विचार
‘हे ईश्वर! हमें अंधकार से प्रकाश की ओर मत लेकर चलो’

आशुचित्र- जो धर्मनिरपेक्षता ‘असते मा सद्गमय’ के वाचन पर प्रश्न करती है, वह मात्र धर्मांतरण करने वाले धर्मों की भारतीय धर्म-विविध ज्ञान रीतियों के विरुद्ध नफरत है।

जेबीएस हल्देन (1892-1964) एक बहुज्ञ और आज के नियो-डार्विनवाद (मेंडल की अनुवांशिकी और डार्विन की उत्क्रांति का संश्लेषण) के रचनाकार हैं। वे एक मार्क्सवादी भी थे। वे मार्क्सवाद से बड़ी मुश्किल से निकले थे। उन्हें मार्क्सवाद से बाहर निकालने में यूएसएसआर द्वारा प्रोत्साहित नियो-लैमार्कवाद के छद्म-विज्ञान और स्टैलिन की अनुवांशिकी पर जाँच का योगदान था।

वे भारत आए और प्राचीन भारतीय दर्शन के प्रशंसक बन गए लेकिन साथ ही वर्तमान भारतीयों की चिंतन शक्ति पर संदेहशील ही रहे। एक बड़े जीव-वैज्ञानिक हल्देन ने 18 मई 1956 में हिंदुस्तान टाइम्स  के एक लेख में लिखा था-

“हिंदू धर्म में एक वैज्ञानिक स्वभाव है और विज्ञान को समझने में यह भारतीयों के लिए सहायक सिद्ध होगा। गायत्री मंत्र का उच्चारण याद दिलाता है कि पृथ्वी, वायु और आकाश का होना हमारा वैभव है और यह व्यक्ति का धर्म है कि वह अपनी शक्ति अनुसार इनका विचार करे। अगर इस मंत्र का उच्चारण करने वाले सौ लोगों में से एक भी इसे अपने कर्तव्यों में उतार पाया तो भारत विज्ञान में अग्रणी होगा।”

कोई यह सोच सकता है कि हल्देन की क्या प्रतिक्रिया होती जब वे इस कथन के सात दशक बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अंधकार से प्रकाश और असत्य से सत्य की ओर ले जाने की प्रार्थना वाले उपनिषद के श्लोक को धर्मनिरपेक्षता के हनन के रूप में मानते हुए देखते।

याचिकाकर्ता का कहना है कि ये प्रार्थना समुदाय विशेष से संबंधित, कट्टर एवं धार्मिक है। समस्या असल में हिंदू धर्म की गहराई और देश में बड़ती सांस्कृतिक अक्षरता के कारण उत्पन्न हुई है।

हल्देन ने खुद माना था कि हिंदू धर्म धर्मांतरण करने वाले धर्मों जैसा नहीं है, बल्कि यह इस सृष्टि के प्रति एक ऐसा दृष्टिकोण देता है जो अनेक धर्मों और दर्शनों के साथ अनुकूल बैठता है। यदि हम अंधकार से प्रकाश और असत्य से सत्य की ओर ले जाने की प्रार्थना को धर्मनिरपेक्षता का विरोधी (एंटी-सेक्युलर) कह सकते हैं, तब क्रमागत उन्नति (इवॉल्यूशन) के शिक्षण को भी ऐसा कहा जा सकता है। आखिरकार क्या यह वेदांत के अवैयक्तिक स्पिनोज़ैन  सिद्धांत पर आधारित नहीं है और सृष्टि के रचयिता के रूप में ईश्वर की अनुपस्थिति क्या इस्लामिक-ईसाई धर्मों के विरुद्ध नहीं है?

तमिल नाडु में वैसे ही राजनीतिक पार्टियों ने सामुदायिक शब्द बीसी और एडी के स्थान पर धर्मनिरपेक्ष शब्द बीसीई और सीई को सम्मिलित कर दिया है क्योंकि उनके अनुसार पहले के शब्द एंटी-सेक्युलर थे।

सीताराम गोयल ने सही भविष्यवाणी की थी कि नीच धर्मनिरपेक्षता मुख्यधारा राजनीति का संभाषण बन जाएगी। आज यह धर्मनिरपेक्षता कुछ नहीं बल्कि मात्र धर्मांतरण करने वाले धर्मों की भारतीय धर्म-विविध ज्ञान रीतियों के विरुद्ध नफरत है, विशेषकर हिंदू धर्म के लिए।

एक राष्ट्र और एक सभ्यता की तरह भारत विविद ज्ञान और आध्यात्मिक परंपराओं के भरन-पोषण का केंद्र रहा है जिसके लिए हल्देन ने कहा था कि यह अनेक धर्मों और दर्शनों के साथ अनुकूल बैठता है। आधुनिक भारत के संस्थापकों ने शायद यह समझ लिया था कि राज्यतंत्र का हिंदू राष्ट्र के प्रति यह कर्तव्य बनता है। इसलिए भारतीय नौसेना का आदर्श-वाक्य वेद से लिया गया है, भारतीय वायु सेना का गीता से और उपनिषद का वाक्यांश सत्यमेव जयते  हमारे राष्ट्र चिह्न के साथ निहित है।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद के लोगो में ईशावास्य उपनिषद का वाक्यांश है। परेशानी जान-बूझकर या अज्ञान से उत्पन्न हो सकती है जब हिंदू राष्ट्र को धर्मनिरपेक्ष राज्य के साथ असंगत समझा जाता है।

