विचार
सबरीमाला मेरा मामला है और इसमें कोर्ट को दखल नहीं देना चाहिए
क्यों सबरीमाला मेरा मामला है और इसमें कोर्ट को क्यों दखल नहीं देना चाहिए

प्रसंग
  • जानकार न्यायाधीश आपकी और मेरी आस्था पर समझदारी से कदम उठाएं

देश भर की नजरें इस पर टिकी हुई हैं कि 10 से 50 साल के बीच उम्र वाली महिलाओं के मंदिर में प्रवेश वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला सुनाता है। लेकिन केरल में पले बढ़े मेरे जैसे किसी मध्यम वर्गीय हिन्दू के लिए सबरीमाला आस्था का एक मामला था। आज हम टीवी पर मकर ज्योति देख सकते हैं लेकिन इसमें उतना मजा नहीं आता जितना मजा रात को खाना खाने के बाद दीपक की मंद-मंद नाचती रोशनी में घर के बड़े बुजुर्गों से इसके बारे में सुनने से आता था।

हम बच्चे इसको पूरे ध्यान से सुनते थे। स्वामी अय्यप्पन एक जीते जागते देवता थे और हमने संस्थापक चालाक रानी के खिलाफ आवाज उठाई थी जिसने उन्हें एक गलती करने पर शेरनी का दूध लाने के लिए भेजा था। अय्यप्पन हम लोगों के लिए उतने ही असली थे जितना कि महाभारत का युद्ध, जिसके बारे में दादाजी ने हमें बहुत कुछ बताया था।

करीब पचास साल पहले यात्रा अलग तरीके से होती थी। मेरे चाचा गाँव से करीब 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर में 41 दिन की कड़ी तपस्या करके पैदल जाया करते थे। अपनी जवानी में वे जंगली नृत्य, पेटातुतुल, करते हुए एरुमेली के कठिन रास्ते से मंदिर जाते थे, इस नृत्य को गुरू-स्वामियों द्वारा शामिल किया गया था।

उन दिनो लोग मंदिर के पास पड़ी खाली जगह पर ही झोपड़ी बना लेते थे और उसी झोपड़ी में रहकर पूरी तल्लीनता से साथ तपस्या किया करते थे। इन झोपड़ियों को पर्णशाला कहा जाता था। दाढ़ी रखे, काले वस्त्र धारण किए हुए लोग माला पहनकर वे पूरे स्वामी लगने लगते थे। यहाँ पर आकर आप पूरी तरह से बदल जाते हैं – न कोई ऊंची जाति का, न कोई नीची जाति का, जाति का कोई अंतर ही नहीं, तीर्थयात्रियों का एक लोकतांत्रिक और समतावादी समूह।

स्वामी की भावना का एहसास कराने के लिए कुछ उल्लेखनीय कार्य हैं – बढ़ी हुई दाढ़ी और त्याग के प्रतीक काले कपड़े यहां पूजा करने आने वालों की वेशभूषा होती है, यह एक समान वेशभूषा आपको व्यक्तिवादी होने की कम और एक समूह का हिस्सा होने की भावना ज्यादा महसूस कराती है। वे लोग बौद्ध भिक्षुओं की तरह सिर मुंडा रखते हैं या सैनिकों की तरह छोटे बाल रखते हैं, इस पूरी वेशभूषा से उनके अंदर व्याप्त अहंकार का नाश होता है और वे अपनी इस तीर्थयात्रा पर ज्यादा ध्यान दे पाते हैं।

तब से अब तक इस बात का तो कोई सवाल ही नहीं उठता था कि महिलाएं इस तीर्थयात्रा पर जाएंगी या नहीं। झोपड़ियों में खुद को अलग कर लेने वाले पुरूषों का मुख्य विचार इस लोक से विमुख होकर आध्यात्मिकता पर ध्यान केन्द्रित करना होता था। इसके विपरीत, महिलाओं को घर गृहस्थी और पुरूष से कुछ समय के लिए अलग होकर कोई अच्छा काम करने के लिए समय मिलता था। लोगों में यह डर भी व्याप्त था कि अगर किसी ने माँस, मदिरा या स्त्री के साथ यौन संबंध बनाकर तपस्या को भंग किया तो उसपर जंगली जानवर हमला करेंगे।

