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उड्डयन पर कोविड-19 का कैसे प्रभाव पड़ा जो गतिशील क्षेत्र आज मंद हो गया

इस वर्ष की शुरुआत तक भारत का उड्डयन क्षेत्र उठाव पर था। यात्री संख्या पिछले दशक की तुलना में घरेलू उड्डयन में 3.2 गुना और अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में 2.1 गुना हो गई तथा भविष्य के लिए अनुमान लगाया गया था कि 2028 तक वृद्धि दर दो अंकों में रहेगी। लेकिन ये सारी बातें कोरोना काल के आरंभ से पहले की हैं।

उस समय मेट्रो शहरों के बीच दिन भर आवागमन चलता रहता था, कई स्थानों के लिए विदेश यात्रा का किराया देश के भीतर ही हवाई यात्रा के किराए से सस्ता था और इसी प्रकार अधिक से अधिक लोग हवाई यात्रा का लाभ उठा रहे थे लेकिन फिर महामारी ने सभी को अपनी चपेट में ले लिया। इसके बाद से बड़े परिवर्तन देखने को मिले।

अधिकांश परिवर्तन डर के कारण हुए, भय से ही लोगों का यात्रा स्वभाव धीरे-धीरे परिवर्तित हो रहा है। डर के कारण लोगों का व्यवहार दो छोरों पर बँट जाता है- कुछ लोग लड़ते हैं, कुछ पलायन करते हैं। इस भावना का उपभोक्ता अनुभव पर भी प्रभाव पड़ता है लेकिन इसके निपटान के लिए साधन सीमित हैं।

एयरलाइन्स ने लोगों के मन से भय निकालने के लिए सूचना साझाकरण, आँकड़ोंं को दोहराना और कई स्थानों पर सामाजिक साक्ष्य के उपयोग का सहारा लिया। लेकिन फिर भी महामारी जारी है और लोगों के मन में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके प्रति भय भी विद्यमान है। संभवतः इसलिए क्योंकि माना जाता है कि हवाई यात्राओं के कारण ही विश्व भर में महामारी फैली।

महामारी के दौरान हवाई यात्रा

साथ ही यात्रा अनुभव के दौरान कई लोगों का सामना भी होता है। यदि हर अनचाहे आमना-सामना को एक खतरे के रूप में देखा जाए तो पूरे यात्रा के अनुभव में खतरा काफी बढ़ जाता है। कुल मिलाकर लोग हवाई यात्रा से नहीं डर रहे हैं बल्कि संक्रमण का भय लोगों को रोक रहा है।

इस भय के कारण न सिर्फ यात्री संख्या में भारी गिरावट आई है बल्कि बुकिंग पैटर्न भी परिवर्तित हुए हैं। बुकिंग पैटर्न दर्शाता है कि अब लोग निर्धारित यात्रा से कुछ दिवस पूर्व ही बुकिंग कर रहे हैं। यहाँ तक कि यात्रा से 24 घंटे पूर्व तक भी 10-12 प्रतिशत की बुकिंग सामान्य बात हो गई है।

विमान क्षमता के 60 प्रतिशत के आसपास यात्री सफर कर रहे हैं, यह आँकड़ा सुखद है लेकिन दुखद बात यह है कि यात्री क्षमता पर नियमों के कारण हम इस आँकड़े पर पहुँच पा रहे हैं। इसके अलावा सरकार ने यात्रा शुल्क पर भी बाध्यता रखी है जिससे बुकिंग संख्या और प्रभावित हो रही है।

यदि ये बाध्यताएँ हटा दी जाएँ तो यात्री संख्या घटेगी, यात्रा शुल्क गिरेगा और पहले से तंग चल रहे उड्डयन क्षेत्र को और झटका लगेगा। यात्रा के प्रति भावना महामारी को नकारने से लेकर उदासीनता तक है और इससे निपटने के लिए संघर्षशील व असहायक रवैया और नुकसान पहुँचा रहा है।

एयरलाइन्स उच्च कुशलता वाले पार्टिकुलेट अब्ज़ॉर्बिंग (हेपा) फिल्टर्स और संक्रमित होने की न्यूनतम संभावनाओं की बात करती हैं लेकिन हवाई अड्डों के दृश्य, विशेषकर सुरक्षा जाँच के समय, इस बात का प्रमाण हैं कि शारीरिक दूरी नहीं बनाई जा रही है।

दिल्ली हवाई अड्डे पर शारीरिक दूरी नियमों के उल्लंघन का दृश्य

यात्रा करने वालों की जनसांख्यिकी से यात्रियों के मनोभाव की पुष्टि की जा सकती है। वे दिन गए जब व्यापारी, छात्र, छुट्टी मनाने जाने वाले लोग, सप्ताहांत पर यात्रा करने वाले, प्रीमियम यात्री और कॉरपोरेट यात्री, सभी सफर किया करते थे। वर्तमान में यात्रा को सिर्फ दो ही श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- आवश्यक यात्रा और अनावश्यक यात्रा। डाटा इसकी पुष्टि करता है।

