विचार
एक राष्ट्रीय पुलिस स्मारक का क्या महत्त्व है हमारे लिए?

प्रसंग
  • राष्ट्रीय पुलिस स्मारक के समर्पण को केवल दिखावा कहने वाले लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इस दिन को देखने में तीन दशकों से ज़्यादा समय लग गया है।
  • यह केन्द्र और राज्य दोनों स्तर पर सरकार के लिए उन अहम कामों के एक अनुस्मरणीय स्मरणपत्र के रूप में काम कर सकता है जो अभी किए जाने बाकी हैं।  

इस साल 21 अक्टूबर को पुलिस स्मृति दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय पुलिस स्मारक का उद्घाटन किया और इसे देश को समर्पित कर दिया।

यह स्मारक दिल्ली के चाणक्यपुरी में उच्च प्रोफाइल वाले राजनीतिक क्षेत्र में 6.3 एकड़ भूमि पर स्थित एक केन्द्रीय ढाँचा है। इसमें 1600 वर्ग मीटर पर परेड का मैदान है और प्राचीन कलाकृतियों, हथियारों, वर्दियों और पुलिस से संबंधित अन्य वस्तुओं का प्रदर्शन करता हुआ एक संग्रहालय है। ग्रेनाइट के एक टुकड़े से बनी केंद्रीय प्रस्तर प्रतिमा है जो 30 फीट ऊंचा पत्थर का खंभा है, जिसका वजन 238 टन है। इसका वजन और रंग सर्वोच्च बलिदान की गंभीरता का प्रतीक है। इसका नाम शूरता की दीवार रखा गया है जिसपर सन् 1947 (देश की आजादी) से लेकर अब देश पर प्राण न्यौछावर करने वाले सभी 34,844 पुलिस जवानों के नाम उकेरे गए हैं। इसके साथ में नीचे की तरफ 60 फीट लंबी एक दीवार है जो उनके निरंतर सद्भावना पूर्ण प्रयासों को दर्शाती है।

वे लोग जो इस समारोह और स्मारक को केवल दिखावा कहते हैं और यह शोरगुल करते हैं कि “जहाँ सबी चीजों की ज़रूरत है वहां सरकार ने यह किया है !”,  को यह याद रखना चाहिए कि जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे तब से लेकर अब इस स्मारक ने 30 सालों के बाद दिन का उजाला देखा है। इस तरह के एक स्मारक को – हमारे पुलिस कर्मियों की सेवा और बलिदान को स्वीकार करने के लिए – बनाने के लिए पहली बार सन् 1980 में विचार किया गया था लेकिन इसके निर्माण में बहुत से लोगों ने अड़ंगा लगा दिया था। सबसे पहले कुछ आपत्तियों के साथ में इसको इसके मूल स्थान से यहाँ पर लाया गया था। जब सन् 2000 की शुरूआत में ही इस स्थान पर एक भवन का निर्माण किया गया था तभी इसको ध्वस्त किए जाने की नौबत आ गई थी, क्योंकि शांत पथ से राष्ट्रपति भवन के नजारों के बीच में बाधा बनने की वजह से इसपर कानूनी बखेड़ा खड़ा हो गया था।

चूँकि अब स्मारक एक असलियत बन चुका है, इसलिए मोदी सरकार इसके लिए बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं है कि दशकों से इसका काम प्रगति पर था। फिर भी हम यह मानते हैं, जैसा कि प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर अपने भाषण में कहा था, “शायद भगवान ने सभी महान काम करने के लिए मुझे ही चुना है, और शायद यही वजह है कि यह हमारी सरकार के शासनकाल के दौरान हुआ है।” उन्होंने अपनी सरकार द्वारा विकसित समयबद्ध कार्य प्रक्रियाओं को इसका श्रेय दिया।

इस बयान के बाद, प्रधानमंत्री को यह महसूस करना चाहिए कि नियम तो यह बनता है कि पुलिस के बाकी बचे हुए महान कामों पर भी ध्यान देना चाहिए और उतनी ही तेजी से। स्मारक को उनकी सरकार के लिए उन कामों के लिए अनुस्मारक के रूप में कार्य करना चाहिए, जो बाकी रह गए हैं।

