राजनीति / विचार
क्यों राम जन्मभूमि स्थल पर एक मंदिर, और केवल एक मंदिर ही बनना चाहिए

आशुचित्र- अयोध्या में राम मंदिर सबसे नैसर्गिक चीज़ है। इसे रोकना केवल समुदायों के बीच तनाव का कारण बन सकता है।

6 दिसंबर 1992 को सैकड़ों-हज़ारों करसेवक अयोध्या में इकट्ठा हुए थे और राम जन्मभूमि का भाग्य अपने हाथों लिखने का निर्णय लिया। उन्होंने सभी बाधकों को तोड़ दिया, जिन संस्थाओं से वे जुड़कर यहाँ तक आए थे, उनके विरोधों को नकार दिया और उन तीन गुंबदों पर चढ़ गए जिसके भीतर राम लला की मूर्ति थी।

जल्द ही वह तीन गुंबद गिर गए और भारत का इतिहास हमेशा के लिए बदल गया।

लोगों ने इस बात पर विरोध जताया कि करसेवकों ने अपने कृत्यों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना की है। कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर दिया गया। मीडिया और प्रभावी शिक्षित वर्ग ने हिंदुओं के विरुद्ध देशभर में अभियान चला दिया जिसने साधारण मुस्लिमों के मन में इस विचार को प्रबल किया कि हिंदुत्व उनके लिए खतरा है।

लेकिन धर्म-निरपेक्षतावादियों के निर्मित विरोध की तरह न होकर 6 दिसंबर 1992 को करसेवकों का आक्रोश सच्चा था। उनके लिए सभी द्वार बंद हो चुके थे या उन्हें ऐसा लगा था लेकिन हमें यह याद होना चाहिए कि अयोध्या आंदोलन भारत के सबसे बड़े जन आंदोलनों में से एक था जिसका मुकाबला केवल महात्मा गांधी के स्वतंत्रता संग्राम के समय के जन आंदोलन से किया जा सकता है।

मुलायम सिंह ने नेहरु की छद्म-धर्मनिरपेक्ष विचारों का मानवीकरण करके इस विचार के खोखलेपन को उजागर किया था। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को मुलायम सिंह सरकार ने करसेवकों पर गोलियाँ बरसाई थी और नरसंहार किया था। लोगों की भावनाओं को सर्वोच्च न्यायालय का भी प्रहार सहना पड़ा था जब कोर्ट ने 15 नवंबर 1991 को कहा था कि कल्याण सिंह सरकार के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के मसले का निपटान दिसंबर तक कर दिया जाएगा। लेकिन एक साल के बाद भी कुछ नहीं हुआ था। करसेवकों का क्रोध वाजिब था।

इतिहासकार, पुरातत्त्वज्ञ और पुरालेखविद् लगातार कहते आए हैं कि बाबरी संरचना एक ध्वस्त मंदिर पर खड़ी है। शिक्षाविदों और मीडिया के वामपंथी कथन ने अपनी मिथ्या और अपने विचार का प्रचार-प्रसार करके भारत के जन साधारण, विशेषकर कि मुस्लिमों को धोखा दिया है। पुरातत्त्वज्ञ के.के. मुहम्मद ने पिछले दिसंबर में  लेखक के साथ एक साक्षात्कार में अयोध्या विवाद पर वामपंथी इतिहासकारों ने तथ्यों को दबाकर जो घातक भूमिका निभाई है, उसकी आलोचना की। उन्होंने समझाया-

“जब डॉ. बी.बी. लाल के द्वारा अयोध्या स्थल पर खुदाई चल रही थी, मैं इकलौता मुस्लिम था दल में। उस समय, इस प्रकार के विवाद नहीं थे। जब विवाद उठा तो जे.एन.यू. के इतिहासकारों ने कुछ महत्त्वपूर्ण खोजों को दबा दिया, वामपंथी इतिहासकारों और मीडियो ने तथ्यों से छेड़छाड़ की, उन्हें दबाया और एक गलत धारणा का प्रचार किया कि बाबरी के नीचे कुछ नहीं था। यदि उन्होंने सत्य को स्वीकर किया होता तो बहुत सी अप्रिय घटनाओं को रोका जा सकता था। वास्तव में, बहुत से मुस्लिम समूह भी इस सत्य को स्वीकारते हैं और हिंदू समुदाय की भावनाओं का सम्मान करते हैं, वे समझौता करना चाहते हैं। लेकिन वामपंथी इतिहासकारों और मीडियो के कुछ खंडों ने इसे बिगाड़ा।”

वामपंथियों के गलत प्रचार-प्रसार के कारण जो मानव त्रासदी हुई है, उसके लिए इन इतिहासकारों के विरुद्ध नूरम्बर्ग जैसी जाँच होनी चाहिए क्योंकि इन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करके हिंदू-मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव उत्पन्न किए हैं।

वास्तव में, अयोध्या में बहुत मस्जिदें हैं। जिस दिन उस गुंबद को ध्वस्त किया गया, उस दिन एक लाख से अधिक करसेवक शहर में मौजूद थे। फिर भी यह रिकॉर्ड पर है कि कर सेवकों ने किसी और मस्जिद के छुआ तक नहीं। इससे ही पता चलता है कि भीड़ असल में भीड़ नहीं थी क्योंकि उनका गुस्सा दिशाहीन नहीं था। यदि भारत देश की राजनीतिक, न्यायिक और शैक्षणिक प्रणालियाँ, साथ ही मीडिया अपनी ज़िम्मेदारी के साथ न्याय करते तो वे त्रासदियाँ नहीं झेलनी पड़तीं जो 6 दिसंबर 1992 के बाद हुईं।

