विचार
ट्विटर बनाम अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य— यूएस संविधान का पहला संशोधन एक स्वांग

जब यूएस संविधान का अर्थ निकालने की बात हो, विशेषकर अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य अधिकारों पर, तो उन्हीं शब्दों का अर्थ अलग-अलग लोगों के लिए भिन्न हो सकता है।

सोमवार (8 मार्च) को अपने आप में एक विधान बनकर किसे प्रतिबंधित करना है और किसे नहीं, का निर्णय करने वाले माइक्रो-ब्लॉगिंग मंच ट्विटर ने संविधान के पहले संशोधन द्वारा सुनिश्चित ‘अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य’ को नियंत्रित करने के आरोप में टेक्सास के अटॉर्नी जनरल पर मुकदमा ठोक दिया।

प्रत्यक्ष है कि टेक्सास के अटॉर्नी जनरल केन पैक्स्टन द्वारा ट्विटर की ‘सामग्री संयमित’ करने की नीतियों पर शुरू की गई जाँच कंपनी को रास नहीं आई है। ध्यान देने योग्य बात है कि जनवरी में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को कैपिटल हिल में हिंसा भड़काने के आरोप में मंच से हटा दिया गया था।

रोचक संयोग है कि पैक्सटन और ट्विटर दोनों ही दावा करते हैं कि वे स्वतंत्र अभिव्यक्ति की रक्षा कर रहे हैं। एक तरफ जहाँ ट्विटर की सामग्री संयमन नीतियों की जाँच शुरू करने वाले पैक्सटन ने उन्हें “भेदभावपूर्ण”, “अभूतपूर्व” और कंज़र्वेटिव आवाज़ों को दबाने वाला बताया, वहीं दूसरी ओर ट्विटर ने कुछ और दावा किया।

कंपनी का कहना है कि ट्रंप को मंच से हटाने के प्रतिशोध के रूप में पैक्सटन ने ट्विटर की संयमन संबंधित सभी ई-मेल व अन्य संचार तक पहुँच की माँग की थी। ट्विटर ने संयमन नीतियों को साझा करने से यह कहकर मना कर दिया कि इन सामग्रियों को संविधान के प्रथम संशोधन के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त है।

यह संशोधन निजी कंपनियों को दायरे से बाहर रखता है और वे अपने अनुसार चीज़ों को सेन्सर कर सकते हैं। देखें क्या कहता है यूएस का पहला संशोधन-

कांग्रेस ऐसा कोई कानून नहीं बनाएगी जो किसी धार्मिक अधिष्ठान से संबंधित हो या धार्मिक स्वतंत्रता को रोकता हो, या अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य अथवा प्रेस स्वातंत्र्य पर काट-छाँट करता हो, या लोगों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन अथवा सरकार से शिकायत के समाधान के लिए याचिका को रोकता हो।

हमारी चर्चा से संबंधित भाग को बोल्ड किया गया है जो कांग्रेस को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य अथवा प्रेस स्वातंत्र्य को काटने-छाँटने से संबंधित कानून बनाने से रोकता है।

स्पष्ट है कि ट्विटर ने इसका यह अर्थ निकाला है कि सरकार अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को काट-छाँट नहीं सकती है लेकिन अपनी संपादकीय नीतियों पर चलकर कोई निजी कंपनी यह काम कर सकती है।

कैलिफोर्निया फेडरल न्यायालय में टेक्सास अटॉर्नी जनरल पर दर्ज किया गया मुकदमा दो कारणों से रोचक होगा। पहला, इससे तय हो जाएगा कि यूएस संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का अधिकार निजी मंचों पर लागू होगा या नहीं।

यह अवश्य है कि प्रकाशकों के पास अधिकार होता है कि वे किस सामग्री को प्रकाशित करने देना चाहते हैं, किसे नहीं, लेकिन एक ऐसा मंच जो प्रकाशक नहीं है, क्या उसे यह अधिकार मिलना चाहिए?

दूसरा, इस मामले के साथ-साथ यूएस के कई राज्यों द्वारा बिग टेक की शक्ति को नियंत्रित करने के मामले समानांतर पर चलेंगे। दिसंबर 2020 में यूएस फेडरल व्यापार आयोग और कई राज्यों के 48 अटॉर्नी जनरल ने प्रतिस्पर्धा को दबाने वाली फेसबुक की नीतियों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करवाया था।

कुछ 38 राज्यों ने इंटरनेट सर्च बाज़ार पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए गूगल पर एंटी-ट्रस्ट मुकदमा दर्ज करवाया था जिससे उपभोक्ताओं और प्रचारकों, दोनों की हानि होती है।

यूएस का पहला संशोधन विचित्र है क्योंकि यह सरकार को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य या धार्मिक स्वतंत्रता से छेड़छाड़ कर से रोकता है लेकिन निजी कंपनियों या व्यक्तियों को कुछ नहीं कहता।

जिस देश में निजी उद्यम और बिग टेक प्रायः कई राज्यों और सरकार से अधिक शक्तिशाली हो, वहाँ पर जब इन शक्तिशाली मंचों को उपभोक्ताओं पर अपना सेन्सरशिप चलाने की अनुमति दे दी जाए तो वास्तविकता में नागरिकों के लिए संरक्षित अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य क्रियाशील नहीं हो सकता।

