विचार
उज्जैन के इस व्यक्ति ने दो दशकों में 24,000 से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है
उज्जैन के इस व्यक्ति ने 24,000 से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है

प्रसंग
  • उज्जैन के अनिल डागर ने पिछले 24 वर्षों के दौरान 24,000 से अधिक लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार किया है।
  • वह पुलिस द्वारा निर्धारित उनके धार्मिक रीति-रिवाज के अनुसार लाशों का दाह-संस्कार करते हैं या उन्हें दफन करते हैं। 20 वर्षों में वह लगभग 2,500 मुस्लिम लाशों को दफना चुके हैं।

हाल ही में महाकल के शहर उज्जैन की यात्रा करते हुए एक बहुत ही असामान्य दीवार लेखन ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। उसमें लिखा हुआ थाः”किसी भी लावारिस लाश के बारे में सूचित करें”। पहली नजर में मैं इस उलझन में था इसका अर्थ क्या है। मैंने इस व्यक्ति के बारे में उज्जैन निवासी ड्राइवर से पूछा। उन्होंने बताया कि यह व्यक्ति शहर में लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार मुफ्त में करता है। मैंने तुरंत उनका नंबर डायल किया यह पूछने के लिए कि वह घर पर थे या नहीं । उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें एक लावारिस लाश के बारे में जानकारी मिली है, और वह वहीं जाने वाले हैं I

मेरे अनुरोध पर वह अपने घर पर मेरा इंतजार करने के लिए सहमत हो गये। मैंने अपनी सभी योजनाओं को स्थगित कर दिया और बिलोटीपुरा में अनिल डागर के घर पहुँच गया।मेरी मुलाकात एक बहुत ही सामान्य लेकिन मजबूत इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति से हुई।उनका कार्यालय उन फाइलों से भरा था जिनमें उन्होंने दाह-संस्कार की गयी या दफनाई गयी प्रत्येक लाश के अभिलेख संभालकर रखे थे।कार्यालय की सभी दीवारों पर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि और उज्जैन से लगभग 59 किमी दूर एक उभरते मेट्रो शहर इंदौर की सांसद (संसद सदस्य), वर्तमान लोकसभा की सभापति सुमित्रा महाजन सहित शहर के बड़े-बड़े लोगों द्वारा उनकी प्रशंसा दर्शाने वाली तस्वीरें लगी हुई थीं।

मेरा पहला सवाल था, “आप कितने समय से ऐसा कर रहे हैं?” उन्होंने कहा: “मैं 15 वर्ष की उम्र से चक्रतीर्थ शमशान में लाशों का अंतिम संस्कार कर रहा हूँ। कुछ समय तक मैंने यह कार्य एक सहायक के रूप में किया, लेकिन शीघ्र ही मैंने इसे पूर्णरूप से स्वयं संभाल लिया। मैंने देखा है कि अधिकतर लोग दाह संस्कार करने के लिए पर्याप्त मात्रा में लकड़ी की व्यवस्था नहीं कर सकते हैं। वे केवल 1.5 कुंतल लकड़ी से शव का दाह संस्कार करने की कोशिश करते हैं। इस तरह के शव अपूर्ण रूप से जल पाते हैं क्योंकि शव के केंद्रीय भाग को जलने के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है। अगर लकड़ी अपर्याप्त है, तो धड़ अधजला रह जाता है। कई वर्षों से मेरा काम ऐसे शवों पर ध्यान देना और उन्हें जलाना था।”

यह सब कैसे शुरू हुआ

“एक बार सर्दी के दौरान कोई जोशी परिवार से एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया था। चूँकि तेज बारिश हो रही थी इसलिए रिश्तेदारों ने जल्दबाजी में अंतिम संस्कार किया और चले गये। मैंने उनसे कुछ और समय तक रुकने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने मेरी सलाह को अनदेखा कर दिया।चूँकि बारिश बहुत तेज हो रही थी इसलिए शिप्रा नदी की बाढ़ ने शमशान को डुबो दिया और अधजला शव उसमें बह गया। वह नदी के किनारे फंस गया और दो दिन बाद शमशान पहुँचने पर मुझे एक साधु जलते हुए शव के पास बैठा हुआ मिला।

“चूंकि सर्दी का मौसम था, इसलिए मैंने उनके लिए चाय की व्यवस्था की। नदी के किनारे में अधजले शव की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि यह वही शव है जिसके बारे में आपने उस दिन बात की थी। यह एक धार्मिक शहर है, जहाँ पूरे देश से हजारों लोग रोज आते हैं;अगर मृत शरीर ऐसी स्थिति में रहता है तो बुरा लगता है। मैंने उनसे पूछा कि मैं उस मृत शरीर को बाहर कैसे ला सकता हूँ क्योंकि वहाँ कीचड़ थी  और नदी की धारा तेज थी। वह खड़े हुए और मुझे अपने पीछे नदी किनारे तक आने के लिए कहा। हमने शव को बाहर खींचा। शमशान में पहले से ही दो चिताएं जल रही थीं। उन्होंने मुझे उस शव को भी किसी एक चिता पर रखने के लिए कहा। वर्ष 1994 में उस संत ने मुझे शहर के सभी लावारिस शवों का अंतिम संस्कार सुनिश्चित करने की सलाह दी। तब से मैं यह कर रहा हूँ।”

सिंधु और गंगा में तर्पण

यह कार्य 1994 से चल रहा है। इस वर्ष, जून 2018 तक वह 265 शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। उन्होंने बताया, “जब मैं 400 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार कर लेता हूँ तो मैं अपनी पत्नी के साथ लेह में बहने वाली सिंधु नदी पर जाता हूँ और सभी शवों का तर्पण करता हूँ। मैं पिछले 24 सालों से ऐसा कर रहा हूँ। मैं सभी शवों की राख को इकट्ठा करता हूँ और साल में एक बार पवित्र नदी में विसर्जित करता हूँ।”

यह पूछे जाने पर कि वह कॉल पर कैसे बात करते हैं, उन्होंने बताया, “जैसे ही मुझे कॉल मिलती है, पहला काम शव के बारे में सभी अहम जानकारी हासिल करने के लिए एक फॉर्म भरने का होता है। ज्यादातर कॉल पुलिस या स्थानीय प्रशासन से आती हैं। लेकिन जब ऐसी कॉल जनता से आती है तो मैं पुलिस को सूचित करता हूँ और पुलिस द्वारा औपचारिकताएं पूरी होने के बाद ही मामले में हाथ डालता हूँ।”

उन्होंने बताया कि पिछले 24 सालों में उन्होंने करीब 24,000 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार किया है।

शव नागदा, मक्सी, रघ्वी और मखदूम जैसे आसपास के इलाकों से आते हैं। उज्जैन नगर निगम में काम करने वाले डागर का कहना है कि “मैं शव को पूरे सम्मान के साथ दाह संस्कार या दफन करता हूँ। मैं इसका एक पूरा रिकॉर्ड रखता हूँ और इसे नियमित रूप से  एसपी कार्यालय में जमा करता हूँ।” पुलिस द्वारा जैसा बताया जाता है डागर शव का उसी के धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार कर देते हैं। 20 सालों में उन्होंने करीब 2500 मुस्लिम शवों को दफ्नाया है।

इस लेख को पहले ‘ओर्गनाईजर’ में प्रकाशित किया गया था और अनुमति के साथ इसे यहाँ पर पुनः प्रकाशित किया गया है।