यह कोई टलने वाला खतरा नहीं था। मंदिर का रास्ता भयानक जंगल से होकर गुजरता था। मैं पहली बार अपनी किशोरावस्था में सबरीमाला गया था। हम लोग जून के महीने में गए थे, उस समय साल के अंत में तीन महीने तक चलने वाली तीर्थयात्रा का समय नहीं था। अक्टूबर-दिसंबर/जनवरी में यहाँ भक्तों की काफी भीड़ रहती थी फिर एक लंबे समय के लिए मंदिर को बंद कर दिया जाता था। फिर धीरे-धीरे उन्होंने हर मलयालम महीने की शुरूआत में पाँच दिनों तक इसे खोलना शुरू कर दिया। उस समय मैं अपने अंकल के साथ वहाँ गया था। जहाँ तक मुझे याद है आज जहाँ पर मंदिर स्थित है पहले वहाँ पहाड़ी पर कोई पक्का भवन नहीं था। केवल कुछ दुकानें लगी हुई थीं। लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है वहाँ पर कई पक्के भवन बन चुके हैं जो साल भर खुले रहते हैं।

फिर हम लोग पम्बा बेस कैंप पहुंचे। जहाँ पर चाचा ने बताया कि अब हम लोग पहाड़ी पर अलग-अलग होकर चढ़ाई करेंगे। फिर मैंने अपनी यात्रा शुरू की। रास्ता सही सलामत था,

करीब दस फुट चौड़ा रास्ता धरती को कई फीट तक फैले हुए शानदार उष्णकटिबंधीय जंगल तक चिन्हित कर रहा था और जहाँ कहीं पर भी ज्यादा खड़ी चढ़ाई थी वहाँ पर पत्थर की सीढ़ियाँ बनाई गई थीं।

मैं एक झोला टांगे, बिना कमीज और काली धोती पहने अकेला ही पहाड़ी पर चढ़ा। कभी-कभी कुछ अनजान आवाजें या लाल पंख वाले तोतों की आवाजें सुनाई पड़ जाती वरना पूरे रास्ते में सन्नाटा ही पसरा हुआ था। मुझे कुछ रीसस बंदर भी दिखाई दिए। लेकिन पगडंडियों पर कोई भी नहीं मिला। खड़ी पहाड़ी पर तीन घंटों वाली चार किलोमीटर यात्रा के दौरान मुझे दूसरी तरफ से आते हुए बहुत ज्यादा तो बस आधा दर्जन लोग ही मिले। चाहे आप कई दिनों वाले एरुमेली के लंबे रास्ते से जाएं या पंबा होकर छोटे रास्ते से जाएं आज भी यह उतना ही मेहनती और थकाऊ रास्ता है। .

असल में, मेरे जाने के रास्ते पर पूरी पहाड़ी थी। यह मेरे जैसे शहरी के लिए थोड़ा सा डरावना था। घना जंगल शांत था, लेकिन यह एक तरह से भयावह था। और मुझे पूरा भरोसा था कि झाड़ियों में जंगली जानवर हो सकते हैं – विशेष रूप से हाथी, और बाघ, ऐसी अफवाहें थीं, खासकर अयप्पा और बाघ की किंवदंती पर आधारित – हालांकि मुझे इनमें से कोई भी नहीं दिखा।

