विचार
वैक्सीन डिप्लोमेसी: कोरोना संकट में दुनिया के लिए हनुमान बना भारत, चीन को लगी आग

रामायण का वह प्रसंग तो हम सभी जानते हैं कि कैसे भगवान हनुमान संजीवनी बूटी लेकर आए और भगवान लक्ष्मण के प्राण बचाए। परंतु जब वैसा ही दृश्य कलयुग में भी देखने को मिले तो यह अपने आप में अद्भुत और चमत्कारी ही होगा। कोरोना काल के दौरान एक बार फिर वह पौराणिक प्रसंग जी उठा है और भारतवर्ष को वैसे ही गौरव और श्रेष्ठता के मुकाम पर खड़ा दिखा रहा है, जैसा रामायण काल में था।

ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो ने भारत से कोरोना वैक्सीन की 20 लाख खुराक मिलने के बाद प्रसन्नता व्यक्त करने के लिए इसी प्रसंग का सहारा लिया। भगवान हनुमान के संजीवनी बूटी लेकर जाते हुए चित्र को ट्वीट कर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार जताया और धन्यवाद प्रकट किया।

कोरोना के इस मुश्किल दौर में भारत लगातार अपने पड़ोसी देशों को कोरोना की वैक्सीन देकर हनुमान की ही भूमिका तो निभा रहा है। ब्राज़ील के अलावा हाल ही में, भूटान, मालदीव, बांग्लादेश, नेपाल, म्यांमार, सेशेल्स, मॉरिशस और मोरक्को को भारत द्वारा कोरोना वैक्सीन भेजी गई। शीघ्र ही अफगानिस्तान, श्रीलंका को भी भारत से कोरोना वैक्सीन की सहायता मिलने वाली है।

बात यहीं पर ही नहीं रुकती। अब तो अमेरिका की बाइडन सरकार भी मोदी सरकार की वैक्सीन कूटनीति की मुरीद हो गई है।

अमेरिका ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा, “भारत सच्चा मित्र है। कई देशों को गिफ्ट के तौर पर वैक्सीन देने का जो काम भारत ने शुरू किया है, उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए, कम है। अपने पड़ोस के देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराकर भारत ने दुनिया के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है”।

इससे पहले भी भारत ने अमेरिका, ब्राज़ील एवं कई पड़ोसी देशों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की टैबलेट्स भेजकर उन्हें राहत की साँस दिलाई थी।

वैक्सीन-मैत्री की राह

भारत की इस अद्भुत पहल को प्रधानमंत्री मोदी ने “वैक्सीन-मैत्री” का नाम दिया है, जिसे कूटनीतिक भाषा में “वैक्सीन डिप्लोमेसी” के नाम से पुकारा जाने लगा है। अंतर्राष्ट्रीय जगत में आज इस टर्मिनोलॉजी की काफी चर्चा है। वैक्सीन डिप्लोमेसी से तात्पर्य, किसी देश द्वारा दूसरे ज़रूरतमंद देश को किसी खास वैक्सीन को उपलब्ध कराकर अपना प्रभाव स्थापित कर कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करना।

अमेरिकी विद्वान् प्रोफ़ेसर पीटर होटेज़ वैक्सीन डिप्लोमेसी को परिभाषित करते हुए बताते हैं, “जब कोई राष्ट्र अपनी विदेश नीति का इस्तेमाल दूसरे देशों में फैली बीमारी से लड़ने के लिए वैक्सीन भेज कर करता है, तो उसे वैक्सीन डिप्लोमेसी कहते हैं”।

प्रोफ़ेसर होटेज़ बताते हैं कि कैसे यह कूटनीति और भी कारगर साबित होती है जब दो राष्ट्र इसका इस्तेमाल आपसी मतभेदों को भुलाकर करते हैं। शीत युद्ध के दौरान की एक महत्वपूर्ण घटना को उद्घाटित करते हुए वह बताते हैं कि कैसे सन् 1956 में अमेरिका और रूस के बीच वैक्सीन डिप्लोमेसी का इस्तेमाल हुआ था, जब अमेरिकी और रूसी वायरोलॉजिस्ट आपसी मतभेदों को भुलाकर पोलियो के टीके को और भी बेहतर बनाने के लिए एक साथ मिलकर काम किए थे।

