इन्फ्रास्ट्रक्चर
रेलवे अब प्रतिस्पर्धा को और देर तक बाहर नहीं रख सकता

2013 में जब शी जिनपिंग राष्ट्रपति बने थे, तब से चीन ने रेल क्षेत्र में भारी सुधारों को आरंभ किया। सबसे पहले उसने रेल मंत्रालय का विघटन किया और 900 लोक सेवकों का स्थानांतरण किया। हो सकता है कि यह विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मस्तिष्क में भी आए क्योंकि रेल नौकरशाही से उन्हें वांछित परिणाम नहीं मिले।

मोदी घाटे में चल रहे यात्री परिवहन क्षेत्र में 30,000 करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित करना चाहते थे लेकिन रेल नौकरशाही का व्यवहार वैसा ही रहा जैसे कोई सामान्य काम चल रहा हो। वे पिछले चार दशकों से रेल क्षेत्र में सुधार अवसरों को बर्बाद कर रहे हैं।

जुलाई 2020 में रेल मंत्रालय ने निजी खिलाड़ियों से योग्यता-पूर्व बोलियाँ मंगाई थीं जिसमें निजी क्षेत्र 12 रेल मंडलों में फैली 109 रेलमार्गों पर 151 आधुनिक ट्रेनों का परिचालन 35 वर्षों के लिए करे।

इसमें निवेशक के पास निर्णय लेने की स्वतंत्रता होगी कि वे कहाँ से ट्रेन खरीदना चाहते हैं और टिकट मूल्य कितना रखना चाहते हैं। यदि यह योजना सफल हो जाती तो इसके दूरगामी परिणाम देखने को मिलते।

सबसे पहला तो यात्रियों की सुविधा सुनिश्चित होती जो भारत में काफी कम है। दूसरा, निवेशक जो डिब्बे खरीदना चाहते हैं, उन्हें खरीदने की स्वतंत्रता देकर रेलवे कोच फैक्ट्रियों के एकाधिकार को चुनौती दी जा सकती थी जो इस क्षेत्र में नए निवेशों को भी आकर्षित करता।

निवेशकों को धकियाना

निजी परिचालकों के लिए राह सरल नहीं रही। उनसे रेलवे सुरक्षा नियम का पालन करने के लिए कहा गया। चालक और गार्ड को नियुक्त करने का अधिकार रेलवे के पास रहा और टिकट बिक्री से आने वाले राजस्व को भारतीय रेलवे से साझा करना था।

बोली लगाने के लिए कम-से-कम 14 भारतीय कंपनियों को योग्य पाया गया था। इनमें से कुछ कंपनियाँ जैसे एल एंड टी और जीएमआर एवं राज्य के स्वामित्व वाली भेल बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियाँ हैं। कुछ कंपनियाँ लॉजिस्टिक्स क्षेत्र की बड़ी खिलाड़ी हैं।

लेकिन जब 23 जुलाई 2021 को टेंडर बंद हुआ तो बस दो ही दावेदार बचे थे- भारतीय रेलवे केटरिंग एवं पर्यटन निगम लिमिटेड (आईआरसीटीसी) और मेघा इंजीनियरिंग व इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (एमईआईएल) जिन्होंने तीन मंडलों (मुंबई-2 और दिल्ली-1 व 2) में कुल 29 जोड़ी ट्रेनों के लिए बोली लगाई थी।

एमईआईएल ने दो मंडलों के लिए बोली लगाई है और रेलवे के साथ 0.5-2 प्रतिशत तक का राजस्व साझा करने की बात कही है। रेलवे का एक उपक्रम, आईआरसीटीसी ही अकेली ऐसी कंपनी रही जिसने उत्साह दिखाया और 6-18 प्रतिशत राजस्व साझाकरण की बात कही। यह तय कर्षण शुल्क के अतिरिक्त होगा।

निस्संदेह ही आईआरसीटीसी एक अपवाद है। यह समझने के लिए कि दूसरों के साथ क्या समस्या हुई, हमें टेंडर देखना होगा। मार्गरेखा और समय को रेलवे निर्धारित करेगा। एक वर्ष में टिकट शुल्क 2 प्रतिशत तक ही बढ़ाया जा सकता है। परंतु रेलवे को मिलने वाले राजस्व में प्रतिवर्ष 6 प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिए।

यह तो वही बात हो गई कि चित भी मेरी और पट भी मेरी। जब से पिछले वर्ष में चर्चा हुई थी, संभावित निवेशक मार्गरेखा और समय को लेकर रेलवे से लचीला होने के लिए कह रहे थे क्योंकि परिसंपत्ति उपयोग और राजस्व पर इनका सीधा प्रभाव पड़ता है।

यात्री किराया वृद्धि और रेलवे के राजस्व में वृद्धि की विसंगतियों को भी रेखांकित किया गया था। लेकिन रेलवे ने एक न सुनी। निवेशकों का तर्क था कि नए क्षेत्र में प्रवेश लेकर वे जोखिम उठा रहे हैं। हमने ट्रेंड देखा है कि मालवहन के साथ-साथ यात्री परिवहन में भी रेलवे की भागीदारी धीरे-धीरे सड़क और हवाई मार्ग खा रहे हैं।

