विचार
इन्फोसिस बनाम पांचजन्य- प्रतिष्ठित व्यापारों की आलोचना कैसे करें और कैसे न करें

भारत की प्रतिष्ठित सॉफ्टवेयर सेवा कंपनी इन्फोसिस की आलोचना करते हुए पांचजन्य के लेख में जो कहा गया और जो नहीं कहा गया, उसपर काफी बवाल हुआ। इन्फोसिस द्वारा बनाए गए नए आयकर पोर्टल की क्रियाशीलता पर आधी-अधूरी बात के अलावा इस लेख में मात्र विचार ही थे।

यह भी दावा किया गया कि इन्फोसिस ट्रस्ट राष्ट्र-विरोधी ताकतों का सहयोग करता है। इस लेख से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने स्वयं को दूर कर लिया है तो हो-हल्ला भी थम जाना चाहिए था क्योंकि संभव है कि इन्फोसिस पर संपादक के विचार उनके संगठन के विचार से भिन्न हों।

और जब बात विचारों की आती है तो चाहे वे कितने ही गलत क्यों न हों, वे अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य अधिकार के अंतर्गत आते हैं। हालाँकि, हम यहाँ कई विषयों पर बात करेंगे क्योंकि लेख के दावों के परीक्षण के अलावा यह भी देखना है कि क्या आरएसएस स्वयं 100 अरब डॉलर के शेयर बाज़ार मूल्य वाली भारत की दूसरी नंबर की सॉफ्टवेयर सेवा कंपनी को तो निशाना नहीं बना रहा है।

पहला, कंपनियों को बुरा दर्शाना अब एक राजनीतिक चलन बन गया है। 1991 से पहले एक प्रथा थी कि ‘सामूहिक हित के शत्रु’ बड़े व्यापार घरानों को लक्ष्य किया जाए। बॉलीवुड में निरंतर व्यापारियों को बुरा दिखाया गया है। यहाँ तक कि फिल्म चक्रव्यूह  में एक गीत भी है जिसके बोल कुछ इस प्रकार हैं-

बिरला हो या टाटा, अंबानी हो या बाटा
सबने अपने चक्कर में, देश का है काटा

जिस बॉलीवुड के संबंध अंडरवर्ल्ड के वित्त और ड्रग्स से हों, वह संपत्ति बनाने और रोजगार के अवसर उत्पन्न करने के लिए जोखिम उठाने वाले व्यापारियों के विषय में ऐसा बोले तो समझ आ जाता है कि व्यापारियों को देखने की प्रचलित मानसिकता कैसी है।

पिछले दशक में जब भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना आंदोलन आरंभ हुआ था, तब राजनेताओं व वामपंथियों को अंबानी से लेकर अडानी तक को निशाना बनाने की खुली छूट मिल गई थी। अरविंद केजरीवाल से राहुल गांधी तक, प्रशांत भूषण से अन्य वामपंथी संगठनों तक, सभी ने बड़े व्यापारों को निशाना बनाया, चाहे तथ्य उनकी बातों में हो या न हो।

ऐसे में पांचजन्य के संपादक जो इन्फोसिस पर अपने लेख पर अड़े हुए हैं, वे व्यापारियों को बुरा दिखाने वाले प्रचलन का ही भाग हैं। दूसरा, आवश्यकता है कि कंपनियों को उनके सहायकों या परोपकारी संस्थाओं की गतिविधियों से अलग करके देखा जाए।

इन्फोसिस भले ही अपने ट्रस्ट का वित्तपोषण करता है लेकिन आवश्यक नहीं है कि ट्रस्ट द्वारा लिए गए निर्णय कंपनी के बोर्ड के नियंत्रण में हों। टाटा ट्रस्ट या अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन के लिए भी यह सत्य है।

