विचार
आपको द्वेषपूर्ण भाषण विधेयक के बारे में क्यों होना चाहिए चिंतित

प्रसंग
  • यदि मौजूदा कानून नाकाफी थे, तो भाषण की स्वतंत्रता को दबाने और निकट भविष्य में राजनीतिक शुद्धता को हथियार बनाने के लिए और भी कानूनों की गुंजाईश है।
  • ये कानून किसी को भी अपनी गिरफ्त में ले सकते हैं और इसके अगले शिकार आप भी हो सकते हैं।

ईश निन्दा के लिए कमलेश तिवारी, राजद्रोह के लिए असीम त्रिपाठी, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कार्टून शेयर करने के लिए अंबिकेश महापात्रा, राम रहीम की नकल करने के लिए कीकू शारदा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ प्रतिकूल लेखों के लिए जाकिर खान और हाल ही में रक्षा रणनीति विश्लेषक एवं समालोचक अभिजीत अय्यर मित्रा। हमें इनमें से कितने नाम याद हैं और कितने नाम हम भूल गए हैं?

अब तक हम सब औपनिवेशिक कानूनों के संग्रह के बारे में जानते हैं जिनका उद्देश्य वह शासित करना है जो हम तर्कसंगत प्रतिबंधों के नाम पर बोलते हैं। ‘द्वेषपूर्ण भाषण’ कानूनों में राजद्रोह के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए, धर्म, जाति, भाषा और निवास के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देने के लिए धारा 153 ए, राष्ट्रीय एकीकरण के प्रतिकूल अभिकथनों के लिए धारा 153 बी और लोगों की धार्मिक मान्यताओं की निंदा या अपमानित करने के लिए 295 ए शामिल हैं। बेशक अन्य अधिनियम भी हैं, लेकिन उपरोक्त चार धाराओं को भारत में भाषण नियंत्रण प्रावधान का सबसे बड़ा हिस्सा माना जा सकता है। भारत के कुछ राज्यों में हर महीने इनमें से किसी न किसी कानून को लोगों पर उनके आक्रामक और कभी-खभी मूर्खतापूर्ण एवं कभी-कभी अप्रिय भाषण के लिए लागू किया जाता है।

कई उदाहरणों में से, तीन घटनाएं ऐसी हुईं जिन्होंने मुझे भावनात्मक रूप से बहुत प्रभावित किया और मुझे एहसास हुआ कि अंततः बुरे कानून हर व्यक्ति को अपनी गिरफ्त में ले लेंगे। पहली घटना 2012 में हुई थी जब बालासाहेब ठाकरे के अंतिम संस्कार के लिए शहर के बंद होने पर एक फेसबुक पोस्ट के लिए मुंबई में दो लड़कियों को गिरफ्तार किया गया था। दूसरी कोणार्क मंदिर और रसगोला की उत्पत्ति पर अभिजीत अय्यर मित्रा की व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के लिए उनकी गिरफ्तारी की घटना रही है। पहली घटना कुछ ऐसी लगी जैसे मैं एक बुरे दिन फेसबुक पर अपनी भावनाओं को निकाल सकती थी और यह तथ्य, कि आपको आपकी बिना सोचे-समझे डाली गई पोस्टों की निगरानी के बारे में जानने की आवश्यकता नहीं है, काफी भयावह लगता है।

दूसरी घटना मुझे भयावह इसलिए लगी क्योंकि कई बार कोशिश करने के बाद भी मुझे समझ में नहीं आया कि लोग मित्रा द्वारा स्पष्ट रूप से व्यंग्यात्मक टिप्पणियों को गलत तरीके से कैसे ले सकते हैं और इसके कारण उन्हें जेल में कैसे डाल सकते हैं। लेकिन तीसरी घटना के प्रकाश में आने पर मैं इन दोनों घटनाओं को अच्छी तरह समझ गई। ट्विटर पर एक अज्ञात ट्रोल ने मेरे नियोक्ताओं को मेरी कट्टरता के बारे में शिकायत करने की धमकी दी। मेरे पास यह जानने का कोई तरीका नहीं था कि वह किस बात से परेशान था और उसे परेशान करने का मेरा कोई उद्देश्य नहीं था। लेकिन, मेरी आजीविका को वास्तव में खतरा था और ऐसा इसलिए था क्योंकि एक अज्ञात ट्रोल मुद्दों पर मेरी राय से सहमत नहीं था।

