अर्थव्यवस्था
भारतीय तकनीकी कंपनियाँ आईपीओ लिस्टिंग के साथ कैसे जा रही हैं एक नई दिशा में

भारतीय उपभोक्ता इंटरनेट कंपनियों के तीव्र उदय का वर्ष रहा है 2021। इस वर्ष के पूर्वार्ध में भारतीय स्टार्टअपों में 11 अरब डॉलर का निवेश हुआ है। अभी तक 16 यूनिकॉर्न (1 अरब डॉलर से अधिक मूल्य के स्टार्टअप) आकार ले चुके हैं।

तकनीकी क्षेत्र में 52 यूनिकॉर्न हैं और ये कंपनियाँ भारत की दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए काम करती हैं- चाहे वे किसी व्यक्ति की हों या उद्यमों की। इस वर्ष भारत की तकनीकी कंपनियाँ स्थानीय वित्तपोषण प्रक्रियाओं से भी जुड़ी हैं।

भारतीय शेयर बाज़ार में हाल में नज़ारा टेक्नोलॉजीज़ और ज़ोमाटो की हुई लिस्टिंग काफी चर्चा में रही है जो निवेशकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। इसके बाद भी बहुत कुछ होने वाला है। पेटीएम ने रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस का प्रारूप दायर कर दिया है।

कई मीडिया रिपोर्टों में समाचार हैं कि डेल्हिवरी, फ्लिपकार्ट, फ्रेशवर्क्स, नाइका, मोबिक्विक, ओला, पेप्परफ्राई और पॉलिसी बाज़ार जैसी कंपनियाँ भी स्थानीय लिस्टिंग पर विचार कर रही हैं।

किस स्टॉक में निवेश करना है, यह व्यक्ति की पसंद और समझ पर निर्भर करता है लेकिन तकनीकी उद्योगों की स्थानीय बाज़ार में लिस्टिंग उत्साहजनक है। कई वर्षों से भारतीय स्टार्टअपों पर आरोप लगता आ रहा है कि वे मात्र अमेरिकी स्टार्टअपों की एक सस्ती प्रति हैं।

इस बात को बहुत कम श्रेय दिया गया है कि भारत की परिचालन जटिलताएँ व्यापार मॉडल में वैसे ही नवोन्मेष को आवश्यक बना देती हैं और प्रतिस्पर्धात्मक बाज़ार में अस्तित्व बरकरार रखने के लिए यह आवश्यक स्थिति बन जाती है।

तकनीकी कंपनियों की सीधी पहुँच अब भारतीय पूँजी बाज़ारों तक हो रही है तथा भारतीय संदर्भ में कल के इन प्रणेताओं के साथ एकीकरण और गहरा जाता है जिसमें वापसी का कोई रास्ता नहीं है।

वहीं दूसरी ओर, भारतीय निवेशकों को विचारों की शक्ति तथा संभावनाओं के आकर्षण पर दाव लगाने का एक अवसर मिलेगा और संप्रति वित्तीय परिणामों की बजाय वे संभावित भावी वृद्धि को प्राथमिकता दे सकेंगे।

पश्चिम में यह एक सामान्य विचार है। हाल ही में मॉडर्ना ने अपने कोविड-19 टीके से विश्व को प्रभावित किया है। बायोटेक क्षेत्र में 2018 का यह सबसे बड़ा सार्वजनिक प्रस्ताव रही थी और अपनी स्थापना से अब तक 1.5 अरब डॉलर का नुकसान झेल चुकी है।

यहाँ तात्पर्य यह नहीं है कि नुकसान झेलने वाली हर कंपनी विश्व को परिवर्तित करने का सामर्थ्य रखती है, बल्कि यह कहा जा रहा है कि तकनीकी लिस्टिंग से भारतीय निवेशकों को ऐसी संभावनाओं पर विचार करने का अवसर मिलेगा।

वर्तमान का व्यापार वातावरण ‘तिमाही से तिमाही तक’ लाभ देखने का है। इसके विपरीत स्टार्टअपों में निवेश आपको अगले कुछ वर्षों या दशकों में ही लाभ दे पाएगा। मूल्यांकन और हर स्टॉक के सही मूल्य पर कलह अपरिहार्य है।