वास्तव में, यह पूर्ण रूप से संभव है कि धनवान लोग अशोका विश्वविद्यालय जैसे निजी विश्वविद्यालयों का वित्तपोषण करें। फिर भले ही जिस तरह से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय वामपंथी-उदारवादियों के कारण कुप्रसिद्ध हो गया है, वैसे ही लोगों का प्रभुत्व इन विश्वविद्यालयों में रहे।

सामान्यतया जो लोग इस प्रकार की परियोजनाओं का वित्तपोषण करते हैं, वे ट्रस्ट को निर्णय लेने की छूट देते हैं कि किसे नियुक्त या वित्तपोषित करना है। ऐसे में वे उन लोगों को भी वित्तपोषित कर रहे हों जो सत्ताधारी सरकार या राष्ट्रवादी तत्वों की छवि खराब करने का काम करते हों तो इसमें कोई नई बात नहीं होगी।

शैक्षिक स्वतंत्रता के नाम पर पीछे के द्वार से “कैन्सल कल्चर” (किसी को पूर्ण रूप से नकार देने का चलन) भी घर कर जाता है। कुल मिलाकर बात यह है कि यदि आप उन तत्वों से असहमत हैं जिन्हें वित्तपोषित किया जा रहा है तो आप वित्तपोषक की आलोचना करने के लिए स्वतंत्र हैं।

जैसा मैंने स्वयं अशोका या क्रेया विश्वविद्यालयों के मामलों में किया है। लेकिन हम उन्हें वित्तपोषित करने वाली कंपनियों और व्यक्तियों को नीचा नहीं दिखा सकते हैं। अवश्य ही कंपनियों को ध्यान रखना चाहिए कि वे किसे वित्तपोषित कर रही हैं परंतु यह नहीं माना जा सकता कि परोक्ष रूप से उन्होंने जिसे वित्तपोषित किया है, वे उससे सहमत हैं।

रतन टाटा से लेकर आनंद महिंद्रा और रोहन मूर्ति (इन्फोसिस के संस्थापक एनआर नारायण मूर्ति के पुत्र) तक कई भारतीय व्यापारियों ने यूएस में अपने शैक्षिक संस्थानों को वित्तपोषित किया है और उनमें से कुछ विश्वविद्यालय हिंदूफोबिक गतिविधियों का केंद्र भी हैं।

यह कहा जा सकता है कि इन धनवान लोगों को स्वदेश में अधिक परोपकार करना चाहिए या शीर्ष पर नियुक्त करने से पहले लोगों की पृष्ठभूमि जाँचनी चाहिए लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि वे भारत-विरोधी या हिंदूफोबिक गतिविधियों का वित्तपोषण कर रहे हैं।

इसमें उनका आंशिक हाथ हो सकता है परंतु पूर्ण नहीं क्योंकि उदारवादी विश्वविद्यालयों में वामपंथी-उदारवादी “कैन्सल कल्चर” विशेषज्ञों की भीड़ रहती है और जो शैक्षिक उद्देश्यों से संस्थानों में कुछ कार्यक्रम वित्तपोषित कर रहे हों, वे हिंदूफोबिक या भारत-विरोधी प्राध्यापकों व विद्यार्थियों को उसमें से पैसा लेकर अपना उल्लू सीधा करने से रोक नहीं सकते हैं।

अब बात आती है सही आलोचना की- वस्तु एवं सेवा कर और आयकर पोर्टल जिनसे इन्फोसिस का संबंध है। यहाँ पर दो बिंदु हैं। पहला, सरकारी पोर्टलों का बनाना काफी कठिन होता है क्योंकि पोर्टल पर भिन्न मत रखने वाले कई हितधारकों वाले एक संस्थान के अनुसार सॉफ्टवेयर को ढालना होता है।

वित्त मंत्रालय और उनके कर वसूलने वाले अधिकारी पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी और कार्य प्रणाली पर एक मत रखते होंगे, वहीं दूसरी ओर पोर्टल के उपभोक्ता हैं जो अन्य स्रोतों से डाटा पहले से भरने व पोर्टल को उपयोग-सहज बनाने की माँग करते हैं।

