इन्फ्रास्ट्रक्चर
हाल ही में आई एमबीए संस्थानों की रैंकिंग क्या सच में मायने रखती है?
28 जनवरी को फाइनेंशियल टाइम्स (एफटी) ग्लोबल एमबीए रैंकिंग 2019 प्रकाशित हुई जिसमें पूरी दुनिया के शीर्ष 50 प्रबंधन संस्थानों में चार भारतीय बी-स्कूलों को स्थान मिला। यह क्रमशः इस प्रकार हैं- सबसे पहले इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) फिर आईआईएम अहमदाबाद, फिर आईआईएम कलकत्ता और आखिरी में आईआईएम बैंगलोर जिसमें से आईएसबी हैदराबाद शीर्ष 25 बी-स्कूलों में स्थान बना पाया है।
आईएसबी को अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग में 24वीं रैंक मिली तो ये स्वाभाविक है कि भारत में एक चर्चा का विषय बनेगा। वहीं आईआईएम-बी और आईआईएम-सी को अपनी रैंकिंग में सुधार लाने की ज़रूरत है। दूसरी ओर आईआईएम-ए एक साल के भीतर 39 से 47 तक फिसल जाने और 2017 के बाद से लगभग 20 रैंक नीचे आने के कारण चर्चा में है। कहीं ना कहीं दाल में कुछ काला तो है।
आईएसबी को इससे क्या लाभ है? जैसा कि संस्था के डीन ने बताया की ज़ाहिर है सबसे महत्त्वपूर्ण कारक पूर्व छात्रों की वेतन वृद्धि है। बेशक महिला छात्रों और अन्य कारकों के संदर्भ में विविधता को भी गिना जाता है।
हमने रैंकिंग की कार्यप्रणाली जानने की कोशिश की और पाया कि इन रैंकिंगों में वेतन का सबसे अधिक महत्त्व है जो कि 20 प्रतिशत है  जो कि अ) स्नातक होने के तीन साल बाद औसत आय और ब) पूर्व एमबीए वेतन की वृद्धि से तुलना है।
एमबीए उम्मीदवार की सूची में जो अन्य महत्त्वपूर्ण मानदंड होने चाहिए वे सभी इस रैंकिंग में हैं लेकिन उन्हें कम भार दिया गया है। जैसे कि ‘पैसे वसूल है या नहीं’, ’करियर की प्रगति’ और ’निश्चित लक्ष्य हासिल करना’ इस जैसी प्रत्येक तत्वों को 3 प्रतिशत का भार दिया गया है। अंतर्राष्ट्रीय संकाय, छात्र और बोर्ड जैसे प्रत्येक 4 प्रतिशत में हैं और महिला संकाय और छात्रों को प्रत्येक में 2 प्रतिशत मिलें हैं।
हमारे शीर्ष चार संस्थानों का मापदंडों पर प्रदर्शन
भारतीय बी-स्कूलों में दस में से पाँच श्रेणियों में शीर्ष-10 स्थान पर हैं। विशेष रूप से सामान्य प्रबंधन और वित्त में दूसरे और तीसरे नंबर पर आईआईएम-ए और आईआईएम-सी की स्थिति सराहनीय है। संभवतः यह उनका धीमा और गहन प्रबंधन अध्ययन है जो इन शीर्ष स्थान पर आईआईएम को रखता है।
दूसरा यह कि अन्य एफटी रैंकिंग जो सितंबर में जारी की जाती हैं जैसे एफटी एमआईएम रैंकिंग वहाँ अपने आप में यह स्पष्ट करने की आवश्यकता है कि इनमें से कोई भी रैंकिंग कार्यक्रमों को ग्रेड करती है न कि बी-स्कूल को।
वर्तमान रैंकिंग में एमबीए कार्यक्रमों को रैंक किया जाता है जिन्हें पूर्व कार्य अनुभव की आवश्यकता होती है और अक्सर एक वर्ष के पाठ्यक्रम होते हैं जिन्हें पीजीपीएक्स, ईपीजीपी और जिनको अलग-अलग रूप में जाना जाता है। दूसरी ओर एफटी एमआईएम रैंकिंग ‘प्रबंधन में स्नातकोत्तर’ कार्यक्रमों को रैंक करती है जिसमें कम या कोई कार्य अनुभव की आवश्यकता नहीं होती है। हमें लगा कि इस बारे में शिक्षा, मानव संसाधन, आईआईएम संकाय के विशेषज्ञों में भी काफी भ्रम है।
