विचार
दार्जिलिंग: कचरे का खुले में फेंका जाना पैदा कर रहा है गंभीर पर्यावरणीय जोखिम

प्रसंग
  • दार्जिलिंग में गैर जिम्मेदाराना ढंग से कूड़े का फेंका जाना और जलाया जाना स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर जोखिम पैदा कर रहा है और साथ ही चूंकि यह सब एक विशिष्ट जैव विविधता वाली जगह पर हो रहा है इसलिए यह आश्चर्यजनक और पूरी तरह से अस्वीकार्य है।

बंगाल का प्रधान और बहुमूल्य पर्यटन स्थल, और इस क्षेत्र में इसका उच्चतम राजस्व कमाई वाला क्षेत्र, तेजी से अपनी चमक खो रहा है। अत्यधिक मात्रा में बिखरे कचरे के ढेरों, जिनकी गन्दगी शहर भर में फैली हुई है, ने दार्जिलिंग को प्रदूषित कर रखा है। 1835 में अंग्रेजों द्वारा एक सेहतगाह के रूप में स्थापित इस शहर ने 1947 के बाद से पूरी तरह अव्यवस्थित तरीके से तरक्की की है और इसलिए आबादी की मौजूदगी ने यहाँ गन्दगी को न्यौता दिया है। स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 में स्वच्छता के लिहाज से दार्जिलिंग को 471 भारतीय शहरों की सूची में 451 वें स्थान पर रखा गया था, जो कि शर्मनाक है।

दार्जिलिंग के लगभग 1.35 लाख लोग अधिकांशतः पक्के, बक्सानुमा संरचनाओं में रहते हैं, जो दो चोटियों पर पसरे 10.6 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में घनी बस्ती के रूप में नज़र आती है। दूर से, शहर एक अत्यंत घनी आबादी के रूप में एक-दूसरे के साथ सटी असमान इमारतों के अनियंत्रित संग्रह की तरह प्रतीत होता है और पृष्ठभूमि में हिमाच्छादित कंचनजंगा पहाड़ियों के साथ एकदम विपरीत छवि प्रस्तुत करता है। यह हिल स्टेशन, जो कभी ‘हिल स्टेशनों की रानी’ कहा जाता था, वर्तमान आबादी के पांचवे हिस्से जितनी आबादी के लिए बनाया गया था, अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद उनके किसी भी उत्तराधिकारी ने दार्जिलिंग के बुनियादी ढांचे पर काम नहीं किया।

इस गंदे हिल स्टेशन की 1.35 लाख स्थायी आबादी में सात लाख पर्यटकों (प्रत्येक इस शहर में औसतन दो दिन रुकता है) को जोड़िये जो हर साल दार्जिलिंग आते हैं और कोई भी व्यक्ति लोगों की तबाही जैसी दिखने वाली खचाखच भीड़ के बारे में आसानी से कल्पना कर सकता है। इस तबाही की सबसे दृश्यमान अभिव्यक्ति वह कचरा है जो पूरे शहर में बिखरा है और इसकी नालियों के साथ प्राकृतिक धाराओं को भी जाम करता है। दार्जिलिंग का नाम तिब्बती शब्द ‘दोर्जी’, जिसका अर्थ होता है वज्रपात या इंद्र का राज-दंड, और ‘लिंग’, जिसका अर्थ है भूमि, से मिलकर बना है। यह शहर रोजाना औसतन लगभग 35 टन कचरा पैदा करता है। चरम पर्यटन समय के दौरान यह संख्या 50 टन तक पहुँच जाती है। इसमें अधिकांश कचरा घरों, होटलों और रेस्तरां से निकला कार्बनिक या अकार्बनिक अपशिष्ट होता है। और तो और, सरकारी और निजी अस्पताल भी अपना खतरनाक बायो-मेडिकल अपशिष्ट खुले में फेंकते हैं।

