विचार
टीकाकरण अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद क्या बदला

कल (7 जून) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र को अपने संबोधन में टीकाकरण नीति में कुछ परिवर्तन की घोषणा की। उन्होंने कहा कि सरकार पुनः पुराने मॉडल पर जा रही है जहाँ टीका की केंद्रीकृत खरीद होगी जिसे 1 मई को समाप्त कर दिया गया था, जब कुछ विपक्षी नेताओं ने केंद्र पर दबाव बनाया था कि राज्यों को अपने पैसे से टीका खरीदने की स्वतंत्रता दी जाए।

रोचक है कि जब केंद्र ने राज्यों को टीका खरीद की शक्ति दी थी, तब विपक्षी नेताओं ने इस बात का श्रेय लिया था कि उन्होंने केंद्र को निर्णय लेने के अधिकार के बटवारे के लिए विवश कर दिया। अब जब केंद्र पुनः पुरानी नीति पर आ गया है तब ये ही विपक्षी नेता उनकी माँगें मानने के लिए प्रधानमंत्री को आभार व्यक्त कर रहे हैं।

संभवतः यह हमें विपक्ष के सामूहिक दिवालियापन की याद दिलाता है क्योंकि जब टीका आपूर्ति में वैश्विक और घरेलू स्तर पर अभाव था, तब उन्होंने विकेंद्रीकरण की माँग की और अब जब धीरे-धीरे आपूर्ति की समस्याएँ सुलझ रही हैं, तब उन्होंने खरीद शक्ति के केंद्रीकरण की माँग की।

ऐसी चाल चलने के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है जिसमें आपूर्ति संकट के समय आप अपने ऊपर सारा दोष ले लेते हैं और जब टीका उत्पादन क्षमता कई गुना बढ़ चुकी होगी तब टीकाकरण अभियान का पूरा श्रेय आपका विपक्षी ले लेगा।

अंततः भारतवासियों के समक्ष राज्यों ने मात्र यह सिद्ध किया है कि टीका खरीद पाने में केंद्र की असमर्थता और टीका उत्पादन की सीमाओं के कारण वैक्सीन अभाव नहीं हुआ। वहीं, दूसरी ओर प्रधानमंत्री की घोषणा कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है जैसा समर्थकों और आलोचकों द्वारा दर्शया जा रहा है।

ऐसा इसलिए क्योंकि 1 मई से जो टीकाकरण अभियान का विकेंद्रीकरण किया गया था, वह भी कोई बड़ी बात नहीं थी। इस घोषणा का महत्त्व सिर्फ लोगों के राजनीतिक दृष्टिकोण को प्रभावित करने जितना है क्योंकि कहा गया कि 18-44 आयुवर्ग के लोगों का भी मुफ्त टीकाकरण किया जाएगा।

टीकाकरण

वास्तविकता यह है कि अनेक राज्यों द्वारा मुफ्त टीकाकरण की घोषणा किए जाने के बाद इस आयुवर्ग में भी अधिकांश लोगों ने मुफ्त में ही टीके लगवाए हैं। जिन लोगों ने टीकों के लिए भुगतान किया है, उन्होंने निजी क्षेत्र पर टीका लगवाया है और यह अभी भी जारी रहने वाला है।

19 अप्रैल को केंद्र द्वारा घोषित ‘उदारीकृत एवं त्वरित राष्ट्रीय कोविड-19 टीकाकरण रणनीति’ के तहत यह हुआ था कि स्थानीय विनिर्माताओं द्वारा बनाए गए कोविशील्ड और कोवैक्सीन टीकों का 50 प्रतिशत केंद्र को आवंटित किया जाएगा।

यह टीके राज्यों को मुफ्त में दिए जाएँगे और 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों तथा गंभीर बीमारियों से ग्रस्त 45 वर्ष से कम आयु के लोगों के लिए ये टीके होंगे। अधिकांश पाठक यह बात पहले से जानते होंगे।

लेकिन कई पाठक यह नहीं जानते होंगे कि बचे हुए 50 प्रतिशत टीकों की आपूर्ति का बटवारा किस आधार पर किया जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा 9 मई को सर्वोच्च न्यायालय में दायर घोषणा-पत्र में इस पहलू पर विस्तृत जानकारी मिलती है।

इस 50 प्रतिशत का आधा-आधा राज्यों और निजी क्षेत्र को मिलना था यानी 25-25 प्रतिशत। यह बटवारा राज्यों के स्तरों पर होना था। “हर राज्य को आवंटित 50 प्रतिशत में से 50-50 प्रतिशत के आधार पर बटवारा किया जाएगा।”, घोषणा-पत्र में कहा गया।

कुल मिलाकर बात यह है कि किसी भी राज्य को जो आपूर्ति की जा रही है, उसकी आधी निजी क्षेत्र को की जाए यदि उस राज्य के निजी क्षेत्र ने विनिर्माताओं से सीधे अनुबंध किए हों तो। लेकिन प्रश्न यह है कि भारत सरकार द्वारा दिए जाने वाले टीकों के अलावा बचे 50 प्रतिशत टीकों को राज्यों के बीच कैसे बाँटा जा रहा था?

