इन्फ्रास्ट्रक्चर
हवाई अड्डा निजीकरण का अगला चरण अलग क्यों होगा

2020 के अंत में महामारी के बावजूद भारत सरकार ने संकेत दिया कि वह हवाई अड्डों के निजीकरण का दूसरा चरण शुरू करेगी। इस बार संभवतः 12 हवाई अड्डे इस सूची में होंगे। इस बात का संकेत भी दिया जा चुका है कि निजीकरण की बोलियाँ इस प्रकार से मंगाई जाएँगी जिसमें दो-दो हवाई अड्डे के छह पैकेज हों।

चयनित हवाई अड्डे हैं- अमृतसर, भुबनेश्वर, तिरुचिरापल्ली, रायपुर, इंदौर और वाराणसी जिनकी जोड़ी बाड़मेर, झारसुगुड़ा, सेलम, जगदलपुर, जबलपुर और कुशीनगर के हवाई अड्डों के साथ बनाई जाएगी। इसके अलावा भी हवाई अड्डा निजीकरण का दूसरा चरण पहले चरण से भिन्न होगा।

निजीकरण का यह चरण पीपीपी मॉडल पर आधारित होगा, संभवतः पिछली गलतियों को सुधारने के लिए जहाँ परिणाम उद्देश्यों से भिन्न मिले। चाहे लागत की अधिकता हो, अनुचित साझेदारी या शुल्क के रूप में उपभोक्ताओं से इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए वसूली, होता यह है कि भौगोलिक रूप से एकाधिकार में काम करने वाले हवाई अड्डों को रिटर्न दर गारंटी की तरह मिलती है और उसकी सेवा का भार यात्री उठाते हैं, जिससे लगता है कि बिना अधिकार के लाभ कमाया जा रहा है और अवांछित व्यवसायी समूहन होता है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे पास बेहतर हवाई अड्डे हैं लेकिन इनके विकास का मॉडल बाज़ार के अनरूप नहीं है। पिछले 20 वर्षों में उच्चतर उपभोक्ता विकास शुल्क (यूडीएफ), हवाई अड्डा विकास शुल्क (एडीएफ) या कुछ मामलों में आगमन शुल्क की वसूली अनचाही रही है। इसके साथ ही निवेशकों ने लाभ कमाया है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में ये शर्तें बेहतर हुई हैं, अधिकांश रूप से उनके पक्ष में।

रियाययत अवधि, राजस्व साझाकरण अनुबंध, विनियमित राजस्व से कम उपभोक्ता शुल्क को कितना सब्सिडाइज़ किया जा सकता है, संपत्ति विकास अधिकार और वित्त की उपलब्धता जैसी बातों पर निवेशक ध्यान देते हैं। परिवर्तनों का इतिहास देखने पर हम पाते हैं कि कोच्चि हवाई अड्डे- पहला पीपीप हवाई अड्डा- की रियायत अवधि परिभाषित नहीं थी और राजस्व साझाकरण सरकार को लाभांश के रूप में था।

इसके बाद हैदराबाद और बेंगलुरु हवाई अड्डे में 4 प्रतिशत के वार्षिक रियायत शुल्क और 26 प्रतिशत के सार्वजनिक स्वामित्व के साथ 60 वर्षों की रियायत अवधि थी। दिल्ली और मुंबई के लिए राजस्व भागीदारी क्रमशः 46.99 प्रतिशत और 38.7 प्रतिशत थी तथा दिल्ली के लिए रियायत अवधि 30+30 वर्ष व मुंबई के लिए 30+10 वर्ष थी। दोनों में सार्वजनिक स्वामित्व 26 प्रतिशत ही था।

दिल्ली हवाई अड्डा

बाद में गोवा के हवाई अड्डे में 40+20 वर्षों की रियायत अवधि, 36.99 प्रतिशत राजस्व साझेदारी लेकिन पाँच वर्षों के लिए राजस्व साझेदारी से मुक्ति तय की गई। हाल ही में अडानी एयरपोर्ट्स द्वारा जीते गए छह हवाई अड्डों में 50 वर्षों की रियायत अवधि है और राजस्व साझाकरणअनुबंध सरकार को प्रति यात्री के हिसाब से भुगतान करने के लिए कहता है। सार्वजनिक स्वामित्व को पूरी तरह से हटा दिया गया है। संभवतः आगे होने वाले निजीकरण का यही आधार रहेगा।

