विचार
कैसे भारत लाला लाजपत राय का ऋणी है

आशुचित्र- उन सभी चीज़ों का स्मरण करते हैं जिसके लिए वर्ष 1865 में जन्मे लाला लाजपत राय जैसे दूरदर्शी, समाज-सुधारक और एक महान स्वतंत्रता सेनानी का भारत ऋणी है।

30 अक्टूबर का दिन था जब काफी बड़ी संख्या में भारतवासी लाहौर की सड़कों पर साइमन आयोग का विरोध करने हेतु शांति और अहिंसक मार्च करने की लिए एकत्रित हुए थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का उपयोग करने का फैसला किया। और उन्होंने एक खास आदमी को निशाना बनाया जो कि छाता पकड़े हुए था। भले ही वह आदमी बूढ़ा और कमज़ोर था, मगर वह पगड़ी पहना हुआ आदमी ही भीड़ को संभाल रहा था और लोगों को अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित कर रहा था। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने खुद उनके साथ मारपीट करने का फैसला किया और मिस्टर सांडर्स ने भी उनका सहयोग करने की ठान ली।

लाला लाजपत राय की जीवनी लिखने वाले ने इस वृत्तांत का बड़े ही मार्मिक ढंग से विवरण किया है, वह भी बिना किसी अतिश्योक्ति के-

“भले ही वे कमज़ोर दिखते थे मगर निडर थे। वे एक वीर की तरह लाठियों का सामना कर रहे थे। उन्होंने भागने के बारे में  सोचा भी नहीं और डटकर ब्रिटिश अफसरों का सामना करते रहे एवं अपने लोगों को भी हिंसा न करने का आदेश दिया। उनको मारने के लिए सारे अंग्रेज़ों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया, फिर भी वे अपने आपको संभाले हुए थे और मार भी सेहन कर रहे थे। उनके चिकित्सक गोपीचंद शर्गवा इस वृतांत के चश्मदीद थे और ये देखकर सब हैरान थे कि इतनी मार के बावजूद भी राय अपनी जगह से तस से मस नहीं हुए।“

“उन्होंने एक शूरवीर की तरह मार का सामना किया और शेर की तरह दहाड़कर मारने वाले से उसका नाम पूछा मगर उनको जवाब में लाठियों का ही प्रहार सहना पड़ा। उन्होंने फिर से अपने हमलावर की मर्दानगी को चुनौती देते हुए उससे  उसका नाम पूछा मगर फिर भी उन्हें जवाब में लाठियों का प्रहार ही मिला।”

उनके ऊपर लाठियों की बरसात हो रही थी मगर वे फिर भी भीड़ को संभाल रहे थे। और जब प्रदर्शन खत्म हुआ तो उन्होंने मार्च को वापस जाने की लिए निर्देशित किया। शाम के वक़्त लाहौर के लोगों को उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए उन्होंने शुभकामनाएँ दीं और कहा-

“मेरे शरीरी पर पड़ी एक-एक लाठी अंग्रेज़ी सरकार के ताबूत में कील का काम करेगी।“

भले ही वे अजय रहे मगर उनका कमज़ोर शरीर प्रहारों की वजह से टूट चूका था। इस वजह से 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई।

और उन्होंने क्या जीवन जिया था!

वर्ष 1905 में 1857 के विद्रोह की 50वीं वर्षगांठ थी, अंग्रेज़ वास्तव में एक भय के मनोविकार में थे। अधिकारियों को यह डर था कि सैकड़ों-हज़ारों विद्रोही एक और विद्रोह शुरू करने के लिए लाला लाजपत राय के एक शब्द का इंतज़ार कर रहे थे। सरकारी रिपोर्ट में यह लिखा गया था कि पंजाब के लोगों से ये मांग की गई थी कि वे सरकार की किसी भी तरह की मदद न करें ,पानी की दरों और अन्य देय राशि का भी भुगतान न करें। पुलिस को देशद्रोही मान लिया गया और उनको सरकारी नौकरी से भी इस्तीफा देने के लिए कहा गया। सरकार को लगा कि आर्य समाज जिससे लाला लाजपत राय संबंध रखते थे, में एक विशेष समूह का गठन किया गया है और उसी के माध्यम से यह प्रचार किया जा रहा है। एक बीजलेख (संकेताक्षर में टेलीग्राम) द्वारा अधिकारियों को यह सूचित किया गया-

