भारती / विचार
टीकाकरण को लेकर असहजता के पीछे मजहब-रिलिजन की भूमिका?

“उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे” की कहावत समझनी हो तो भारत में हाल के दौर में शुरू हुआ टीकाकरण अभियान देखने लायक होगा। विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले देश में अगर कोई कहता है कि पोलियो का उन्मूलन कर दिया गया, कॉलरा नहीं होता, कुकुर-खाँसी या दूसरी कुछ बीमारियाँ टीकाकरण के ज़रिए समाप्त कर दी गईं, तो ये ऐसे ही नहीं हुआ होगा।

इतनी बड़ी जनसंख्या, जिसमें अधिकांश अशिक्षित हों, आसानी से टीके लेने के लिए तैयार हो गई? बड़ी अजीब बात है! इसकी जड़ में जाते ही पता चलने लगता है कि टीकाकरण जिसे आज बड़ी शान से पश्चिमी बताया जाता है, उसकी तो उत्पत्ति संभवतः भारत में ही हुई थी।

कम-से-कम दो स्रोतों से टीकाकरण के भारत में आम होने की जानकारी मिलती है। “टिकादार” कहलाने वाले ब्राह्मण, गाँव-गाँव घूमकर टीके लगाया करते थे। ओलिवर कोउल्ट ने 1731 में लिखा था कि ऐसी प्रक्रिया “धन्वंतरी” नामक वैद्यों द्वारा की जाती है, जिसे उसने कहीं चंपानगर में देखा था।

दूसरी बार इनका उल्लेख 1768 में आता है और जॉन होल्वेल्ल लिखते हैं कि यह प्रक्रिया सदियों से बंगाल के क्षेत्रों में आम है। कम-से-कम स्मॉल पॉक्स के लिए जो टीकाकरण से मिलता जुलता तरीका इस्तेमाल होता था, उसका प्रयोग भारत, चीन इत्यादि में कम से कम 1000 वर्षों से हो रहा है।

टीकाकरण के नए तरीके में 1802-03 में फिरंगी हुक्मरानों ने पुराने तरीके को प्रतिबंधित कर दिया। पुराने तरीकों के प्रतिबंधित होने से जो लोग “टिकादार” की तरह काम करते होंगे, उनकी जीविका तो प्रभावित हुई ही होगी, साथ ही इसके सामाजिक प्रभाव भी हुए होंगे।

एक असर तो यह भी हो सकता है कि टीके लगाने जैसे काम के कारण वे जो शौच और छुआछूत के नियम मानते होंगे, उन सामाजिक दूरी के उनके परंपरागत नियमों को बाद में भेदभाव का तरीका बता दिया गया होगा।

गाँव-गाँव घूमकर टीकाकरण करने के बदले उन्हें कुछ आय भी होती होगी। उसे “नैरेटिव” गढ़ने वालों के लिए घूम-घूमकर भीख माँगना बता देना बिलकुल भी मुश्किल नहीं होगा। 200 वर्षों में इस नैरेटिव को कैसे गढ़ा गया है, यह देखना मुश्किल नहीं।

इससे जो एक और चीज़ समझ में आती है, वह यह है कि भारतीय जनता के लिए अपनी धार्मिक शिक्षा और सामाजिक व्यवस्था के कारण विज्ञान को स्वीकारना कठिन नहीं था। ऐसा माना जाता है कि टीकाकरण की पहली मॉडल भी भारतीय थी।

देवाजमानी (चित्र साभार- बीबीसी)

कैंब्रिज विश्वविद्यालय के इतिहासकार डॉ निएगेल चांसलर के अनुसार 1805 में देवाजमानी मैसूर आई थी। उनका विवाह नए-नए राजा बने 12 वर्षीय कृष्णराजा वाडियार (तृतीय) से हुआ था। इस समय फिरंगियों को हाल ही में मैसूर के टीपू पर फतह मिली थी।

टीकाकरण भी इसी दौर में शुरू हुआ था। राजपरिवार द्वारा इसे अपनाया जाना, जनता में इसकी स्वीकार्यता बढ़ाता। तो रानी देवाजमानी की पेंटिंग इसी उद्देश्य से बनी थी। जहाँ तक ब्रिटेन का सवाल है, वहाँ इस तरीके का विरोध हुआ था।