क्या होता यदि यह ट्रॉल मेरे नियोक्ताओं के पास न जाकर पुलिस के पास जाता और मेरे खिलाफ मामला दर्ज कर देता? क्या होता यदि वह कह देता कि मेरी टिप्पणियां दुर्भावनापूर्ण थीं और हिंसा को बढ़ावा देने वाली थीं या उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली थीं या समूहों के बीच दुश्मनी को उकसाने वाली थीं? क्या होता यदि मेरा सोचा-समझा और उपयुक्त भाषण किसी के लिए द्वेषपूर्ण भाषण था और क्या होता यदि इसके लिए उसने मुझे जेल भेजने का फैसला किया होता?

ऐसी परिस्थिति में जहाँ हममें से किसी को भी द्वेषपूर्ण भाषण के दोषी के रूप में चित्रित किया जा सकता है, तो वास्तव में द्वेषपूर्ण भाषण है क्या?

सबसे पहले यह समझने की जरूरत है कि द्वेषपूर्ण भाषण की संविधान में या भारत द्वारा स्वीकृत एवं अनुमोदित कोई परिभाषा नहीं है। कई निर्णयों के दौरान, अदालतों ने इस समझ तक पहुँचने की कोशिश की है कि अभिव्यक्ति की वह प्रकृति क्या है जिसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति की सीमा तय करने के लिए तर्कसंगत ठहराया जा सके। वर्ष 1989 के रंगराजन बनाम जगजीवन राम मामले में न्यायालय ने प्रमाणित किया कि जो द्वेषपूर्ण भाषण तत्काल सार्वजनिक उपद्रव उत्पन्न कर सकता है, वो द्वेषपूर्ण भाषण है। वर्ष 2011 के अरुप भूयान बनाम असम राज्य मामले में, न्यायालय ने वही दृष्टिकोण अपनाया और बाद में इस तरह के भाषण की समझ को ‘निकटस्थ कानूनहीन कार्रवाई’ जैसे रूप में स्पष्ट किया। भारत में भाषण की आजादी के ऐतिहासिक निर्णयों में से एक, श्रेया सिंघल बनाम भारतीय संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला किया था कि न तो चर्चा और न ही वकालत, बल्कि हिंसा को प्रोत्साहन देने वाले स्वतंत्र भाषण को ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने वाले कारणों के रूप में उपयोग किया जा सकता है।

जहाँ पिछले निर्णय यह स्पष्ट करते हैं कि द्वेषपूर्ण भाषण को मुख्य रूप से हिंसा को बढ़ावा देने वाले कारण के रूप में पहचाना जाता है, वहीं हम विशिष्ट कानूनों के माध्यम से होने वाले दुरुपयोगों को भी देख सकते हैं। लेकिन आगे जो खतरा सामने आता है वह न्यायमूर्ति बी एस चौहान की अध्यक्षता में वर्ष 2017 की कानून आयोग की रिपोर्ट की सिफारिशों के रूप में आता है। वर्ष 2014 के प्रवासी भलाई संगठन बनाम भारतीय संघ के फैसले के एक हिस्से के रूप में सर्वोच्च न्यायालय ने कानून आयोग से द्वेषपूर्ण भाषण को परिभाषित करने और इससे होने वाले खतरे को रोकने के लिए संसद को सुझाव देने के लिए कहा था। द्वेषपूर्ण भाषण को रोकने की उत्सुकता में आयोग ने ‘हिंसा को बढ़ावा देने’ की परिभाषा की बजाय ‘द्वेष को बढ़ावा देने’ की परिभाषा को प्रस्तुत किया।

कानून आयोग के अनुसार, द्वेषपूर्ण भाषण की नई परिभाषा “मुख्य रूप से वंश, जाति, लिंग, यौन अभिविन्यास, धार्मिक आस्था और इसी तरह के संदर्भ में परिभाषित, व्यक्तियों के एक समूह के खिलाफ घृणा का प्रोत्साहन” है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सोशल मीडिया की अनामिकता ‘झूठे और आक्रामक विचारों’ को प्रसारित करने की अनुमति देती है जिससे भेदभाव कायम रह सकता है। इसलिए यह सलाह देता है कि न केवल हिंसा को भड़काना बल्कि भेदभाव को बढ़ावा देना भी द्वेषपूर्ण भाषण कहलाता है। रिपोर्ट में दो दंड प्रावधान जोड़ने की सिफारिश की गई है जो द्वेषपूर्ण भाषण को एक संज्ञेय अपराध बनाते हैं जिससे घृणा, भय, चेतावनी और हिंसा को बढ़ाने के लिए दो साल तक के कारावास की सजा हो सकती है।