स्रोत पर अपशिष्ट का कोई भी पृथक्करण नहीं है। इस क्षेत्र में कार्यरत गैर सरकारी संगठनों द्वारा किये गए कई अध्ययनों के अनुसार, सारे कचरे को खुले टैंकों (वैट्स) में डाला जाता है और इन टैंकों की अनुपस्थिति में सड़क किनारे, नालों में, खाइयों और धाराओं में फेंक दिया जाता है। यहाँ तक कि टैंक में डाले गए ठोस कचरे को नगरपालिका कर्मचारियों द्वारा नियमित रूप नहीं हटाया जाता है। कई सर्वेक्षणों के अनुसार, नगरनिकाय के कर्मचारियों द्वारा इस कचरे के लगभग 50 प्रतिशत भाग को ही वास्तव में उठाया जाता है लेकिन वह भी बहुत अनियमित ढंग से। दार्जिलिंग नगरपालिका, देश की सबसे पुराने नगर निकायों में से एक, (जिसकी सन् 1850 में स्थापना की गई थी, यह मुंबई महापालिका से भी पहले की है) के पास दरवाजे-दरवाजे जाकर कूड़ा एकत्र करने की बहुत कम क्रियाशील अपशिष्ट संग्रहण प्रणाली है, जो शहर के 32 वार्डों में से केवल 15 को ही कवर कर पाती है। एक पर्यावरणीय गैर-सरकारी संगठन ‘सेव दार्जिलिंग‘ से जुड़ी सक्रिय कार्यकर्ता सोनम गुरुंग कहती हैं कि “नगर निकाय के कार्मचारी बेहद सुस्त हैं और नगर निकाय के अधिकारियों द्वारा कोई देखभाल नहीं की जाती है, वे अपने कर्तव्यों से भागते हैं। नतीजा यह होता है कि कचरे को बहुत ही मुश्किल से दरवाजे के सामने से एक-एक दिन छोड़कर उठाया जाता है कभी-कभी तो यह तीन से चार दिनों में एक बार उठाया जाता है। बारिश या भीषणसर्दियों के दौरान तो वे एक-एक हफ्ते तक कचरा साफ नहीं करते हैं। इस तरह से हम लोग टैंकों में ही कचरा डालने के लिए मजबूर हैं।”

कचरे के ढेर पर सड़ने वाले पदार्थों से न केवल भीषण बदबू आती है बल्कि यह गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं भी पैदा करती है। गुरुंग कहती हैं कि “कचरे के ये ढेर बीमारियों और मच्छरों के लिए पैदावार के मैदान हैं। कुछ साल पहले दार्जिलिंग में एक भी मच्छर नहीं था, लेकिन अब कीड़े-मकोड़े (मच्छरों और मक्खियों सहित) एक खतरा बने हुए हैं और दार्जिलिंग में मलेरिया के मामले भी हमारे पास आए हैं।” सबसे ज्यादा खतरा कूड़ा बीनने वालों को है –  शहर में उनकी तादाद करीब 200 है जिसमें ज्यादातर कम उम्र के बच्चे हैं जिनकी उम्र 1-0 है – जो सड़कों के किनारे और कचरे के ढेर में से ठोस कचरा बीनते हैं। कुछ सालों पहले किए गए एक अध्ययन के अनुसार, कूड़ा बीनने वालों को त्वचा रोगों, जठरांत्रिय रोगों, क्षय रोग, अल्सर और आँख संबंधी बीमारियों से पीड़ित पाया गया था।

हिल स्टेशन पर कई घरों, होटलों और अन्य वाणिज्यिक संस्थानों में सीवेज एकत्र करने के लिए सेप्टिक टैंक नहीं हैं, यह सीवेज शहर की नालियों में बहा दिया जाता है और आखिरकार यह नीचे नदियों और धाराओं में जाता है। शहर में एक निजी अस्पताल से जुड़े चिकित्सक गेहेन्द्र प्रधान कहते हैं कि “यह एक गंभीर समस्या है जो एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या पैदा करती है, विशेषरूप से खुली नालियों के पास झोपड़ियों में रहने वाले गरीब परिवारों के लिए। इस आबादी के बीच दस्त, अतिसार और दूसरी बीमारियों के मामले लगातार सामने आए हैं।” सीवेज भूजल को दूषित करता है और आखिरकार यह धाराओं और नदियों को प्रदूषित करता है, जिससे इन जल स्रोतों पर निर्भर कई गाँवों के लिए गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न होती हैं। चिकित्सक प्रधान कहते हैं कि “यही वजह है कि पहाड़ियों में जठरांत्रिय बीमारियाँ इतनी आम हैं। ज्यादातर जल स्रोत अपशिष्ट और सीवेज से दूषित होते हैं। दस्त और अतिसार बहुत आम हैं, खासकर इन नदियों और धाराओं पर निर्भर गाँवों में। एक अनुमान लगाया गया है कि (दार्जिलिंग) पहाड़ियों की करीब 70 प्रतिशत आबादी जठरांत्रिय बीमारियों के गंभीर हमलों से साल में कम से कम तीन बार पीड़ित होती है।”

