विचार
कुंभ में मोदी द्वारा की गई सफाई कर्मचारियों की पद पूजा की वृहद पृष्ठभूमि

आशुचित्र- महाकुंभ सफाई कर्मचारियों के चरण धोकर प्रधानमंत्री मोदी ने रामकृष्ण परमहंस और संघ की विचारधारा को क्रियान्वित किया है।

सभी भारतीयों की तरह, या कहें कि आधिकांश आम भारतीयों की तरह लेखक के लिए भी भारत के प्रधानमंत्री द्वारा सफाई कर्मचारियों (तीन पुरुष व दो महिलाओं) के चरण धोना आँखें नम करने वाला क्षण था। इस घटना का साक्षी बनकर भाव विभोर न होना मुश्किल है। इसलिए आँसुओं के लिए क्षमा करें।

जब भारत के 14वें व वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने सफाई कर्मचारियों के पद उठाकर परात में रखे व अपने हाथों से उन्हें धोया तो यह उनके द्वारा भारतीय समाज को दिया गया एक मज़बूत संदेश था। और यह संदेश सरल नहीं है। यह छवि हज़ार वर्षों की औपनिवेशिक मानसिकता से उपजी पूर्वधारणाओं को ध्वस्त करने में सक्षम है।

1918 में इंदौर के राजा ने राज्य में फैल रही महामारी से लड़ने के लिए पैट्रिक गेड्स का सम्मान किया था। नगर की सफाई व्यवस्था को सुधारने के लिए गेड्स ने स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए दीपावली के पर्व को चुना। राम ने अस्वच्छ परिस्थितियों के रावण का नाश किया। इसके बाद सफाई कर्मचारियों की रथ यात्रा निकली जिसमें उन्होंने उसी प्रकारी की पगड़ी पहनी थी जैसा इंदौर के उच्च अधिकारी पहना करते थे।

इंदौर के महापौर खुश थे गेड्स को जो उन्होंने कहा वे ऐसे शब्द थे जो भारतीयों को शर्मसार कर देंगे। उन्होंने कहा कि यह एक बेमिसाल विचार है लेकिन वे एक ब्राह्मण हैं इसलिए ऐसा नहीं कर सकते हैं, परंतु गेड्स एक युरोपवासी हैं इसलिए उन्हें भारतीय रूढ़ियाँ प्रभावित नहीं करूँगी। महापौर ने गेड्स के प्रति आभार को इस प्रकार समाप्त किया, “…आपने उनसे बराबरी वालों की तरह व्यवहार किया।” ध्यान देने योग्य बात यह है कि गेड्स के मन में भारत के प्रति प्रेम स्वामी विवेकानंद और सिस्टर निवेदिता के प्रभाव से जगा था। इसलिए उनके द्वारा कहे शब्दों की वास्तविकता हमें शर्मसार करती है।

सफाई कर्मचारियों के विरुद्ध ये घृणित पूर्वधारणाएँ सिर्फ विद्यमान ही नहीं हैं, बल्कि वे प्रबलित भी हैं। तमिल फिल्म के एक प्रसिद्ध हास्य दृश्य को याद करते हैं जो कुछ वर्षों पहले चित्रपटल पर उतरा था। सुप्रसिद्ध हास्य कलाकार वादिवेलु जो दुबई से लौटे थे, नायक, जिसने दावा किया था कि वह दुबई से आया है, से उसके वहाँ के रहन-सहन से संबंधित प्रश्न करते हैं। नायक हास्य कलाकार को नीचा दिखाने के लिए कहता है कि क्या वह दुबई में शौचालय साफ करता था। चकित होकर हास्य कलाकार स्वीकारता है कि वह सच में यही कार्य करता था। ये जानने के बाद नायक उससे दूर हटने को कहता है क्योंकि उससे अभी भी दुर्गंध आ रही है।

पूरा तमिल नाडु इस दृश्य पर हँसा जिसने अस्पृश्यता को और प्रबल किया। एक भी फिल्म आलोचक ने इस हास्य को एक सफाई कर्मचारी के बच्चे के दृष्टिकोण से नहीं देखा, जिसके मान को इस पिल्म ने हानि पहुँचाई थी। यह मात्र एक उदाहरण है।

मोदी लगातार इस धारणा को मिटाने का कार्य कर रहे हैं। 2016 में मोदी सरकार ने सुलभ संस्था के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक को स्वच्छ रेल मिसन का ब्रांड प्रचारक नियुक्त किया और उन्हें ‘टॉयलेट मैन ऑफ इंडिया’ भी कहा। डॉ पाठक न सिर्फ चार दशकों से भारत में सस्ती शौचालय सुविधा के प्रणेता हैं बल्कि उन्होंने सफाई कर्मचारियों से संबंधित अस्पृश्यता के विरुद्ध भी लड़ाई लड़ी है। उन्होंने जाति की रूढ़ियों को तोड़ा है।

सुलभ इंटरनेशनल व सुलभ शौचालयों में ब्राह्मण कर्मचारी भी होते हैं। पत्रकार फ्रैंकोइस गॉटियर के अनुसार दिल्ली के सभी 50 सार्वजनिक शौचालयों का रख-रखाव ब्राह्मण ही करते हैं जहाँ प्रति शौचालय में पाँच-छह कर्मचारी नियुक्त हैं। मोदी सरकार द्वारा डॉ पाठक को स्वच्छ भारत मिशन का ब्रांड प्रचारक बनाया जाना इस सरकार में निहित मूल्यों को दर्शाता है।