यदि मौजूदा कानून नाकाफी थे, तो भाषण की स्वतंत्रता को दबाने और निकट भविष्य में राजनीतिक शुद्धता को हथियार बनाने के लिए और भी कानूनों की गुंजाईश है। एक पल के लिए जेल में निस्तेज अभिजीत अय्यर पर बारीकी से विचार करें और खुद से एक सवाल पूछें। अगर कोई दिलोदिमाग से देखे तो पाएगा कि किस बयान, किस मजाक, और किस मुंहतोड़ जवाब को भेदभावपूर्ण या घृणास्पद टिप्पणी के रूप में नहीं देखा जा सकता? परिभाषा इतनी अस्पष्ट और संक्षिप्त है कि किसी समुदाय या समूह पर किसी व्यंग्य से लेकर इतिहास पर चर्चा या राजनीतिक बयान तक सब कुछ शायद आसानी से भेदभावपूर्ण या शायद घृणास्पद माना जा सकता है। किसी भी प्रकार की हिंसा को कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती। सिर्फ अपराध की धारणा लोगों पर मुकदमा चलाने और उनके भाषणों को रोकने के लिए पर्याप्त होगी। क्षेत्रीय या राष्ट्रीय महत्व के किसी भी विषय पर मीडिया द्वारा कोई भी चर्चा द्वेष फैलाने के अंतर्गत आ सकता है और यह स्वतंत्र मीडिया के खिलाफ जा सकता है।

इस साल मई में, द्वेषपूर्ण भाषण बिल 2018 का प्रारूप गृह मंत्रालय को भेजा गया था, जिसमें घृणित भाषण पर तीन समितियों की सिफारिशों को संकलित किया था। पहली, चौहान कानून आयोग की रिपोर्ट थी जिसका जिक्र पहले किया जा चुका है। दूसरी, बेजबरुआ समिति की रिपोर्ट थी जिसमें उत्तर पूर्व भारत के नागरिकों के खिलाफ भेदभाव के बढ़ते मुद्दों को हल करने के लिए नए कानूनों के प्रावधान की भी सिफारिश की गई थी। तीसरी और अंतिम रिपोर्ट टी के विश्वनाथन समिति की रिपोर्ट थी। ऑनलाइन तरीके से द्वेषपूर्ण भाषण पर ध्यान देने के उद्देश्य से धारा 66 ए हटाए जाने के बाद लोकसभा के महासचिव विश्वनाथन की अगुवाई में एक पैनल का गठन किया गया था। विधेयक के मसौदे में धारा 153 सी (बी) और धारा 505 ए के तहत दो साल के कारावास की सजा के साथ नए कानूनों के अंतर्गत द्वेषपूर्ण भाषण को संज्ञेय अपराध बनाने के लिए एक संशोधन का प्रस्ताव रखा गया है। वर्तमान सरकार इस पर विचार करने में देरी कर रही है लेकिन 2019 में सत्ता बदलने पर स्थिति गंभीर होने की संभावना है।

अगर आपको लगता है कि यह आप नहीं हो सकते, तो फिर से विचार कीजिए। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहां हर भाषण को द्वेषपूर्ण भाषण समझा जा सकता है। और अगर ऐसे कानून अस्तित्व में आते हैं तो ऐसे मामलों में बढ़ोत्तरी होगी। सामान्य रूप से राजनेताओं पर व्यंग्य करने के लिए, कार्टून बनाने के लिए, धर्म की आलोचना करने के लिए और सामान्य रूप से मजाक उड़ाने के लिए लोगों को जेल भेजा जा चुका है। लोगों को आलोचना करने, गुस्सा करने, बुद्धिहीनता, मूर्खता और असंवेदनशील होने के लिए जेल भेजा गया है। लोगों को उस चीज के लिए जेल भेजा जा रहा हैं जो वे हैं और इसलिए भी भेजा जा रहा है क्योंकि वे स्वयं को अपने तरीके से व्यक्त करते हैं। इसलिए, अगर आपको लगता है कि वह आप नहीं हो सकते, तो फिर से विचार कीजिए।

प्रत्याशा रथ सामाजिक विकास और राजनीतिक क्षेत्र की सलाहकार हैं।