इन्फ्रास्ट्रक्चर
स्वास्थ्य बीमा तब काम नहीं आएगा जब स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी अवस्था में हो

2018 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई आयुष्मान भारत योजना का लक्ष्य 50 करोड़ लोगों तक पहुँचना था। यह योजना मुख्य रूप से बीमारी की स्थिति में वित्तीय समाधान उपलब्ध कराती है और इसका केंद्र वे परिवार हैं जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं।

कई निर्धन परिवारों को सोना या भूमि जैसी पारिवारिक संपत्तियों को भी बेचना पड़ जाता है जब किसी बीमारी का खर्चा उठाने की स्थिति उत्पन्न होती है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति होती है जहाँ अपने परिवार के किसी सदस्य के प्राण बचाने के लिए लोग अपनी जमा-पूँजी झोंक देते हैं।

पूरे विश्व एवं भारत में कोविड-19 के आगमन से पहले आयुष्मान भारत योजना ने कई लोगों को काफी राहत दी थी। कोरोना वैश्विक महमारी के बीच लगभग सभी स्वास्थ्य सुविधा प्रणालियों को जूझते हुए देखा गया, चाहे वह यूएस के नेतृत्व वाला बीमा मॉडल हो या यूके का एनएचएस मॉडल।

ताइवान जैसे कुछ अपवाद भी रहे जो अपना सम्मान बरकरार रख पाए क्योंकि वहाँ “उपचार से बेहतर है बचाव” के नारे को अधिक महत्त्व दिया गया। लेकिन मुख्य प्रश्न है कि क्या स्वास्थ्य सुविधा सिर्फ स्वास्थ्य बीमा तक ही सीमित है।

उत्तर अवश्य ही नहीं है और हाल की कुछ घटनाओं ने इसे सिद्ध भी कर दिया है। दिल्ली, बेंगलुरु और मुंबई में कोरोनावायरस से संक्रमित लोग साँस लेने के लिए संघर्ष कर रहे थे लेकिन उन्हें एक उपयुक्त अस्पताल बेड मिलना भी कठिन था।

बात सिर्फ भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर की नहीं है जिसकी सीमाओं का परीक्षण हुआ, बल्कि स्वास्थ्य अधिकारियों की उपलब्धता भी कठिन कसौटी से गुज़री और सरकार को निर्णय लेना पड़ा कि एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के विद्यार्थियों की भी सेवाएँ ली जाएँ।

नारायण हृदयालय के संस्थापक देवी शेट्टी की उदास टिप्पणी कि यदि भारत में 10 गुना अधिक डॉक्टर या नर्स होते तो स्थिति काफी बेहतर होती, एक मार्मिक दृश्य खड़ा कर देती है जो देश के मानव स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर की दयनीय स्थिति पर प्रकाश डालती है।

कर्नाटक के मंत्री बी श्रीरामलु (बाएँ) के साथ डॉ देवी शेट्टी (दाएँ)

स्वास्थ्य बीमा से बीमाकर्ता अस्पताल के विरोध में खड़े हो जाते हैं और अस्पताल रोगी के विरोध में। अस्पताल ऐसे रोगी का उपचार करना चाहते हैं जिसके पास भरपूर बीमा सुरक्षा हो। उनके लिए इसका लाभ उठाने का लोभ बहुत अधिक होता है।

संभवतः इससे समझा जा सकता है कि क्यों भारत में कोरोना हेतु बीमा के तहत 22,955 करोड़ रुपये का दावा किया गया जबकि मात्र 11,794 करोड़ रुपये का ही भुगतान अभी तक किया गया है। 2.5 लाख ग्राहकों के 11,161 करोड़ रुपये के दावे अभी भी लंबित हैं।

कहा जा रहा है कि अस्पतालों और बीमाकर्ताओं के बीच जैसा विरोधात्मक संबंध होता है, उसके कारण भुगतान करने में समस्या आ रही है। बीमाकर्ता मानते हैं कि अस्पताल उनसे अत्यधिक भुगतान करवाते हैं।

