भारती / विचार
वोक संस्कृति कोई सामाजिक आंदोलन नहीं बल्कि अधिष्ठान द्वारा थोपा गया एक मत है

न्यूयॉर्क सिटी में टाइम्स स्क्वायर के निकट कुछ महीने पहले एक वृद्ध एशियाई महिला पर दिन-दहाड़े एक निर्दयी हमला हुआ था। हमलावर एक चाकू लिये हुए था। उसने महिला को लात मारकर भूमि पर गिराया, उसे पीटा, घसीटा और एशियाई-विरोधी अपशब्द कहे।

यह एक ऐसा असंवेदनशील आपराधिक कृत्य है जो किसी को भी क्रोधित कर देगा। आज के जागृत (वोक) वातावरण में जहाँ नस्ल और लिंग को लेकर हर कोई जागरूक है, वहाँ संभव ही नहीं था कि इस घटना पर जनता ध्यान न दे। किसी को तो दोषी ठहराना था।

किसी को ठहराया भी गया। इस मार्ग के निकट स्थित भवन में काम करने वाले दो द्वारपालों, जिन्होंने हमला होते हुए देखा पर कुछ किया नहीं, को नौकरी से निकाल दिया गया। अच्छा हुआ। लेकिन एक बात पर ध्यान दें।

न्यूयॉर्क सिटी में अपराध बढ़ रहा है, एक वर्ष में गोलीबारी की घटनाएँ 86 प्रतिशत बढ़ी हैं। 2019 के अंत में न्यूयॉर्क में एक नया राज्य कानून पारित हुआ जिसने कारावास के द्वार खोल दिए और सहस्रों अपराधियों को खुला छोड़ दिया।

जिस व्यक्ति ने वृद्ध एशियाई महिला पर हमला किया है, उसे सड़क पर खुला नहीं घूमना चाहिए था। 2002 में स्वयं अपनी माँ की चाकू मारकर हत्या करने का वह दोषी ठहराया जा चुका है। तो क्यों न इस घटना और बढ़ते अपराधों का उत्तरदायी न्यूयॉर्क के राज्यपाल को ठहराया जाए?

क्या आप मज़ाक कर रहे हैं? अब ऐसा नहीं होता है। राज्यपाल के पास शक्तियाँ हैं। इसलिए वोक आंदोलन उन्हें कुछ नहीं कहेगा। यहाँ तक कि न्यूयॉर्क के राज्यपाल एन्ड्र्यू क्यूओमो पर आरोप है कि उन्होंने वृद्धों के चिकित्सालयों में कोविड रोगियों को भेजा जिसके कारण सहस्रों मौतें हुईं।

इसके बाद उनके सहयोगियों ने संघीय सरकार से इस डाटा को छुपाने की बात भी स्वीकार की है। इसके अलावा राज्यपाल पर कम-से-कम 10 महिलाएँ यौन उत्पीड़न का आरोप लगा चुकी हैं। क्या इतना सब पर्याप्त है कि वोक भीड़ उन्हें कार्यालय से बाहर का रास्ता दिखाए?

बिल्कुल भी नहीं। राज्यपाल क्यूओमो के पास शक्ति है। इसलिए अभी तक वे उस पद पर हैं जबकि दो द्वारपालों, जो संभवतः न्यूनतम भत्ते पर काम करते होंगे, को नौकरी से निकाल दिया गया है और अब वे दर-दर भटककर अपने परिवारों के भरन-पोषण के लिए कोई और साधन ढूंढ रहे होंगे।

वोक संस्कृति अमेरिका पर हावी हो चुकी है और विश्व पर भी हावी होने के लिए प्रयासरत है लेकिन ध्यान दें कि इसका लक्ष्य कौन है। 2010 में जो बाइडन ने क्यू क्लक्स क्लैन (केकेके) के पूर्व आयोजक और सांसद रॉबर्ट बायर्ड की शोक संभा में एक हृदयस्पर्शी प्रशंसा-भाषण दिया था।

