विचार
कड़वा लेकिन सच- विभाजन के लिए नेहरू का निर्णय सही था

आशुचित्र- अगर दक्षिण एशिया में एक इस्लामिक राज्य होना ही था, तो यही बेहतर हुआ कि यह पूर्णतः भारत से अलग हुआ।

1947 में भारत के विभाजन का दोष जवाहरलाल नेहरू को देना आजकल की राजनीतिक चर्चा में प्रचलित लोकाचार बन गया है। यह कई शिक्षाविदों और विशेषज्ञों की राय है कि नेहरू विभाजन के ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे 16 मई 1946 के कैबिनेट मिशन योजना से सहमत नहीं हुए थे। यह योजना बाहरी तौर पर भारत को एकजुट तो रखती लेकिन आंतरिक तौर पर हिंदू बहुसंख्यक और मुस्लिम बहुसंख्यक के गुटों में बाँट देती, जिसमें इनका अपना-अपना क़ानून और सरकारी व्यवस्था होती, मात्र सेना, मुद्रा, अंतर्राष्ट्रीय संबंधों जैसे राष्ट्रीय मुद्दों पर संघ (यूनियन) सरकार का अधिकार होता जिसमें हिंदुओं और मुसलमानों का बराबर प्रतिनिधित्व होता।

नेहरू इस योजना से सहमत नहीं थे। द्वितीय कैबिनेट मिशन की योजना में प्रस्तावित किया गया कि भारत को दो स्वतंत्र राष्ट्रों में विभाजित किया जाएगा, एक जिसमें मुस्लिम बहुसंख्यक होंगे और दूसरा जिसमें हिंदू बहुसंख्यक और नेहरू इसके लिए राज़ी हो गए।

हिंदू राष्ट्रवादी जिन्हें भारत के क्षेत्रीय नुकसान की चिंता है वे खुशी-खुशी धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) नेहरू को विभाजन का दोषी ठहराते हैं। मोहम्मद अली जिन्नाह के समर्थक जो हिंदुओं को विभाजन और हिंदू-मुस्लिम विवाद का दोषी ठहराते हैं, वे भी विभाजन के लिए नेहरू को ज़िम्मेदार मानते हुए कहते हैं कि यदि नेहरू ने कैबिनेट मिशन की पहली योजना को स्वीकार कर लिया होता तो विभाजन नहीं होता और हिंदू-बहुसंख्यक राष्ट्र और मुस्लिम आबादी में संघर्ष नहीं होता, जैसा कि कश्मीर या अन्य जगहों पर हो रहा है।

मैं इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूँ।

विश्व भर में 50 से अधिक मुस्लिम बहुसंख्यक देश हैं। धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी और बहुलवादी लोकतंत्र का इनमें से कहीं पर भी मजबूत इतिहास नहीं रहा है और न ही स्थिर भविष्य की अपेक्षा है, मात्र मलेशिया ही अपवाद है। कैबिनेट मिशन योजना का एक विषय पाकिस्तान, एक मजबूत और स्थिर संविधान बनाने में असफल रहा है जिससे संस्थाओं की भूमिका व दायित्त्व एवं नागरिकों के अधिकार व सुविधाएँ सुनिश्चित नहीं हो पाए। इसने अपने संविधान में बहुत बदलाव किए हैं और लोकतंत्र का शब्द-जाल बिछाकर जिहाद की जुनूनी सैन्य तानाशाही व गैर-सैन्य चोरों के बीच झूलता रहा है। यह प्रथम दिन से ही हिंदुओं के विरुद्ध अपने उद्देश्य से उपभुक्त हो चुका है और राज्य को इस्लाम के अनुसार चलने की माँग में कैद हो चुका है।

हमारे पास क्या कारण हैं यह सोचने के लिए कि क्रियाविधि और असफलताओं जिससे पाकिस्तानी राज्य पीड़ित है व तरीके और शक्ति के प्रकार जिसका प्रयोग यह भारत के विरुद्ध करता आया है, वे अविभाजित भारत में मुस्लिम बहुसंख्यक वर्ग की क्रियाओं में नहीं झलकती? पाकिस्तान और अविभाजित भारत में स्वायत्त क्षेत्र के मुस्लिम बहुसंख्यकों के इतिहास, विरासत, संस्कृति और दृष्टिकोण में क्या अंतर होता?