यात्रा की प्रकृति भी बदल रही है। छोटी दूरी के लिए लोग पुनः सड़क यात्रा को चुन रहे हैं और वह भी अधिकांश रूप से निजी वाहन में। इसके अंतर्गत व्यापार के लिए यात्रा और गैर-व्यापारी यात्रा दोनों आ जाती है। इसी क्षेत्र में उड्डयन क्षेत्र को उठने में सर्वाधिक समय लगेगा।

इसके अलावा बस यात्रा भी खुल चुकी है जो हवाई यात्रा से सस्ती होती है और इसमें हवाई यात्रा से कम बाधाएँ होती हैं व सिर्फ शहरों को नहीं बल्कि गाँवों को भी जोड़ती है। वास्तव में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से उत्तर प्रदेश के शहरों तक जाने में लोगों को हवाई यात्रा से दूर बसें ले गई हैं, न कि रेलगाड़ी। विकास के साथ जैसे-जैसे सड़कें बेहतर होंगी और वाई-फाई सर्वव्यापी होगा, बस और लोगों को आकर्षित कर हवाई यात्रा से दूर करेगी।

लंबी यात्रा के लिए अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि लोग रेल को चुनेंगे या हवाई यात्रा को। फिर भी कुछ ट्रेंड किसी विशेष पैटर्न पर संकेत कर रहे हैं। कुछ सप्ताह में अधिक यात्रियों की यात्रा की दिशा बदल गई है। जैसे, जब लॉकडाउन खुले थे और हवाई सेवाओं को अनुमति मिली थी, तब उत्तर प्रदेश और बिहार के लिए विमानों में यात्रियों की भारी संख्या थी लेकिन अब एक परिवर्तन दिखाई दे रहा है।

कुछ विसंगतियाँ गोवा जैसी जगहों के लिए ट्रैफिक में भी देखी गई जहाँ के लिए हाल ही में अधिक संख्या में लोग गए। यह कितने समय तक चलेगा वह देखने योग्य होगा और यूरोप में जैसे छुट्टी मनाने के स्थानों पर हुआ, वैसे इन शहरों में वायरस की दूसरी लहर की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

अंतर्राष्ट्रीय उड़ान की बात करें तो अधिकांश समय तक विमान सेवा को बंद ही रखा गया है। सरकार ने 18 देशों के साथ यात्रा बबल की व्यवस्था की है और अन्य देशों से भी वार्ता जारी है। लेकिन इस व्यवस्था में खाली दो देशों के बीच बिंदु से बिंदु तरह की यात्रा हो पाती है।

कोरोना काल में अंतर्राष्ट्रीय उड़ान

विभिन्न देशों में एकांतवास के नियम भिन्न हैं। दुबई और हॉन्ग कॉन्ग जैसे स्थान एयरलाइन्स पर जुर्माना भी लगाने लगे हैं यदि वे इस बात की पुष्टि न कर पाएँ कि उनके सभी यात्री कोरोना नेगेटिव हैं। हालाँकि इन शहरों में अनुमति मिल गई है कि वे वहाँ से दूसरे देश की फ्लाइट ले सकें। ऐसा होता रहेगा जब तक देश अपनी सीमाओं को बंद रखेंगे।

विडंबना यह है कि विपरित विचारों के बावजूद सभी का निष्कर्ष सीमाओं को बंद रखने के पक्ष में ही है। जो देश कोविड से सफलतापूर्वक निपट रहे हैं और जो देश इससे निपटने में चुनौती का सामना कर रहे हैं, सभी का निष्कर्ष एक ही है कि सीमाओं को बंद रखा जाए।

सबसे ज़रूरी बात यह कि प्रीमियम माँग धीमी पड़ चुकी है और जब माँग लौटेगी तो यही अंतिम क्षेत्र होगा जिसमें माँग पुनः जीवित होगी। कार्यालयों में ट्रेंड हो चला है कि यात्रा का काम छोटे अधिकारियों को सौंपा जा रहा है (जहाँ पहले ये होता था कि यात्रा का अवसर पाने के लिए उच्च अधिकारी प्रयास करते थे)।

इसके अलावा जहाँ संभव हो, वहाँ ग्राहक और आपूर्तिकार दोनों ही डिजिटल संवाद स्थापित कर रहे हैं जिससे प्रीमियम क्षेत्र के लिए माँग उठ नहीं पा रही। कन्फ्रेन्स और सेमिनार जो ऐसी माँग में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, वे भी अब नहीं हो रहे।

उड्डयन क्षेत्र इस आशा में है कि पुनः उछाल आए लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की घोषणा इसके विपरीत है। उन्होंने घोषणा की थी कि लीव ट्रैवल कंसेशन (एलटीसी) का लाभ यात्रा के अलावा वस्तुओं की खरीद पर भी उठाया जा सकता है।

केंद्र सरकार के कर्मचारियों के लिए यह लाभ था जिसे सरकार ने मार्च 2021 से पहले तक वस्तुओं और सेवाओं की खरीद की ओर निर्देशित कर दिया है। इस योजना के लाभ और हानि पर चर्चा की जा सकती है लेकिन एक बात स्पष्ट है कि यात्रा पर खर्च के विकल्प जैसे उड्डयन को यह नुकसान पहुँचाएगी।

सत्येंद्र पांडे उड्डयन के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति हैं और व्यावसायिक रूप से भी इस क्षेत्र के लिए काम कर चुके हैं।