कई मजहब ऐसे होते हैं, जिनका विज्ञान से संबंध कुछ विशेष अच्छा नहीं रहता। अगर केवल भारत में देखेंगे तो भी ये नज़र आ जाएगा। असल में टीकाकरण का कुछ विशेष तबकों में विरोध होता रहा है। ईसाई-बहुल माने जाने वाले पूर्वोत्तर के राज्यों में इस वर्ष की शुरुआत में ऐसा ही देखने को मिला।

इस वर्ष 17 जनवरी को ईस्टर्न ज़िओन हीलिंग मिनिस्ट्री ऑफ़ पफुत्सेरो के दावों का असर लोगों पर होने लगा था। नागालैंड का यह इसाई संगठन ईसाइयों को टीकाकरण से मना कर रहा था, क्योंकि “यह ईश्वर की मर्ज़ी नहीं थी”।

इस मामले में कोहिमा के कैथोलिक बिशप जेम्स थोप्पिल ने कहा था कि कई ईसाई संगठनों पर उनका कोई नियंत्रण नहीं है। जनता को स्वयं ही ऐसे लोगों से सावधान रहना चाहिए। चाखेसंग बैप्टिस्ट चर्च कौंसिल (सीबीसीसी) ने इसके लिए प्रेस विज्ञप्ति भी जारी की थी।

अपने परिपत्र में ईस्टर्न ज़िओन हीलिंग मिनिस्ट्री ने कहा था- “नया कोविड टीका ईश्वर की मर्जी नहीं है इसलिए विश्वास करने वालों को इसे नहीं लगवाना चाहिए। जो ईश्वर में यकीन करने वाले कोविड-19 का टीका लगवाएँगे, उन्हें ईसा मसीह के राज्य में प्रवेश नहीं मिलेगा”।

यह कोई पहली बार नहीं था जब ऐसी चर्चा आई हो। इससे पहले पूर्वोत्तर के ईसाई-बहुल नागालैंड और मिज़ोरम जैसे राज्यों में 2018 में आधार कार्ड और रूबेला के टीकाकरण में भी ऐसी ही अफवाहें उड़ाई गई थीं। उस समय कहा गया था कि यह ईश्वर की मर्जी के खिलाफ है और इसकी सज़ा पशु का निशान शरीर पर पड़ जाने के रूप में मिलेगी।

उस समय भी सीबीसीसी ने कहा था कि वो “भविष्यवाणियों” में तो विश्वास करता है, मगर इन बातों में नहीं। इन सब बातों के बीच आप शायद जाँच के लिए जा रहे स्वास्थ्य कर्मियों के साथ मार-पीट करने की घटनाएँ भी याद कर पा रहे होंगे।

कहना नहीं होगा कि उन घटनाओं में भी एक समुदाय विशेष के लोग ही नज़र आते थे। टीकाकरण की लड़ाई हमें केवल बीमारी के विरुद्ध ही नहीं लड़नी पड़ती। यह अलग-अलग कई मोर्चों पर होती है। कई बार विज्ञान के विरुद्ध यह मोर्चा मजहब और रिलिजन भी खोले बैठे होते हैं।

हाँ, इस बात पर अफसोस अवश्य किया जा सकता है जब पिछड़ेपन और अंधविश्वासों की बात होती है तो जल्दबाज़ी (और संभवतः डर के मारे) भी अधिकांश लोग दुनिया के सबसे वैज्ञानिक धर्म को भी किन्हीं विज्ञान के शत्रु रहे मजहबों और रिलिजन के साथ ही तौलने लगते हैं।

कोविड-19 संबंधी टीकाकरण के शुरू होते ही रमज़ान (14 अप्रैल 2021) के शुरू होने का समय भी आया। इसके साथ ही मुस्लिम समुदाय में यह बहस शुरू हो गई कि रमज़ान के दौरान टीका लगवाना हराम होगा या हलाल!

