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कार्बन फुटप्रिंट को कम करने का मार्ग भारतीय रेलवे कैसे प्रशस्त कर रहा है

विश्व के अधिकांश देश जलवायु परिवर्तन के लिए चिंतित हैं जिसके पीछे का कारण और प्रत्यक्ष होता जा रहा है- वातावरण में कार्बन की अभूतपूर्व वृद्धि। वर्तमान में जीवाश्म ईंधनों का जैसे उपयोग हो रहा है, उससे विश्व के औसत तापमान में 1-1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ोतरी की अपेक्षा है।

आर्कटिक और अटार्कटिक पर हिम द्रुत गति से पिघल रहा है और हिमस्खलन के समाचार सामान्य हो गए हैं। कई रिपोर्टों में चेतावनी दी गई है कि सन् 2100 तक समुद्र का स्तर 6 फीट बढ़ जाएगा जिससे समुद्र तट पर बसे कई शहरी क्षेत्र और नगर खतरे में आ जाएँगे।

खतरनाक समुद्री चक्रवातों, तूफानों, दावानलों और सूखा पड़ने की घटनाओं की दर में वृद्धि हुई है। समुद्र का तापमान बढ़ने से पशु और समुद्री जीव ध्रुवों की ओर असमान्य रूप से जा रहे हैं।

2015 में कॉप21 (कॉन्फ्रेन्स ऑफ पार्टीज़) ने बढ़ते तापमान को रोकने के लिए 2050 तक ग्रीनहाउस गैसों के शून्य उत्सर्जन की शपथ ली थी। 2026 के लिए एक और वैश्विक सम्मेलन की योजना है जहाँ विश्लेषण करके प्रतिज्ञा के प्रति प्रतिबद्धता को और सशक्त किया जाएगा।

यूएस कॉप21 से पुनः जुड़ गया है और चीन ने प्रण लिया है कि वह 2060 से पहले कार्बन न्यूट्रल (शून्य उत्सर्जन) हो जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने प्रण लिया है कि 2022 तक वैकल्पिक ऊर्जा उत्पादन क्षमता की भागीदारी 40 प्रतिशत की होगी और वन क्षेत्र बढ़ाकर 33 प्रतिशत किया जाएगा।

अभी तक, भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो अपने वादे के अनुसार चल रहा है। कुल ऊर्जा उपयोग की 10 प्रतिशत पूर्ति वैकल्पिक ऊर्जा से की जाती है। वैकल्पिक ऊर्जा की क्षमता 1.75 लाख मेगावाट है जिसमें सौर और पवन ऊर्जा की मुख्य भागीदारी है तथा 2022 तक लक्ष्य पूरा होने की अपेक्षा है।

विश्व की चौथी सबसे बड़ी रेलवे प्रणाली- भारतीय रेलवे डीज़ल के रूप में काफी जीवाश्म ईंधन का उपयोग करती है। भारत के कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में रेलवे का योगदान अत्यावश्यक है, जहाँ वे ऊर्जा स्रोतों और उपयोग कुशलता में परिवर्तन लाएँ।

भारतीय रेलवे का डीज़ल इंजन

इसी संदर्भ में भारतीय रेलवे ने कार्बन न्यूट्रल बनने के लिए कई प्रयास किए हैं और देश के ऊर्जा प्रण को पूरा करने के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है। डीज़ल की बजाय रेलवे विद्युत ऊर्जा को अपना मुख्य स्रोत बनाना चाहता है।

2014 से 2021 के बीच 24,000 मार्ग किलोमीटर (आर.किमी) का विद्युतीकरण हुआ जबकि 2007 से 2014 के बीच मात्र 4,337 आर.किमी विद्युतीकरण हुआ था। दिसंबर 2023 तक ब्रॉड गेज का शत प्रतिशत विद्युतीकरण होने की अपेक्षा है और 18,800 आर.किमी के साथ 71 प्रतिशत विद्युतीकरण हो चुक है।

पूर्ण विद्युतीकरण के बाद वार्षिक रूप से 14,500 करोड़ रुपये की बचत होगी। विद्युतीकरण कार्यक्रम से परिचालन लागत कम होगी, भारी ट्रेनों का वहन किया जा सकेगा, लंबी दूरियों को कम समय में तय किया जाएगा और कुल मिलाकर ऊर्जा उपयोग भी कम होगा।