लेकिन सार्वजनिक लिस्टिंग की झड़ी अगली पीढ़ी की तकनीकी कंपनियों को अनुकरण के लिए एक बड़ा उदाहरण दे देती है। सार्वजनिक लिस्टिंग का अर्थ होगा कि सीमित पूँजी परिधि के बाहर भारतीय तकनीकी कंपनियाँ बाज़ार प्रतिभागियों के बड़े समूह द्वारा मूल्यांकित होने के लिए आत्मविश्वास से भरपूर होंगी।

दलाल स्ट्रीट में एक कहावत प्रचलित है- ‘भाव भगवान् छे’। इस कहावत का परीक्षण ये कंपनियाँ खुले बाज़ार में करेंगी। अपने विचारों में ये कंपनियाँ जो आत्मविश्वास और आस्था दिखा रही हैं, वह दर्शाता है कि बड़े लीग लेन-देन का नवोदय हो रहा है।

शुरुआती निवेशकों और इक्विटी के लिए काम करने वाले कर्मचारियों के लिए यह भविष्य का वादा लिए आज के अपरिचित नामों के प्रति आकर्षण भी बढ़ाता है। उद्यमियों के अलावा, तकनीकी प्रणेताओं की अगली पीढ़ी में आज के कर्मचारी भी होंगे जो अपने सपनों पर काम करने का निर्णय ले लेंगे।

एक रिपोर्ट के अनुसार, ज़ोमाटो का प्रारंभिक सार्वजनिक प्रस्ताव (आईपीओ) 18 लोगों को डॉलर मिलियनेर (10 लखपति) बना गया। सार्वजनिक लिस्टिंग इन तकनीकी कंपनियों के कर्मचारियों को अपनी कागज़ी इक्विटी को नकद में परिवर्तित करने का अवसर देती है।

अपेक्षा है कि इनमें से कुछ राशि का उपयोग नए स्टार्टअपों के वित्तपोषण के लिए होगा जो तकनीक आधारित उद्यमिता की नई लहर लेकर आएगा। ऐसा नहीं है कि भारतीय तकनीकी कंपनियों ने सार्वजनिक बाज़ारों का स्वाद पहले नहीं चखा है।

मेकमाईट्रिप, रेडिफ, सिफि और यात्रा की नासडाक पर लिस्टिंग हुई है। इन्फोएज की भारतीय बाज़ार में 2006 में लिस्टिंग हुई थी। लेकिन ये कुछ चुनिंदा उदाहरण हैं। अब समय अलग है, और सिर्फ कहने के लिए नहीं, वास्तव में।

यदि विचाराधीन आईपीओ में से कई वास्तविकता में बदल जाएँ तो यह इनोवेटर ग्रोथ प्लैटफॉर्म (आईजीपी) की व्यवहारिकता बढ़ा सकते हैं। प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने आईजीपी का गठन स्टार्टअपों को भारत में लिस्ट करने के प्रोत्साहन के लिए किया था।

आईपीओ के अलावा भारतीय तकनीकी उद्योग ने वित्तपोषण क्षेत्र में भी एक ट्रेंड देखा है। पिछले वर्ष के मध्य से जब लद्दाख संघर्ष के बाद भारत में चीनी निवेशों पर सरकार नज़र रखने लगी, तब से चीनी पूँजी में भारी गिरावट हुई है।

संदेहवादियों ने तब कहा था कि चीनी वित्तपोषण के बिना भारतीय स्टार्टअप वित्तीय अभाव का सामना करेंगे। वास्तव में इसका विपरीत हुआ। विश्व के दूसरे क्षेत्रों से निवेशकों को यहाँ अवसर दिखा जिससे 2021 में रिकॉर्ड वित्तपोषण हुआ।

वास्तव में, जिन कंपनियों का आईपीओ आने वाला है, चीनी निवेशक उनमें अपनी भागीदारी कम कर लेंगे या उनसे बाहर निकल जाएँगे। द ऐसेंट ऑफ मनी पुस्तक में नायल फर्ग्युसन लिखते हैं, “पैसा धातु नहीं है। यह अंकित विश्वास है।”

हम भारतीय तकनीकी क्षेत्र की विश्वसनीयता में बढ़ावा देख रहे हैं जो भविष्य के व्यापार पारिस्थितिकी-तंत्र को परिवर्तित करने का सामर्थ्य रखता है।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीतियों, राजनीति और सम-सामयिक विषयों पर लिखते हैं। वे @c_aashish द्वारा ट्वीट करते हैं।