इन्फ्रास्ट्रक्चर
हवाई अड्डों के विकास में कैसे सहायता करेंगे विकास वित्त संस्थान

कोविड वैश्विक महामारी के बावजूद भारत का उड्डयन सामर्थ्य उच्च है। इसका एक प्रमुख तत्व है हवाई अड्डा इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास। अपेक्षा है कि अगले दशक में हवाई अड्डा विकास के लिए 10 अरब डॉलर से भी अधिक राशि की आवश्यकता होगी।

इसके साथ ही भारत सरकार हवाई अड्डा निजीकरण के पथ पर भी आगे बढ़ रही है। निजी संचालकों के अधीन आने वाली हवाई अड्डा क्षमता कुल क्षमता का 65 प्रतिशत भाग है तथा अपेक्षा है कि यह और बढ़ेगी। लेकिन फिर भी वित्तपोषक चिंतित हैं।

इसका कारण है कि हवाई अड्डों की सफलता के बावजूद प्रक्रिया में जो देरी होती है, लागत बढ़ती है और विनियामकों की अनिश्चितता के बीच यह उतार-चढ़ाव वाली यात्रा बन जाती है। कोई वित्तपोषक नहीं चाहता कि वह इस उतार-चढ़ाव का शिकार बने।

हवाई अड्डों से होने वाली वित्तीय कमाई कई कारकों से संबंधित है। इनमें ट्रैफिक वृद्धि, भूमि बैंक, विनियामक संरचनाएँ, राजनीतिक इच्छा-शक्ति और लाभ कमाने के लिए प्रबंध क्षमता भी आती है। एकाधिकार मिलने के साथ दीर्घ काल की रियायत अवधि, प्रतिस्पर्धा का कम खतरा, अनुकूल बनी हुईं संरचनाएँ एवं स्थिर नकद-प्रवाह निवेशकों की रुचि को और बढ़ाते हैं।

इसके ऊपर परिसंपत्ति आधार के बड़े भाग पर निश्चित रिटर्न को भी जोड़ दें। ऐसे में जब प्रतीक्षा अवधि लंबी होती है तो गुणी परिसंपत्तियों के लिए निवेशक धैर्य धारण करते हैं क्योंकि रिटर्न सुनिश्चित करने के लिए कई कारण उपस्थित होते हैं। लेकिन जो खतरे होते हैं, वह एक अलग दृश्य प्रस्तुत करते हैं।

समष्टि-अर्थव्यवस्था का खतरा तो स्थिर है ही, उसके ऊपर भारत में राजनीतिक खतरा और परियोजना-विशेष खतरा भी कम-ज़्यादा होता रहता है। हवाई अड्डा डवलपर्स और परिचालकों का भारत में अनुभव ऐसे कामों को संभालने का भी रहा है जिनके लिए समय-सीमा तय नहीं की जा सकती- इनमें से अग्रणी है भूमि अधिग्रहण।

नोएडा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का भूमि अधिग्रहण

इसके बाद आती हैं अनुमतियाँ जिनमें सर्वाधिक आवश्यक है पर्यावरण अनुमति। इसमें राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, वैधानिक एवं तकनीकी संरचनाओं में परिवर्तनों को भी जोड़ दिया जाए तो खतरा और बढ़ जाता है। ये सब मिलकर वित्तपोषण की एक प्रमुख कुंजी को प्रभावित करने लगते हैं- नकद प्रवाह में अनियमितताएँ होती हैं।

2015 में रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने एक परिपत्र जारी किया था जिसमें निर्देश था कि परिचालन शुरू करने की तिथि में दो वर्षों से अधिक का परिवर्तन होने पर उसे गैर-निष्पादित परिसंपत्ति की श्रेणी में डालना या संरचना परिवर्तित करना आवश्यक होगा लेकिन इसका लाभ नहीं होता है।

ऐसा इसलिए क्योंकि बैंक से ऋण लेने के लिए दोनों ही परिणाम प्रतिकूल हैं। इसलिए कई बैंक सीधा मार्ग अपनाते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को वित्तपोषित ही न किया जाए। अशोध्य ऋण से बचने का उन्हें सबसे सुरक्षित तरीका लगता है कि ऋण ही न दिया जाए।