मैं स्थलों पर अकेला घूम रहा था, जैसे, बरगद का पेड़ जिसमें वहां पहली बार पहुचने वाले तीर्थयात्री तीर घुसेड़ते हैं और इसके साथ ही अपनी मनोकामना मागते हैं। मेरे सिर पर दो बैग इरू-मुदी थे जो वहां पहुचने वाले प्रत्येक तीर्थयात्री के पास होते है और उनमें पूजा में प्रयोग किया जाने वाला देशी घी से भरा हुआ नारियल और अन्य पूजा सामग्री होती है। जैसा की रस्म है तो मैं नंगे पैर ही था और पत्थरों से मेरे पैर घायल हो गए। और रास्ता कहीं कहीं पर बेहद खड़ी चढ़ाई वाला था और यह बहुत ही थका देने वाला था। वहां जोंक भी थीं, क्योंकि यह बरसात का मौसम था, और मैं लगातार अपने नंगे पैरों को देख रहा था कि कहीं उनमें से कोई मेरे पैर में चिपक न जाए। मेरे पास उनसे निपटने के लिए चूने का पेस्ट था जो उनकी पकड़ को कमजोर कर देता है।

और मैं अकेला था। पिछले कुछ सालों में, एक बार सीजन के दौरान जाने को मिलाकर मैं वहां पांच बार गया था और घने बालों वाले, काले या नीले रंग के कपड़े पहने हुए तीर्थयात्री उस जगह को एक वास्तविक महासागर बनाते हैं। आजकल अयप्पा तीर्थयात्रा पर अकेले होने की कल्पना करना भी संभव नहीं है। लेकिन मैं तब अकेला था, और मुझे बाद में महसूस नहीं हुआ कि इसमें कितना आशीर्वाद था: मैं अपने विचारों पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम था, और मेरी भगवान अय्यप्पन को उनके मंदिर में देखने की प्रत्याशा थी।

आखिरकार, मैं शिन्निधानम, शिखर पर पहुंचा। वहाँ दर्जनों लोग थे, शायद सौ भी हो सकते हैं। अठारह सीढ़ियों की परंपरागत तरीके से पूजा करने के बाद मैं भगवान के समीप पहुंच गया था, और बहुत ही अद्भुत तरीके से छोटे से मंदिर के गर्भगृह के बाहर खड़ा था। उन शान्तिपूर्ण दिनों में, मैं जब तक वहां खड़ा रहना चाहता था तब तक खड़ा रह सकता था: क्योंकि यहां भीड़ नहीं थी जो मुझे धक्का देकर वहां से हटा दे।

हो सकता है कि यह वर्षों की प्रत्याशा के कारण था, या शायद रास्ते की थकावट, लेकिन उस पल, मैने ऐसा महसूस किया जो मैंने कभी पहले या बाद में महसूस नहीं किया था। मैं मूर्ति के सामने खड़ा था आँखें बंद थीं, और मैं स्वर्ग के दरवाजे खुलते हुए देख सकता था। मैं एक अवर्णनीय आनंद का अनुभव कर रहा था, और मुझे पता था कि मैं इस अनुभव को फिर से महसूस नहीं कर सकता। मैं चाहता था कि मैं उस पल में मर जाऊं, ताकि मैं हमेशा उस आनंद में रह सकूं। अगर मैं समय रोक सकता, तो वह ऐसा क्षण था जिसे मैं रोकना चाहता था।

वह आनंद का अनुभव गुजर गया, लेकिन मैं उसे कभी नहीं भूल सकता। मेरे पूर्वजों के देवता ने मुझे पूर्ण दर्शन दिए, और इसके लिए मैं हर दिन उनका धन्यवाद करता हूं।

कुछ सालों के बाद, मैं फिर से वहां गया, लेकिन अब यह पहले जैसा नहीं रह गया था। हालांकि यह ऑफ सीजन था, फिर भी वहां बहुत अधिक भीड़ थी। आप गर्भगृह के सामने पल भर से अधिक नहीं रह सकते। चूंकि तीर्थयात्रा बेहद लोकप्रिय हो गई है, और दक्षिण भारत के लोग बड़ी संख्या में पहुंचने लगे हैं, यह एक अद्भुत स्थल बन गया है; लेकिन अधिकारियों ने सचमुच मंदिर के रखरखाव के लिए, पैसा का लेखा-जोखा लेने और इसे राज्य के राजकोष में डालने के लिए लगभग कुछ भी नहीं किया है। हालत खराब है, कई घंटों कर इंतजार करना पड़ता है, पूरा क्षेत्र लोगों द्वारा फैलाए गए कचड़े से भरा पड़ा है और जंगली शुअर उस कचड़े को खोदा करते हैं। यह, अब दुनिया में सबसे ज्यादा लोगों के एक जगह एकत्र होने की जगहों में से एक ऐसा अनुभव देती है कि केवल एक सच्चा भक्त ही इसकी सराहना कर सकता है। फिर भी, तमिल और तेलुगू और कर्नाटक के लोग, दाढ़ी वाले तीर्थयात्री लाखों में आते हैं।