दूसरा, कोई भी पोर्टल उसी आधार पर बनाया जा सकता है, जैसा सॉफ्टवेयर कंपनी के अभियंताओं को निर्देश दिया गया हो। कई बार कुछ विशेषताओं की माँग बदलती रहती है जिसका सरकारी लोगों ने मूल निविदा में कोई उल्लेख नहीं किया होता है।

ऐसे में निरंतर संवाद व परीक्षण की आवश्यकता होती है जिससे सुनिश्चित हो सके कि लाखों लोग और कॉर्पोरेट जो पोर्टल का उपयोग सरल व जटिल डाटा भरने के लिए करेंगे, वे सभी उपभोक्ता संतुष्ट हों। खरीददार जैसा निर्देश और विस्तृत कार्यक्षमता के विषय में बताएगा, वैसा ही सॉफ्टवेयर मंच बनेगा।

यदि इन्फोसिस पोर्टल में अभी तक कई समस्याएँ हैं तो इसमें कर विभाग की कमी भी दिखती है कि वह स्पष्ट रूप से समझा नहीं पाया कि पोर्टल से उसे क्या चाहिए। यह कहना पर्याप्त है कि ऐसे जटिल पोर्टल स्थिर होने से पहले कई परिवर्तनों से गुज़रते हैं।

लॉन्च होने के कई वर्षों बाद भी यूएस होमलैंड सुरक्षा कंप्यूटरों में अभी भी समस्या आती है और दो वर्ष पूर्व लॉन्च होने से पहले अंतिम समय में यूएस के कस्टम्स व सीमा सुरक्षा (सीपीबी) इलेक्ट्रॉनिक वीज़ा यात्रा प्रणाली में भी समस्याएँ आईं थीं।

यह भी याद रखना चाहिए कि पिछले ई-फाइलिंग कर पोर्टल को भी स्थिर होने में कई वर्ष लगे थे और प्रारंभिक वर्षों में उपभोक्ता लॉग इन नहीं कर पा रहे थे या बिना किसी चेतावनी के लॉग आउट हो जाते थे। पहले से भरा हुआ डाटा काफी त्रुटिपूर्ण और गलत होता था जो पहले से भरे रखने के उद्देश्य की पूर्ति ही नहीं कर सकता था।

यहाँ हम यह नहीं कहना चाह रहे हैं कि त्रुटिरहित नए आयकर पोर्टल को बनाने में इन्फोसिस की विफलता की आलोचना नहीं होनी चाहिए, बल्कि तात्पर्य बस इतना है कि यह आलोचना अनुपात से अधिक न हो। आलोचना इस बात पर होनी चाहिए कि कंपनी ने क्या वादा किया था और क्या परिणाम दिए।

एक अंतिम बात जिसका इन्फोसिस से संबंध नहीं है- जब प्रतिष्ठित लोगों या कंपनियों पर आरोप लगाए जाते हैं, तो तथ्यों का ध्यान रखना चाहिए। आप किसी की प्रतिष्ठा को मात्र कम सोची-समझी बातों से धूमिल नहीं कर सकते हैं।

यूएस में ऐप्पल के स्टीव जॉब्स व वॉरेन बफे कंपनी की क्रमशः ईसॉप्स को पूर्व-दिनांकित करने एवं संभव इंसाइडर ट्रेंडिंग के लिए जाँच हुई थी। किसी की आलोचना नहीं की गई क्योंकि यूएस अर्थव्यवस्था में उनके योगदान की तुलना में ये त्रुटियाँ छोटी थीं।

जिन कंपनियों ने सॉफ्टवेयर शक्ति के रूप में भारत को वैश्विक पहचान दिलाई है, उनमें से एक इन्फोसिस भी है और उसे टुकड़े-टुकड़े गैंग के साथ जोड़कर देखने का लाभ सिर्फ राष्ट्र-विरोधी शक्तियों को मिलेगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।