विचार
चौरी चौरा- तथ्य से आगे स्वतंत्रता संग्राम के इस अनभिज्ञ सत्य की ओर
सरदार बनाम नेताजी

आशुचित्र- इतिहास ने उन क्रांतिकारियों को अनपढ़े पृष्ठों में दफ़ना दिया है किंतु जिस चौरी चौरा ने एक महात्मा और अनगिनत राजनैतिक अभिलाषाओं को जीवन दिया, हमें उसके शहीदों को भी जानना चाहिए।

“सत्य तथ्य से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है”- यह कथन है प्रसिद्ध अमरीकी वास्तुविद एवं लेखक फ्रैंक लॉयड राइट का।

तथ्य और सत्य के मध्य अंतर संदर्भ का होता है।  संदर्भहीन विवरण तथ्य हो सकता है, सत्य नहीं। जब हम भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास पढ़ते हैं, विशेष कर जो स्वतंत्रता के पश्चात आज़ादी के बाद बने नायकों के महिमामंडन के उद्देश्य से लिखा गया और जो उन घटनाओ के समसामयिक लेखन में दिखता है, हम सत्य और तथ्य के मध्य की यह दूरी तुरंत ही देख पाते हैं।

चौरी चौरा का इतिहास भी कुछ ऐसा ही है। हमें यह अवश्य पता चलता है की चौरी चौरा हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई जिसने कांग्रेस को तमाम संघर्ष के नियंत्रक की भूमिका में स्थापित किया और अन्य विचारधाराओं के क्रांतिकारियों को हाशिये पर धकेल दिया। चौरी चौरा में शामिल भारतीय उसी मानदंड से नापे गए जिस मानदण्ड पर छद्म – असहिष्णुता का दुष्प्रचार होता है। गांधी जी के देवदूतीकरण के लिए चौरी चौरा के सेनानियों का दानवीकरण आवश्यक था।  यह न सिर्फ गांधी का राजनैतिक आकार बढ़ाने के लिए आवश्यक था, वरन यह एक व्यक्तिवादी ज़िद में राष्ट्रवादी आंदोलन को निछावर कर देने के निर्णय का औचित्य स्थापित करने के लिए भी आवश्यक था।

चौरी चौरा के बारे में आप किसी भी आम आदमी से पुछा जाए तो वह भारतीयों की अनुशासनहीनता और क्रूरता के विषय में ही कहेगा जिसके परिणाम में 22 ब्रिटिश पुलिस कर्मियों को जीवित जला दिया गया। इस दुर्घटना के आधार पर गांधी जी ने व्यक्तिगत निर्णय के आधार पर असहयोग आंदोलन को वापस ले लिया।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में चौरी चौरा के महत्त्व को समझने के लिए इसके परिपेक्ष्य और पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। चौरी चौरा की घटना और उसके आस पास का परिदृश्य आने वाले समय की दिशा बताता है।  यह समय हमें यह भी समझाता है कि भारतीय राजनीति किस प्रकार कांग्रेसी सम्प्रभुता की ओर बढ़ती चली गयी और क्रान्तिकारी हाशिये पर खिसकते चले गए।

लार्ड डफरिन के निर्देश के अनुसार मूक राष्ट्र को विद्रोह की आशंका से बचाने के लिए एक स्वर 28 दिसंबर 1885 को कांग्रेस की स्थापना के रूप में अंग्रेज़ों के द्वारा दिया गया।  तब से 1920 के आस पास तक कांग्रेस ब्रिटिश व्यवस्था के भीतर संतोषपूर्वक ब्रिटिश सत्ता के प्रति निष्ठावान भारतीय स्वर बन कर रही। 1857 में निर्ममता से दबाया गया स्वराज्य का उद्घोष वीर क्रांतिकारियों द्वारा आगे बढ़ाया गया।

