भारती / विचार
ओरिजिनल सिन (ईसाइयत में एक सिद्धांत) से प्रेरित है आज का ‘वोक कैन्सल कल्चर’

यूएस में ब्लैक लाइव्स मैटर अभियान के साथ ‘वोक’ (अत्यधिक जागरूक) विश्व ‘कैन्सल’ (हर विपरीत विचार को नकारना) मोड में चला गया है। पिछले वर्ष कई “नस्लवादियों” की प्रतिमाएँ गिराई गईं और जिनकी प्रतिमाएँ नहीं तोड़ी गईं, उनके विरुद्ध प्रदर्शन चलता रहा, जैसे सेसिल रोड्स, विन्सटन चर्चिल, रॉबर्ट क्लाइव और क्रिस्टोफर कोलंबस।

अब इंग्लिश हैरिटेज ने कह दिया है कि वह एनिड ब्लाइटन की कृतियों में “नस्लवाद, विदेशी लोगों के प्रति घृणा और साहित्यिक मेधा के अभाव” या ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पुरस्कृत कवि रूडयार्ड किपलिंग के “नस्लवादी और साम्राज्यवादी भावों” को अस्वीकार करते हैं।

यदि हमारे नायकों ने कुछ ऐसा किया है जिसे आज हम नहीं मानते हैं, उससे स्वयं को पृथक कर लेना ठीक है लेकिन भूतपूर्व घटनाओं या व्यक्तियों को नीचा दिखाना व पूर्ण रूप से स्वयं को उससे अलग कर लेना समस्याजनक है।

इतिहास में अब कोई ऐसा व्यक्ति नहीं बचा है जिसका वर्तमान में उपहास न उड़ाया जाता हो या अस्वीकार न किया जाता हो। हम निश्चित रूप से यह मान सकते हैं कि आज की अतिरिक्त राजनीतिक शुद्धता और बिना दोष के एक पूरे वर्ग के लोगों को ग्लानि भाव देने की प्रवृत्ति को इस सदी के अंत तक अत्यधिक मूर्खतापूर्ण मान लिया जाएगा।

ऐसा लगता है कि सामान्य बुद्धिमता से कोई चलना ही नहीं चाहता जिसमें हम यह सोचें कि भूतपूर्व घटनाएँ उस समय स्वीकार्य थीं, यहाँ तक कि कुछ मामलों में अपेक्षित थीं, भले ही आज वे हमारे लिए गलत हों। यदि वैसी गलती आज भी की जा रही है तो आप उसे सही करने के लिए जो कर सकते हो करो।

लेकिन आपको ग्लानि में डूबने की आवश्यकता नहीं है, जैसा कि ‘वोक’ लोग “क्रिटिकल रेस सिद्धांत (सीआरटी)” या “इंटरसेक्शनलिटी (अंतरनुभागीयता)” से आपको महसूस कराना चाहते हैं। मनुष्य गलत और सही दोनों करता है, इस बात को मानने के लिए आपको किसी सिद्धांत की आवश्यकता नहीं है।

यदि किसी व्यक्ति ने कुछ गलत किया है, उसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वह व्यक्ति पूरा ही गलत है। चर्चिल भारतीयों के लिए कोई नायक नहीं है, लेकिन अपने कुछ कृत्यों के लिए अंग्रेज़ों की दृष्टि में वह नायक है। निस्संदेह, वह नस्लवादी था लेकिन वह उस समय था जब हमारे लगभग सभी औपनिवेशिक शासक नस्लवादी थे।

आधुनिक अंग्रेज़ों को उसका धन्यवाद कम-से-कम हिटलर को रोकने के लिए करना चाहिए क्योंकि वह कर पाना सरल नहीं था। वह नायक और खलनायक दोनों है। साथ ही, एक व्यक्ति के रूप में कोई व्यक्ति बहुत अच्छा और संत प्रवृत्ति का हो सकता है लेकिन उसके कृत्यों का प्रभाव दुष्टों को लाभ पहुँचा सकता है।

ऐसा गांधी के अहिंसा के साथ हुआ। उन्होंने खिलाफत आंदोलन का सहयोग करके मुस्लिम तुष्टिकरण करना चाहा। अहिंसा की वकालत करने के बावजूद मालाबार में हिंदुओं के विरुद्ध हुए मोपला दंगों पर उन्होंने कुछ नहीं कहा। बुराई के विरुद्ध तटस्थ नैतिक प्रतिरोध और सामूहिक आत्महत्या के बीच की महीन रेखा गांधी समझ नहीं पाए।

समस्या किसी सिद्धांत से है, चाहे वह अहिंसा का हो या सीआरटी, न कि मानवीय वास्तविकताओं से। सीआरटी के अनुसार, “कानून और वैधानिक संस्थान नस्लवादी होते हैं और नस्ल जैविक और प्राकृतिक नहीं बल्कि समाज द्वारा बनाई गई एक अवधारणा है जिसका उपयोग श्वेत लोग अपने आर्थिक और राजनीतिक हितों को बढ़ाने के लिए करते हैं।”