राम मंदिर से अयोध्या का संबंध पुरातन काल से है। हिंदू, बौध, जैन और सिख, सभी राम का सम्मान करते हैं। संपूर्ण भारत में भाषा विविधता के बावजूद राम धार्मिक साहित्य और आध्यात्मिक कला जैसे नृत्य और संगीत का आधार रहे हैं।

वाल्मिकि रामायण के अलावा राम का सबसे प्राचीन उल्लेख विष्णु के अवतार के रूप में तमिल संगम साहित्य में मिलता है। कहानी कुछ इस प्रकार है- एक लड़की एक ऐसे लड़के से प्रेम में पड़ जाती है जो कमाने के लिए किसी दूर के स्थान पर चला जाता है। हर शाम को लड़की एक जगह पर जाकर खड़ी हो जाती है और अपने प्रेमी का रस्ता देखती है। इससे गाँव वासियों में कानाफूसी होने लगी। वे सब उसके पीठ पीछे बातें करते थे। फिर एक दिन नायक लौट आता है और सारी अफवाहें शांत हो जाती हैं।

कवि समझाते हैं- “जिस प्रकार जब सेतु के निकट बरगद के पेड़ के नीचे राम रणनीति तैयार कर रहे थे लेकिन चिड़ियों की चहचहाहट से उन्हें परेशानी होने पर उन्होंने अपनी आवाज़ से, जिसमें वैदिक अधिकार था, चिड़ियों को शांत होने के लिए कहा और वे शांत हो गई।” उसी प्रकार नायक के गाँव लौट आने पर गाँववाले भी शांत हो गए।

ध्यान दीजिए कि इसमें कहीं भी रामायण शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है और ना ही यह वाल्मिकि के समय का है। यह काव्य कम-से-कम दो हज़ार साल पुराना है और यदि राम के जीवन का यह दिव्य प्रकरण इतने मर्मस्पर्शी ढंग से प्रयोग किया जा रहा है तो सोचिए कि राम तमिल संस्कृति का कितना अभिन्न अंग रहे होंगे। आज भारत एक राष्ट्र इन संबंधों के कारण है और इसमें राम का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है।

दक्षिण भारतीय पर्यटक जो उत्तर भारत घूमने आते हैं, उन्हें ताज महल और लाल किला इतने मोहक नहीं लगते जितना कि अयोध्या लगता है। यदि कोई पाषाण है जिसके लिए ऐसा माना जाता है कि वहाँ वनवास के दौरान राम ने विश्राम किया था, तो हर भारतीय उस पत्थर से एक जुड़ाव महसूस करता है बिना इस बात के आक्षेप के कि वह कौनसी भाषा बोलता है। यहाँ तक कि हिंदुओं के लिए यह बात वाल्मिकि और कंबर पर भी निर्भर नहीं करती है। यह सभी चीज़ें भारत को एक राष्ट्र बनाने का साधन हैं। भारतीयों के लिए यह भगवान राम की स्मृति से उत्पन्न एक पवित्र भूभाग का स्वाभाविक उद्भव है।

नवीन भारत में अयोध्या प्रकरण को हिंदुओं और मुस्लिमों के मध्य एक संघर्ष की तरह देखना अनुचित है। ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह लड़ाई है भारतीय राज्य व्यवस्था के उन विपथगामी लक्षणों से जिन्होंने भारत को उसकी आत्मा से दूर रखा है। जब कांग्रेस और सत्ताधारी नेहरु विचार के समर्थक उत्कृष्ट वर्ग भारत की आत्मा से भटक गए तो देश में एक अस्थायी स्थिति पैदा हो गई। अगर कोई जानना चाहता है कि नेहरु विचार का भारतीय राज्य जो भारत की आत्मा से विमुख है, वह कैसा होता है तो जाकर जे.एन.यू. की स्थिति देखे। यह स्थिति पूरे देश में भी उत्पन्न हो सकती है। भाग्यवश, स्वतंत्रता के बाद का सबसे बड़ा जन आंदोलन राम जन्मभूमि के लिए हुआ जिसने नेहरु के मिथ्या कथन, जो भारत की आत्मा पर थोपा जा रहा था, को सीधी चुनौती दी।

यदि नेहरु राज्य तंत्र के विरुद्ध यही आंदोलन तथ्यों के आधार पर लोकतंत्र की भावना से किया गया होता तो आज अयोध्या में राम का एक भव्य मंदिर होता। दुर्भाग्यवश, इस आंदोलन को गोलियों और झूठे प्रचार का प्रत्युत्तर मिला। और फिर इतिहास मानव जीवन के मूल्य पर सामने आया।

अयोध्या का राम मंदिर भारत का वह भाव है जिसे अतीत के लिए बदला नहीं चाहिए बल्कि इसे सुलह और न्याय की तलाश है। अयोध्या में राम मंदिर सबसे नैसर्गिक चीज़ है और इसे रोकना केवल सामुदायिक द्वेष को बढ़ावा देगा।

आज यह बुद्धिमता सभी संबंधित दलों को प्राप्त है। बाबरी के सबसे पुराने मुकदमेबाज़ ने सामने आकर यह बयान दिया कि वे उस स्थान पर एक राम मंदिर देखना चाहते हैं। आयोध्या में हिंदुओं द्वारा माँग किए गए स्थान पर राम मंदिर के निर्माण को अनुमति देकर न्यायपालिका उस दोष रेखा से बच निकलेगी जो कृत्रिम नेहरु राज्यतंत्र और संगठित हिंदू राष्ट्र के बीच है, वह रेखा जो एक राष्ट्र की तरह भारत के अस्तित्व के लिए खतरा है।