“लाला लाजपत राय ही इस आंदोलन के मुख्य और केंद्रीय व्यक्ति हैं। वे एक खत्री अभिवक्ता हैं जो पंजाब के कांग्रेस प्रतिनिधि बनकर इंग्लैंड गए थे। वे एक एक क्रांतिकारी और राजनीतिक उत्साही हैं जिन्हें अंग्रेज़ सरकार से नफ़रत से प्रेरणा मिलती है।”

लालजी खत्री नहीं थे मगर एक आर्य समाजी होने के कारण उन्हें जातिवाद एवं छुआछूत जैसी चीजें नापसंद थी। इसलिए 1907 में उन्हें बिना किसी परीक्षण के मंडालय भेज दिया गया। वाइसरॉय मिंटो ने उत्सुकता से अपनी सहमति दी। जब वे जा रहे थे तब उन्होंने अपने पिताजी को लिखकर बताया कि “अब जो भी आएगा उसका एक शूरवीर की तरह जन्म होना चाहिए।”

1914 में वे संयुक्त राज्य अमेरिका में थे जहाँ वे देशभक्ति से जुड़े सिद्धांतों को समझ रहे थे और भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयास कर रहे थे। जहाँ स्वतंत्रता के प्रयास में उनके कई साथियों जर्मन-समर्थक भावना आ गई थी, वहीं उन्होंने भारत की आज़ादी के लिए स्पष्ट रूप से कहा-

“मैं एक भारतीय देशभक्त हूँ और मैं अपने देश के लिए स्वतंत्रता की कामना करता हूँ। मुझे जर्मनों के लिए कोई सहानुभूति नहीं है और न ही मैं उनके खिलाफ हूँ। मगर मैं हमेशा से ही इस सिद्धांत के प्रति कट्टरता से जुड़ा रहा हूँ कि विदेशी मदद से मिली स्वतंत्रता की कोई कीमत नहीं होती।”

फिर भी, जब इस तरह के प्रयास विफल हुए और क्रांतिकारियों को परेशानी हुई, तो लालाजी हमेशा मदद करने की लिए मौजूद रहते थे । जब एमएन रॉय को मेक्सिको भागना पड़ा और वे काफी तनाव में थे, तब लालाजी ने ही उनका सहयोग किया था।

लालजी धर्मनिरपेक्षता पर यकीन करते थे और उनका मानना था कि अंग्रेज़ों की वजह से ही हिंदुओं और मुसलमानों के बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं। उन्होंने वर्ष 1924 में भारत के बारे में लिखा-

“हमारा उद्देश्य यह नहीं है कि विभिन्न समुदायों के बीच विलय हो बल्कि हम चाहते हैं कि हर धर्म के लोग एक साथ रहें, बिना किसी को आहत किए। भारतीय होने की लिए किसी भी धर्म के व्यक्ति को किसी भी तरह का संघर्ष नहीं करना होगा। वे अपने आपको भारतीय हिंदू, भारतीय मुस्लिम या भारतीय ईसाई मान सकते हैं। और फिर सब कुछ अच्छा होगा।“

हालाँकि लालजी को एक डरावनी हक़ीक़त का पता चला कि इस्तांबुल में भारत पर आक्रमण करने की योजना बनाई जा रही है ताकि इस्लामी शासन की स्थापना की जा सके। उबैदुल्लाह योजना में विश्व की सभी मुस्लमान शक्तियों के साथ गठबंधन कर और प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम भाग के दौरान खुद को भारतीय राष्ट्रवादियों के साथ जोड़ना शामिल था। उनका उद्देश्य एक भारत-अफगान इस्लामी साम्राज्य बनाना था। लालजी को यह समझने में देर नहीं लगी कि इस तरह भारतीय आंदोलनों का अंत किस पड़ाव पर होगा है मगर काफी सारे कांग्रेस नेताओं में इस दूरदर्शिता का अभाव था।

वास्तव में उबैदुल्लाह ने लालाजी को काबुल कांग्रेस कमेटी की ओर से जारी उप-महाद्वीप के संघों के बारे में एक मुद्रित योजना भेजी थी। लालाजी को यह समझ आ गया कि वास्तव में यह भारत को टुकड़ों में बाँटने की योजना है। वर्ष 1946 में जाकर यह योजना नेहरू को भी समझ में आई कि भारत को टुकड़ों में बाँटा जाएगा और फिर एक-एक करके इसके अंशों को जीत लिया जाएगा। नेहरू ने इस योजना को कम्युनिस्टों की देन माना। लालाजी ने पहले ही कम्युनिस्टों और इस्लामवादियों के एक साथ काम करने की सोच को समझ लिया था।