निवेशक की दृष्टि से मुख्य अनुबंध में प्रतिष्ठापित एकाधिकार स्थिति, लंबी रियायत अवधि, प्रतिस्पर्धा का कम खतरा, स्थिर नकद प्रवाह, निश्चित उपभोक्ता आधार और परिसंपत्ति आधार से निश्चित रिटर्न (वर्तमान में पीपीपी हवाई अड्डों को विनियमित परिसंपत्ति आधारपर 16 प्रतिशत तक के रिटर्न की गारंटी दी गई है) जैसी बातें हवाई अड्डे को आकर्षक बनाती हैं।

इसके फलस्वरूप तैयार हवाई अड्डों के पास काफी बाज़ार शक्ति होती है। भारतीय बाज़ार की प्रगति, जनसांख्यिकी और व्यय एवं यात्रा व्यवहार इसे लाभकारी भी बना देते हैं। लेकिन अब होने वाला निजीकरण अलग है क्योंकि इन हवाई अड्डों पर आवागमन और प्रगति पहले के हवाई अड्डों जैसी नहीं है।

इसके अतिरिक्त हर हवाई अड्डे पर खर्च करने का तरीका अलग होता है। संयोजकता की दिशा में अथाह प्रगति का साक्षी बना वाराणसी धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है, ऐसा ही अमृतसर के साथ है जहाँ अंतर्राष्ट्रीय परिवहन भी काफी है जिसके लिए दिल्ली का उपयोग होता है, ऐसे में हर हवाई अड्डे के लिए अलग समाधान खोजना होगा।

अमृतसर हवाई अड्डा

बाज़ार की परिवर्तनशीलता और आँकड़ों में न दिखने वाली भारतीय उपभोक्ता की पसंद को समझकर ही समाधान निकाला जाना चाहिए। इसके अलावा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को किराए पर देने की बात को भी त्याग देना चाहिए। नकद प्रवाह की रूपरेखा के कारण नहीं बल्कि व्यावसायिक परिचालन की अनिश्चित अवधि, जो एक माह से दो वर्ष तक हो सकती है, के कारण ऐसा करना चाहिए।

अनुबंध प्रवर्तन अभी भी लंबी और कठिन प्रक्रिया है। निवेशकों ने भी भूमि अधिग्रहण और विनियामक अनुमतियों को लेकर समस्या प्रकट की है। उदाहरण स्वरूप, नवी मुंबई हवाई अड्डा 20 वर्षों से प्रगतिशील है क्योंकि भूमि अधिग्रहण के कारण विलंब हुआ, वहीं गोवा के मोपा हवाई अड्डे पर विनियामक अनुमतियों के कारण प्रतिबंध लगा दिया गया था और मामला सर्वोच्च न्यायालय गया।

निवेशकों के लिए अनिश्चितता के कारण खतरा बढ़ जाता है और वे अधिक रिटर्न की अपेक्षा करते हैं।साथ ही अनुबंध प्रवर्तन और स्थानीय समस्याएँ चुनौती बनी रहती हैं। ऐसे में निवेशक सावधानी से काम लेना चाहेंगे। निजीकरण के आखिरी चरण पर प्रश्न खड़े हुए हैं और भले ही ये आधारहीन हों लेकिन यह नैरेटिव और भावनाओं को प्रभावित करते हैं- जो खतरे और रिटर्न के विश्लेषण में कई मामलों में आँकड़ों जितना ही महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं।

इस निजीकरण से भारत 66-68 प्रतिशत यात्री पीपीपी मॉडल के हवाई अड्डों का उपयोग करेंगे। लेकिन यह निजीकरण वांछित उद्देश्यों की पूर्ति कर पाए, उसके लिए कई पहलुओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। लागत पर नज़र रखनी होगी, प्रतिस्पर्धा और मूल्य रचना को प्रोत्साहित करना होगा और किराए को हतोत्साहित।

नवाचार, स्वास्थ्य सुरक्षा प्रयास, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, संयोजकता और साझेदारी को प्रोत्साहित करना होगा। निस्संदेह ही हवाई अड्डा निजीकरण का यह चरण पिछले चरण से काफी भिन्न होगा।