विचार
क्यों है तमिलनाडु को कावेरी डेल्टा में जल संग्रहण बढ़ाने की ज़रूरत?

प्रसंग
  • कावेरी में चेक बांधों का निर्माण तमिलनाडु में जल संकट से निपटने में एक अहम समाधान हो सकता है, जो मुख्य रूप से भूमिगत जल पर निर्भर है

24 अगस्त को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री इडापड्डी के. पलानीस्वामी ने क्षतिग्रस्त हुए मुक्कोम्बू बांध का निरीक्षण करने के तुरंत बाद घोषणा की कि राज्य में बहुत जल्द ही करीब 325 करोड़ रुपये की लागत से कोल्लिदम नदी पर एक नियामक बाँध का निर्माण किया जाएगा। यह बांध इतना ज्यादा क्षतिग्रस्त हो गया था कि इसमें से 10,000 क्यूसेक उपयोगी जल बह गया था, जिसे बचाया जाना चाहिए था।

पिछले 13 साल में पहली बार तमिलनाडु, कावेरी नदी को इतने उफान पर देख रहा है। केन्द्रीय जल आयोग से प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि राज्य के छह प्रमुख जलाशयों का जलस्तर पिछले 10 सालों में सबसे ऊंचे स्तर पर है। जिससे इनका भंडारण सामान्य से 80 प्रतिशत अधिक हो गया है।

मेत्तुर और लोअर भवानी जलाशय तो अपनी क्षमता के अनुकूल भरे हुए हैं, लेकिन अन्य जलाशयों का जलस्तर 90 प्रतिशत से अधिक है। बांध पूरी तरह से भरे हुए हैं, दक्षिण-पश्चिमी मानसून के अच्छे होने  की वजह से केरल और कर्नाटक में कुछ ज्यादा ही बारिश हुई है। 29 मई से सक्रिय होने वाले मानसून ने केरल में सामान्य से 60 प्रतिशत अधिक जबकि दक्षिण कर्नाटक में सामान्य से 12 प्रतिशत अधिक बारिश हुई है। केरल और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में कई दिनों में लगभग 100 मिमी तक बारिश हो गई।

नतीजा यह हुआ कि इस साल कावेरी में करीब 1,70,000 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है। फिर भी तमिलनाडु के किसान खुश नहीं हैं। कडलूर और नागपट्टनम जिलों के किसानों ने शिकायत की है कि उनके खेतों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिला और कोल्लिदम से अधिकांश पानी बंगाल की खाड़ी में गिरा दिया गया है।

तमिलनाडु में तंजावुर के मन्नारगुड़ी विधानसभा क्षेत्र से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) पार्टी के विधायक टीआरबी राजा ने दो हफ्ते पहले ट्वीट किया था कि कावेरी डेल्टा के कई हिस्सों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिला, जिससे किसान भड़के हुए हैं। इससे पहले उन्होंने ईपीएस सरकार द्वारा नहरों में पानी की सुनिश्चितता न होने के लिए सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकार द्वारा बजट में इसके लिए आवंटन होने के बावजूद भी नहरों की सही से सफाई नहीं की गई है।

2015 में रिकॉर्ड बारिश और उसके बाद

खैर इस समय तमिलनाडु में इस बात पर बहुत बहसबाजी की जा रही है कि क्या राज्य में कावेरी डेल्टा में पानी को संरक्षित करने के लिए अधिक संग्रह या तरीकों का होना चाहिए? जलाशय न केवल मानसून में मूसलाधार बारिश के दौरान पानी को संरक्षित करते हैं बल्कि बाकी समय में भी पानी की महत्वपूर्ण मात्रा को भी संकुचित करते हैं। उदाहरण के लिए, 2015 में तमिलनाडु में बाढ़ के प्रकोप का सामना करने वाले कम से कम आठ जिलों में रिकॉर्ड बारिश हुई थी। लेकिन अगले 12 महीनों में, भूजल के स्तर में गिरावटआई – इससे पता चलता है कि मूल्यवान पानी किस तरह से बर्बाद किया गया।

डेल्टा द्वारा पिछले दो वर्षों में पानी की कमी का सामना करने और कावेरी पानी साझा करने पर कर्नाटक के साथ तमिलनाडु के संघर्ष के बाद इस मुद्दे को विशेष महत्व मिला है। राज्य जल संसाधन प्रबंधन एजेंसी, चेन्नई के एस एस राजगोपालऔर जल संसाधन विभाग के कार्यकारी अभियंता डी पनेरसेल्वम द्वारा “तमिलनाडु कावेरी डेल्टा प्रणाली में जल प्रबंधन कार्यों का अवलोकन” नामक एक शोध पत्र, में कहा गया कि तमिलनाडु में ताजे पानी की बढ़ती माँगों के साथ, इसका 53 प्रतिशत भूजल के माध्यम से मिलता है।