एफटी एमआईएम रैंकिंग में भारत के शीर्ष संस्थानों ने कैसा प्रदर्शन किया निम्नलिखित है।
फिर से 100 में से शीर्ष -25 स्कूलों में तीन आईआईएम की हैं और वास्तव में पिछले एक साल में उनकी रैंक में सुधार हुआ है। आईएसबी के पास यह कार्यक्रम नहीं है और इसलिए वह भाग नहीं लेता है।
पाठ्यक्रम की अवधि और कार्य अनुभव की आवश्यकता के अलावा इन रैंकिंग में भौगोलिक स्थिति का भी अंतर है और अंतर यह है कि एफटी एमआईएम 2018 में ज्यादातर यूरोप के 27 देशों से कार्यक्रम हैं। एफटी ग्लोबल एमबीए रैंकिंग में 17 देशों के स्कूल भाग लेते हैं लेकिन 50 प्रतिशत से अधिक अमेरिकी बी-स्कूल शामिल हैं और दिलचस्प बात यह कि एफटी यूके का एक प्रकाशन है।
क्या इसे हल्के में लिया जा सकता है?
आईएसबी की रैंकिंग योग्यता से दूर जाने की कोशिश किए बिना अभी भी यह कह सकते हैं कि वेतन वैश्विक एमबीए रैंकिंग का सबसे महत्त्वपूर्ण निर्धारक है।
बी-स्कूल के पूर्व छात्र द्वारा किए गए स्व-सर्वेक्षण की रिपोर्ट में पता चलता है कि ना ही यह मुश्किल है और न ही असामान्य है कि वेतन को अंकित करते समय पूर्व छात्र स्वयं के स्कूल को बेहतर दिखाने के लिए अपने वेतन को बढ़ा-चढ़ा कर बता देते हैं।
कार्यप्रणाली अनुभाग से हमें यह भी साफ दिखाई देता है कि पूर्व छात्रों की प्रतिक्रिया को 61 प्रतिशत के भार साथ रैंकिंग का एक प्रमुख हिस्सा बन रही है। इस क्षेत्र के एक विशेषज्ञ कहते हैं, “कोई भी असंतुष्ट छात्र जिसका करियर उसके अनुसार सही नहीं चला, वह किसी भी संस्थान की रैंकिंग को आसानी से नीचे ला सकता है”।
इसके अलावा केवल 20 प्रतिशत पूर्व छात्रों को रैंकिंग में शामिल किया गया जो कि विशेष स्कूल से थे और इस बात का जवाब सर्वेक्षण में देने की आवश्यकता है। इस प्रकार तिरछे परिणामों की अधिक संभावना हो जाती है। इसलिए रैंकिंग को हल्के में लिया जा सकता है।
बी-स्कूलों की योग्यता पर किसी भी निष्कर्ष पर इतनी जल्दी न आने का एक और कारण यह है कि ये सर्वेक्षण तीन साल पहले या तीन साल में आंशिक रूप से प्रतिबिंबित होते हैं। इसलिए 2019 की रैंकिंग  में 2015 के पूर्व छात्र वर्ग को शामिल गया है। यह देखते हुए यह बात पाना मुश्किल है कि वर्तमान में कौन-सा बेहतर संस्थान है।
फिर अन्य एमबीए सर्वेक्षण भी हैं। जैसे कि द इकोनॉमिस्ट का 2018 के सर्वेक्षण में एमआईएम-ए को 49वाँ स्थान दिया गया था और एमआईएम-ए शीर्ष 100 की पूर्व सूची में एकमात्र भारतीय स्कूल था। कथित तौर पर एक स्कूल को रैंकिंग में आने से पहले दो दौर से गुज़रना होता है जो काफी मुश्किल माना जाता है। एक क्यूएस रैंकिंग है जिसमें एमआईएम-ए 48 वें स्थान पर, एमआईएम-बी 71वीं पर और आईएसबी 100वें नंबर पर है।