इसके अलावा रेलवे नवाचार तकनीकों को खोजकर क्रियान्वित कर रहा है तथा कार्बन फुटप्रिंट और कम करने के लिए प्रबंधन तकनीकें भी विकसित कर रहा है। ऊपर लगे बिजली उपकरणों से डब्बों को सीधे आपूर्ति और एसी डब्बों के ऊर्जा कुशल उपकरणों का उपयोग करके 24-26 डिग्री.सी तापमान रखने से बिजली बचेगी।

विद्युत इंजनों की पुनः अभियांत्रिकी करके भारत में अधिक हॉर्सपावर (एचपी) वाले इंजन बनाए जा रहे हैं, विशेषकर 12,000 एचपी के और कंटेनर को दो तलों को बनाया जा रहा है। जब इनका उपयोग होगा तो वर्तमान की 25 किमी प्रति घंटा की गति की बजाया 50 किमी प्रति घंटा की गति हो जाएगी।

बेहतर सिग्नलिंग से देरी कम होगी और लंबी ट्रेनों से लागत कम होगी। 2014-14 में जहाँ 264 विद्युत लोकोमोटिव का विनिर्माण हुआ था, वहीं 2021-22 में अनुमानित 905 का विनिर्माण होगा जो डीज़ल से विद्युत के विकल्प पर शीघ्र स्थानांतरण में सहायक होगा।

12,000 एचपी का 100वाँ इंजन भारतीय रेलवे से मई में जुड़ा

रेलवे ने वैक्यूम तकनीक का उपयोग करने वाले बायो शौचालयों का उपयोग आरंभ किया है जिससे पानी बचाया जा सके। ट्रेनों की यांत्रिकी धुलाई, डिब्बों की यांत्रिकी सफाई, ट्रेनों में जल की त्वरित पंपिंग और अपनी संपत्ति में वर्षा जल संग्रहण से भी पानी की बचत की जा रही है।

डीज़ल से विद्युत लोकोमोटिव चुन लेने से ही कार्बन फुटप्रिंट को कम करने का लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सकता। आवश्यकता है कि विद्युत ऊर्जा स्वच्छ स्रोतों से मिले। वर्तमान में भारत की 70 प्रतिशत विद्युत ऊर्जा थर्मल संयंत्रों से आती है। इसे 2030 तक 50 प्रतिशत करने का लक्ष्य है।

रेलवे में 1,000 से अधिक स्टेशनों और 400 से अधिक सेवा भवनों की छत पर 114 मेगावाट सौर ऊर्जा के लिए सोलर पैनल लगाए हैं। भूमि पर 25,000 मेगावाट सौर ऊर्जा का लक्ष्य है जिसमें भंडारण सुविधा भी होगी।

उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए बाज़ार से 150 मेगावाट हरित ऊर्जा खरीदने की भी योजना है। इसके अलावा, सभी स्टेशनों, भवनों और रेलवे अधिष्ठानों में एलईडी बल्ब लगाए गए हैं। ऊर्जा कुशल बनने का रेलवे का प्रयास भारतीय अर्थव्यवस्था के हित में भी है जहाँ कम लागत पर मालवहन किया जा सकेगा।

वर्तमान के 27 प्रतिशत की बजाय 2030 तक रेलवे को मालवहन में 45 प्रतिशत की भागीदारी का लक्ष्य रखना चाहिए। सड़क पर मालवहन कम करके भी जीवाश्म ईंधन का उपयोग, कच्चे तेल की आयात माँग और कुल मिलाकर कार्बन फुटप्रिंट को कम किया जा सकता है।

कार्बन फुटप्रिंट कम करने और कॉप21 की प्रतिज्ञाओं को पूरा करने में भारत की सफलत इसपर निर्भर करती है की उर्जा के बड़े उपभोक्ता स्वयं में क्या परिवर्तन लाते हैं। इस परिवर्तन मार्ग को भारतीय रेलवे प्रशस्त कर रहा है, यह जानकर प्रसन्नता होती है।