विचार
रसगुल्ला पर टिप्पणी- मैं अभिजीत अय्यर-मित्रा का समर्थन क्यों करता हूँ और आपको भी ऐसा क्यों करना चाहिए

प्रसंग
  • वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता लिखते हैं, “अगर हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं और सक्रिय रूप से अभिजीत को अपना समर्थन नहीं देते हैं, तो हम उन कानूनों के सामने झुकने के दोषी होंगे जो स्वतंत्रता के प्रतिकूल हैं और जिनके बिना भारत में लोकतंत्र अधूरा है और रहेगा।”

भारत में मुक्त भाषण के प्रयोग का कोई मतलब नहीं है। लेखक, ब्लॉगर और रक्षा विश्लेषक अभिजीत अय्यर-मित्रा हाल ही में ब्रिटिश-युग औपनिवेशिक कानूनों, जो भारत में खुले भाषणों तथा शांत खुली आवाजों को दबाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं, के शिकार हुए हैं। अभिजीत को हाल ही में ओडिशा के कोणार्क सूर्य मंदिर पर टिप्पणी करने और एक साल पहले ट्विटर पर ओडिशा या पश्चिम बंगाल की एक लोकप्रिय मिठाई रसगुल्ला पर टिप्पणी करने के कारण राज्य प्रायोजित उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। अभिजीत की टिप्पणियां उपहासपूर्ण तथा व्यंगात्मक थीं ; वे न तो किसी का बुरा चाहते थे और न ही उनका इरादा किसी की आलोचना करना था। वे निश्चित रूप से पुलिस हस्तक्षेप और भारतीय दंड संहिता के कुछ सबसे दंडनीय और आपत्तिजनक धाराओं के तहत अभियोग के पात्र नहीं थे।

फिर भी उन्हें 23 अक्टूबर को भुवनेश्वर में गिरफ्तार कर लिया गया था। इसके पहले उन्होंने कोणार्क सूर्य मंदिर पर उनकी टिप्पणी पर आपत्ति जताने वाले विधायकों के खिलाफ स्वयं द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणियों के लिए ओडिशा विधान सभा से माफ़ी मांगी थी। पुलिस ने उन्हें रसगुल्ला की उत्पत्ति पर उनकी एक वर्ष पुरानी ट्वीट् पर दर्ज शिकायत के आधार पर गिरफ्तार कर लिया। स्थानीय मजिस्ट्रेट की अदालत ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया। उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इससे पहले जब अभिजीत ने सुप्रीम कोर्ट से राहत की अपील की थी तो उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया गया और कहा गया कि जेल उनके लिए “सबसे सुरक्षित स्थान” है।

भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता के लिए गंभीर खतरे उत्पन्न करने वाले तथा बड़े पैमाने पर वित्तीय अपराध करने वाले अपराधियों के साथ बहुत अधिक दयालु और सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है।

अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता और लोकतंत्र की स्वतंत्रता में विश्वास रखने वाले हर भारतीय को भारत में मुक्त भाषणों में तेजी से आ रही कमी के लिए शंकित और भयभीत होना चाहिए। ब्रिटिश युग के औपनिवेशिक कानून, जिनका पालन ब्रिटेन में नहीं होता है, आज आजादी के सात दशकों बाद भी भारत की कानून की पुस्तकों में हैं और लागू भी हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रात्मक देश अपने नागरिकों को अप्रतिबंधित मुक्त भाषण का अधिकार न देकर स्वतंत्रता के लिटमस परीक्षण में असफल रहा है। अभिजीत की गिरफ्तारी एक आगाह करती है कि मुक्त भाषण, जो कि एक दमनकारी औपनिवेशिक राज्य के लिए तैयार किए गए असंगत तथा आजादी का गला घोटने वाले कानूनों की सहायता से लागू किया गया था, लोकतंत्र में एक अपरिहार्य अधिकार और स्वतंत्रता की कमी का उल्लंघन है।