मक्का की बड़ी मस्जिद और मदीना की पैगंबर की मस्जिद से शेख डॉ अब्दुल रहमान इब्न अब्दुलअज़िज अल सुदैस ने कहा कि इस दौरान कोविड का टीका लगवाया जा सकता है। मगर फिरके अलग-अलग होते हैं, और सभी को एक ही बात मान्य हो, ऐसा ज़रूरी नहीं होता।

अब्दुल रहमान इब्न अब्दुलअज़िज अल सुदैस

जमाते-इस्लामी (हिंद) जनवरी में ही कह चुका था कि अगर किसी टीके में हराम चीज़ें भी हों (कोविड के टीके में सूअर की चर्बी की अफवाह थी), तो भी मजबूरी में इंसानी जान बचाने के लिए उसे लगवाया जा सकता है। वैसे इससे बहस समाप्त होने के बदले और बढ़ ही गई थी।

ऑल इंडिया सुन्नी जमीअत-उल-उलेमा परिषद और मुंबई की रज़ा अकादमी ने स्पष्ट तौर पर सूअर की चर्बी वाले टीके को हराम करार देकर, लगवाने से इनकार कर दिया था। यह रज़ा अकादमी वही है जिसपर मुंबई के आज़ाद मैदान में दंगे भड़काने, तोड़-फोड़ करने के लिए 3 करोड़ रुपये का जुर्माना हुआ था।

रज़ा अकादमी ने जुर्माना भरने से भी साफ इनकार कर दिया था। इस बीच तक फाईज़र, मॉडर्ना और एस्ट्राज़ेनका ने स्पष्ट कर दिया था कि उनके वैक्सीन में सूअर की चर्बी का प्रयोग नहीं होता। (यद्यपि रख-रखाव और एक जगह से दूसरी जगह लाने-ले जाने के दौरान वैक्सीन को सुरक्षित और प्रभावी रखने में सूअर की चर्बी का बड़े पैमाने पर प्रयोग होता है।)

इस मौके पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले भी बारी-बारी आते रहे। मीडिया का एक बड़ा वर्ग जिस महाराष्ट्र की तारीफ करते नहीं थकता था, उसे महाराष्ट्र में दूसरी लहर के भयावह रूप लेने पर शाब्दिक नहीं, असली वाला मरघट का सन्नाटा अख्तियार करना पड़ा।

ऐसा ही केरल के साथ भी हुआ। केरल मॉडल की तारीफ करते नहीं अघाने वाले आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए। इस बीच केरल को अपने स्वास्थ्य मंत्री को ही बदलना पड़ा। वैक्सीन के असरदार होने पर एक सवाल यह भी उठा कि कहीं जनता को “लैब रैट” (गिनी पिग) बनाकर इसकी जाँच तो नहीं की जा रही!

इसी कारण संभवतः 37.3 प्रतिशत वैक्सीन व्यर्थ करने वाला राज्य झारखंड बना गया। इन सब के बीच कुछ राजनीतिबाज शोर मचाने लगे कि हमें टीके खुद खरीदने दो। केंद्र ने इसकी छूट दे दी। फिर पता चला कि वो टीके खरीद ही नहीं पा रहे और फिर से केंद्र पर आरोप थोपने पहुँच गए हैं।

कभी अवसर मिले तो सोचिए कि ऐसे दौर में अगर इन चीज़ों को दस्तावेज के तौर पर सुरक्षित रख लिया जाए तो क्या होगा? विदेशों में जहाँ ऐसे विषयों पर कई किताबें लिखी जाती हैं, वहीं भारत में ऐसा नहीं होता। पिछली सदी में 1918 के दौर के फ्लू के फैलने पर “द ग्रेट इन्फ्लुएंजा” जैसी, बेस्ट सेलर रही पुस्तकें उपलब्ध हैं।

जबकि पोलियो उन्मूलन, मलेरिया, कॉलरा जैसी दर्जनों बिमारियों से निपटने के बाद भी हम भारतीय लोगों ने अपने अनुभवों पर कुछ नहीं लिखा। बाकी “आपदा में अवसर” की बात चले तो कम-से-कम इस आपदा में भारत को दस्तावेजों में अनुभवों को सहेजना भी सीखना चाहिए। आपकी आगे की पीढ़ियों को यह पता तो होगा कि हम उनसे बेहतर कैसे थे? वरना उल्टा चोर कोतवाल को डाँटता तो रहेगा ही!