यह यथानुपात आधार पर किया जा रहा था। “यह घोषित है कि भले ही राज्य विनिर्माताओं से टीके खरीद रहे हैं, केंद्र सरकार ने टीका विनिर्माताओं से चर्चा करके तय किया है कि हर राज्य में 18-44 आयुवर्ग के लोगों की जनसंख्या के अनुपात में टीके दिए जाएँ और राज्य उसी मात्रा में टीके खरीद सकते हैं।”, घोषणा-पत्र में कहा गया।

ऐसा करने का उद्देश्य था कि राज्यों के समझौता करने के कौशल या किसी अन्य कारण से टीका उपलब्धता में राज्यों के बीच कोई असमानता न रहे। साथ ही, विनिर्माताओं को अधिक मूल्य देकर कोई राज्य दूसरे राज्यों को दबाकर अधिक टीके न खरीद सके, इसके लिए सभी राज्यों के लिए केंद्र ने समान मूल्य तय किया था।

घोषणा-पत्र का मुख पृष्ठ

“यह घोषित है कि भले ही नई टीका रणनीति के तहत उपरोक्त आधार पर राज्य सरकारों को टीके खरीदने हैं, केंद्र सरकार ने टीका विनिर्माताओं से अनौपचारिक चर्चा करके यह सुनिश्चित कर दिया है कि टीका मूल्य सभी राज्यों के सिए समान रहेगा ताकि कोई राज्य किसी राज्य से अधिक मूल्य पर टीका खरीदे, ऐसी असमानताएँ न हों।”, घोषणा-पत्र स्पष्ट करता है।

इसके अलावा प्रेस इन्फॉरमेशन ब्यूरो द्वारा जारी की जाने वाली विज्ञप्तियों से स्पष्ट हो जाता है कि वास्तव में केंद्र सरकार ही विनिर्माताओं से सभी टीके खरीद रही थी, राज्यों की ओर से भी तथा उसके बाद राज्यों को टीका आपूर्ति की जा रही थी।

वास्तव में, केंद्र सरकार ने राज्यों में 18-44 आयुवर्ग के लोगों की जनसंख्या के आधार पर तय किया कि किस राज्यों को कितने टीके मिलेंगे और टीका विनिर्माताओं ने तय किया कि राज्यों को किस मूल्य पर ये टीके मिलेंगे जिसमें केंद्र ने यह सुनिश्चित किया कि सभी राज्यों को समान मूल्य पर टीके दिए जाएँ।

अप्रैल से मई में मात्र एक बात जो बदली, वह यह थी कि राज्यों को उन्हें मिलने वाले 25 प्रतिशत आपूर्ति कोटे के टीकों के लिए भुगतान करना था। अब हम हाल के प्रधानमंत्री के निर्णय पर आ जाते हैं जबाँ यह तय हुआ कि पूरा भुगतान केंद्र ही करेगा।

यह वह एक मात्र बात है जो अब बदलेगी। इसका कोई प्रभाव लोगों पर नहीं पड़ेगा क्योंकि उनके लिए टीका आपूर्ति वैसी ही बनी रहेगी जिसमें 75 प्रतिशत खुराकें उन्हें मुफ्त में मिलेंगी। 18-44 आयुवर्ग के लोगों के टीकाकरण के लिए पहले राज्य सरकारें भुगतान कर रही थीं, जो अब केंद्र सरकार करेगी।

ध्यान देने योग्य बात है कि भले ही मई में निजी क्षेत्र के लिए 25 प्रतिशत आपूर्ति आवंटित की गई थी, उसे मात्र 15 प्रतिशत से कुछ अधिक टीके मिले। संभवतः इसका कारण यह था कि पर्याप्त अस्पतालों ने विनिर्माताओं को टीके के ऑर्डर नहीं दिए।

मई में जहाँ निजी क्षेत्र को लगभग 1.2 करोड़ टीका खुराकें मिलीं, रिपोर्ट किया गया कि इनमें से मात्र 22 लाख टीका खुराकों का ही उपयोग किया गया। यह एक ऐसा विषय है जिसपर केंद्र को आगे बढ़ते हुए निरीक्षण करना चाहिए।

जून में निजी क्षेत्र के लिए लगभग 4 करोड़ टीका खुराकें उपलब्ध होंगी और हर माह उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ आपूर्ति भी बढ़ती जाएगी। यदि निजी क्षेत्र टीकाकरण अभियान में इसी तरह से पिछड़ा रहा तो समझदारी होगी कि मासिक खरीद में इसकी भागीदारी 25 प्रतिशत से घटाकर मात्र 10 प्रतिशत कर दी जाए।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @haryannvi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।