यह एक ऐसा संगठन था जिससे जुड़े व्यक्ति की प्रशंसा करने पर किसी को भी नकार दिया जाता। लेकिन बाइडन ‘कोई भी’ नहीं हैं। वहीं, दूसरी ओर एक मध्यम स्तर की टेलीविज़न अभिनेत्री को पिछले माह नकार दिया गया।

इंटरनेट से उजागर हुआ कि 1999 में जब वे 19 वर्ष की थीं तो एक स्थानीय प्रदर्शन में सम्मलित हुई थीं जिसकी शुरुआत एक ऐसे व्यक्ति ने की थी जो 19वीं शताब्दी में केकेके से जुड़ा था। 1878 के समाचार आलेख से एक अंश निकालकर उन लोगों ने अभिनेत्री का सच ‘उजागर’ कर दिया।

और यह सोचा कि नस्लवादी होने के बावजूद वह कैसे बच जाती, इंटरनेट पर निगरानी रखने वालों के प्रति आभार व्यक्त किया जिन्होंने ऐसा नहीं होने दिया, है ना? वोक संस्कृति के पक्षधरों का कहना है कि यह मात्र उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने वाली संस्कृति है।

उनका कहना है कि उपनिवेश-विरोधी आंदोलनों, नागरिक अधिकार आंदोलनों, पुराने नारीवादी आंदोलनों या समलैंगिक अधिकार आंदोलनों की तरह ही वे भी विश्व को बेहतर बनाने के लिए कार्य कर रहे हैं। लेकिन यदि वे प्रणालीगत अन्याय से लड़ रहे होते तो क्या वे सामान्य लोगों के 10 वर्ष पुराने ट्वीट निकालने की बजाय शक्तिशाली लोगों को चुनौती नहीं देते?

यदि आपको गड़े मुर्दे ही उखाड़ने हैं तो क्यों न आप बात करें कि कैसे न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाइटी) ने नाज़ी नरसंहार पर पर्दा डाला था? 1934 में बर्लिन में एनवाइटी के ब्यूरो प्रमुख ने रिपोर्ट किया था कि साक्षात्कारों से उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि नाज़ी शिविरों में यहूदियों का वज़न बढ़ रहा था।

वे ओरेनाइनबर्ग-सैशेनहॉसेन स्थित शिविर की बात कर रहे थे जहाँ 1 लाख लोगों को मारा गया था। क्या न्यूयॉर्क टाइम्स को अभी तक नकारा गया है? बिल्कुल भी नहीं। क्योंकि एनवाइटी ही वह माध्यम है जिससे लोगों तक वोक संस्कृति के फतवे पहुँचाए जाते हैं।

हम जानते हैं कि वैटिकन सिटी मुसोलिनी द्वारा दिया गया एक उपहार है क्योंकि पोप ने फासीवादी शासन को वैध ठहराया था। थोड़ा सोचें कि विश्व भर में कैथॉलिक चर्च के विरुद्ध बाल यौन शोषण के कितने आरोप लगते हैं।

सोचें कि महिलाओं और समलैंगिकों के अधिकारों को दबाने में विश्व भर में चर्च ने क्या भूमिका निभाई है। क्या पोप को अभी तक नकारा गया? बिल्कुल भी नहीं। जो बाइडन श्रद्धा रखने वाले एक कैथॉलिक हैं।

जब वे राष्ट्रपति बने तो न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल ने आशा व्यक्त करते हुए लेख लिखे कि दो पुरुष, एक मजहब अधिकारी और एक लौकिक, मिलकर अमेरिका को प्रकाश की ओर ले जाएँगे। इसीलिए वोक संस्कृति भूतपूर्व सामाजिक आंदोलनों से अलग है।

