विचार
व्हाट्सऐप, फेसबुक और गूगल सिर्फ तकनीकी प्लेटफॉर्म ही नहीं बल्कि मीडिया हाउस की भूमिका में भी करते हैं काम
सोशल मीडिया के फायदे और नुकसान

प्रसंग
  • टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म केवल मौज मस्ती के लिए नहीं हैं ये सीधे सूचनाओं को आगे बढ़ाते हैं।
  • इसका दुरूपयोग रोकने के लिए उन्हें और अधिक ध्यान देना चाहिएऔर इसकी भी पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि इन प्लेटफार्मों पर क्या हो रहा है।

व्हाट्सएप एक ऐसी मैसिजिंग सेवा है जिसमें जुड़े यूजर्स के बीच काफी तेजी से सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा है। इसकी सेवाओं का दुरुपयोग बाल अपहरण की झूठी खबरें फैलाने के लिए हुआ, जिसकी वजह से मॉब लिंचिंग तक की घटनाएं सामने आई हैं।

इसमें भुगतान सेवा प्रारंभ करने के लिए जो आवेदन दिया गया था वह डेटा गोपनीयता और अन्य मुद्दों पर डर की वजह से बीच में ही फंस करगया है। कानून,तकनीक और सूचना मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने यह चेतावनी तक दी थी कि‘’कंपनी को भारतीय कानून की धज्जियाँ उड़ानी वाली पनपती मॉब लिचिंग और दुर्भावनापूर्ण अश्लीलता जैसी भयावह घटनाओं से निपटने के लिए समाधान खोजने की जरूरत है।‘’

व्हाट्सएप ने अपनी सेवा में किसी संदेश को फॉरवर्ड करने पर उसपर’फॉरवर्ड’ का लेबल लगाने और एक बार में केवल पाँच लोगों को एक संदेश भेजे जाने जैसे बदलाव करके ऐसी घटनाओं पर कुछ हद तक रोकने का प्रयास किया है,लेकिन फिर भी इन अफवाहोंको पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता है। क्योंकि ग्रुपों के माध्यम से इन अफवाहों को अब भी फैलाया जा सकता है और संदेश या अफवाहें फैलाने की यह श्रृंखला लगातार चल रही है।

व्हाट्सएप का मुद्दा डिजिटल प्रौद्योगिकी द्वारा तैयार की गई एक असाधारण समस्या को सामने लाता है,और वह है प्लेटफॉर्म को इसके चलन से दूर करने में कठिनाई और मीडिया का मैंसिजिंग के साथ होता विलय।

अगर आप अखबार या टीवी चैनल पर कोई चीज देख रहे हैं तो आपको पता होता है कि आप एक मीडिया कंपनी को देख-सुन रहे हैं और इसपर आपको दिखाईयासुनाई जाने वाली हर सामग्री के लिए वे कानूनी रूप से जिम्मेदार होते हैं। लेकिन क्या फेसबुक, गूगल, व्हाट्सएप और ट्वीटर उसके लिए जिम्मेदार हैं जो उनके प्लेटफार्मों पर दिखाया जाता है जब वे दावा करते हैं कि वे केवल संचार के समर्थक हैं सामग्री निर्माण में उनकी कोई भूमिका नहीं है?

इसी तरह एप्लीकेशन के माध्यम से काम करने वाली दोनों टैक्सी सेवाओं – ओला और उबर – का कहना है कि वे केवल तकनीकि के लिए जिम्मेदार हैं, न कि चालकों या उनके प्लेटफार्म का उपयोग करने वाले ग्राहकों के आचरण के लिए। वे टैक्सी चालकों को प्लेटफार्म पर आने वाले ग्राहकों को सवारी की पेशकश करते हुए “स्वतंत्र ठेकेदार” के रूप में देखते हैं। हालांकि, वे अपने एप्लीकेशन पर चालकों और यात्रियों दोनों की रेटिंग की सुविधा देते हैं, लेकिन अगर चालक यात्री को लूट ले या उसके साथ रेप कर दे तो इसकी वे कोई जिम्मेदारी नहीं लेते हैं।

तो यहां पर इससे संबंधित तीन सवाल खड़े होते हैं

पहला,जब टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म दो तरह के ग्राहकों के बीच माध्यम बन जाता है तब क्या कुछ गलत जानकारी आदान-प्रदान होने पर वे अपनी सारी जिम्मेदारियों से भाग सकते हैं?