एक बार फिर आज “वैक्सीन डिप्लोमेसी” टर्मिनोलॉजी चर्चा में है, और इस बार कोरोना वैक्सीन को लेकर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। ध्यान से देखें तो कोरोना महामारी के दौरान एक और डिप्लोमेसी की भी चर्चा हुई थी, जिसे “मास्क डिप्लोमेसी” के नाम से जाना जाता है।

इसकी शुरुआत चीन ने की, ऐसा माना जाता है। बहुत से देशों को मास्क और पीपीई किट भेजकर चीन अपना प्रभाव स्थापित करने तथा भड़के हुए देशों का मन बदलने का प्रयास किया था। लेकिन इनकी खराब गुणवत्ता के कारण चीन की काफी आलोचना हुई, और फलतः वह अपने उद्देश्य में सफल न हो पाया।

जहाँ तक भारत का सवाल है, वह बिना किसी लाभ या राजनीति के ज़रूरतमन्द देशों को संकट के इस घड़ी में केवल सहायता करने के दृष्टिकोण से मदद कर रहा है। इस सहायता का केवल एक ही आधार है और वह है “मानवीय आधार”। यह कुछ और नहीं बल्कि एक महान् राष्ट्र के महान् लक्षणों और उसके बड़े हृदय को दर्शाता है।

ऐसे ही नहीं भारत को “विश्व गुरु” जैसी उच्च शब्दावलियों से सुशोभित किया जाता है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत पूरे विश्व में दूसरे नंबर पर आता है, और ऐसे में अपनी जनसंख्या के साथ-साथ दूसरे ज़रूरतमंद देशों के लोगों का ख्याल रखना, ऐसे संकट के समय में विरले ही कर सकते हैं।

चीन की बढ़ती बेचैनी

एक तरफ जहाँ भारत की चहुँओर बड़ाई हो रही है, वहीं दूसरी ओर चीन भारत की इस सफलता को पचा नहीं पा रहा है, और दुष्प्रचार में लग गया है। चीनी समाचार-पत्र ग्लोबल टाइम्स भारत के इस सफल अभियान को दुष्प्रचारित करने का प्रयास कर रहा है।

ग्लोबल टाइम्स  ने भारत की वैक्सीन-मैत्री के खिलाफ दुष्प्रचार करते हुए सीरम इंस्टीट्यूट में हाल ही में आग लगने की घटना के बाद भारतीय वैक्सीन मैन्युफैक्चरिंग क्षमता पर सवाल उठाए हैं। इतना ही नहीं बल्कि सीरम के कोविशील्ड को लेकर कई और भी भ्रम पैदा करने का प्रयास कर रहा है। साथ ही साथ, चीन ने यह भी दावा किया है कि चीन में रहने वाले भारतीय चीनी वैक्सीन को प्राथमिकता दे रहे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत के वैक्सीन-मैत्री अभियान ने चीन को बैकफुट पर धकेल दिया है, और वह भी खासकर दक्षिण एशिया में। भारत वैसे भी अफगानिस्तान, श्रीलंका और पाकिस्तान को छोड़कर सभी दक्षिण एशियाई देशों को वैक्सीन उपलब्ध करा चुका है।

कहा जा रहा है कि बहुत सारे देश चीनी वैक्सीन को स्वीकृति नहीं दे रहे हैं, जो कि चीन के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। चीन यह भी नहीं पचा पा रहा है कि भारत को दुनिया का वैक्सीन-हब माना जाता है, और चीन इस क्षेत्र में भारत से बहुत पीछे है।

संकट की इस घड़ी में इस तरह की प्रतिस्पर्धा चीन जैसे बड़े राष्ट्र को शोभा नहीं देती है। चीन द्वारा वैक्सीन की सहायता को प्रतिस्पर्धा के रूप में देखना ठीक नहीं है। अगर चीन खुद को एक ज़िम्मेदार राष्ट्र मानता है तो उसे भारत की इस अनुकरणीय और अद्भुत पहल का स्वागत करना चाहिए। यह वैक्सीन पर राजनीति का समय नहीं है।

आज का समय मानवता की सुरक्षा एवं बचाव का है, कटुता भाव से ग्रसित राजनीति करने का नहीं। निस्संदेह, पूरे विश्व के सामने भारत एक उच्चकोटी का उदाहरण प्रस्तुत कर अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में एक नया आयाम स्थापित कर रहा है, जिसे कई सदियों तक याद किया जाएगा।

डॉ. मुकेश कुमार श्रीवास्तव भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) में कंसल्टेंट हैं। प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं, परिषद के नहीं।