रॉलेट एक्ट जिस के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना सुनवाई के गिरफ्तार कर के जेल में डालने का अधिकार सरकार को था, फ़रवरी 1919 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में सर सिडनी रौलेट के द्वारा लाया गया और मार्च १९१९ में पास हुआ। 6 अप्रैल को भारतीय नेताओं ने हड़ताल का आह्वान किया। 10 अप्रैल 1919 को वरिष्ठ कांग्रेस नेता डॉ सत्यपाल और डॉ सैफुद्दीन किचलू पंजाब में गिरफ्तार किये गए।  इसके विरोध में निकाले गए जुलूस पर पुलिस फायरिंग हुई जिसमे लगभग 30 भारतीय मारे गए और प्रतिक्रया में हुई हिंसा में पाँच अँग्रेज़ मारे गए।  गवर्नर सर माइकल ड्वायर द्वारा प्रदर्शनकारियों पर हवाई जहाज से बमबारी की गयी और ११ अप्रैल 1919 को ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर के नेतृत्व में 1100 सैनिकों की टुकड़ी अमृतसर पहुंची।  बैसाखी के त्यौहार के लिए जलियांवाला बाग में जमा हुए भारतीयों पर जनरल डायर ने निर्ममता से गोलियां चलवायीं जिसमे ३७९ भारतीय मारे गए और 1200 घायल हुए।  इस के बाद पंजाब में सैनिक शासन घोषित किया गया और 570 भारतीयों पर भिन्न धाराओं के अंतर्गत मुक़दमे चलाये गए। 108 नागरिकों को मृत्यु दंड दिया गया जिसमें से 19 को फाँसी हुई (द हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया, जॉन रिद्दीक)।

इसकी प्रतिक्रिया में संपूर्ण भारत में भीषण रोष फैला और गांधी जी ने सितम्बर 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग आंदोलन “एक वर्ष में स्वराज” के दावे के साथ आरम्भ किया। गांधी ने खिलाफत के माध्यम से मुसलामानों को असहयोग से जोड़ा। क्रांतिकारी आंदोलनकारी जैसे अशफ़ाक़ स्वतंत्रता संग्राम के पैन-इस्लाम से जोड़े जाने के पक्षधर नहीं थे। कांग्रेस के अंदर भी लाला लाजपत राय और चित्तरंजन दस जी ने स्वतंत्रता आंदोलन को खिलाफत से जोड़े जाने का विरोध किया।

मन्मनाथ गुप्त की पुस्तक के अनुसार सितम्बर 1921 में क्रांतिकारी नेताओं और गांधी जी के मध्य वार्ता का आयोजन किया गया जहाँ क्रांतिकारियों ने अपना कार्यक्रम पीछे रख कर कांग्रेस के असहयोग का समर्थन देने का वचन दिया। जहाँ क्रांतिकारी और कांग्रेस के भीतर देशबंधु चित्तरंजन दास , मोतीलाल नेहरू और हक़ीम अक़मल ख़ान पूर्ण स्वराज की मांग कर रहे थे, गांधी तब तक ब्रिटिश व्यवस्था के भीतर ही स्वशासन की मांग कर रहे थे। हसरत मोहानी के द्वारा लाये पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव का गांधी ने पुरज़ोर विरोध किया। फिर भी संघर्ष में एका रखने के विचार से सभी ने गांधी के नेतृत्व को सर्वमान्य घोषित किया और असहयोग से जुड़े।

17 नवंबर 1921 को बॉम्बे में हिंसा हुई जिसमे ५३ लोग मारे गए।  इसी सबके बीच गोरखपुर के पास छोटे से ग्राम-द्वय चौरी- चौरा के पास असहयोग आंदोलन पहुंच गया। जनवरी 1921 में चौरी चौरा से एक मील दूर छोटकी डुमरी में स्वयंसेवक मंडल का गठन हुआ।  इसके लिए गोरखपुर जिला कांग्रेस कमिटी और खिलाफत नेताओं को चौरी के लाल मुहम्मद सेन के अनुरोध पर बुलाया गया।  गोरखपुर से आए हक़ीम आरिफ़ ने जनता को सम्बोधित कर के असहयोग के लिए प्रेरित किया।  मॉस, मछली, मदिरा और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का प्रण लिया गया। चौरी चौरा काण्ड के कुछ ही दिन पहले इन वस्तुओं के विरोध में दुकानों को बंद करने के लिए मुंडेरा बाजार में भीड़ एकत्रित हुई जहाँ मेसोपोटामिया अभियान में अंग्रेज़ों के साथ लड़े और तब सेवा-निवृत विकलांग पूर्व-सैनिक भगवान अहीर को बुरी तरह पुलिस ने पीटा। (इवेंट, मेटाफर, मेमोरी – शहीद अमीन)