दूसरा, प्लेटफॉर्म जिन सेवाओं तक हमारी पहुँच सक्षम बनाते हैं क्या वे खुद को उससे अलग समझते हैं? यदि फेसबुक अनेकों प्रकाशकों और ब्लॉगर्स के लिए एक प्रकाशक मंच है,तो क्या वे असलियत में अपनी प्रकाशन भूमिका से अपनी प्लेटफॉर्म भूमिका को अलग कर सकते हैं?

तीसरा,क्या स्वतंत्रता के पुराने मानदंड – जो प्रिंट और टेलीविजन पर लागू होते हैं – डिजिटल और सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर लागू किए जा सकते हैं, जहां परजानकारी के आदान-प्रदान होने की तेज गति उसकी निगरानी और नियंत्रण में मुश्किलें पैदा कर सकती है।

संतोष देसाई ने द टाइम्स ऑफ इंडियामें लिखा कि सोशल मीडिया और अन्य टेक्नोलॉजी प्लेटफार्म, जो सही व गलतजानकारी को तेजी से फैलाने में सक्षम हैं, को नए नियमों और विनियमों पर चलाने की जरूरत है। “हालांकि यह तर्क मान लेना आसान है कि मुख्य समस्या इन सेवाओं के उपयोगकर्ता हैं न कि स्वयं सेवाकी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सोशल मीडिया के नए प्रकारों को नियंत्रित करने के लिए नियमों में बदलाव करने की कोई जरूरत नहीं है। टेक्नोलॉजी दोषमुक्त नहीं है, सिर्फ इसलिए कि इसके इरादों में कोई खोट नहीं है। उपयोगकर्ता जिम्मेदार हो सकते हैं, लेकिन उनका उपयोग टेक्नोलॉजी पर निर्भर नहीं है;वास्तव में, यह अक्सर इसमें गहराई से संबंधितहोता है।

फ्रांसीसी-अमेरिकी अरबपति और ईबे के संस्थापकपियरे ओमिड्यारने यहाँ तक सुझाव दे डाला कि सोशल मीडिया के कुछ उपयोगकर्ताओं कोनिष्कासित कर देना चाहिए क्योंकि वे लोकतंत्र को बर्बाद कर रहे हैं।पिछले साल ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा पुनर्प्रकाशित एक पोस्ट में उन्होंने लिखा था: “यह टेक्नोलॉजी हर तरीके से हमें एक साथ लाती है, लेकिन सूचनाओं का मुद्रण और सूचना से छेड़छाड़ तेजी से हमें अलग कर रही है। चुनाव अभियानों को लक्षित करते हुए हमारे चुनावों में विदेशी हस्तक्षेप से लेकर लोगों को भ्रमित और विभाजित करके लोकतंत्र की धज्जियां उड़ाने के लिए इन ग्रुपों के पास एक प्रभावशाली तरीका है। सोशल मीडिया की दुनिया में यह ग्रुप उदार मेजबान पाए गए हैं। लेकिन अब समय आ गया है कि इन अनचाहे मेहमानों को  बाहर का रास्ता दिखा दिया जाये।” यह पोस्ट 2016 में हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों के पीछे रूस द्वारा गुप्त रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के पक्ष मेंहस्तक्षेप करने के बारे में थी।

हालांकि समस्या यह है कि यह तय कौन करेगा कि पार्टी के लिए बिन बुलाया मेहमान कौन है।क्या इस प्रकार उन लोगों की आवाज को दबाने से उनके लिए किसी भी प्रकार की न्यूज फिल्टरिंग सेंसरशिप का कारण बन जाएगी,जो समाचार के लोकतांत्रिककरण से लाभान्वित हुए हैं ।

उदाहरण के लिए, ट्विटरउन उपयोगकर्ताओं को ब्लॉक करता है जो या तो अभद्र हैं या कट्टरपंथी हैं, लेकिन इसपर (जिसमे फेसबुक भी शामिल है) भारत में अधिकारों और यूएस में रूढ़िवादी आवाजों को उठाने का आरोप लगाया गया है।बहुत से लोग अस्थायी रूप से बिना किसी कारणवशब्लॉक थे, और बोलने की स्वतन्त्रता पर रोक थी।

भले ही गूगल और फेसबुक डिजिटल विज्ञापन राजस्व के एक बड़े बाजार में हिस्सेदारी कर रही हों, पर अभी भी वे मीडिया कंपनियां होने की बात से इनकार करती हैं। लेकिन, अप्रत्यक्ष तरीके से, वे अब तथ्य पड़तालकताओकी फौज बनाने के लिएजिम्मेदार हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके प्लेटफॉर्म का उपयोग भ्रामक, खतरनाक या झूठी खबरों कोफैलाने के लिए तो नहीं किया जा रहा है। इसका इरादा फेक न्यूजपर जल्द से जल्द शिकंजा कसने का है।