जब हवाई अड्डों को ऋण देने की बात आती है तो संपार्श्विकता का मुद्दा भी आता है। पहली नज़र में देखकर लगता है कि हवाई अड्डों के पास ऋण न दे पाने की स्थिति से उबरने के लिए काफी संपत्ति है, लेकिन वास्तविकता यही है कि यह संपत्ति तरल नहीं है।

उदाहरण स्वरूप, भूमि अधिग्रहण अधिकांश मामलों में राज्य सरकारें करती हैं और उन्हें लीज़ पर हवाई अड्डों को देती हैं। ऐसे में भूमि का लाभ नहीं उठाया जा सकता। टर्मिनल भवन और अन्य परिसंपत्तियाँ भी तरल नहीं हैं। ऐसे में यदि बैंक इन परिसंपत्तियों को जब्त भी कर लेता है तो इसका निस्तारण करना एक चुनौती बन जाती है।

हवाई अड्डे की अतरल संपत्ति

यही बात रनवे, एयरसाइड, लैंसाइड और अन्य अमूर्त परिसंपत्तियों के लिए है। ऐसे में वित्तपोषक केवल हवाई अड्डे से होने वाले नकद प्रवाह पर ही आश्रित रहते हैं। लेकिन ये नकद प्रवाह तब ही हो सकता है जब हवाई अड्डा परिचालित हो और इसलिए ग्रीनफील्ड (जहाँ पहले विकास न हुआ हो) परियोजनाएँ ऋण के लिए संघर्ष करती रह जाती हैं।

इसके साथ ही पृष्ठभूमि में बॉन्ड बाज़ार तरलता पर ही आधारित है, गैर-बैंकिंग वित्तपोषण कंपनियाँ (एनबीएफसी) अपनी ही चुनौतियों का सामना कर रहा हैं औऱ व्यावसायिक बैंक उड्डयन क्षेत्र से बचने का प्रयास कररहे हैं क्योंकि उन्हें लघु-अवधि में ही वापसी वाले ऋण देने हैं।

लंबी प्रतीक्षा अवधियों के कारण निजी पूँजी भी इसमें प्रवेश नहीं करना चाहती क्योंकि उनका पूर्व अनुभव अच्छा नहीं रहा है। साथ ही उभरती अर्थव्यवस्था के बीच बहुत कम डवलपर्स के पास धन उपलब्ध है। इस प्रकार खतरे और रिटर्न के अनुपात के कारण ऋणदाता समितियाँ इन परियोजनाओं को हरी झंडी नहीं दिखाती हैं।

माँग के विपरीत अति-उत्साही ट्रैफिक की भविष्यवाणियों के गलत निकलने पर यात्रियों पर अतिरिक्त शुल्क लगाकर ही कई परियोजनाओं के विस्तार को वित्तपोषित किया गया है। भारत उन कुछ देशों में से एक है जहाँ उपभोक्ता विकास शुल्क (यूडीएफ) और हवाई अड्डा विकास शुल्क (एडीएफ) दोनों वसूला जाता है।

अतिर्कत शुल्क का प्रभाव यात्री संख्या पर पड़ता है और ऐसे शुल्क समावेशी विकास और पहुँच के निर्धारित उद्देश्यों के विपरीत काम करने लगते हैं। इन सब के परिणाम स्वरूप हवाई अड्डों को वित्तपोषक नहीं मिलते हैं। और ऐसे में ही विकास वित्त संस्थान (डीएफआई) सहायता कर सकता है।

डीएफआई में न सिर्फ कम ब्याज दर पर ऋण देने का सामर्थ्य है बल्कि व्यावसायिक बैंकों के विपरीत उनके दोहरे उद्देश्य हैं- विकास और रिटर्न। ये संस्थान दीर्घ अवधि वाले ऋण दे सकते हैं। हवाई अड्डा विकास के विज़न को पूरा करने में वे सहायता करेंगे।

सत्येंद्र पांडे बाज़ार विशेषज्ञ तथा उड्डयन के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति हैं और व्यावसायिक रूप से भी इस क्षेत्र के लिए काम कर चुके हैं।