और इंटरसेक्शनलिटी का अर्थ हुआ कि दो लोग एक ही उद्देश्य के लिए लड़ रहे हों लेकिन आवश्यक नहीं कि वे एक ही स्तर पर हों क्योंकि कोई किसी दूसरे से “अधिक उत्पीड़ित” हो सकता है। दोनों उपरोक्त परिभाषाएँ ब्रिटैनिका से ली गई हैं।

हालाँकि, हमें गहराई से समझना होगा कि लाखों लोगों को अपराध-बोध से ग्रसित करने की ‘वोक’ आवश्यकता की उत्पत्ति कहाँ से हुई है। मेरा मानना है कि यह एक अजीब ईसाई अवधारणा “ओरिजिनल सिन” से आई है जहाँ पैदा हुआ हर बच्चा पापी होता है। पाप-मुक्त होने के लिए उसे ईसा मसीह में विश्वास रखना होता है।

ओरिजिनल सिन अवधारणा के दो लाभ हैं- एक तो मजहबी प्रचार-प्रसार के लिए यह तर्कसंगत है और दूसरा यह पैशाचिक है। यदि सिर्फ ईसा मसीह ही आपको पाप-मुक्त कर सकते हैं तो ईश्वर-पुत्र में विश्वास करने का एक अच्छा कारण हो जाता है, अन्यथा उस पाप के कारण आपको नर्क में जाना पड़ सकता है।

पैशाचिक इसलिए क्योंकि जब तक ईसा मसीह आपको पाप-मुक्त करते रहेंगे, तब तक आप पाप करने के लिए स्वतंत्र होंगे और कोई भी पाप करके मात्र क्षमा याचना कर लेंगे। इसी कारण से यूरोपीय नस्लवादियों और समुद्री डाकुओं ने हत्याएँ कीं और फिर स्थानीय लोगों को छोटा-सा स्थान देकर क्षमा याचना कर ली।

यदि एक बार ओरिजिनल सिन की अवधारणा पर आप विश्वास करने लग जाते हैं तो पाप अपरिहार्य हो जाता है तो क्यों आप प्रयास करेंगे कि भविष्य में आप पाप न करें? ओरिजिनल सिन के विचार से ही सीआरटी आया है कि कोई भले ही कट्टरवादी न हो लेकिन वह नस्लवादियों के कृत्यों के लिए उत्तरदायी है और उसे अपराध-बोध से ग्रसित होना ही होगा।

संत ऑगस्तीन ने ओरिजिनल सिन अवधारणा की विस्तृत व्याख्या की है और तबसे यह कैथोलिक चर्च मत का महत्त्वपूर्ण भाग है। लेकिन, जैसा कि ब्रिटैनिका में लिखा है, प्रबोधन मूल्यों ने इस अवधारणा पर प्रश्न खड़े किए हैं, हालाँँकि इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि मजहबी दृष्टि में इस विचार को नकारने के बावजूद लोग इसे दूसरों पर लागू नहीं करते हैं।

यही ओरिजिनल सिन है जो पश्चिमी इंडोलॉजिस्ट हम पर थोपना चाहते हैं और यह कहते हैं कि यदि आप स्वयं को हिंदू कहते हैं, विशेषकर सवर्ण हिंदू तो आप दलितों और अन्य हिंदुओं पर किसी के भी द्वारा किए गए अपराधों के लिए उत्तरदायी हैं।

यहाँ तक कि सुधार और इन गलतियों को सही करना पर्याप्त नहीं माना जाता। यदि आप हिंदू हैं, तो आप अपराधी हैं क्योंकि दो कारणों से आप पर ओरिजिनल सिन चढ़ा है- पहला, आप जो हैं (हिंदू) उसके लिए और दूसरा, आप जो नहीं हैं (धर्मांतरित ईसाई) उसके लिए क्योंकि ईसाई बनकर ही आप पाप-मुक्त हो सकते हैं।

रोचक है कि अन्य दो अब्राह्मिक मत और कम्युनिज़्म ईसाइयत से इस मामले में भिन्न है। यहूदी धर्म में ओरिजिनल सिन की कोई अवधारणा नहीं है, वहीं इस्लाम और कम्युनिज़्म विपरीत दिशा में चलते हैं तथा मानवता के विरुद्ध अपराधी व्यवहार व पाप को व्यावहारिक रूप से सही ठहराते हैं।

क़ुरान में ‘काफिरों’ के विरुद्ध हिंसा की अनुमति है, वहीं कम्युनिज़्म मानता है कि विरोधियों और विद्रोहियों की हत्याएँ आवश्यक हैं। इस्लाम अपने आक्रांताओं को अपना गौरव मानता है और आश्चर्य की बात नहीं है कि इन आक्रांताओं के पापों को धोने का काम कम्युनिस्टों ने किया है, चाहे वह टीपू सुल्तान हो या औरंगज़ेब।

आज तक भी, भारतीय कम्युनिस्ट लेनिन, स्टैलिन और माओ जैसे सामूहिक नरहत्या करने वालों को अपना नायक मानते हैं, भले ही उनकी कुछ बुराइयाँ भी स्वीकार की जाती है। इस्लाम और कम्युनिज़्म के अनुसार ओरिजिनल सिन उनपर चढ़ता है जो उनकी विचारधाराओं से सहमत नहीं होते हैं।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।