इसके विरोध में 4 फ़रवरी को सभा बुलाई गयी जिसे स्थानीय नेता नज़र अली ने संबोधित किया। पुलिस के साथ झड़प हुई और फायरिंग हुई। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार इस गोलीबारी में तीन प्रदर्शनकारियों की मृत्यु हुई- नज़र अली, खेलावन भर  और भगवान तेली।  मन्मनाथ गुप्त के अनुसार काला पानी में मिले 74 वर्षीय चौरी चौरा के द्वारका प्रसाद के अनुसार कम से कम 26 लोगों की पुलिस गोलीबारी में मृत्यु हुई। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार पुलिस ने तब तक गोलियाँ चलाई जब तक गोलियाँ समाप्त नहीं हो गयीं। इसके बाद भीड़ थाने पहुँची और थाने को पुलिस अधिकारियों समेत जला दिया गया।

गांधी जी ने 12 फरवरी को चौरी चौरा के कारण असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इस एक-पक्षीय निर्णय के लिए गांधी जी के तमाम कांग्रेसी खेमों से निंदा हुई।

मोतीलाल नेहरू ने पत्र में लिखा- “हिमालय की तराई में बसे एक गांव को क्यों केप कैमेरॉन में हुई घटना के लिए उत्तरदायी माना जाए और दंडित किया जाए ?”

मूल तात्पर्य एक व्यक्तिवादी निर्णय को राष्ट्रीय आंदोलन पर थोपने का विरोध था और छुट पुट घटनाओं के आधार पर स्वातंत्रय के अवसर को गँवा देने पर निराशा और विरोध था। इसपर भी प्रश्न उठाया गया कि क्या गांधी जी आंदोलन की सफलता और अपने एक वर्ष में स्वराज्य के वचन की विफलता को लेकर चिंतित थे? प्रश्न यह भी उठता है की यदि हिंसा आंदोलन वापस लेने का कारण था तो मुंबई में 53 लोगों की मृत्यु पर आंदोलन वापस क्यों नहीं लिया गया। जो भी कारण हो, इस आंदोलन ने एक जुड़े हुए संघर्ष को टुकड़ों में बाँट दिया और हताश क्रन्तिकारी पुनः अपने मार्ग परअलग चलने को मज़बूर हो गया। आंदोलन के परिणामस्वरूप 226 गिरफ्तारियाँ हुई। 23 अक्टूबर 1923 को सज़ा घोषित हुई, जिसमे 172 लोगों को फाँसी की सज़ा सुनाई गयी। महामना मालवीय जी के हस्तक्षेप के पश्चात 19 लोगों को मृत्युदंड मिला, 14 को काला पानी भेजा गया।

इतिहास ने उन क्रांतिकारियों को अनपढ़े पृष्ठों में दफ़ना दिया है किंतु जिस चौरी चौरा ने एक महात्मा और अनगिनत राजनैतिक अभिलाषाओं को जीवन दिया, हमें उसके शहीदों को भी जानना चाहिए। आवश्यक है कि अब्दुल,नज़र अली, भगवान अहीर, विक्रम अहीर, दुधई, काली चरण, लाल मुहम्मद, लाल बिहारी, श्याम सुंदर, सीताराम, सपत, सहदेव जैसे भोले भाले ग्रामीणों को श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाए जो भीड़ के नाम से भुला दिए गए हैं और अपने जीवन के मूल्य पर भारत को एक महात्मा के हाथों में सौंप गए।

साकेत सूर्येश स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे  @saket71 द्वारा ट्वीट करते हैं।