इस अवसर पर उनके भाषण की संवेदनशीलता को देखते हुए अब लोग उम्मीदें तो काफी बड़ी लगाए बैठे हैं। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि उन्होंने पुलिस को शांत श्रमिक कहकर एकदम सही बात की, क्योंकि पुलिस वालों का कोई हाल-चाल नहीं लिया जाता और उनको उपेक्षित समझा जाता है। “लोग पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों के उन कार्यों की हदों के बारे में नहीं जानते हैं जिनके लिए ये हरदम तैयार रहते हैं – उनके लिए दिन, मौसम, समय कोई मायने नहीं रखता यहाँ तक कि वे त्यौहारों के दौरान भी काम किया करते हैं।” मोटे तौर पर देखा जाए तो उन्होंने कहा था कि “यह बहुत ज्यादा सतर्कता ही इसकी वजह है कि नागरिकों का हर पल शांति से रहना संभव हो पाता है और शांति तथा सुरक्षा को नुकसान पहुँचाने वाली असंख्य कोशिशों को नाकाम कर दिया जाता है – भले ही इनमें से अधिकतर कोशिशें गुप्त रह गई हों और चर्चा में न आई हों, फिर भी अकेले प्रशंसा प्राप्त करने दीजिए !”

उऩका गला भर आया जब उन्होंने जनता से कहा कि जब हम किसी आपदाग्रस्त स्थानों जैसे नाव डूबने पर, रेल दुर्घटनाएं हो जाने पर, इमारतों के ढह जाने पर खाकी वर्दी पहने हुए एनडीआरएफ/एसडीआरएफ जवानों को लोगों की जानें बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगाते हुए देखते हैं। “वो मेरे पुलिस के जवान ही हैं।” उन्होंने कहा – और कई आँखे आसुओं से भरी हुई थीं, गले रूंधे हुए थे, खासकर उनके जो पुलिस वालों की जिंदगी से रूबरू हैं।

निश्चित रूप से, इस स्मारक और भाषण को सार्वजनिक चेतना, अहम भूमिका और पुलिस के योगदान को सामने में मददगार होनी चाहिए। जम्मू-कश्मीर में, नक्सल पीड़ित क्षेत्रों में लड़ाई में, नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में युवाओं को मुख्यधारा में लाने में, पूर्वोत्तर में विकास कार्य की पृष्ठभूमि के रूप में – कुछ ऐसे उदाहरण हैं जिनका प्रधानमंत्री ने जिक्र किया था। यह पुलिस के लिए एक अच्छी भावनाओं को जागृत करेगा – “वीरता को सलाम करते हुए, सीने में गर्व महसूस होता है और साथ ही शोक और सहानुभूति भी ।” केवल तभी जनता पुलिस को अपना सहयोग प्रदान करने में सक्षम होगी, जो अपराध और आतंकवाद दोनों को रोकने के लिए पुलिस के सबसे अच्छे कार्य के लिए बहुत ही ज्यादा अहम है।

मौजूदा समय में, जिस तरह से पुलिस संगठन विलाप करते हैं, पुलिस को उससे बहुत विपरीत भावना हासिल होती है, जो उनकी काफी हद तक नकारात्मक और असभ्य छवि का कारण बनती है।

21 अक्टूबर 2018 को पुलिस स्मृति दिवस पर ग्रेटर मुंबई पुलिस द्वारा जो प्रस्तुतिकरण दिया गया था, उसमें कहा गया था किः जनता द्वारा पुलिसकर्मियों की निंदा की जाती है, प्रचारकों द्वारा आलोचना की जाती है, फिल्मों में उनके साथ छेड़छाड़ की जाती है, अखबारों में उनको गाली दी जाती है…जब वे कानूनों को लागू करते हैं तो उन्हें दण्डित किया जाता है और जब वह ऐसा नहीं करते तो उन्हें निकाल दिया जाता है।”

इसी प्रस्तुतीकरण के संबंध में पुलिस से संबंधित कुछ तथ्य दिए गए थेः कि, आजादी के बाद, देश की अखंडता की रक्षा करने और राष्ट्र को सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश में अब तक 24,832 पुलिस कर्मी शहीद हुए हैं। छोटे फॉन्ट में हमें दिए गए एक बयान में सूचित किया गया था कि इसी अवधि में “23,000 भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था।” इसके अलावा, सितंबर 2017 से अगस्त 2018 तक, 414 पुलिस वालों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था, साल 2017 में, 106 भारतीय सैनिकों ने अपनी जान गंवाई थी। ये आँकड़े वे जानकारी हासिल करने में काफी मददगार साबित होंगे कि पुलिस ने किन हदों तक जाकर अपना बलिदान दिया है।

हॉट स्प्रिंग घटना

प्रधानमंत्री के भाषण में “हॉट स्प्रिंग” घटना का जिक्र किया गया था, जिसके बाद 21 अक्टूबर को पुलिस स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाना शुरू कर दिया गया था। करीब 60 साल पहले घटित इस घटना का ग्रेटर मुंबई के पुलिस प्रस्तुतिकरण में जिक्र किया गया था, जिसके कुछ अंश यहाँ पर दिए गए हैं –