इसने और गलत अवधारणाओं को आकर्षित करना शुरू कर दिया है। 1950 के दशक में, एक भू-माफिया ने मंदिर को जलाने की कोशिश की। तत्कालीन मुख्यमंत्री, एक कांग्रेस नेता ने कहा: “ओह अच्छा, अंधविश्वास का एक और गढ़ खत्म हुआ.” 1980 के दशक में, ईसाईयों ने अचानक ‘2000 वर्ष पुराना’ लकड़ी का क्रॉस वहीं कहीं आस-पास ‘खोज’ निकाला और मांग की कि वहां एक चर्च वहां बनाया जाए। और अब, याचिकाकर्ताओं का एक समूह जो भक्त नहीं है, बार-बार कहने की ज़रूरत नहीं, ने लिंग के भेदभाव का हवाला देते हुए मंदिर के संस्कारों को बदलने के उद्देश्य से जनहित याचिका दायर की है और आग्रह किया है कि तीर्थयात्रा में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को भी भाग लेने की अनुमति दी जानी चाहिए।

प्रजनन क्षमता वाली आयु की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के बारे में कुछ तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया गया है। एक स्पष्ट दृष्टिकोण से ऐसा लगता है कि यह किसी प्रकार के पुरूषों का एक संगठन है, पुरूषों द्वारा महिलाओं पर प्रतिबंध लगाने का कारण पुरुष विशेषाधिकार के अलावा और कुछ भी नहीं है। वास्तव में कुछ और सूक्ष्म कारण हैं। यह एक दुष्कर और निर्जन तीर्थस्थल है अथवा ऐसा पहले के दिनों में रहा होगा। घने जंगलों से होकर जाने पर जंगली जानवर हमला कर सकते थे, और इसके बाद पुरूषों को कुल मिलाकर महिलाओं की हिफाजत करने की आवश्यकता होती थी। इसी प्रकार यह सच है कि आपके साथ जो छोटी बच्चियाँ और बुजुर्ग महिलाएं यात्रा करती हैं उनकी हिफाजत भी आपको ही करनी है।

यह विचार सही है कि 41 दिनों के व्रत (ब्रह्मचर्य) के दौरान महिलाओं को एक या दो बार मासिक धर्म से गुजरना पड़ सकता है। ऐसा नहीं है कि मासिक धर्म किसी न किसी तरह से ‘गंदा’ माना जाता है। हिंदू परंपरा में, महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान विशेष रूप से शक्तिशाली माना जाता है और उन्हें संरक्षण तथा सम्मान दिया जाता है और कोई काम नहीं करने दिया जाता है। इसका एक वैज्ञानिक कारण हो सकता है: मासिक धर्म के रक्त में प्लुरिपोटेंट स्टेम कोशिकाएं होती हैं। ऐसे कई मंदिर हैं जहाँ मंदिर की देवियों को भी मासिक धर्म होता है।

मेरा अनुभव यह कहता है कि भारतीय महिलाएं अपने मासिक धर्म को लेकर परेशान नहीं होती हैं और वे सीधे तौर पर इसे साधारण और स्वास्थ्यकर चीज मानकर बात करती हैं (उनमें से कुछ कहती हैं, ‘मेरा साथी’ )। पाश्चात्य सभ्यता की महिलाएं काफी हद तक इनके विपरीत हैं, जो मासिक धर्म को बहुत ही शर्मनाक बात मानती हैं और पुरूषों से यह छिपाने में उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ती है। अगर आज कोई भारतीय पुरूष सोचता है कि मासिक धर्म किसी न किसी तरह से ‘गंदा’ होता है तो ऐसा नहीं है, यह सब अब्राहमिक संस्कृति की भावना का परिणाम है।

