विचार
यूएस-पाकिस्तान के संबंधों की पुनर्स्थापना का विचार पाक की प्रवृत्ति समझे बिना अधूरा

जो बाइन के अमेरिकी राष्ट्रपति बन जाने के बाद से यूएस-पाकिस्तान के संबंधों को बेहतर करने के लिए आवाज़ें उठ रही हैं। 2011 से शीत युद्ध के इन दो सहयोगी देशों के बीच संबंध बिगड़ने लगे थे और 2018 में ये पतन की पराकाष्ठा पर पहुँच गए थे जब यूएस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्विटर पर पाकिस्तानी “झूठ और धोखे” की आलोचना की तथा कई करोड़ डॉलर की सुरक्षा सहायता निलंबित कर दी।

डोनाल्ड ट्रंप व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान

2018 से पाकिस्तान अपनी वित्तीय सहायता के दो प्रमुख स्रोतों को खो चुका है- यूएस और सऊदी अरब। एफएटीएफ से भी इसे राहत मिलने की कम संभावना है, ऐसे में यह ऋण सेवाओं के विषैले जाल में फँस चुका है। अफगान युद्ध अपनी समाप्ति की ओर है तथा यूएस प्रशासन ने स्वयं को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में व्यस्त कर लिया है, ऐसे में पाकिस्तान की सहायता के लिए कुछ नहीं बचा है।

यूएस-पाकिस्तान संबंधों में गिरावट के बीच भारत का पड़ोसी देश अभी तक प्रतिबंधों और आर्थिक परित्याग से बचा हुआ है जैसा कि प्रायः ऐसी परिस्थिति में देखने को मिलता है। हालाँकि, अमेरिका पाकिस्तान को प्रासंगिक क्यों रखना चाहता है यह बात समझ आती है लेकिन एक बात जो वह भूल जाता है, वह है कि पाकिस्तानी राज्य अपने आप में कितना अकर्मण्य है।

इस बारे में भी बहुत कुछ लिखा जा चुका है लेकिन संबंधों को पूर्व स्थिति पर लाने के लिए जो कोलाहल मचा हुआ है, उस बीच यह बात कहीं खो जाती है। आर्थिक सुरक्षा परिदृश्य से शुरू होने वाले सुझाव एक ऐसे पके-पकाए वाक्-जाल में जाकर फँस जाते हैं जो पाकिस्तान की ‘भारत से समानता’ और इस बात के सहगामी ‘अफगानिस्तान पर रणनीतिक पकड़’ व ‘चीन से मध्यस्थता’ पर जाकर समाप्त होते हैं।

यूएस-पाकिस्तान संबंधों को वापस पटरी पर लाने के लिए जो विचार किया जाता है उसमें पाकिस्तानी राज्य की अकर्मण्यता को अनदेखा कर दिया जाता है जिसका भारत पर ही सारा ध्यान रहता है। पाकिस्तानी की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय चर्चाओं में भारत ही होता है। वहीं राज्य की संस्थाओं पर पाकिस्तानी सेना की जो पकड़ है, उससे दोनों देशों के संबंध में सुधार और मुश्किल हो जाता है।

कई वेब-आधारित आयोजनों में दिखने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार डॉ मोईद युसुफ कहते हैं कि पाकिस्तान का नया विज़न संयोजकता और “विकास में साझेदारी, सहयोग नहीं” को प्रथामिकता देने का है तथा अंतर्राष्ट्रीय सहायता के लिए यह अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाना बंद करना चाहता है।

इमरान खान के साथ मोईद युसुफ (दाएँ)

नए परिदृश्य में आर्थिक सुरक्षा को जीर्णोद्धार का आधार बनाने के साथ-साथ कुछ प्रयासों का सुझाव भी है जैसे पाकिस्तान के निजी क्षेत्र में अमेरिकी निवेश हो, मानव विकास हो, पाकिस्तान में अमेरिकी कंपनियाँ विनिर्माण इकाइयाँ लगाएँ जिससे चीनी बाज़ारों तक भी उनकी पहुँच हो सके जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी, जलवायु, ऊर्जा, स्वास्थ्य और कृषि के क्षेत्रों पर विशेष ध्यान रहे।

सामान्य रूप से किसी भी देश के निजी क्षेत्र द्वारा विदेशी निवेश को सहायता की श्रेणी में नहीं डाला जाता है। हालाँकि पाकिस्तान कोई सामान्य राष्ट्र नहीं है। फौजी फाउंडेशन जैसी सेना-नियंत्रित इकाइयाँ नाश्ते की समाग्री के उत्पादन से लेकर सीमेंट, मांस, ऊर्वरक से लेकर रेडियो और टीवी मनोरंजन, ऊर्जा, पेट्रोलियम तथा बैंकिंग तक में हस्तक्षेप करती हैं, ऐसे में निजी क्षेत्र के लिए वहाँ खुला बाज़ार नहीं रह जाता।

इस परिस्थिति में पाकिस्तान के “निजी क्षेत्र” में यूएस का जो निवेश होगा, वह इन हस्तक्षेपों से बचा रहेगा, ऐसी संभावना काफी कम है। इससे भी अधिक, देश में सुरक्षा वातावरण अनिश्चित है क्योंकि सांप्रदायिक और अन्य कट्टरपंथी समूह वहाँ सार्वजनिक छूट का आनंद लेते हैं। ऐसे में कोई भी विदेशी निवेश इन समूहों को नियंत्रित करने वाली वास्तव के राज्य चलाने वालों के संरक्षण के बिना सुरक्षित नहीं रह सकता।