नहरों के माध्यम से कावेरी नदी से पानी प्राप्त करके, डेल्टा में कर्नाटक के सिंचित क्षेत्र,जो 1960 के दशक में 2 लाख हेक्टेयर थे, से बढ़कर 14 लाख हेक्टेयर हो गए हैं। साथ ही, तमिलनाडु में नहरों के माध्यम से नदी द्वारा सिंचित क्षेत्र 9 लाख हेक्टेयर से घटकर 7.5-8 लाख हेक्टेयर रह गए हैं। तमिलनाडु के लिए दुर्भाग्य की बात यह है कि तालाब द्वारा सिंचाई के तहत भूमि, जो 1960 के दशक में 9.5 लाख हेक्टेयर थी, अब 4 लाख हेक्टेयर रही रह गई है।

मेकेदातु के लिए मामला?

मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर, के शिवसुब्रमण्यन ने इन आंकड़ों की तरफ इशारा करते हुए ‘स्वराज्य’ को बताया, कर्नाटक में पानी का विस्तार बेहतर है। उन्होंने यह भी कहा कि शायद मेकेदातु में बांध का निर्माण करना समझारी भरा निर्णय होगा। कर्नाटक और तमिलनाडु दोनों मेकेदातु बांध के निर्माण की पूर्व योजनाओं पर झगड़ा कर रहे हैं। 9 अगस्त को कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी ने मीडिया से कहा कि वह मेकेदातु में एक बहुउद्देशीय परियोजना के निर्माण के लिए तमिलनाडु के प्रतिनिधियों और किसानों से मिलेंगे। यह परियोजना पेयजल और बिजली की जरूरतों को पूरा करेगी। कर्नाटक पूरी कावेरी नदी पर एक संतुलित जलाशय का निर्माण करेगा। कर्नाटक जल संसाधन मंत्री डी के शिवकुमार ने केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी से भी परियोजना की केंद्र की मंजूरी पाने के लिए मुलाकात की थी।

कर्नाटक 5,912 करोड़ रुपये की लागत से एक जलाशय बनाने की योजना बना रहा है, जो बेंगलुरू से 90 किलोमीटर दूर रामनगरम में बनाया जाएगा। जो मेकेदातु की  65 टीएमसी (हजार मिलियन घन) फीट पानी के भंडारण की क्षमता रख सकेगा। यह बांध राज्य को 400 मेगावाट बिजली उत्पन्न करने औरपेयजल की कमीं से जूझ रहे बेंगलुरु की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करेगा। वहीं, दूसरी ओर तमिलनाडु कावेरी नदी पर अपने अधिकारपूर्ण जल के हिस्से से वंचित होने के डर से इस परियोजना का विरोध कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने 15 फरवरी के अपने फैसले में पहले ही इसका हिस्सा 177.25 टीएमसी कर दिया है।

कावेरी के तट पर स्थित तिरुची के मुसिरी में रहने वाले शिवासुब्रमण्यन ने बताया कि तमिलनाडु होगेनक्कल के पास स्थित रसिमनल में जलाशय बनाने पर विचार कर सकता है। 24 अगस्त को कृष्णगिरि में पट्टाली मक्कल कतची पार्टी द्वारा जल का भंडारण को लेकर और इसे समुद्र में बहने से बचाने के लिए रसिमनल में एक बांध के निर्माण की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया गया। सिंचाई विशेषज्ञों का कहना है कि तमिलनाडु में, विशेषकर मानसून के समय, अतिरिक्त वर्षा जल का भंडारण करने की विधियों और संसाधनों की जांच की जानी चाहिए।

चेक बाँध हैं समाधान

शिवासुब्रमण्यन कहते हैं कि कावेरी मेतूर से 420 किलोमीटर आगे बंगाल की खाड़ी तक बहती है, तमिलनाडु तंजावुर तक कम से कम प्रत्येक 10 किमी पर एक चेक बांध बनाने पर विचार कर सकता है। उन्होंने बताया, “इस तरह की एक मुहिम कम से कम 25-30 चेक बांध बनाने में मदद कर सकती है और ऐसे बांधों की ऊँचाई 5 फीट से अधिक नहीं होनी चाहिए। ”आंध्र प्रदेश सरकार ने पालर नदी पर जो मुहिम चलाई है, यह भी उसी के जैसी है। चंद्रबाबू नायडू सरकार ने नागारी और सनकुप्पम के बीच तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले में नदी के प्रवेश बिंदु पर प्रत्येक 2 किमी पर 10 चेक बांधों का निर्माण किया है।