स्वास्थ्य बीमा के प्रणेता यूएस ने भी प्रयास किया है कि अस्पतालों पर स्वास्थ्य सुविधा प्रबंधन का दायित्व डाला जाए जिससे वे स्वयं को बीमाकर्ताओं की स्थिति में रखकर समझ सकें कि कैसे सेवाएँ दी जाती हैं।

इससे लाभ यह होता है कि बिचौलियों से बचा जा सकता है। वार्षिक प्रीमियम के भुगतान पर अस्पताल मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएँ देते हैं जैसा कि स्वास्थ्य बीमा में होता है। अंतर बस यह होता है कि रोगी बंध जाता है किसी विशेष अस्पताल या उसकी शाखाओं से व अपना उपचार कहीं और नहीं करवा सकता है।

प्रबंधित स्वास्थ्य सुविधा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि अस्पतालों को पहले से ही राशि मिल जाती है जिसका उपयोग वे अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर करने के लिए कर सकते हैं। साथ ही वे अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति अधिक सजग भी हो जाते हैं क्योंकि वे किसी ऐसी जाँच में नहीं पड़ना चाहते जिससे उनकी ग्राहक संख्या को हानि हो।

कोविड सुविधा की तैयारी में अमेरिकी डॉक्टर

अनावश्यक जाँचों को कम करने का लाभ स्वयं उस अस्पताल को मिलता है जो प्रबंधित स्वास्थ्य सुविधा प्रदान कर रहा है। यूके के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (एनएचएस) मॉडल के तहत सैद्धांतिक रूप से सभी नागरिक मुफ्त स्वास्थ्य सुविधा के लाभार्थी होंगे।

यह आकर्षक है, विशेषकर इस संदर्भ में कि यूके अपनी जीडीपी का 9.2 प्रतिशत इसपर खर्च करता है। यूएस की तरह ही कोरोनावायरस के कारण यह प्रणाली भी ध्वस्त हो गई थी जिसने संदेश भेजा कि अंततः जिस बात से फर्क पड़ता है, वह यह कि देश ने स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए क्या किया है।

चिकित्सक-जनसंख्या अनुपात में भारत को विकसित देशों की तरह बनना होगा। इसके लिए मेधावी छात्रों को अभियांत्रिकी या प्रबंधन क्षेत्र की बजाय चिकित्सा क्षेत्र की ओर आकर्षित करना होगा। भारतीय जनता विशेषज्ञता प्राप्त चिकित्सक की शिक्षा के लिए अत्यधिक शुल्क देने से बचना चाहती है।

उनकी दृष्टि होती है उस भारी वेतन पैकेज पर जो अभियांत्रिकी या प्रबंधन के क्षेत्र से उन्हें बैंक या म्युचुअल फंड में नौकरी करके मिलती है और विडंबना यह है कि इसमें अभियांत्रिकी पृष्ठभूमि से कई लोग आते हैं।

भारत में स्वास्थ्य राज्य की सूची का विषय है। संभवतः समय आ गया है कि संविधान में संशोधन करके केंद्र सरकार की जवाबदेही बढ़ाई जाए ताकि वे यूके के एनएचएस जैसी कोई संस्था बनाएँ इस वास्तविकता को समझते हुए कि गुणवत्ता-युक्त स्वास्थ सेवाओं तक पहुँच बहुत महत्त्वपूर्ण है।

पॉलिसीबाज़ार जैसे बीमा मंच स्वास्थ्य बीमाकर्ताओं को प्रीमियम के आधार पर वरीयता सूची में डालते हैं और किन अस्पतालों तक वे पहुँच देंगे, इसे अनदेखा कर देते हैं। प्रबंधित स्वास्थ्य सुविधा के परिवेश में उन्हें अस्पतालों के आधार पर वरीयता देनी होगी क्योंकि स्वास्थ्य सुविधा का संबंधी बीमाकर्ता से अधिक अस्पतालों से है।