इस प्रकार पाकिस्तान जो नारा लगा रहा है कि “भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाने की बजाय वह आर्थिक संभवानाओं” को प्राथमिकता देगा व उनकी मार्केटिंग करेगा, वह खोखला है। राजनीतिक परिदृश्य में सेना का जो घातक प्रभाव है, उसपर विचार किए बिना ये खोखले दावे किए जा रहे हैं।

यूएस-पाकिस्तान संबंधों को पटरी पर लाने के लिए पाकिस्तान धीमी आवाज़ में जिस आर्थिक सहयोग की बात कर रहा है, उससे स्पष्ट है कि ये चर्चाएँ फिर से पुराने ढर्रे पर चली जाएँगी- ‘भारत से समानता’, ‘अफगानिस्तान पर रणनीतिक पकड़’ व ‘चीन से मध्यस्थता’।

रिपोर्ट यूएस को सुझाव देती हैं कि दक्षिण एशिया में मानवाधिकार और लोकतंत्र की चुनौतियों के लिए एक “क्षेत्रीय तरीका” अपनाया जाए और भारत द्वारा अनुच्छेद 370 के उन्मूलन पर एक “स्पष्ट और अमिश्रित मुद्रा” हो, साथ ही अफगानिस्तान पर प्रभाव डालने के विरुद्ध भारत को चेतावनी दी जाए।

चीन के लिए यूएस को सुझाव दिया गया है कि विकास वित्त निगम (डीएफसी) और ब्लू डॉट नेटवर्क का प्रलोभन देकर पाकिस्तान को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सी-पेक) से दूर किया जाए, चीन से मध्यस्थता के लिए पाकिस्तान की सहायता ली जाए और इंडो-पैसिफिक की अवधारणा का विस्तार करके उसमें पाकिस्तान को जोड़ा जाए।

यह अपेक्षा करना कि भारत और अफगानिस्तान के प्रति अपनी नीतियों में परिवर्तन के बिना पाकिस्तान यूएस से संबंधों को पुनः स्थापित कर सकता है, चिंता की बात है। साथ ही चीन और इंडो-पैसिफिक के लिए जो सुझाव दिए गए हैं, वे भी पाकिस्तान का आकलन करने और चीन के आक्रामक तथा अवसरवादी रवैये के विरुद्ध विश्व के गुस्से को समझने में असफलता दर्शाते हैं क्योंकि विश्व कोविड महामारी से जूझ रहा है।

इसमें कुछ भी अनपेक्षित नहीं है और पाकिस्तान से संबंध सुधारने से पहले इतिहास पर भी नज़र दौड़ा लेनी चाहिए। 70 वर्षों से अधिक समय से अमेरिका से मिली आर्थिक सहायता का पाकिस्तानी सेना ने गलत उपयोग करके स्वयं को सुदृढ़ किया है, जबकि लोकतांत्रिक संस्थानों को दुर्बल कर दिया गया है।

पाकिस्तानी सेना

विडंबना यह है कि इस सहायता ने, जैसा कि मदीहा अफज़ल कहती हैं, पाकिस्तानी सरकारों को “राजनीतिक लाभ के लिए अमेरिका-विरोधी भावनाओं” को लगातार भड़काने से नहीं रोका। लोकप्रिय चर्चाओं में भारत, यूएस और इज़रायल-विरोधी मुद्राएँ इस तरह से रच-बस गई हैं कि कश्मीर पर राजनीतिक समाधान तक पहुँचना या इज़रायल के अस्तित्व को स्वीकारना भी राजनीतिक आत्महत्या मानी जाती है।

यूएन द्वारा नामित आतंकी समूहों की कमर तोड़ने या उनकी वित्तीय गतिविधियों पर लगाम लगाने में पाकिस्तान का रिकॉर्ड लज्जाजनक रहा है। डेनियल पर्ल हत्या में उमर साईद शेख को निर्दोष घोषित करने जैसी घटनाएँ इस बात की पुष्टि करती हैं। राज्य विभाग को तथ्यों के आधार पर पाकिस्तान को देखकर अपना दृष्टिकोण बदलना चाहिए।

समय आ गया है कि चर्चा अफगानिस्तान और कश्मीर से आगे बढ़े। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की तैनाती और उसपर अरबों अमेरिकी डॉलर का खर्च भी पाकिस्तान को तालिबान की सहायता करने से नहीं रोक सका। बाइडन प्रशासन ने संकेत दे दिया है कि समझौते की शर्तों के अनुपालन में यह तालिबान के रिकॉर्ड से संतुष्ट नहीं है।

यह सोचना कि कश्मीर मुद्दे के समाधान (जो अपने आप में एक अच्छी बात है) से दक्षिण एशिया में स्थिरता आएगी, पाकिस्तान को न समझ पाने का सूचक है क्योंकि वह भारत के उत्थान को दबाने के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा। वैश्विक स्तर पर चीन के घातक प्रभाव को रोकने और सेना को वापस लेने के प्रयासों के बीच यूएस को समझ जाना चाहिए कि पाकिस्तान को चीन से दूर करना सरल नहीं होगा।

यदि यूएस-पाकिस्तान संबंधों को पुनर्स्थापित करने के लिए इन कारकों को ध्यान में न रखा जाए तो यह मात्र एक दिखावटी प्रयास होगा।

लेखिका सिविल सेविका हैं। उनके उपरोक्त विचार भारत सरकार के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।