यह ऊपर से आती है, नीचे से नहीं। यह सत्ता को चुनौती नहीं देती है बल्कि यह सत्ता का एक साधन है। इसका उद्देश्य छोटे लोगों को डराकर नियंत्रण में रखना है। सोचें कि सामाजिक आंदोलन कैसे शुरू होते हैं।

लोगों का एक छोटा समूह होता है जो अपने समय के बार में सोचता है, अन्याय को पहचानता है और परिवर्तन के लिए प्रदर्शन करता है। शुरुआत में उन्हें अनदेखा किया जाता है और निम्न दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन वे जागरूकता फैलाने का काम जारी रखते हैं।

अधिष्ठान उन्हें दबाने का प्रयास करता है, परिवर्तन चक्र को थामने की कोशिश करता है। प्रगति धीमी होती है लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन होता है। जैसा कि कहा जाता है, वे पहले आपको अनदेखा करेंगे, फिर आप पर हँसेंगे, फिर आपसे लड़ेंगे और अंततः आप जीत जाएँगे।

वहीं दूसरी ओर, क्या आपको कभी ऐसा लगा कि वोक संस्कृति इतनी तेज़ी से फैल रही है कि आप इससे कदम नहीं मिला पा रहे? आप सोचते हैं कि आप गतिशील हैं लेकिन अचानक आपको पता चलता है कि आपने जो कहा था उसे बीते कल ही नकारा जा चुका है।

आपको लगता था कि माता शब्द में कोई बुराई नहीं है लेकिन फिर आपको पता चला कि माता कहना गलत है, बल्कि जन्मदात्री जनक (बर्थिंग पैरेंट) कहना चाहिए। सामाजिक आंदोलनों के विपरीत, इसमें अधिष्ठान हमेशा आपसे एक कदम आगे होता है।

सरकार और शैक्षिक स्तर पर वोक संस्कृति को समर्थन मिलता है और आपके सीखने की क्षमता से कई तेज़ी से यह बढ़ता है। बड़े निगम आपसे कई अधिक वोक हैं। क्या आपको कभी आश्चर्य हुआ कि कर्मचारियों व छोटे व्यापारों और तीसरे विश्व का शोषण करने वाले निगम कैसे आपसे अधिक लोगों की भावनाओं की चिंता करते हैं?

लेकिन सबसे महत्त्वपूर्ण, क्या इन सबका आप पर दुष्प्रभाव पड़ता है? आज नहीं तो कल आप सोचेंगे कि कोई वाक् अपराध या विचार अपराध करने से बेहतर है कि आप चुप ही रहें। सूची लगातार बढ़ती जाएगी। इंटरनेट पर हत्या करने वाली भीड़ किसी को भी उठाकर उसका दमन करके एक उदाहरण प्रस्तुत करेगी।

संदेश अनियमितता में है। यदि वे शक्तिशाली लोगों को निशाना बनाते तो आपको चिंता करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि आप जानते हैं कि आप एक आम व्यक्ति हैं। इसलिए वे साधारण और औसत लोगों को निशाना बनाते हैं।

उनका निशाना आज किसी मध्यम-स्तर के नगर में हज़ार मील दूर रहने वाला कोई मध्यम-वर्गीय व्यक्ति था, कल आप हो सकतें हैं। बेहतर होगा कि आप चुप रहें। सामाजिक आंदोलनों के विपरीत, अधिष्ठान इस परिवर्तन को रोकने का प्रयास नहीं करते हैं।

बल्कि अधिष्ठान ही हैं जो इस परिवर्तन को निर्धारित करते हैं। वास्तव में, अधिष्ठान ही परिवर्तन हैं। युद्ध शांति है, दासता में स्वतंत्रता है, अज्ञानता शक्ति है और अधिष्ठान परिवर्तन है। और वर्ष 1984 है (संदर्भ- जॉर्ज ओरवेल की पुस्तक)।

अभिषेक बनर्जी गणितज्ञ और भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AbhishBanerj के माध्यम से ट्वीट करते हैं।