इससे भी बदतर बात है कि इन कानूनों और इनके दुष्प्रभावों के अस्तित्व ने पंजाब के ईशनिंदा कानून की तरह नए कठोर कानून बनाने के लिए राज्यों का समर्थन किया है। भारत तेजी से उन देशों के सदृश होता जा रहा है जिनमें धर्मतंत्र और घटिया तानाशाही शासन है, जिनसे हम घृणा करने का दावा करते हैं। धर्म, धार्मिक नेताओं, राजनीति, राजनीतिक नेताओं पर निंदात्मक तरीके से कार्टून, वीडियो और तस्वीरें पेश किए जाने पर अपने विचार व्यक्त करने वाले नागरिकों को गिरफ्तार करके उन पर मुकदमा चलाया गया है। किताबों पर रोक लगा दी गई है, फिल्मों को सेंसर बोर्ड द्वारा जांच करके रूपांतरित किया गया और स्वतंत्र मीडिया पर अंकुश लगाया गया। राज्यों में कभी कभार होने वाले अपराध अब छोटी सी बात पर ही नियमित होने लगे हैं। कार्यकारी शक्ति, विधायी शक्ति, न्यायिक शक्ति, स्वार्थी राजनीतिक वर्ग और सामाजिक संस्थानों में से कई अधिकारों और स्वतंत्रताओं की इस क्षति में सहभागी पाए गए हैं। यह अनैतिकता चिंता या संघर्ष का कारण बनती है।

अगर हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं और सक्रिय रूप से अभिजीत को अपना समर्थन नहीं देते हैं, तो हम उन कानूनों के सामने झुकने के दोषी होंगे जो स्वतंत्रता के प्रतिकूल हैं और जिनके बिना भारत में लोकतंत्र अधूरा है और रहेगा। यह व्यंग्यपूर्ण बात है कि एक नागरिक को उपहासपूर्ण तथा व्यंगात्मक टिप्पणी के लिए राज्य द्वारा गिरफ्तार किया गया और उस पर मुकदमा चलाया जा सकता है। लेकिन वास्तविक तथ्य यह है कि ऐसा होता रहा है, और हो चुका है, और आगे भी होता रहेगा जब तक इस पर रोक नहीं लगेगी। हमें हमारे लिए, हमारे देश के लिए, हमारे लोकतंत्र के लिए और दूसरों के लिए इस पर गहराई से विचार करना चाहिए।

मैं मुक्त भाषण के अधिकार का उपयोग करने के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने के कानून के इस दुरुपयोग को अस्वीकार करने के लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से अपील करता हूं। अगर ट्विटर पर अभिजीत के व्यंग्य को राजनीतिक रूप से गलत माना जाना है तो यह प्रतिकूल रूप से बहुत ही खराब बात है कि उन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित अभियोग का सामना करना होगा। नवीन बाबू, एक उदारवादी जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतंत्र के मौलिक सिद्धांतों को महत्व तथा समर्थन देने के लिए जाने जाते हैं, को इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहिए जिससे अभिजीत निरंतर उत्पीड़न, कैद और उससे भी बदतर स्थिति के अधीन न हों। निश्चित रूप से वह इस बात से सहमत हैं कि उपहासपूर्ण तथा व्यंगात्मक टिप्पणी के लिए नागरिक को जेल भेजना स्पष्ट तौर पर अस्वीकार्य है? यह शिक्षित, कुलीन और शिष्ट नवीन बाबू ने जो अपने पूरे जीवन में किया है उस पर एक करारा व्यंग्य है जैसा कि उनके पिताजी बिजू पटनायक के साथ हुआ था।

मैं विचार और भाषण की स्वतंत्रता को पोषित करने वाले सभी विभागों और विचारधारात्मक विभाजनों के सभी लेखकों, पत्रकारों, ब्लॉगर्स और टिप्पणीकारों से भी अभिजीत का समर्थन करने और उनकी तत्काल रिहाई के लिए आवाज बुलंद करने की अपील करता हूं। वह कोई अपराधी या कानून का अमानवीय तरीके से उल्लंघन करने वाले नहीं हैं। वह समाज या राज्य के लिए खतरा नहीं हैं। कम से कम वह जमानत के हकदार तो हैं ही।

मैं अभिजीत के लिए अपने स्पष्ट समर्थन को दोहराता हूं। एक स्वतंत्र भाषण निरपेक्षवादी के रूप में, मुझे उनकी कैद और रिहाई का अस्वीकरण स्वतंत्रता पर एक अप्रिय हमला प्रतीत होता है। अभिजीत की गिरफ्तारी से लोकतंत्र एक बार फिर घायल हो गया है। इस घाव और इसके समान कई अन्य समान घावों को नासूर बनने नहीं दिया जाना चाहिए। हमारा गणतन्त्र स्वतन्त्रता से नाराज लोगों की क्षमताओं को बंदी बनाने की अनुमति नहीं दे सकता, और देनी भी नहीं चाहिए।

अभिजीत के लिए संघर्ष करो। आजादी के लिए संघर्ष करो।

नोट: अभिजीत अय्यर-मित्रा ‘स्वराज्य’ के नियमित अंशदाता हैं।

कंचन गुप्ता एक वरिष्ठ पत्रकार हैं।