इन्फ्रास्ट्रक्चर
कैसे भारतीय रेल बना स्वच्छता क्रांति का साक्षी

आशुचित्र- भारतीय रेलवे ने स्वछता को महत्त्व देते हुए कार्य किया है तथा उसके परिणाम दिखते हैं। यहाँ एक नज़र डालते हैं कि किस प्रकार से पिछले कुछ वर्षों में चीजें बदली हैं।

पिछले चार वर्षों में, स्वच्छ भारत मिशन के रूप में भारत विश्व के सबसे बड़े आचरण परिवर्तन कार्यक्रम का साक्षी बना है। 2014 में स्वच्छता 38 प्रतिशत थी जो 2018 में बढ़कर 83 प्रतिशत हो गई है। वहीं भारतीय रेलवे ने भी इस विकास कार्य के साथ अपने कदम निरंतर बढ़ाए हैं।

इसी वर्ष कुछ समय पूर्व “स्वच्छ भारत रेल रिपोर्ट” सामने आई थी, जिसमें स्पष्ट रूप से दर्शाया गया था कि ए1 स्टेशन (वार्षिक यात्री राजस्व 50 करोड़ से अधिक) तथा ए स्टेशन (वार्षिक यात्री राजस्व 6 करोड़ से 50 करोड़ तक) में स्वच्छता के स्तर में काफ़ी सुधार हुआ है।

वर्ष 2018 में इन स्टेशनों के औसतन स्वच्छता स्कोर में 17.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है। वहीं 2017 में शीर्ष 100 स्टेशनों पर 9 प्रतिशत की, अगले 100 स्टेशनों पर 14 प्रतिशत की, 201- 300 की श्रेणी के स्टेशनों पर 20 प्रतिशत तथा 301-407 की श्रेणी वाले स्टेशनों में 31 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई थी।

संपूर्ण स्वच्छता अंक

रिपोर्ट यह भी दर्शाती है कि 2017 की तुलना में स्वछता के पैमाने में रेलवे के 16 में से 10 ज़ोन में 10-20 प्रतिशत का, 4 ज़ोन में 20 प्रतिशत का तथा 2 ज़ोन में 10 प्रतिशत का सुधार देखा गया है।

रेलवे इस मुकाम तक कैसे पहुँच पाया

1.  ट्रेनों में जैव शौचालयों (बायो टॉयलेट) का निर्माण

वर्ष 2011 में भारतीय रेलवे ने ट्रेनों में जैव शौचालयों का निर्माण आरंभ कर दिया था। उस समय, ग्वालियर-वाराणसी बुंदेलखंड एक्सप्रेस में 57 जैव शौचालयों का निर्माण किया गया था। तब से लेकर अभी तक, रेलवे ने क़रीब 1,25,000 जैव शौचालयों का निर्माण ट्रेनों में कराया है। यह कोचिंग बेड़े का कुल 60 प्रतिशत है।

एनडीए सरकार के कार्यकाल में जैव शौचालयों के निर्माण में बहुत अधिक बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2017-2018 में रेलवे ने सर्वाधिक जैव शौचालयों का निर्माण ट्रेनों के कोच में किया है जो कि निर्धारित 40,000 जैव शौचालयों के लक्ष्य से 40 प्रतिशत अधिक है तथा 2016- 2017 में निर्मित 34,134 जैव शौचालयों की तुलना में 64 प्रतिशत अधिक है।

वर्षवार जैविक-शौचालय की स्थापना

यह एक महत्त्वपूर्ण कदम रहा क्योंकि सरकार ने अनुमान लगाया था कि 4000 मिलियन टन मल ट्रेनों के कोच से हर दिन निकलता है। तथा 60 प्रतिशत कोच में जैव शौचालयों के कारण खुले में होने से काफ़ी घटा है।

जैव शौचालय में, जो कि शौचालय के नीचे लगाए गए हैं, वहाँ इंसानी मल को एनेरोबिक बैक्टेरिया के द्वारा पानी तथा गैसों में परिवर्तित किया जाता है। गैस को छोड़ दिया जाता है व पानी को रेलवे ट्रैक के क्लोरीनेशन हेतु उपयोग में लाया जाता है और इस प्रकार मल को ट्रैक पर गिरने से रोक लिया जाता है।

हवाई जहाज़ों की तरह, रेलवे बायो वैक्यूम टॉयलेट का परीक्षण भी कर रही है, इनसे पानी की ज़रूरत को कम किया जा सकेगा। इनका 500 कोचों में परीक्षण चल रहा है, यदि यह परीक्षण सफल रहा तो बड़े पैमाने पर इनका निर्माण किया जाएगा।

