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क्यों कोलकाता जल-जमाव की चपेट में आया, क्या हैं समस्याएँ

शनिवार (17 अगस्त) और रविवार को कुछ घंटों के लिए कोलकाता के विशाल जल क्षेत्र में बाढ़ के पानी की आवक बनी रही और सोमवार को भी शहर के कुछ इलाकों में पानी भरा रहा। विषम परिस्थितियों में भी 250 पंप तूफान के पानी को निकालने के लिए चौबीसों घंटे काम करता है।

चित्र श्रेय- आईएएनएस

शुक्रवार दोपहर से 24 घंटों के दौरान शहर में 335 मिमी की बारिश हुई, यह अगस्त में हुई औसत बारिश से सबसे अधिक (रिकॉर्ड 191 मिमी) है, लेकिन शहर में पानी के जमाव होने पीछे अकेले तीव्र बारिश को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

कोलकाता के अदूरदर्शी और अकुशल योजनाकारों, वहाँ के लापरवाह नागरिक, बिल्डरों और शहर की स्थलाकृति ही उसकी गंदगी के लिए ज़िम्मेदार हैं जिसके कारण शहर हर बारिश के बाद खुद को जल-जमाव का क्षेत्र पाता है।

कोलकाता के जलमग्न होने के पीछे कई कारण हैं, इन कारणों में कुछ प्राकृतिक है तो कुछ मानव निर्मित।

तलरूप की संरचना

शहर की प्राकृतिक ढलान पश्चिम से पूर्व की ओर है, जिसमें हुगली (गंगा की एक सहायक नदी) है जो अपनी पश्चिमी सीमा बनाती है (मानचित्र देखें)। शहर का मध्य भाग एक सूप के कटोरे की तरह है, जिसमें तूफान का पानी आसपास के क्षेत्रों से बहता है। इससे पहले, पूर्वी भाग में विशाल दलदली भूमि और आर्द्रभूमि शामिल थे जहाँ तूफान का पानी बहकर जाता था और शहर के सीवेज के लिए प्राकृतिक सोख-गड्ढे की तरह काम करता था लेकिन अब यह नहीं है।

मिट्टी कि स्थिति

शहर की मिट्टी अर्ध-विकृत जलोढ़ मिट्टी है, जो पानी को बहुत तेजी से नहीं सोखती है। शहर की घनी आबादी वाले पश्चिमी और मध्य भागों में नई जलोढ़ मिट्टी है जो और अधिक अभेद्य है एवं इसलिए बारिश का पानी आसानी से मिट्टी को पार नहीं करता है, जिससे पानी ऊपर ही रह जाता है।

नहरों का संकुचित होना

नहरें, जो शहर के पूर्व में दलदली भूमि और आर्द्रभूमि तक तूफानी पानी की निकासी करती थीं, वह अब पूरी तरह से चोक हो गई हैं और शहर के अधिकारियों द्वारा उन्हें साफ के लिए वस्तुतः कुछ भी नहीं किया गया है। इसलिए, अब वे उस बाढ़ के पानी को नहीं ले जा सकते हैं जिसे वे तीन दशकों पहले बहाव का रास्ता देती थीं। अध्ययनों से पता चला है कि पिछले चार दशकों में उनकी जल निकासी क्षमता में 50 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है।

प्लास्टिक संकट

कोलकाता की गैर-ज़िम्मेदार नागरिकों को भी इस गंदगी का दोषी माना जा सकता है। जागरूकता कार्यक्रमों और अपील के बावजूद, नगरवासियों ने प्लास्टिक बैग का उपयोग करना जारी रखा है और उन्हें नालियों में फेंक देते हैं, जिससे नाले भर जाते हैं और पानी का निकास रुक जाता है।

कचरे का पृथक्करण अनसुना है और शहर में कचरा इकट्ठा करने की प्रणाली बहुत कुशल नहीं है। इससे शहर की नालियाँ और सीवर भर जाते हैं। और इसलिए पानी को बाहर निकालने के लिए पंप की दक्षता गंभीर रूप से संकुचित हो जाती है।

बड़े पैमाने पर शहरीकरण

कोलकाता का एक कॉन्क्रीट जंगल बनना, जल-जमाव का प्रमुख कारण है। आवासीय ऊँचे-ऊँचे भवन शहर के 135 साल पुराने सीवरों पर भारी दबाव डालते हैं, जो कि ब्रिटिश द्वारा शहर की वर्तमान आबादी 4.5 मिलियन (2011 की जनगणना) के एक छोटे से अंश के लिए बनाए गए थे।

