इन्फ्रास्ट्रक्चर
दिल्ली के प्रदूषण का समाधान है सार्वजनिक परिवहन लेकिन यह कब और कैसे होगा

प्रसंग- कई वर्षों बाद दिल्ली की सड़कों पर नई बसें उतारी जाएँगी जो स्वागत योग्य प्रयास है लेकिन मेट्रो के चौथे चरण पर भी कार्य किया जाना उतना ही आवश्यक है।

2010 से 2018 तक आठ वर्षों में दिल्ली में वाहनों के कारण प्रदूषण में 40 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। डीटीसी ने पिछले आठ वर्षों से अपने वाहन समूह में कोई नई बस नहीं जोड़ी और क्लस्टर स्कीम के तहत भी चार वर्षों से दिल्ली में कोई नई बस नहीं लाई गई है। इस दौरान दिल्ली मेट्रो कुछ हद तक शहर की आवश्यकताओं की पूरक बनी लेकिन अंतिम छोर तक संयोजकता न दे पाने के कारण प्रदूषण स्तर को घटा न सकी। साथ ही इसके चौथे चरण के प्रस्ताव को 2014 में पारित हो जाना चाहिए था लेकिन यग अभी तक अटका हुआ है।

प्रदूषण से निपटने में केजरीवाल सरकार की विफलता प्रत्यक्ष है और इसका सबसे बड़ा कारण सार्वजनिक परिवहन की अप्रभावशीलता रही है। सफर-इंडिया (2018) की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में 40 प्रतिशत पीएम 2.5 प्रदूषण वाहनों के कारण होता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि दिल्ली में 11,000 बसों की आवश्यकता है जबकि दिल्ली सरकार के पास मात्र 5,279 बसें ही हैं। जहाँ बीजींग में प्रति लाख लोगों पर 107 बसें हैं, वहीं दिल्ली में 17।

दिल्ली में आधे से अधिक लोग निजी वाहनों का उपयोग करते हैं जो प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण है। विभिन्न परिवहन माध्यमों की सटीक सवारी संख्या निकालना कठिन है लेकिन अनुमानित रूप से निम्न डाटा निकाला गया है-

मेट्रो और बसों, दोनों के क्रियान्वयन में हो रहे विलंब को लेकर दिल्ली सरकार के पास अपने कारण हैं। मेट्रो के लिए केंद्र और राज्य सरकार के बीच खर्च वहन के अनुपात पर सहमति न बन पाना बाधा बना हुआ है, वहीं न्यायालय के स्थगन निर्देश से बसों को क्रियान्वित करने की प्रक्रिया में देरी हुई। हालाँकि, दीर्घ प्रतीक्षा के बाद अब 4,000 बसें खरीदने के निर्णय को स्वीकृति मिल गई है।

वास्तविकता में शुरुआती दौर में अतिरिक्त बसों के ठहराव हेतु भूमि के अभाव और दिल्ली ट्रांस्पोर्ट कॉर्पोरेशन (डीटीसी) द्वारा वाहनों की खरीद के लिए जारी किए गए टेंडरों की विफलता के कारण इतना विलंब हुआ। इन सबके बाद जब दिल्ली सरकार सितंबर 2017 में 2,000 स्टैंडर्ड फ्लोर बसों को समूह में जोड़ने का प्रस्ताव लाई तब एक जनहित याचिका के कारण दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस निर्देश पर रोक लगा दी।

एक दिव्यांग व्यक्ति निपुण मल्होत्रा द्वारा दायर की गई जनहित याचिका का कहना था कि दिल्ली में केवल लो फ्लोर बसों को ही लाया जाना चाहिए क्योंकि स्टैंडर्ड फ्लोर बसें दिव्यांगजनों के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। हालाँकि, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने दिल्ली सरकार को स्टैंडर्ड फ्लोर बसों में दिव्यांगजनों के लिए हाइड्रॉलिक लिफ्ट लगाने का निर्देश देते हुए फरवरी 2019 में इसकी अनुमति दे दी।

नई जोड़ी जा रही 4,000 बसों में 1,000 स्टैंडर्ड फ्लोर बसों के अलावा 2,000 लो फ्लोर बसें और 1,000 इलेक्ट्रिक बसें भी होंगी। इलेक्ट्रिक बसों के लिए टेंडर 2 अगस्त को निकाला जाएगा, दिल्ली के परिवहन मंत्री कैलाश गहलोग ने बताया। ये बसें जनवरी से अप्रैल 2020 तक सड़कों पर आएँगी। लो फ्लोर बसें नवंबर से शुरू होकर मई 2020 तक सड़कों पर आ जाएँगी।

अपनी इलेक्ट्रिक वाहन नीति में दिल्ली ने 2023 तक 50 प्रतिशत इलेक्ट्रिक बसों का लक्ष्य रखा है। प्रति बस 75 लाख रुपये या बस की लागत की 60 प्रतिशत राशि, दोनों में से जो भी कम हो, की सब्सिडी दिल्ली सरकार देगी। दिल्ली सरकार द्वारा 1,000 ई-बसों को लाना देश में ई-वाहनों का पहला सबसे बड़ा जत्था होगा। इन वाहनों के चार्जिंग के लिए छह डिपो सुनिश्चित किए गए हैं जहाँ ये बसें रात भर चार्ज होंगी। इसके लिए कैबिनेट ने 800 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।