दार्जिलिंग नगर पालिका द्वारा इकट्ठा किए गए ठोस अपशिष्ट को खुले ट्रक और मिनीवैन में ले जाया जाता है और दार्जिलिंग के पास स्थित एक पहाड़ी पर पलट दिया जाता है। पर्यावरणविद् सुभाष चेत्री ने बताया, “अपशिष्ट, जिसमें खतरनाक बायोमेडिकल अपशिष्ट भी शामिल होते हैं, के इस खुले और अवैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन के कारण पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुँचा है। अपशिष्ट को न तो प्रथक किया जाता है और न ही संसाधित। पहाड़ी पर दार्जिलिंग का अपशिष्ट फेंके जाने से गंभीर प्रदूषण उत्पन्न हुआ है, और अध्ययनों से पता चला है कि अपशिष्ट स्थल से बाहर निकलने वाले विषाक्त पदार्थों द्वारा भूजल और आसपास के जल स्रोत प्रदूषित हो गए हैं। इससे होकर बहने वाला पानी अत्यधिक जहरीला और हानिकारक है और जिसने जल स्रोतों को प्रदूषित कर दिया है। इस स्थान पर अपशिष्ट, साथ ही दार्जिलिंग के विभिन्न हिस्सों में फैला हुआ कचरा जो कई दिनों तक इकट्ठा नहीं किया जाता है, विभिन्न जैविक प्रक्रियाओं से गुजरता है, जिससे कार्बन-डाई-ऑक्साइड और मीथेन जैसी हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों का उत्पादन होता है जो इस क्षेत्र के मनोहर पर्यावरण को भयंकर नुकसान पहुँचा रही हैं।” अपशिष्ट स्थल झोपड़पट्टियों के करीब है जहाँ गरीब आबादी निवास करती है जो अपशिष्ट के खुले और अवैज्ञानिक तरीकों से किए जाने वाले प्रबंधन के कारण पीड़ित है।

दार्जिलिंग नगर पालिका न केवल शहर से एकत्रित अपशिष्ट को अपने बाहरी इलाके में अपशिष्ट स्थल पर फेंकती है बल्कि खुलेआम इसे जलाती भी है। विषाक्त धुआं और कैंसर पैदा करने वाली गैसें भी लोगों में गंभीर स्वास्थ्य खतरा पैदा करती हैं। 2010 में किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि अपशिष्ट स्थल के 2 किमी के दायरे में रहने वाले 46 प्रतिशत लोग श्वसन रोग से पीड़ित हैं। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि दार्जिलिंग के निवासियों के बीच कैंसर की घटनाओं में वृद्धि हुई है और चिकित्सकों का मानना है कि इस हिल स्टेशन का अत्यधिक प्रदूषित वातावरण इसका एक अत्यधिक संभावित कारण है।

पर्यावरणविद् सुनीता लामा ने कहा, “यह (कचरा फेंकना और लापरवाहीपूर्वक इसे जलाना) पूरी तरह से अस्वीकार्य है और यह तथ्य, कि यह सब एक निर्दिष्ट जैव विविधता के स्थान पर हो रहा है, भयानक है। ऐसा लगता है कि नगर निकाय के अधिकारियों को कचरे को संसाधित करने और प्रबंधन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। पहाड़ी पर रहने वाले लोगों में जागरूकता की कमी है, और दुर्भाग्यवश, राज्य सरकार और नगर निकाय के अधिकारियों ने इस जागरूकता का प्रसार करने के लिए कुछ भी नहीं किया है। अपशिष्ट को अलग करने, प्रबंधन करने, और बचे हुए कचरे को वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित करने की आवश्यकता है ताकि पर्यावरण को कोई नुकसान न हो, और यह तुरंत किया जाना आवश्यक है। दार्जिलिंग में, नगर निकाय के अधिकारियों को पहले इस पर जागरूक होना होगा क्योंकि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनकी जागरूकता की कमी दार्जिलिंग के पर्यावरण और वहाँ के लोगों को गंभीर और अपरिवर्तनीय नुकसान पहुंचा रही है।”

उपचार –

  • प्लास्टिक और नॉन-बायोडिग्रेडेबल (प्राकृतिक तरीके से न सड़ने वाली) सामग्री का उपयोग कम किया जाए।
  • रिसाइकिल और पुनः उपयोग।
  • स्रोत पर अपशिष्ट पदार्थों का अनिवार्य रूप से पृथक्करण किया जाए।
  • कचरे के संग्रहण और रिसाइकिलिंग में निजी क्षेत्र को शामिल किया जाए, जनता को कचरे से खाद बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
  • अपशिष्ट पदार्थों की रिसाइकिलिंग करने वाली संस्थाओं और घरों को प्रोत्साहित किया जाए।
  • सेप्टिक टैंकों का निर्माण अनिवार्य किया जाए और नालियों में सीवेज के बहाव को प्रतिबंधित किया जाए।
  • शहर की जल निकाली व्यवस्था में सुधार और इसका विस्तार किया जाए।
  • सड़क के किनारे कचरा डालने वालों को दंडित किया जाए।
  • हर घर के दरवाजे पर जाकर कचरा संग्रहण का पूरे शहर में पालन किया जाए।
  • अपशिष्ट संग्रह की कार्यक्षमता मे सुधार किया जाए।
  • इकट्ठा किये गए अपशिष्ट का खुले मे फेंकना बंद किया जाए।