से एक है जिसके 90-95 प्रतिशत पानी का उपयोग सिंचाई और बिजली बनाने के लिए कर लिया जाता है। नदी के पानी के साझाकरण का विवाद पुराना है और ब्रिटिश काल से शुरू होता है जब मैसुरु साम्राज्य का कर्नाटक पर अधिकार था।

मद्रास प्रेसिडेन्सी के नाम से ब्रिटिश तमिलनाडु पर शासन करते थे। उस समय दोनों के बीच पानी साझाकरण पर समझौता हुआ था। इस समझौते के अनुसार किसी भी निर्माण कार्य से पहले कर्नाटक को तमिलनाडु की अनुमति लेनी होगी।

स्वतंत्रता के बाद कर्नाटक ने तर्क दिया कि स्वतंत्रता-पूर्व किए गए समझौते अब अवैध हैं और वे गलत तरीके से मद्रास प्रेसिडेन्सी के पक्ष में झुके हुए हैं। राज्य ने “जल के बराबर साझाकरण” के आधार पर एक नए समझौते की माँग की।

वहीं, तमिलनाडु ने कहा कि उसने भू-प्रणालियाँ विकसित कर ली हैं और इसलिए उसे अधिक पानी की आवश्यकता है। उसने तर्क दिया कि किसी भी परिवर्तन से लाखों किसानों की जीविका पर बुरा प्रभाव पड़ेगा।

वार्ताओं से इस मुद्दे को सुलझाया न जा सका और 1990 में केंद्र ने एक विवाद न्यायाधिकरण की स्थापना की। इसके बाद 16 वर्षों तक कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण ने सभी पक्षों के तर्क सुने और अंततः 5 फरवरी 2007 को अपना निर्णय सुनाया।

इस निर्णय को केंद्र सरकार ने 2013 में लागू किया। अंतिम आदेश ने कावेरी घाटी में भागीदारी रखने वाले सभी राज्यों- कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु- और पुडुचेरी को आवंटन किए। यह भी निर्धारित किया कि “सामान्य वर्ष में हर माह कर्नाटक” तमिलनाडु को कितना पानी देगा।

न्यायाधिकरण के आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी जिसपर फरवरी 2018 के निर्णय में जल आवंटन को संशोधित करते हए कर्नाटक की भागीदारी 14.75 अरब घन फीट बढ़ा दी गई।

इस आवंटन में 4.75 अरब घन फीट जल बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों के पेयजल के लिए था। सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार कर्नाटक को 284.75 अरब घन फीट, तमिलनाडु को 404.25 अरब घन फीट, केरल को 30 अरब घन फीट और पुडुचेरी को 7 अरब घन फीट जल मिलना था।

मेकेदाटु परियोजना- कर्नाटक बनाम तमिलनाडु

कर्नाटक सरकार द्वारा पस्तावित इस परियोजना में राज्य सीमा से 4 किलोमीटर दूर 67.16 अरब घन फीट की क्षमता का जलाशय और 400 मेगावाट क्षमता का पनबिजली संयंत्र बनाने की बात है। परियोजना की अनुमानित लागत 9,000 करोड़ रुपये है।

तमिलनाडु इस परियोजना का विरोध करता है क्योंकि उसे लगता है इससे उसे मिलने वाला जल परिमाण प्रभावित होगा, विशेषकर “अनियंत्रित क्षेत्रों” से। वह तर्क देता है कि मेकेदाटु परियोजना नदी के बहाव को रोककर धारा को परिवर्तित कर देगी।

2007 के निर्णय में न्यायाधिकरण ने “अनियंत्रित क्षेत्रों” से बहाव पर भी विचार किया था। अनुमान के अनुसार, 80 अरब घन फीट पानी तमिलनाडु को कर्नाटक के कबिनी बांध व कृष्णराज सागर बांध और सीमा पर बिल्लिगुंडुलु स्थल के बीच बहते अनियंत्रित जल से मिल जाता है।

न्यायाधिकरण के अंतिम आदेश और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, दोनों में ही मेकेदाटु परियोजना पर कोई बात नहीं है। तमिलनाडु कहता है कि बेंगलुरु की जल आवश्यकताओं के लिए कर्नाटक के पास पहले से ही पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर है और मेकेदाटु परियोजना की कोई आवश्यकता नहीं है।

वहीं, कर्नाटक सरकार का तर्क है कि परियोजना के बाद भी तमिलनाडु को जल में तय भागीदारी मिलेगी। उसके अनुसार प्रस्तावित जलाशय तमिलनाडु में बहने वाले पानी को मासिक रूप से विनियमित करेगा, जैसा न्यायाधिकरण और सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था।