पर्यावरण प्रदूषण (निरोध एवं नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) की 1 जुलाई 2019 जारी की गई रिपोर्ट ने दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन को सही दिशा और गति प्रदान करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप की माँग की है। दिल्ली मेट्रो के चौथे चरण के काम को आगे बढ़ाने के लिए रिपोर्ट सुझाती है कि इसके तीन प्राथमिकता वाले गलियारों पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अधीन कार्य शुरू कर दिया जाए और जब तक ज़मीनी स्तर पर कार्य शुरू होगा तब तक इन मतभेदों का भी समाधान कर लिया जाएगा।

कुल छह गलियारों के साथ 103.94 किलोमीटर लंबा मेट्रो का चौथा चरण महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह शहर के कई भागों को जोड़ते हुए सवारी संख्या बढ़ाएगा। इस परियोजना की विवरणिका अनुमान लगाती है कि यह 18.6 लाख नए यात्रियों को जोड़ेगी।

मेट्रो रेल नीति अगस्त 2017 के अनुसार भारत सरकार अधिकतम परियोजना राशि का 20 प्रतिशत ही देगी लेकिन इसका स्वामित्व 50 प्रतिशत होगा। इसपर विरोध जताते हुए दिल्ली सरकार का कहना है कि यदि स्वामित्व बराबरी का है तो केंद्र को बराबर खर्च भी उठाना चाहिए। साथ ही उसकी अन्य दो शर्तें हैं कि क्रियान्वयन में कोई घाटा होता है तो केंद्र उसमें 50 प्रतिशत भागीदारी रखे और जीका के ऋण की भरपाई का दायित्व राज्य सरकार पर न आए।

अप्रैल में दिल्ली सरकार ने दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) को निर्देश दिया था कि जब तक केंद्र इन सुझावों को प्रस्ताव में सम्मिलित नहीं करता है, तब तक चौथे चरण का कार्य शुरू न किया जाए। इसपर प्रतिक्रिया देते हुए शहरी कार्य मंत्रालय के सचिव दुर्गा शंकर मिश्रा ने जनहित में कार्य जारी रखने की अपील के साथ इन शर्तों को हटाने का निवेदन किया है। उनका कहना है कि ये शर्तें मेट्रो नीति के विरुद्ध हैं।

इसका समाधान सुझाते हुए ईपीसीए कहता है कि जहाँ तक क्रियान्वयन घाटे का प्रश्न है तो पिछले पाँच वर्षों में डीएमआरसी का कोई घाटा नहीं हुआ है और परियोजना विवरणिका भी पर्याप्त आय की ओर संकेत करती है। इसी प्रकार ऋण चुकाने के लिए वित्तीय प्रबंधन आय और व्यय को ध्यान में रखकर किया गया है। साथ ही डीएमआरसी को कभी भी ऋण चुकाने में परेशानी नहीं हुई है तो यह सोचना गलत होगा कि नए चरण में कुछ बदल जाएगा।

केंद्र और राज्य बराबरी का खर्च उठाए, इस शर्त में डीएमआरसी के अनुसार प्राथमिकता वाले तीन गलियारों में 1,223.6 करोड़ की उलझन है। इसी प्रकार कर में असहमति के कारण 162.72 करोड़ रुपये की उलझन है। इस तरह डीएमआरसी के अनुसार वित्तीय शर्तों के कारण 1,386.32 करोड़ रुपये का अंतर हो रहा है।

वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार को तीन गलियारों के लिए 7,884.07 करोड़ रुपये का खर्च उठाना होगा लेकिन दिसंबर 2018 में इसने 5,994.5 करोड़ रुपये की ही स्वीकृति दी है। इस प्रकार देखा जाए तो वित्तीय शर्तों में लगभग 1,800 करोड़ रुपये का अंतर है। इस अंतर की पूर्ति हेतु दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) द्वारा चौथे चरण के लिए दी जा रही 5,000 करोड़ रुपये की राशि का उपयोग किया जा सकता है। या फिर दिल्ली सरकार अपने बजट में इस भुगतान के लिए प्रावधान बना सकती है।

ईपीसीए के सुझावों को मानते हुए दिल्ली सरकार को शहर की परिवहन समस्या का हल करने के लिए जल्द आगे बढ़ना चाहिए। साथ ही राज्य और केंद्र के मध्य असहमतियों को सुलझाने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप भी गलत नहीं होगा। नई बसों को सड़कों पर लाने के साथ-साथ दिल्ली सरकार को भविष्य के विषय में भी सोचना होगा क्योंकि डीटीसी की सभी बसें आठ वर्ष से अधिक पुरानी हैं जिन्हें शीघ्र ही बदलना होगा।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।