इसके और भी कारण हैं। इनमें से पहला है अनोखी क्रियाशीलता, जो तब प्रदर्शित होती है जब एक युवा लड़का और लड़की कमरे के अंदर होते हैं। युवा लोगों की प्राकृतिक संभोग प्रवृत्ति चरम पर हो जाती है, और पुरुष महिलाओं को ‘प्रभावित’ करने के लिए मूर्खतापूर्ण क्रियाएं, जिसमें आत्मसंतुष्टि तथा मुकाबला शामिल है, करते हैं जिस तरह समागम की ऋतु आने पर नर पशु करते हैं। महिलाएं भी पुरुषों का ध्यान आकर्षित करने के लिए वह सब कुछ करती हैं, जो मादा पशु करते हैं। यह सब आध्यात्म के अनुकूल नहीं है।

यही कारण है कि पूरी दुनिया की सेनाओं में एक ही लिंग के (पुरूष या स्त्री) सैनिक रखे जाते हैं क्योंकि प्राकृतिक ईर्ष्या या बदले की भावना सैन्य मनोबल के लिए अच्छी बात नहीं है। (उदाहरण के लिए, यह स्वीकार करते हुए मैं कहता हूँ कि स्पार्टा के पुरूष सैनिक संभवतः प्रेमी थे। इससे मेरी बात साबित होती हैः समय के साथ स्पार्टा का क्या हुआ? यह सच है, बहुत से कारण हैं, लेकिन यह मेरे तर्क को नकारने का अच्छा उत्तर नहीं है।) जो सेनाओं के लिए तर्कसंगत नहीं है वह तीर्थयात्रियों के लिए भी तर्कसंगत नहीं है, मैं इस पर तर्क कर सकता था कि इससे ब्रह्मचर्य और आध्यात्म पर से ध्यान भटक जाएगा।

केरल में हिंदू महिलाएं, विशेष रूप से अयप्पा की भक्त, इसे समझती हैं और लोगों के बीच मुकदमे के समर्थन की कोई मजबूत भावना नहीं है। हैशटैग #रेडीटूवेट के तहत संगठित महिलाओं के समूह ने केरल में हिंदू महिलाओं का विशाल बहुमत हासिल किया जो नियमों में बदलाव से असंतुष्ट थीं और जो कथित तौर पर अपना अधिकार मांग रही थीं।

इस देश का पुत्र और एक आस्तिक होने के नाते मेरा मानना है कि राज्य मंदिर की परंपराओं को बदल रहा है जो कि घटिया विचार है। जो लोग स्वयं को पीड़ित महसूस नहीं करते हैं उन पर विपत्ति-ग्रस्त और सामाजिक न्याय के बारे में पुरानी और खुद को ख़त्म कर देने वाली पाश्चात्य संस्कृति और असंगत है। हिंदू आस्था में अद्वैतवाद-संबंधी एकरूपता नहीं है: हमारी संस्कृति में विविध परंपराएं और विशेष स्थल पुराण हैं जिनमें हमें श्रद्धा की भावना रखनी जानकार न्यायाधीश आपकी और मेरी आस्था पर समझदारी से कदम उठाएं.

राजीव श्रीनिवासन कार्यनीति और नवपरिवर्तन पर लिखते हैं, इस पर वह बेल प्रयोगशाला और सिलिकॉन घाटी में काम कर चुके हैं। इन्होंने कई भारतीय प्रबंधन संस्थानों में नवपरिवर्तन की शिक्षा प्रदान की है। आईआईटी मद्रास और स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस में वह 20 वर्षों तक एक अपरिवर्तनवादी समीक्षक रह चुके हैं।