इन्फ्रास्ट्रक्चर
निकोबार द्वीपसमूह पर अंतर्राष्ट्रीय ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल के निर्माण ने पहली बाधा की पार

ग्रेट निकोबार द्वीप पर ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ने पहली बाधा पार कर ली है। इस योजना की वैचारिक शुरुआत नीति आयोग से हुई थी।

मार्च और अप्रैल में कई बैठकों के बाद पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 15-सदस्यीय पर्यावरण मूल्यांकन सिमिति ने “प्रस्ताव को संदर्भ की शर्तें दिए जाने का सुझाव दिया।”

योजना का प्रस्ताव है कि ग्रेट निकोबार पर एक ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफिल्ड अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, टाउनशिप और क्षेत्र विकास तथा 450 मेगावॉल्ट ऐम्पीयर का गैस एवं सौर्य ऊर्जा आधारित विद्युत संयंत्र बनाया जाए।

यह द्वीप निकोबार द्वीपसमूह के दक्षिणी छोर पर स्थित और सबसे बड़ा द्वीप है। भारत का सबसे दक्षिणी क्षेत्र भी यही है। पहले, 17 और 18 मार्च को हुई बैठक में समिति ने इस प्रस्ताव को टाल दिया था क्योंकि उन्हें प्रस्तावकर्ता से अतिरिक्त जानकारियाँ चाहिए थीं।

प्रस्ताव के अनुसार, ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिणी-पूर्वी भाग में स्थित गलथिया की खाड़ी में अंतर्राष्ट्रीय कन्टेनर ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल बनाया जाएगा। भारतीय महासागर और दक्षिण चीन सागर को सबसे कम कम दूरी से जोड़ने वाले मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी छोर से यह मात्र 90 किलोमीटर दूर है।

ट्रान्सशिपमेंट का अर्थ होता है कि एक जहाज़ से किसी कारगो को उतारकर दूसरे जहाज़ पर चढ़ाया जाए जो उसे गंतव्य बंदरगाह तक ले जाएगा। छोटे जहाज़ कारगो कन्टेनरों को उन बंदरगाहों से ट्रान्सशिपमेंट केंद्र पर लाते हैं जहाँ तक गहराई सीमा के कारण बड़े जहाज़ नहीं पहुँच पाते।

भारत के कई बंदरगाहों की गहराई क्षमता बड़े जहाज़ों को स्थान देने की नहीं है। ऐसे में छोटे जहाज़ बंदरगाहों से जो कारगो कन्टेनर ले जाते हैं, उन्हें ट्रान्सशिपमेंट केंद्र पर खाली किया जाता है और फिर बड़े जहाज़ों पर लादा जाता है जहाँ से अंतिम गंतव्य स्थान तक उनका परिवहन होता है।

आयात के मामले में बड़े जहाज़ कोलंबो और सिंगापुर जैसे ट्रान्सशिपमेंट केंद्र पर कारगो लेकर आते हैं जहाँ उन्हें उतारा जाता है और फिर छोटे जहाड़ों पर लाजा जाता है जो छिछले बंदरगाहों तक पहुँच सकते हैं।

बड़े जहाज़ों पर कंटेनर के परिवहन को अच्छा माना जाता है क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था का स्तर बढ़ता है तथा परिचालन का खर्च बचता है। निर्यातकों और आयातकों के लिए मालवहन शुल्क घटता है जिससे वे प्रतिस्पर्धा में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

आज भारत में आने-जाने वाले 25 प्रतिशत कंटेनरों का कोलंबो, सिंगापुर, क्लांग (मलेशिया) और जेबेल अली (संयुक्त अरब एमीरात) जैसे विदेशी बंदरगाहों पर ट्रान्सशिपमेंट होता है।

इस ट्रान्सशिपमेंट में 80 प्रतिशत से अधिक भागीदारी कोलंबो, सिंगापुर और क्लांग बंदरगाहों की है। कोलंबो बंदरगाह के कुल कंटेनर ट्रान्सशिपमेंट मात्रा का 45 प्रतिशत भाग भारत के कंटेनरों का ही होता है।

इस प्रकार भारतीय बंदरगाह प्रति वर्ष 20 करोड़ डॉलर का राजस्व खो देते हैं जो उन्हें मिल सकता था। “अनुमान है कि इससे अर्थव्यवस्था को इससे कुल 2,000-4,5000 करोड़ रुपये का नुकसान होता होगा (यदि हम बंदरगाहों के लिए दो-तीन गुना के आर्थिक कारक का आकलन करें।”, रिपोर्ट में कहा गया।

“यदि हम क्षेत्र के अन्य देशों के कारगो का ट्रान्सशिपमेंट करने के अवसर को देखें तो यह नुकसान और अधिक होगा।”, सागरमाला पोर्टल की रिपोर्ट में आगे कहा गया। विशेषज्ञों का मानना है कि अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह पर यदि कोई भारतीय टर्मिनल बनाया जाता है तो वह इस कंटेनर ट्रैफिक का काफी भार ले सकता है।

यह टर्मिनल बांग्लादेश और म्यान्मार सहित क्षेत्र के अन्य देशों के कंटेनर के लिए ट्रान्सशिपमेंट केंद्र के रूप में भी उभर सकता है। अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह के ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल के लिए गलथिया की खाड़ी तकनीकी और वित्तीय दृष्टि से सबसे व्यवहार्य स्थान है।

यह भारत के पूर्वी तट, बांग्लादेश और म्यान्मार से क्षेत्र के वर्तमान ट्रान्सशिपमेंट केंद्रों- सिंगापुर तथा क्लांग से अधिक निकट होगा। बंदरगाह, शिपिंग एवं जलमार्ग मंत्रालय की वेबसाइट पर 2015 की रिपोर्ट बताती है कि बांग्लादेश और म्यान्मार के लगभग 70 प्रतिशत कारगो का ट्रान्सशिपमेंट सिंगापुर में होता है।

यदि अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह पर एक ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल बन जाता है तो कुछ मात्रा में यहाँ से भी ट्रान्सशिपमेंट होगा। 200 किलोमीटर चौड़े सिक्स डिग्री चैनल से गलथिया की खाड़ी का ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल निकट होगा जहाँ से मलक्का जलडमरूमध्य से गुज़रने वाला अंतर्राष्ट्रीय सामान जाता है।

इस क्षेत्र में 18-20 मीटर तक की गहराई वाले जहाज़ों को लगाया जा सकता है जिसका अर्थ हुआ कि इस टर्मिनल पर बड़े जहाज़ भी आएँगे। भले ही पर्यावरण मूल्यांकन समिति ने पहली बाधा तो पार कर दी है लेकिन साथ ही सरकार को अन्य स्थलों का निरीक्षण करने के लिए भी कहा है।

“अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रान्सशिपमेंट टर्मिनल के निर्माण व परिचालन का पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर प्रभाव कैसा पड़ेगा, विशेषकर जहाज़ों के आवागमन से कछुओं पर, इसपर अधिक विवरणात्मक अध्ययन करके गलथिया की खाड़ी के अतिरिक्त स्थलों को खोजा जाना चाहिए।”, समिति ने कहा।