“मैं भारत की सात करोड़ मुसलमानों से डरता नहीं हुँ”, उन्होंने लिखा, “मगर अगर सात करोड़ भारत के, इसके अलावा अफगानिस्तान, मध्य एशिया, अरब, मेसोपोटामिया और तुर्की के सशस्त्र गिरोह अप्रतिरोध्य होंगे। तो तब क्या हम तब बर्बाद हो जाएँगे?” लालाजी के इन पंक्तियों को लिखने के 20 बाद वर्ष 1946 में सीआर दास को लिखे पत्र में अंबेडकर ने इस खतरे के प्रति चिंता जताई जिस ओर उत्साही गांधी भारत को ले जा रहे थे।

लाजपत राय ने ब्रिटिशों को मुस्लिमों और सिखों के बीच संप्रदायवाद के बीज को बोते हुए देखा। उन्होंने भारत के लिए एक पैन-इस्लामी खतरे को भी देखा। वह चिंतित थे। स्वामी श्रद्धानंद की हत्या ने उन्हें झकझोर दिया था। मगर वे धर्मशासित देश के खिलाफ थे।

एक समाज सुधारक के रूप में वे अस्पृश्यता के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने कहा कि अस्पृश्यता लोकतंत्र का विरोधी है। जिनके लिए अस्पृश्यता एक धार्मिक मुद्दा था और इससे मुक्ति कांग्रेस के राजनीतिक अभियान में नहीं जोड़ा जाना चाहिए, उनके लिए लालाजी ने लिखा-

“लोकतंत्र के बारे में बात करना अनुचित है यदि हम अस्पृश्यता जैसा भेदभाव लेकर चल रहे हैं और यह मनोदशा उनसे हमारे व्यवहार को प्रभावित करती है जिनसे हमारा धर्म अलग है या जिनका पेशा हमें नहीं पसंद। राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया एक नैतिक प्रक्रिया है। दोगलापन करके आप सफलता नहीं हासिल कर सकते। यह बहुत खेद की बात है कि हमें इसे अपने अभियान में सम्मिलित करना पड़ा लेकिन कुछ वर्गों की संवेदनशीलता से डरकर यदि हम यह नहीं करते तो और भी बुरा होता। यह अनैतिक होता।“

लाजपत राय ने 1924 में अस्पृश्यता के बारे में लिखा। उनके लिए अस्पृश्यता का उन्मूलन लोकतंत्र की स्थापना से पूर्व मूल्य आवश्यकताओं में आता था। इसी लेख में अंबेडकर का पूर्वचित्रण करते हुए वे कहते हैं, “इस सामाजिक समस्या से निजात पाने हेतु हमारे समक्ष जो कार्य है, वह शिक्षण, संगति और संगठन का है।” एक अन्य ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि अनुसूचित समुदायों के नेता एमसी राजा मतभेदों के बावजूद राय के मित्र थे।

प्रगति पर उनकी दृष्टिकोण अपने समय के अनुसार उग्र था। वे पूछते हैं कि क्या प्रगति को ऊपर से आदेश दिया जाना चाहिए। वे पूछते हैं कि फिर प्रगति क्या है? फिर पूछते हैं-

“क्या रेल प्रगति का मापदंड है? या आयात व निर्यात के आँकड़े प्रगति के मापदंड हैं? क्या बड़ी सेना और तगड़ा बजट प्रगति है या सरकारी अफसरों की बढ़ोतरी प्रगति है? जो नवीन इमारतें जनता के पैसों से खड़ी की गई हैं, क्या वह प्रगति है? ये चीजें कुछ मामलों में प्रगति को समझा सकती हैं मगर ये चीजें लोगों के असहाय होने का कारण भी हैं जिनके मूल्य पर इस प्रगति को प्राप्त किया गया है… इसलिए बदलाव की शुरुआत ज़मीनी स्तर से होनी चाहिए।“

एक दूरदर्शक, एक राष्ट्रवादी, जिन्होंने देश की स्वतंत्रता और विकास के लिए बलिदान दिया, के शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ने ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में कील का काम किया और हम आने वाली असंख्य पीढ़ियों तक उनके ऋणी रहेंगे। उनका ऋण चुकाने के लिए हम स्वतंत्रता और लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्ध रह सकते हैं, न सिर्फ राजनीतिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक भी और अंततः आध्यात्मिक।