राज्य को धर्मनिरपेक्ष मानने के अलावा और कोई विचार नहीं हो सकता, उसी प्रकार भारत को हिंदू राष्ट्र मानने के अलावा भी कोई और विचार नहीं हो सकता, यदि इस शब्द को गहराई से समझा जाए तो।

राजनीतिक मानसिकता में पहचान को लेकर भ्रम दुर्भाग्यवश उत्पन्न हुआ है जहाँ दोनों के अंतर में धुंधलापन है। यहाँ तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले का दायित्व एक विशेष बेंच को सौंपा है जबकि इसे सारांश में बर्खास्त कर देना चाहिए था।

यदि पाठ्यक्रम में किसी चीज़ की त्वरित आवश्यकता है तो वह वेदों के दर्शन, वेदांत और संख्या, वेद प्रणाली की सत्कार्यवाद, जैनों के सत्यवाद, बौद्धों के प्रतित्यसमुप्तदा, आदि को वित्रान, कला और मानविकी में कुशलतापूर्वक जोड़ने की है।

यह एक ऐसी आवश्यकता है जिसका आभास आधुनिक गणतंत्र भारत की शुरुआत में ही हो गया था। भौतिक-विज्ञानी व शिक्षाविद प्रोफेसर डीएस कोठारी के नेतृत्व में शिक्षा आयोग ने 1966 में तत्कालीन शिक्षा मंत्री मुहम्मद करीम चगला को रिपोर्ट सौंपते हुए कहा था-

यदि हम ठीक से समझें तो हम विज्ञान का उपयोग हमारे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को सशक्त न कि कमज़ोर करने के लिए कर सकते हैं। यह हमारा उद्देश्य और कर्तव्य होना चाहिए कि हम प्राचीन द्रष्टाओं के मौलिक सिद्धांतों को फिर से समझें और समयानुकूल बनाएँ जो कुछ संदर्भों में अद्वितीय है और विश्व की गतिविधियों को मर्म और गहराई से समझाने में सक्षम है।

इस वाक्य का अंतिम हिस्सा एक प्रसिद्ध किताबव्हॉट इज़ लाइफसे लिया गया है। भौतिक-विज्ञानी श्रोडिंगर द्वारा लिखित इस किताब ने विज्ञान को एक नई दिशा प्रदान की है। इसके बाद आयोग केना उपनिषद के प्रारंभिक श्लोक हवाला देते हुए विस्तार से समझाता है। इस संदर्भ में आयोग ने नेहरू जी के कहे हुए शब्दों का भी उल्लेख किया और कहा, “हम विज्ञान के प्रति बेईमान नहीं हो सकते मगर हम अपने पुराने रीतियों से बेईमान हो सकते हैं।” और भारत से नफरत करने वाले लोग भी इस बात से सहमत होंगे कि उपनिषद जिनका प्रतिनिधित्व करता है, “वह वे सिद्धांत हैं जिनके लिए भारत युगों से खड़ा रहा है।”

कोई उम्मीद कर सकता है कि भारत इन अद्वितीय सभ्यतागत लाभों को विज्ञान का एक पाठ्यक्रम बनाए। मगर यह वैदिक हवाई जहाज और महाभारत परमाणु मिसाइलों के बारे में नहीं होगा और ही डार्विनविरोधी मूर्खताओं और ही छद्म गुरुओं के द्वारा अर्जित ‘जादुई शक्तियोंके बारे में होगा। वर्तमान में मन से जुड़ी विकृतियाँ सांस्कृतिक अशिक्षा से पैदा हुई हीन भावना से आती हैं जो हमारी शिक्षा प्रणाली में सम्मिलित हैं।

यह जीवन के सभी क्षेत्रों में एक मजबूत मनोविज्ञान की खोज और विज्ञान में इस्तेमाल किए जाने वाले शाश्वत मूल्यों को बनाने के बारे में है। इस सभ्यता ने पहले ही दिखाया है कि कैसे वैदिक मूल्य जेसी बोस और जॉर्ज सुदर्शन जैसे वैज्ञानिक बना सकते हैं और आज हमारे पास मंजुल भार्गव और सुभाष काक जैसे लोग मौजूद हैं। फिर भी, इस सभ्यतागत ज्ञान से फलीभूत लोग आज व्यवस्था के परिणाम से अधिक अपवाद के रूप में खड़े हैं। अगर हमने अपनी शिक्षा में उपनिषदों और बुद्ध एवं  शंकरा की भावनाओं को एकीकृत करने वाली प्रणाली बनाई होती, तो इस भूमि में विभिन्न प्रकार के महान लोग मौजूद होते!

इतने वर्षों के बाद सर्वोच्च न्यायलय को यह अवसर प्रप्त हुआ है कि वह लोगों को उपनिषद की उपयोगिता के बारे में बताए क्योंकि असतोमा सद्गमय जैसे श्लोक हमारे देश की आत्मा हैं और अगर हम इन श्लोकों को किसी भी कारणवश भूल जाते हैं या भुला देते हैं तो राष्ट्रवाद की भावना धूमिल हो जाएगी और भारत के सभी संस्थान और उपकरण केवल आत्मा रहित शरीर के रूप में बने रहेंगे।