ऐसा ही धार्मिक स्वतंत्रता के लिए भी है, जिसे भी प्रथम संशोधन में संरक्षित किया गया है। यह अधिकार कंपनियों को धार्मिक आधार पर भेदभाव करने की छूट देता है।

इसका अर्थ हुआ कि यदि कोई राज्य समलैंगिक विवाह के पंजीयन की अनुमति देता है तो ईसाई आदर्शों को मानने वाला व्यक्ति अपनी कंपनी या व्यक्तिगत सामर्थ्य के दायरे में इसे मानने से मना कर सकता है। अन्य शब्दों में कहें तो धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार धार्मिक कट्टरवाद का भी अधिकार देता है।

वहीं, दूसरी ओर अपने समर्थकों को डोनाल्ड ट्रंप का कथित उकसावा अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य के अधिकारों पर सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या में दोषरहित हो सकता है क्योंकि हिंसा के लिए उकसावा जिससे तुरंत हिंसा नहीं होती भी अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य की श्रेणी में है।

ब्रैंडनबर्ग बनाम ओहायो (395यूएस 444 – 1969) में यूएस सर्वोच्च न्यायालय ने हिंसा के लिए उकसावे पर दंडित करने की सीमा को काफी ऊँचा रखा था। इस मामले में क्लैरेन्स ब्रैंडनबर्ग को ओहायो कानून के अनुसार दोषी माना गया था।

ओहायो के अनुसार “कर्तव्य, आवश्यकता या अपराध, हिंसा या गैर-वैधानिक गतिविधियों को औचित्य बताकर औद्योगिक या राजनीतिक सुधार” के लिए हिंसा की वकालत करना गलत है। हालाँकि, सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय को वापस लेकर कहा-

इस प्रकार से दोषी ठहराना पहले और 14वें संशोधनों के प्रतिकूल है। अभिव्यक्ति और प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार किसी राज्य को अनुमति नहीं देते हैं कि वे बल प्रयोग या कानून तोड़ने की वकालत को रोकें जब तक कि ऐसी वकालत से तुरंत गैर-कानून कार्रवाई नहीं भड़कती।

यूएस सर्वोच्च न्यायालय

कुल मिलाकर, मूल रूप से हिंसा के लिए उकसावा स्वीकार्य है परंतु यह तब ही प्रतिबंधित हो सकता है जब यह “तुरंत गैर-कानूनी कार्रवाई” को उकसाए। हमें चिंता इस बात की है कि “तुरंत गैर-कानून कार्रवाई” को कैसे परिभाषित किया जाता है।

क्या यह तब ही लागू होगा जब किसी वक्तव्य से भीड़ तुरंत हिंसक हो जाती है, और तब नहीं जब वही भीड़ थोड़ा समय ले और कुछ दिनों या महीनों बाद कोई हंगामा करे या छिपकर इसकी योजना बनाए?

ब्रैंडनबर्ग निर्णय का उद्धरण भारत में भी दिया जाता है जब सरकार ने कुछ हिंसक सीएए (नागरिकता संशोधन अधिनियम)-विरोधी प्रदर्शनकारियों या कुछ किसानों द्वारा 26 जनवरी को लाल किले पर की गई हिंसा के मामले में सरकार ने कार्रवाई की थी। लेकिन वास्तविकता यह है कि वह निर्णय यूएस के संदर्भ में भी सही नहीं है।

उससे भी बड़ी सच्चाई यह है कि जहाँ अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य पर बड़े तकनीकी मंच अपने आप से नियम बना रहे हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र जैसे शैक्षिक संस्थानों, कार्यस्थलों तथा मीडिया इकाइयों में “कैन्सल कल्चर” (हर विरोधी बात का खंडन/विरोध/अस्वीकार्यता) काम कर रहा है तो यूएस के संविधान का अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य और धार्मिक स्वतंत्रता का विचार आधुनिक परिप्रेक्ष्य में संरक्षक का काम नहीं कर सकता।

भारत के लिए संदेश सरल है- हम यह न मान लें कि यूएस या यूरोप में किसी संदर्भ में बने कानून हमाारे लिए प्रासंगिक हैं। अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य पर हमें अपने तार्किक विधानों को स्वयं विकसित करना होगा जो संयमन करते हों, प्रतिबंध नहीं और विभिन्न धार्मिक आचरणों के प्रति तब तक सहिष्णुता रखें जब तक वे व्यक्तिगत मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन न करते हों।

ब्रैंडनबर्ग का संदर्भ हमारे लिए प्रासंगिक नहीं है क्योंकि रैलियाँ या जुलूस अधिकांश रूप से हिंसा या दंगों या संपत्ति के साथ छेड़छाड़ का रूप ले लेती हैं। हमारे परिदृश्य में प्रासंगिक हिंसा को रोकने के लिए हमें कानून बनाने होंगे जो अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य, अंतर्मन की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन की स्वतंत्रता के साथ समझौता न करें।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।