जून 2017 में mygov.in पोर्टल द्वारा नागरिकों को सफाई कर्मचारियों के साथ फोटो साझा करने के लिए कहा गया था औऱ इसकी प्रतिक्रिया में कई नागरिकों ने ऐसा किया भी। इस प्रकार मोदी लगातार उन धारणाओं से लड़ रहे हैं कि कुछ व्यवसाय अपमानजनक होते हैं।

यह समझने के लिए कि प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छ भारत मिशन से इतना जुड़े हुए और सफाई कर्मचारियों के सम्मान के लिए इतना प्रतिबद्ध क्यों हैं, हमें उनकी सांस्थानिक विरासत को समझना होगा। वे एक स्वयंसेवक हैं और स्वयंसेवकों की अपनी प्रथा होती है। उनका अध्यात्म श्री रामकृष्ण और विवेकानंद के वेदांत दर्शन में निहित है। संयोगवश, यह वही दर्शन है जिससे महात्मा गांधी जुड़े हुए हैं। इन सबकों जोड़ने वाली कड़ी व्यावहारिक मानववादी वेदांत है जो कहता है कि हर मनुष्य के दैवीय तत्व का सम्मान होना चाहिए, यहाँ तक कि हर जीव का लोकिन मनुष्य का तो अवश्य।

अन्य सभ्यताओं की तरह भारत में भी सामाजिक रूढ़ियों ने मानव समाज के कुछ वर्गों को अलग कर दिया है और उन्हें ऐसा कार्य सौंपा है जो अभद्र समझा जाता है। सफाई कर्मचारियों को अछूत समझा जाता था। आधुनिक समय में हिंदू पुनर्जागरण अंग्रेज़ शिक्षित अभिजात वर्ग के माध्यम से नहीं बल्कि आध्यात्मिक जड़ों से जुड़े तथाकथित अशिक्षित स्वामियों द्वारा हुआ।

ऐसे ही हैं गंगाधर की तरह जन्मे श्री रामकृष्ण। इस अशिक्षित काली मंदिर के पुजारी ने अछूत माने जाने वाले व्यक्ति के शौच को अपने सिर से साफ करने को अपनी आध्यात्मिक साधना का एक अंश समझा। ऐसा करते हुए वे माता से प्रार्थना कर रहे थे कि सामाजिक व व्यक्तिगत स्तर पर श्रेष्ठता और हीनता की सभी धारणाओं का नाश हो। “मुझे सबका दास बना दो”, यह साधना करते हुए उनकी प्रार्थना थी। इसके बाद उनके शिष्य स्वामी विवेकानंद ने कहा कि नया भारत “हल चलाने वाले किसान की कुटिया से, मछुआरे, मोची और सफाई कर्मचारियों की झोपड़ियों” से उभरेगा।

महात्मा गांधी जो पहले जन्म से जाति निर्धारित होने के विचार पर विश्वास रखते थे, रामकृष्ण-विवेकानंद के वेदांत से धीरे-धीरे परिचित होने के बाद परिवर्तित हो गए। वे जन्म के स्थान पर योग्यता के आधार पर वर्ण में विश्वास करने लगे। और इसलिए वे हमेशा अस्पृश्यता के विरोधी रहे। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि उनके सभी साथी व अनुयायी स्वयं अपने शौचालयों की सफाई करें जो प्रायः सफाई कर्मचारियों द्वारा किया जाता था।

जब डॉ हेडगेवार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापनी की तो अपने प्रशिक्षण शिविरों में वे इस विचार को और आगे लेकर गए। शिविर के स्वयंसेवकों को बारी-बारी से भोजन पकाने और शौचालय साफ करने का कार्य करना होता था।

तो जो स्वयंसेवक एक दिन पहले शिविर में सभी शौचालयों की सफाई कर रहा होता था, वही अगले दिन भोजन पका रहा होता था। एंडरसन और दामले, दोनों ने ही संघ पर अपनी पुस्तकों में लिखा है कि इसका उद्देश्य शुद्धता और प्रदूषण के संबंध में धारणाओं को गलत सिद्ध करना था जो हिंदू समाज की जाति संरचना में निहित थी।

रामकृष्ण-विवेकानंद वेदांत के संत व तमिल नाडु के प्रखर शिक्षाविद व संस्थान निर्माता स्वामी चिद्भावनंद (1898-1985) उन पहले व्यक्तित्वों में से थे जिन्होंने गांधी की जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था की धारणा पर प्रश्न उठाए थे। अपने शैक्षिक संस्थान में उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि पूजा घर, रसोई घर व शौचालय समान समर्पण से स्वच्छ रखे जाएँ।

जब लोगों की कमी होती थी तो स्वामी चिद्भावनंद स्वयं सेप्टिक टैंक में उतरकर इसकी सफाई करते थे। स्वामी जी पहले संघ को लेकर सशंक थे लेकिन बाद में वे संघ के प्रखर समर्थक बन गए व अपने संस्थान में संघ की शाखाएँ भी आयोजित करवाईं। वे संघ के लोगों को भी संबोधित किया करते थे। यह भी याद करें कि जब जन संघ सत्ता में थी तो उडुपी नगर पालिका ने शौच की हाथों से सफाई (मैनुअल स्कैवेंजिंग) को अवैध ठहराया गया था।

इस धरोहर को ध्यान में रखते हुए अब प्रधानमंत्री का वह वीडियो देखें जिसमें वे महाकुंभ के सफाई कर्मचारियों के चरण धो रहे हैं और तब आप इस कृत्य के वास्तविक महत्त्व और इसमें निहित विशाल दृष्टिकोण को समझ सकेंगे।

अरविंदन स्वराज्य में सहयोगी संपादक हैं।