उपरोक्त चर्चा से जारी तथ्य नीचे दिए गए हैं।

#1: प्रौद्योगिकी प्लेटफॉर्म गैरतरफ़दार नहीं हैं – उनके माध्यम से क्या गुजरता है इसके लिए केवल वहहीउत्तरदायी नहीं है।वहसामग्रीकोतेजीसेप्रचारितकरतेहैं। इसतरह दुरुपयोग को रोकने के लिए उन्हें अधिक निवेश करना पड़ता है, और उनके प्लेटफॉर्म के माध्यम से क्या होता है इसके लिए आंशिक जिम्मेदारी लेनी पड़ती है।

#2: जब एक प्लेटफॉर्म केवल सामग्री निर्माता और दर्शकों के बीच, या फिरयूसमझेकिटैक्सी मालिकों और सवारी करने वालों के बीच माध्यमिक प्रदर्शन कर सकता है,तोऐसे उभरते संबंधों कोसमझानेके लिए नई शब्दावली की आवश्यकता है। ब्रिटेन में, मैथ्यू टेलर कीआधुनिक कार्य पेशों परप्रस्तुत कीगयीरिपोर्ट नेबताया कि उबेर के ड्राइवर स्वतंत्र ठेकेदार नहीं, बल्कि “आश्रित ठेकेदार” थे, जिसका मतलबयह है कि उबेर द्वारा अपने ड्राइवरों (और ग्राहकों, अगर ड्राइवरों द्वारा ग्राहकों को गलत सेवा दी जाती है) के प्रति कुछ ज़िम्मेदारी है। सामग्री के संदर्भ में, गूगल, फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सएप दावा नहीं कर सकते कि वे केवल तकनीकी प्लेटफार्म हैं; वे सामग्री के समर्थक हैं। वे पारंपरिक मीडिया कीतरहनहीं हो सकते हैं, मगर वे इसका आधाकामकररहेहैं।वे “मीडिया-समर्थक” हैं और इसलिए इन्हें नियमित मीडिया की कुछ जिम्मेदारियों को साझा करना चाहिए।

#3:मीडियानियंत्रक और समाज को, हानिकारक दुष्प्रचारवअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने के बीच एक संतुलन कायम रखना चाहिए। वायरल और खतरनाक सामग्री तैयार करने के लिए लाखों, यहां तक कि अरबों सामग्री उत्पादकों को रोकने के लिए हजारोंतथ्य कीपड़तालकरनेवाली साइटेंभी पर्याप्त नहीं होंगी। प्रौद्योगिकी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शामिल करनाचाहिए। लेकिन अगरपड़ताल करने वालेगलत समाचार और विचारों कोपरखनहींपातेहैं तो समाचार का लोकतांत्रिककरण खत्म हो जाएगाऔर यह एक बुरी बात होगी।

कड़वी सच्चाई तो यह है कि फेक न्यूज हमारीजरूरतोंके कुछ “तथ्यों” पर विश्वास करने से फैलती है न कि किसी दूसरी चीज से। यह भगवान या चमत्कारों पर विश्वास करने की आवश्यकता जैसा है। जैसे आप धर्म के प्रति भगवान और अंधविश्वास को जानबूझकर खत्म नहीं कर सकते हैं, वैसे ही पड़तालकरनेवालेफेक न्यूजके समाधान का केवल एक हिस्सा हैं।

फेक न्यूजों का अंतिम जवाब मानव परिपक्वता है, जो आम तौर पर व्यक्ति में समय के साथ आतीहै।कोई भी हर बार लोगों को मूर्ख नहीं बना सकता है।

लोग जो देखते हैं और सुनते हैं अगर उसके प्रति अपने विवेक का प्रयोग करानाशुरूकरदेगें, तो फेक न्यूज का जाल खुद-ब-खुदखत्महोनाशुरू हो जाएगा। फेक न्यूजकेफैलनेकाकारणहैपरपरागतमीडिया, जोयहसबदेखकरभीचुपहैऔर जिसनेअपनी विश्वसनीयता खो दी है। कथित तौर पर कुछ पुराने मीडिया लेखकों और टीवी एंकरों में से कुछ पर जनता का विश्वास नहीं रह गया। एक बार पुराने मीडिया और निहित हितों के बीच नाता टूट जाए,तो फेक न्यूज खुद-ब-खुद बंद  हो जाएंगी।

जगन्नाथ स्वराज के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggiपर ट्वीट करते हैं।