इसके अलावा, शहर में अंधाधुन पक्कीकरण ने वर्षा जल को मिट्टी में अवशोषित होने की संभावनाओं को सीमित कर दिया है। और भवनों के निर्माण से यह समस्या बद से बदतर ही होती जा रही है।

कोलकाता का बेलुर मठ

जल निकायों का भरना

भ्रष्ट नागरिक अधिकारियों के साथ लीग में रहने वाले अघोर बिल्डरों ने शहर में बहने वाले लगभग सभी जल निकायों को भर दिया है। सॉल्ट लेक, जो एक दलदली भूमि थी, शहर का बाहरी क्षेत्र बन गई है, और शहर राजरहाट-न्यूटाउन तक फैल गया है, जहाँ भी कॉन्क्रीट संरचनाओं के निर्माण के लिए कई जल निकायों को भरा गया है। इस प्रकार शहर के अधिकांश वर्षा जल को बाहर निकालने के लिए कोई जगह नहीं है। यहाँ तक कि पूर्वी कोलकाता की झीलों, रामसार साइट पर भी चुपके से भूमि दलाल अतिक्रमण कर रहे हैं।

अनियोजित वृद्धि

1947 से, विशेषकर 1970 के दशक में जब अत्याचार के भय से पूर्वी पाकिस्तान से लाखों लोग कोलकाता व इसके आसपास के क्षेत्र में आकर बस गए थे, तब से शहर की वृद्धि अनियोजित ही हुई है।

पूरे शहर में झुग्गी-बस्तियाँ बस गईं, विशेषकर पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी छोरों पर जहाँ सीवर और नालों की व्यवस्था भी नहीं थी। ये वही क्षेत्र हैं जो पिछले सप्ताह हुई वर्षा के कारण लगभग 24 घंटे तक डूबे रहे थे।

हुगली में गाद जमा होना

हुगली में गाद जमा होने से इसकी क्षमता कम हो गई है और उफान पर चल रही हुगली नदी में शहर के वर्षा जल को पंप कर पाना असंभव हो जाता है।

सरकार का उदासीन रवैया

सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने इस समस्या से निपटने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। इसका कुछ कारण पार्टी के नेताओं की बिल्डरों से साठ-गाँठ भी माना जा सकता है क्योंकि हम देखते हैं कि पिछले आठ सालों से सरकार ने एक भी बिल्डर पर बड़ी कार्रवाई नहीं की है।

रेलवे और मेट्रो परियोजना

दूसरी ओर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रेलवे और मेट्रो की चल रही परियोजनाओं पर जल जमाव का ठीकरा पर फोड़ दी। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार बारिश के बाद एक कार्यक्रम में गई मुख्यमंत्री ने कहा कि रेलवे पुल बनाने की अनुमति नहीं दे रही है और न ही मेट्रो इसपर गंभीर है, इसलिए शहर में जल-जमाव जैसी स्थिति बन गई है।

जल संचयन

शहर में वर्षा के जल संचयन की कोई ठोस विधि नहीं है। जल संचयन के लिए न तो सरकार की तरफ से कोई बड़ा प्रयास किया गया है और न ही आम लोगों की तरफ से। हालाँकि, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जल संचयन के लिए ‘जल धरो जल भरो’ योजना की शुरुआत की है, लेकिन इसका कोई खासा असर देखने को नहीं मिलता है। कोलकाता नगर निगम ने लोगों से जल संचयन करने पर टैक्स में छूट देने की बात भी कही है।

उपरोक्त कारणों को देखकर लगता है कि कोलकाता-वासियों को हर भारी वर्षा के बाद कुछ घंटों के लिए जलमग्न रहना होगा, कम से कम निकट भविष्य में तो।

जैसा कहा जाता है, अधिक पंप लगाने से भी समस्या नहीं सुलझेगी। गाद निकालकर हुगली की क्षमता बढ़ाना, प्लास्टिक का त्याग, नहरों की सफाई और जल निकायों के लिए स्थान बनाना ही कोलकाता की समस्या का समाधान हैं।

यह लेख जयदीप मजूमदार से प्राप्त जानकारियों के आधार पर है।