2. सफाई कार्य हेतु बजट में बढ़ोतरी

रेलवे ने डिविज़नल रेलवे प्रबंधकों को यह अधिकार दिया है जिससे वे लंबे अंतराल के लिए 100 करोड़ तक के सफाई के अनुबंध कर सकते हैं। पूर्व में यह राशि 20 करोड़ ही थी।

3. सफाई मशीनों का बड़े पैमाने पर उपयोग

रेलवे, 520 स्टेशनों पर एकीकृत मशीनी सफाई की तकनीक से सफाई करवा रही है वहीं मार्च 2019 तक इस तकनीक को 60 से अधिक स्टेशनों तक पहुँचाया जाएगा। साथ ही कचरा हटाने के लिए ऑटोमेटेड रेल माउंटेड मशीनों का उपयोग भी किया जा रहा है। ताकतवर वैक्यूम क्लीनर से लैस यह मशीनें ट्रैक के आसपास के कचरे को साफ करने में उपयोगी हैं।

स्वचालित रेल सवार मशीन

4. स्वच्छता के लिए किए जाने वाले विभिन्न स्वतंत्र सर्वेक्षण

रेलवे ने बाहरी स्त्रोतों की मदद से स्टेशनों तथा ट्रेनों में स्वच्छता परीक्षण हेतु स्वतन्त्र सर्वेक्षण कराए हैं। इसी प्रकार के एक सर्वे के आधार पर, जो कि भारत की गुणवत्ता परिषद ( क्यूसीआई) द्वारा किया गया था, रेलवे ने पूरे देशभर में स्टेशनों की ए तथा ए1 श्रेणियाँ बनाई हैं। इसी तरह का एक सर्वे भारतीय रेल खानपान एवं पर्यटन निगम द्वारा किया गया था, जिसमें स्टेशनों पर यात्रियों से वार्ता की गई थी।

रेलवे परिणामों को तीन मापदंडों के आधार पर विश्लेषण करती है- वाहन पार्किंग, मुख्य प्रवेश द्वार, मुख्य प्लेटफ़ॉर्म, और यात्री प्रतीक्षालयों में स्वच्छता का मूल्यांकन (33.33 प्रतिशत), क्यूसीआई के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण (33.33 प्रतिशत) तथा यात्रियों की प्रतिक्रियाएँ (33.33 प्रतिशत)। रेलवे के स्वच्छता पोर्टल के आधार पर मूल्यांकन के आधार पर 333.3 में से 195.7 अंक, निरीक्षण के आधार पर 204.5 अंक तथा प्रतिक्रियाओं के आधार पर 240.6 अंक दिए गए हैं।

रेलवे ने 24×7 समय के लिए नियंत्रण कक्ष भी निर्मित किया है जो कि सर्वे की निष्पक्षता तथा संगति को सुनिश्चित करता है।

5. ट्रेनों में हाउसकीपिंग की सुविधा को बढ़ाना

भारतीय रेलवे ने ट्रेनों में रख-रखाव तथा आवश्यकता के अनुसार “क्लीन माय कोच” जैसी सुविधाओं में बढ़ोतरी की है। ऑनबोर्ड हाउसकीपिंग की सुविधा मार्च 2018 तक 1003 से अधिक आने-जाने वाली रेलगाड़ियों में उपलब्ध कराई थी, जो कि 2014 की तुलना में ढाई गुना अधिक थी। यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान 2014 में यह सुविधा केवल 416 ट्रेनों के फेरों में ही थी।

वहीं रेलवे ने रख-रखाव की नई प्रक्रिया को आरंभ किया है जहाँ यात्रियों की प्रतिक्रिया के अनुसार हाउसकीपिंग ठेकेदारों को राशि प्रदान की जाती है।

आवश्यकता के अनुसार “क्लीन माय कोच” सुविधा लंबी दूरी की 970 ट्रेनों के फेरे में दी जा रही है।

अन्य चीजों में, रेलवे, पटरियों के विभिन्न हिस्सों को मल मुक्त कर रही है। 2016-2017 में लगभग 6 खंडों को तथा 2017- 2018 में 21 खंडों को “ग्रीन ट्रेन कॉरिडोर” घोषित किया है। वहीं धार्मिक, सांस्कृतिक, तथा ऐतिहासिक स्थलों जैसे, भोपाल, मधुबनी के स्टेशनों के सौन्दर्यीकरण हेतु क्षेत्रीय कलाकारों की मदद से कदम उठाए जा रहे हैं।

इस प्रकार, भारतीय रेलवे, स्वच्छता संग्राम का केंद्र नज़र आती है।

प्रखर गुप्ता स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @prakhar4991 द्वारा ट्वीट करते हैं।