20 अक्टूबर 1959 को, भारतीय खोजी मुहिम को आगे बढ़ाने की तैयारी में, लद्दाख के उत्तर पूर्व के हॉट स्प्रिंग में सेना की तीन टुकड़ियों को तैनात किया गया था…उसी दिन दोपहर तक दो टुकड़ियों के सदस्य तो हॉट स्प्रिंग वापस लौट आए लेकिन दो पुलिस कांस्टेबलों और एक पोर्टर वाली एक टुकड़ी वापस नहीं लौटी। सभी उपलब्ध सुरक्षा कर्मी अगली सुबह जल्द ही अपने लापता साथियों की तलाश करने के लिए निकले। इस दल की अगुवाई डीसीआईओ श्री करम सिंह कर रहे थे। (डीसीआईओ – डिप्टी सेन्ट्रल इंटेलीजेंस ऑफिसर, यह राज्य पुलिस के पुलिस अधीक्षक के समकक्ष होता है।)

करीब दोपहर के वक्त, करम सिंह की अगुवाई वाली टुकड़ी पर चीनी सैनिकों ने गोलीबारी कर दी और ग्रेनेट से हमला कर दिया। चूँकि कोई भी कवर नहीं था इसीलिए ज्यादातर घायल हो गए थेः दस बहादुर सैनिक शहीद हो गए और सात अन्य घायल हो गए। सात घायल सैनिकों को चीनी सैनिकों ने कैद कर लिया। इस घटना के तीन सप्ताह बाद, 13 नवंबर 1959 को चीन ने दसों भारतीय सैनिकों के शव भारत को वापस सौंप दिए थे। इन सैनिकों का अंतिम संस्कार पूरे सैन्य सम्मान के साथ हॉट स्प्रिंग में ही किया गया था।

 जनवरी 1960 में राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिरीक्षक के वार्षिक सम्मेलन में फैसला लिया गया कि 21 अक्टूबर को अब पुलिस स्मारक दिवस / शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाएगा। यह भी फैसला लिया गया कि हॉट स्प्रिंग्स में एक स्मारक बनाया जाएगा और हर साल, देश के विभिन्न हिस्सों से पुलिस बलों के सदस्य उन बहादुर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए हॉट स्प्रिंग्स की यात्रा करेंगे।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने हमें बताया कि, “यह विडंबनापूर्ण प्रतीत होता है कि 21 अक्टूबर को पुलिस स्मृति दिवस में एक यादगार घटना घटित हुई जब आंतरिक सुरक्षा के लिए अनिवार्य रूप से जिम्मेदार बलों ने देश की सीमा पर, बाहरी दुश्मन से लड़ते हुए महान बलिदान दिया।” यह उनका कर्तव्य था, और यह सिर्फ एक उदाहरण है कि पुलिस अपने देश की सुरक्षा के लिए क्या कर सकती है।

एक आदर्श मिसाल

जनता को अपने पुलिस बल के बलिदानों के प्रति श्रद्धा रखनी और जो बदलावों के वे लायक हैं, भी होते देखने चाहिए। और यह वही है जिसका उल्लेख माननीय प्रधानमंत्री ने “लोगों के प्रति सहानुभूति का विकास”- सेवा प्रदाता के साथ एक संवेदनशीलता- के रूप में किया। यह विचारात्मक परिवर्तन पुलिस कर्मियों के बीच आत्मनिरीक्षण का एक बिंदु होना चाहिए, और यह श्रेणीबद्ध होना चाहिए।

जब पुलिस स्मृति दिवस के विचार की पहली बार कल्पना की गई थी तो उस अवसर पर  पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) एमके नारायणन, जो खुफिया विभाग (आईबी) के निदेशक थे, के साथ आईबी के वर्तमान और कई पूर्व निदेशक, अजीत डोवाल और पुलिस संगठनों के प्रमुख और अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारी मौजूद थे। अपने सहभागियों के इस स्मारक को देखकर उन सभी के चेहरों पर संतुष्टि तथा गर्व की गहरी भावना झलक रही थी। यह एक वास्तविक स्मारक है जिसे अब सभी देख सकते हैं। शायद, उनकी दीर्घकालिक इच्छा की यह अनुभूति कार्य में व्यापकता, कर्तव्य की उच्च भावना और प्रतिष्ठा बनाए रखने को लेकर पुलिस कैडर में विचारात्मक सुधार के लिए उन्हें अब और भी ठोस कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगा।