शिवासुब्रमण्यन ने कहा, “ये चेक बांध केवल सिंचाई ही नहीं बल्कि नदी के आसपास के सैकड़ों गांवों की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। वर्तमान समय में नदी के किनारों से 2 किमी के दायरे तक पेयजल उपलब्ध है। बहता पानी नदी के किनारे से 2 से 4 किमी के बीच स्थित गाँवों की मदद करता है लेकिन नदी के किनारे से 4 किमी से अधिक दूरी वाले गाँवों में पानी नहीं पहुँचता।” इन चेक बाँधों से काफी दूर के क्षेत्रों तक पानी पहुँचने में सहायता मिल सकती है।

तमिलनाडु अब पीने योग्य पानी की जरूरतों को पूरा करने के लिए भूमिगत पानी का दोहन करने पर अधिक निर्भर करता है। यह दो दशक पहले कि समस्या है जब कुओं के माध्यम से पानी की जरूरतों को पूरा किया जाता था। तंजावुर, पुदुकोट्टई और मदुरै जैसे जिलों में, कावेरी डेल्टा में भूमिगत जल का दोहन करके घरों में सप्लाई किया जा रहा है। एक विशेषज्ञ का कहना है, “कावेरी डेल्टा में पानी के नीचे का स्रोत बहुत विशाल है।“

हर साल जब 12 जून को सिंचाई के लिए मेट्टूर बांध खोला जाता है तब चेक बांध भी खोले जा सकते हैं। जिससे भूमिगत पानी को रिचार्ज करने में मदद मिल सकती है और इसी के साथ यह उद्देश्य को आगे बढ़ाने में  तेजी ला सकता है। इससे पंप सेट की सिंचाई दक्षता में सुधार होगा, जो 90% ड्रिप सिंचाई और 85 प्रतिशत फव्वारा सिंचाई की तुलना में केवल 60-70 प्रतिशत है।

शिवासुब्रमण्ययन ने कहा “तमिलनाडु को सूखे से प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए 10 से 15 किलोमीटर लंबे चैनल या नहरों का निर्माण करने पर भी विचार करना चाहिए। डेल्टा से निकलने वाला पानी नहर में जाएगा, जो एक मौसम की फसल पैदा करने में तो मदद कर ही सकता है।”

कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच जल साझाकरण पर कई दांव पेंच हैं, जैसे मानसून के अभाव में पहले वाले को सिंचाई करने की प्राथमिकता देना और यदि वैसे हालत अगले वर्ष भी बने रहे तो उसके बाद दूसरे को मौका दिया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय  मौसम विज्ञान विभाग की भविष्यवाणी की सूचना प्रणाली को आने वाले महीनों में सुधारना होगा।

आवंटनों की हालत बदतर?

तमिलनाडु के बारे में सिंचाई विशेषज्ञों का कहना है कि नहरों को साफ और गहरा रखा जाना चाहिए था। विशेष रूप से द्रमुक की अगुवाई में विपक्षी दलों द्वारा ईपीएस सरकार के खिलाफ की गयी शिकायतों में यह कहा गया है कि शाखा नहरों और उप नहरों का सही से रखरखाव नहीं किया जा रहा है। शिवासुब्रमण्यन का कहना है कि “इन नहरों को लगातार दो साल में कम से कम एक बार गहरा करना पड़ता है।”

दूसरी ओर राजा ने सवाल उठाया कि तमिलनाडु सरकार ने नहरों की सफाई, गहराई और रखरखाव के लिए बजट में से जो भाग आवंटित किया था उसका क्या हुआ। पिछले और मौजूदा बजट में, राज्य ने जल निकायों की गहराई और सफाई द्वारा जीर्णोद्धार करने के लिए 300 करोड़ आवंटित किए थे। द्रमुक के कार्यकारी अध्यक्ष एम के. स्टालिन अचंभीत हैं कि सिंचाई विभाग के पास कोई दीर्घकालिक उपाय क्यों नहीं है। उन्होंने कहा कि दुख होता है कि इतनी बड़ी मात्रा में पानी समुद्र में चला जाता है। एक सवालिया ट्वीट करते हुए उन्होने पूछा कि जल संग्रहण के लिए बजट से आवंटित और विश्व बैंक जैसी बहुपार्श्वीय कंपनियों से उधार ली गई सारी धनराशि का क्या हुआ।

स्टालिन की बात में दम तो है लेकिन तमिलनाडु की समस्या यह है कि सन् 1967 में जब द्रमुक सत्ता में थी तब से राज्य को जलाशय की केवल कुछ ही परियोजनाएं मिली हैं।

एम.आर. सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वह @mrsubramani पर ट्वीट करते हैं।