कोई इनमें कैसे सामंजस्य स्थापित करता है? वहाँ थोड़ी सी असंगतता तो है लेकिन इतना भी नहीं है जब आप देखते हैं कि भारतीय बिज़नेस स्कूलों के ये चार सबसे बड़े अधिकतर रैंकिंग में शीर्ष -100 में जगह बना लेते हैं। फिर भी इनमें सुधार की गुंजाइश है। डेलॉयट में एक वरिष्ठ सलाहकार कहते हैं “पुराने स्कूलों में एक पात्रता रवैया और एक निश्चित शालीनता है। उन्हें ये निकाल फेंकना चाहिए और प्रतिस्पर्धी बनना चाहिए। ”
संभावित पाठ्यक्रम में सुधार क्या हो सकते हैं? जहाँ आईआईएम आईएसबी से काफी पिछड़ रहे हैं जाहिर है अंतर्राष्ट्रीय संकाय प्राप्त करने से पाठ्यक्रम का मूल्य बढ़ेगा।
2015 के आईआईएम-ए पीजीपीएक्स क्लास के अनुराग सिंघल,सीए जो कि यूट्यूब पर एक करियर संरक्षक भी हैं,वो कहते हैं कि “आईएसबी आईआईएम से आगे है जब अंतरराष्ट्रीय संकाय को आकर्षित करने की बात आती है। वे अमेरिका में प्रोफेसर द्वारा अर्जित राशि के 60 प्रतिशत पर अपना वेतन निर्धारित करते हैं। मुझे लगता है कि आईआईएम संकाय के लिए वेतन आयोग द्वारा निर्धारित संरचनाओं का पालन करते हैं। आईआईएम-ए ने हाल ही में अपने एलुमिनी की मदद से अपने संकाय सदस्यों को पुरस्कृत करने के लिए जो अत्याधुनिक अनुसंधान में संलग्न हैं।
“हालाँकि आईएसबी तकनीकी रूप से गैर-लाभकारी है लेकिन इसमें एक बड़ा पेंच भी है की एक साल के पाठ्यक्रम के लिए लगभग 900 छात्र 35 लाख प्रति वर्ष का भुगतान करते हैं जबकि आईआईएम-ए पीजीपीएक्स में लगभग 135 छात्रों का वार्षिक भुगतान 30 लाख होता है।
किसके लिए रैंकिंग महत्त्वपूर्ण है?
इन रैंकिंग से नियोक्ता या भावी छात्रों में कौन प्रभावित होता है? हैदराबाद में स्थित एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के एचआर डीजीएम कहते हैं कि “भारतीय परिदृश्य में ज्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता। कंपनियाँ आईआईएम और आईएसबी आदि से छात्रों को लेती हैं क्योंकि उन्हें ऐसे लोग चाहिए जो सही और बेहतर काम कर सकें और आप इन सभी को एक जगह पर नहीं पा सकते हो। वे कहते हैं, “छात्रों को इनमें से किसी भी एक में प्रवेश करने में खुशी होगी और मुझे नहीं लगता कि वे संकायों आदि के बारे में प्रवेश के समय कोई प्राथमिकता रखते हैं।”
नए आईआईएम के अंतरराष्ट्रीय संबंध अधिकारी एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं: “एक समय के बाद इस बात का फ़र्क़ नहीं पड़ता कि आप आईआईएम-ए, बी, सी या हार्वर्ड, एलबीएस और इनसाइड से हैं!
इसी बीच दिल्ली के एक स्नातक कॉलेज में एक अर्थशास्त्र (ऑनर्स) के एक छात्र को सिंगापुर की एक फर्म से 38 लाख रुपये प्रतिवर्ष पैकेज का प्रस्ताव मिला। और आपको लगा कि आपको तत्काल प्लेसमेंट और उच्च वेतन के लिए एमबीए की आवश्यकता है?
समय आ गया है कि इस तेज़ी से आगे बढ़ती दुनिया में रैंकिंग पर पुनर्विचार किया जाए। विशेष रूप से इसलिए कि इसाबेल बेरविक ने जो कि एफटी के नए काम और करियर के संपादक हैं, वे और उनकी टीम का एक हिस्सा जो वर्तमान रैंकिंग को एक साथ संपादित करता है पर प्रशन चिह्न लगा दिया है!
स्वाति कमल स्वराज्य के स्तंभ लेखिका हैं।