यह विचार प्रयासों के अच्छे परिणामों के साथ वरिष्ठ पुलिस अफसरों के दिमाग में घर कर गए हैंI इस तरह के कुछ विचार आंध्र कैडर के भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी के. आर नंदन द्वारा “भर्ती प्रक्रिया और प्रशिक्षण” 2008 में पीपुल-फ्रेंडली पुलिसिंग शीर्षक के साथ एक अखबार में दिए गए थे। पुलिस अनुसंधान विभाग एवं विकास के आंकड़ों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 22.1 9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्होंने पुलिस का समर्थन नहीं किया, 36.08 प्रतिशत लोगों ने पुलिस को नकार दिया और 13.27 प्रतिशत लोगों ने पुलिस से नफरत की – यह तर्क दिया गया था कि पुलिस नेताओं को सही सेवा मूल्यों के आधार पर व्यवस्था और प्रक्रियाओं को विकसित करना होगा।

अखबार ने पुलिस प्रशिक्षण में कुछ समस्याओं को उजागर किया:

अ) प्रशिक्षण में स्पष्ट उद्देश्यों की कमी, कोई कार्य विश्लेषण नहीं, और कार्यप्रणाली अधिकारियों/भर्तियों के स्तर को गंभीरता से नहीं लेती।

ब) पुलिस प्रशिक्षण वर्तमान में व्यवसायिक शिक्षा का बोझ लाद रहा है, और इस तरह इस क्षेत्र में कानूनी शिक्षा, आपराधिका और वे शैक्षिक विषय जो वास्तव में हटा दिए गए थे, की जरूरत है।

एक पुलिसकर्मी को क्या करना चाहिए इसकी अपेक्षा को ध्यान में रखने के लिए नंदन ने एक प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार करने का सुझाव दिया; और एक शैक्षणिक स्तर- जिसमें पुलिस विज्ञान, न्यायिक चिकित्सा, अपराध विज्ञान और आपराधिक कानून की मूल बातें, आदि शामिल हैं- तैयार करना चाहिए जिसमें सैनिक स्कूलों की तरह बारहवीं स्तर या स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था या पुलिस स्कूल में प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। तब ये कार्यक्रम करियर के रूप में पुलिसिंग चुनने वालों के लिए प्रोत्साहक कार्यक्रम के रूप में कार्य कर सकते हैं- यह व्यवसायिक  योग्यता भर्ती पूरक प्रशिक्षण में मदद करेगी। उन्होंने आंध्र प्रदेश की पुलिस (तत्कालीन अविभाजित) के उदाहरण के साथ, जहां एक आदर्श बदलाव का प्रयास किया गया था, अपनी वाणी को विराम दिया। आत्म-सम्मान, व्यक्तित्व विकास में सुधार और पुलिस कर्मियों को “सौहार्दपूर्ण जीवन की स्थिति” देने के माध्यम से सेवा-मनोवृत्ति और उद्देश्यों में सुधार किया गया था; उन्हें सामाजिक कार्यकर्ताओं के रूप में काम करने का अनुभव दिया गया था।

प्रभावशाली और प्रमुख पुलिस संग्रहालय को इस आत्मनिरीक्षण के सञ्चालन के लिए योजना बनाने वालों को याद दिलाना चाहिए और अगर पुलिस-पब्लिक पार्टनरशिप को सही तरीके से काम करना है तो सही-गलत को निर्धारित करना चाहिए I

आखिरी लेकिन महत्वपूर्ण, यह विशाल संरचना केन्द्र और राज्य दोनों स्तर पर पुलिस सुधारों के माध्यम से सरकार के लिए उन अहम कामों के एक अनुस्मरणीय स्मरणपत्र के रूप में काम कर सकती है जो अभी किए जाने बाकी हैं. अगर पुलिसकर्मियों की जिंदगी वास्तव में कीमती है और वे सार्थक काम करने के लिए हैं, तो निश्चित रूप से उनको राजनीतिक वर्ग के बंधनों से आजाद करने की जरूरत है।

कई बार पुलिस के पास जनशक्ति और संसाधनों की कमजोरी से जुड़ी रिपोर्टें प्रस्तुत की गईं हैं जो उनके काम को प्रभावित करते हैं। यहाँ तक कि पुलिस कर्मियों के लिए शिफ्ट-ड्यूटी प्रणाली का जो सुझाव दिया गया था उसको भी सही से नहीं अपनाया गया, जिससे पुलिस कर्मियों का तनाव कम होता और उनकी कार्यक्षमता बढ़ती। यह संरचना सरकारों और हर आने-जाने वालों को इस बात की याद दिलाती रहनी चाहिए। शायद, सार्वजनिक दृष्टि में इस संरचना की उपस्थिति, हमें हर साल उनकी याद दिलाने के लिए, जो देश के लिए शहीद हो जाते हैं – जिनको अक्सर टाल दिया जाता है – के लिए यह एक संकेत है कि इस समय हम लोग इसकी मांग करें?

स्वाती कमल स्वराज्य की एक स्तम्भकार हैं।