यात्री परिवहन में खर्च होने वाले हर 1 रुपये पर 43 पैसे का नुकसान होता है। वातानुकूलित कुर्सीयान व 3-एसी के अलावा किसी और श्रेणी में लाभ नहीं होता है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार राजमार्गों के तीव्र विस्तार से सड़क ही देश की जीवनरेखा बन गए हैं जो 60 प्रतिशत मालवहन और 85 प्रतिशत यात्री परिवहन की भागीदारी रखते हैं।

शताब्दी में वातानुकूलित कुर्सीयान

2014 से 2018 के बीच हवाई यात्रियों की संख्या 8.2 करोड़ से दोगुनी होकर 16.4 करोड़ हो गई। वही यात्री-किलोमीटर की दृष्टि से रेलवे का ट्रैफिक 2012 से स्थिर ही है। स्पष्ट है कि यात्री रेलवे से सफर नहीं करना चाह रहे हैं, भले ही इसमें किराया सस्ता हो।

यदि रेलवे अपने परिचालन अनुपात को बेहतर करना चाहता है, जो स्वस्थ रूप से 85 प्रतिशत से कम होना चाहिए परंतु वर्तमान में यह 97-98 प्रतिशत है, तो उसे कुशलता एवं आराम बढ़ाकर परिवहन का कुछ भाग वापस जीतना होगा। (परिचालन अनुपात यानी 1 रुपये का राजस्व कमाने में कितने पैसे का खर्च हुआ।)

संकीर्ण हितों की रक्षा

निजी परिचालक जोखिम उठाना चाहते थे, यदि रेलवे उनका सहयोग करता तो। रेलवे ने आईआरसीटीसी के लिए जगह बनाने हेतु उन्हें धकिया दिया। यह बात समझ से परे है कि आईआरसीटीसी को यह टेंडर लाभप्रद कैसे लगा, हो सकता है परिवार का सदस्य होने के नाते उसे कुछ अकथ लाभ मिले रहे हों।

हो सकता है रेलवे उसके साथ वही करे जो उसने एक अन्य परिवार के सदस्य कन्टेनर कॉरपोरेशन (कॉनकॉर) के साथ किया। चीन समेत विश्व भर में मालवाहक ट्रेनें चलाने वाली इस कंपनी से पूछें कि क्यों भारत में वह ऐसा नहीं कर रही है, आप समझ जाएँगे।

1988 में कॉनकॉर की स्थापना की गई थी। उसके बाद इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा लाने के लिए कई प्रस्ताव दिए गए। यूपीए सरकार विशेष मालवाहक ट्रेनों के लिए 2006 से 2010 के बीच तीन योजनाएँ लेकर आई थी और सब विफल रहीं। वे बनीं ही विफल होने के लिए थीं।

अंत में हार तो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की हुई। 1000-1500 किलोमीटर यात्रा पर कोयला मूल्य लगभग दोगुना हो जाता है। निजी से लेकर सार्वजनिक- सभी व्यवसाय रेल से असंतुष्ट हैं। कई कारगो प्रकृति (जैसे कोयला) के कारण रेल का प्रयोग करने हेतु बाध्य हैं। जिनके पास विकल्प है, वे सड़क मार्ग चुन रहे हैं।

रेलवे से कोयला परिवहन

आदर्श रूप से सड़क से सस्ता रेल को होना चाहिए। लेकिन रेल से संयोजित सीमा चौकियों को देखें, नेपाल और बांग्लादेश मिलाकर भारत से 17 अरब डॉलर का निर्यात कर रहे हैं लेकिन यह सब सड़क मार्ग से होता है। इसका अर्थ हुआ कि व्यवहारिक रूप से रेल महंगी है और लागत के कारण हमारे निर्यातक लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

बड़े सुधारों की आवश्यकता

नरेंद्र मोदी सरकार सही समय पर यात्री ट्रेन सेवा में निजी निवेश को आकर्षित करने का प्रस्ताव लेकर आई है। हालाँकि, विफलता ने इस लाभ से हमें वंचित कर दिया है। अब विकल्प है कि या तो टेंडर प्रक्रिया को दोहराया जाए या और बड़े सुधार प्रयासों से अपनी इच्छाशक्ति का लोहा मनवाया जाए।

इतिहास हमें बताता है कि सुधारों को रोकने में रेलवे नौकरशाही को दक्षता प्राप्त है। पिछले चार दशकों में रेलवे सुधार के लिए कई समितियाँ गठित हुई हैं। दो का नेतृत्व एचसी सरीन (1981-85) और राकेश मोहन (2011) ने किया था जिनके सुझाव कागज़ों पर ही रहे।

समय आ गया है कि और कड़े कदम उठाए जाएँ। आदर्श रूप से रेल ट्रैक पर रेलवे का स्वामित्व होना चाहिए और रेल नेटवर्क के परिचालन में अपनी योग्यता तक ही उसे सीमित रहना चाहिए, शेष सब कुछ निजी हो सकता है। यदि राजनीतिक कारणों से हम ऐसा नहीं कर सकते तो चीन से सीख लेनी चाहिए।

सुधारों के बाद राज्य के स्वामित्व वाली चीन रेलवे समूह लिमिटेड के अधीन कई रेल कंपनियाँ कारगो व यात्रियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। भारत रेलवे मंडलों को रेल कंपनियों का रूप दे सकता है। बात स्पष्ट है कि राष्ट्र इस अकुशल राज्य एकाधिकार को और नहीं सह सकता है। हमें प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता है।