भारती / विचार
ट्विटर की स्वायत्तता पर लगाम कसना भारत की संप्रभुता के हित की बात है

नरेंद्र मोदी सरकार ने 3 फरवरी को नोटिस जारी करके अंततः यूएस की बड़ी तकनीकी कंपनी ट्विटर को भारत में क्रियान्वयन के संबंध में उसकी स्वायत्तता की सीमाएँ बता दी हैं। इस माइक्रोब्लॉगिंग सोशल मीडिया मंच पर किसान प्रदर्शन से संबंधित घृणा फैलाने वाली समग्री पर कड़ा रुख अपनाते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (मेइती) ने ट्विटर को पाँच पन्नों का नोटिस भेजकर कहा, “नरसंहार के लिए उकसावा अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य नहीं है। यह कानून व्यवस्था के लिए खतरा है।”

इस नोटिस का संकेत हैशटैग मोदी प्लानिंग फार्मर जीनोसाइड था जो पिछले सप्ताह ट्विटर पर ट्रेंड हुआ था। सरकार के अनुसार, “यह भावनाओं को भड़काने वाला, घृणा फैलाने वाला और तथ्यों में गलत था।”

आपातकाल स्थिति के लिए मेइती ने 31 जनवरी को एक अंतरिम आदेश पारित किया था जिसमें सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 (आईटी एक्ट) के खंड 69ए पर आधारित सूचना प्रौद्योगिकी (सार्वजनिक जानकारी को प्रतिबंधित करने की कार्यप्रणाली और बचाव) नियम 2009 के नियम 9(1) के आधार पर 257 लिंक और एक हैशटैग को प्रतिबंधित करने के लिए कहा गया था।

सरकार के नवीनतम नोटिस में आरोप है कि ट्विटर ने आपत्तिजनक सामग्री को आदेश के कई घंटों तक नहीं हटाया था और 1 फरवरी को दोपहर 3 बजे सरकार की समिति के समक्ष उनके अधिवक्ता की उपस्थिति के कुछ मिनट पहले ही उन्हें हटाया गया।

इसके अलावा ब्लॉक की गई सभी सामग्री को शीघ्र ही अनब्लॉक भी कर दिया गया और ट्विटर ने सरकार का आदेश मानने से यह कहकर मना कर दिया कि उसने सामग्री को ‘समाचार-योग्य’ और ‘अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य’ के दायरे में पाया है। अब सरकार ने ट्विटर को याद दिला दिया है कि वह भारतीय विधान के अधीन आता है।

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद

ट्विटर को भेजे गए नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के खंड 2(1)(डब्ल्यू) की परिभाषा के अनुसार ट्विटर एक “मध्यस्थ” है और वह मुद्दे की अव्यावहारिकता या अनुपातहीनता का निर्णय नहीं कर सकता है क्योंकि वह केंद्र सरकार द्वारा पास किए गए आदेश से बंधा हुआ है।

नोटिस में आगे कहा गया कि ‘ट्विटर के पास संवैधानिक सिद्धांतों पर आधारित वैधानिक प्रावधानों से छेड़छाड़ या भारत के संवैधानिक और वैधानिक कानूनों पर अपनी सीमित समझ के अनुसार इन प्रावधानों को नकारने का कोई संवैधानिक, वैधानिक या कानूनी आधार नहीं है।’

सरकार के नोटिस में बार-बार उद्धृत आईटी एक्ट का खंड 69ए स्पष्ट है- यदि केंद्र सरकार ‘किसी मध्यस्थ को सार्वजनिक जानकारी को ब्लॉक करने का निर्देश देना आवश्यक समझती है या यदि सरकार मानती है कि सार्वजनिक व्यवस्था को क्षति पहुँचाने वाली कोई जानकारी उत्पन्न, प्रसारित, संग्रहित या किसी कंप्यूटर संसाधन में रखी न जाए’ तो वह यह कर सकती है।

भारत के संवैधानिक कानून की अवज्ञा या अनादर करने का मन यदि ट्विटर ने बना लिया है तो उसके लिए भी कानून स्पष्ट है। आईटी एक्ट का खंड 69(3) कहता है कि जो मध्यवर्ती इकाइयाँ सरकार का आदेश नहीं मानेंगी, उन्हें ‘अधिकतम सात वर्षों के कारावास का दंड दिया जा सकता है और उनपर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।’

अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य पर सिर्फ आईटी एक्ट ही सीमाएँ नहीं लगाता। इनका मूल संविधान के अनुच्छेद 19 के दूसरे उप-खंड में है-
उप-खंड 1(ए) (जो सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य का अधिकार देता है) की कोई बात किसी कानून के क्रियान्वयन को बाधित नहीं कर सकती या राज्य को कोई कानून बनाने से रोक नहीं सकती जब तक कि कानून भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मित्रवत संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता के हित में या न्यायालय की अवज्ञा, मानहानि या अपराध के लिए उकासवे को रोकने के लिए इस अधिकार पर तार्किक प्रतिबंध लगाता हो।

नेहरू का पहला मंत्रालय

हालाँकि स्वराज्य पहले इस उप-खंड के कई आयामों के अतार्किक होने की बात कह चुका है लेकिन इन्हें संविधान के प्रथम संशोधन के तहत तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जुड़वाया था तथा कोई भी विदेशी कंपनी के आंतरिक नियम इन संवैधानिक प्रावधानों पर हावी नहीं हो सकते हैं।

यह भी समझें कि यदि ट्विटर ने जिस राह पर चलना शुरू किया है, उसी पर चलता रहे तो भारत सरकार के पास दंडात्मक कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। सार्वजनिक व्यवस्था को क्षति पहुँचाने के लिए सरकार ट्विटर पर प्रतिबंध लगा सकती है या इसके अधिकारियों को दंड दे सकती है जिसके लिए मोदी-विरोधी नेहरू पर दोष मढ़ सकते हैं।

हालाँकि वे लोग (या वे भारतीय जो ट्विटर के नियमों के समर्थन में हैं क्योंकि वह उनकी राजनीतिक विचारधारा के अनुरूप है) वाद-विवाद और चर्चा के बाद निर्णय लेकर संविधान में परिवर्तन करने के संसद के अधिकार पर दोराय नहीं रख सकते।

भारतीय राज्य का यही विशेषाधिकार है। सिर्फ भारतीय ही निर्णय कर सकते हैं और करेंगे कि संविधान की कमियों को कब और कैसे दूर करना है। संप्रभुता के मूल में यही विचार है। ‘हम भारत के लोग’ संविधान में स्पष्ट है और विदेशी विचारधाराओं को मानने वाले तथा अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों से चलने वाले ट्विटर के अधिकारी इस श्रेणी में नहीं आते हैं।

भारतीय राज्य ट्विटर को इस बात की अनुमति नहीं दे सकता कि वह अपने ऑनलाइन उपनिवेश में एक समानांतर कानून चलाए जिसे भारतीयों को मानना अनिवार्य हो। भारतीय सिर्फ भारतीय कानून से बंधे हुए हैं जिन्हें देश के नागरिकों द्वारा चुने प्रतिनिधि ही बनाते हैं।

सरकार और ट्विटर के बीच इस रस्साकशी के मूल में अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य या मंच की स्वायत्तता नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता है। अभी तक भारतीय सरकार ने दक्षिणपंथी लोगों पर छाया-प्रतिबंध लगाने या उन्हें मंच से हटाने को लेकर ट्विटर से कुछ नहीं कहा है जबकि राजनीतिक परिदृश्य में वाम पर स्थित लोगों को वह पूर्ण स्वतंत्रता देता है।

ऐसे में भारत सरकार ने इस संदर्भ में ट्विटर को स्वायत्तता दी है। सरकार ने नोटिस तब ही जारी किया जब वह भारतीय कानून के अनुसार नहीं चला और भारत की संप्रभुता को चुनौती दी। टिकटॉक पर प्रतिबंध लगाने का भी प्रमुख कारण भारत की संप्रभुता ही था।

तब मेइती ने कारण बताया था कि टिकटॉक और अन्य चीनी ऐप्स ‘ऐसी गतिविधियों में लिप्त थीं जो भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए हानिकारक थीं।’

उस समय मैंने तर्क दिया था कि जैसे चीनी ऐप्स चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ का हथियार बन गई हैं, वैसे ही यूएस की बड़ी तकनीकी कंपनियाँ जैसे ट्विटर भी धीरे-धीरे उसी राह पर चल रही हैं और स्वयं को वामपंथियों के हाथ में देकर अपने लिए गड्ढा भी खुद ही खोद रही हैं।

लेकिन लगता है कि ट्विटर ने चीनी ऐप्स के प्रतिबंध से कोई सीख नहीं ली। स्थानीय राजनीति में विदशी विचारधाराओं के हस्तक्षेप को भारत अनुमति नहीं दे सकता है क्योंकि यह उसकी “संप्रभुता के लिए हानिकारक” होगा। अगर ट्विटर अब भी पीछे नहीं हटता है तो इसे नए भारत की राग सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @haryannvi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।