वास्तव में यह और बुरा होता। एक बार ज़ुल्फीकर अली भुट्टो, याह्या खान, ज़िया-उल-हक़, परवेज़ मुशर्रफ और हाफ़िज़ सईद जैसे लोगों को केंद्र में मुस्लिम बहुसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करते हुए कल्पाना करें, वे न केवल अपने क़ानून बना रहे होते और अपनी आंतरिक सरकार चला रहे होते, बल्कि भारतीय सेना, आर्थिक मामलों और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भी अल्पसंख्या और अर्थव्यवस्था में कम योगदान होने के बावजूद बराबरी का अधिकार रखते। भारत के भीतर एक पाकिस्तान का दिल्ली और अन्य स्थानों पर बराबरी का हक़ होता। किस ग्रह पर यह एक अच्छा विचार सिद्ध होता?

कोई अंदाज़ा लगाना चाहेगा कि हिंदू बहुसंख्यक वर्ग से अपनी स्वायत्तता की रक्षा करने के नाम पर उनके पास कैसा शक्तिशाली सैन्य बल होता? क्या यही कारण नहीं है जो पाकिस्तान अपनी गढ़सेना के लिए देता है?

इस योजना को स्वीकार करना नेहरू का सबसे बड़ा पागलपन होता। विभाजन के अलावा कोई विकल्प नहीं था। हालाँकि अगर वे इस मानव युद्ध (आर्मागेडन) के विषय में पहले से सोच पाते तो हो सकता है कि वे कुछ और चुनते। पर इसका मतलब यह होता कि रक्तपात और भय की धमकी से मुस्लिम लीग को न सिर्फ उप-महाद्वीप के अव्यवस्थित मुस्लिमों पर पूर्ण अधिकार मिलता बल्कि सरकार और सेना पर भी हिंदुओं से दोगुना अधिकार प्राप्त होता।

मैं यह नहीं कह रहा कि विभाजन ही सर्वश्रेष्ठ संभावित परिणाम है। अविभाजित भारत जो भारतीय गणतंत्र जैसा होता और सिंध, पंजाब और बंगाल राज्य भी इस गणतंत्र के अधीन आते, यह सर्वश्रेष्ठ विकल्प होता।

नेहरू और वो जो भारत को धर्मनिरपेक्ष और एकजुट रखना चाहते थे, की कोशिशों के बावजूद इसकी संभावना नहीं थी कि जिन्नाह और मुस्लिम लीग इसके लिए तैयार होते। कैबिनेट मिशन के पास एकमात्र विकल्प बचा था, हिंदू और मुस्लिमों के अलग-अलग प्रांत व एक कमज़ोर केंद्र, अन्यथा विभाजन।

इन दो विकल्पों में विभाजन निस्संदेह बेहतर विकल्प था। अगर मुस्लिम लीग ने यह सुनिश्चित कर लिया था कि सभी व्यवहारिक उद्देश्यों के लिए दक्षिण एशिया में एक इस्लामिक राज्य होना चाहिए तो यही बेहतर था कि यह भारत से अलग होता, न कि भारत के भीतर होकर इसे नियंत्रित करता।

विभाजन के लिए नेहरू का निर्णय व्यक्तिगत रूप से हानिकारक हो सकता है पर यह एक सही निर्णय था जो लोगों और उनके इतिहास के प्रति असीम ज़िम्मेदारी की भावना दर्शाता है।

दुर्भाग्यवश, 1947 से अब तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई एन सी) ने भारतीय गणतंत्र से मुस्लिमों को अलग कर दिया है और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का अपना वादा पूरा करने में नाकाम रही है। बल्कि इसने इस्लाम को धर्मनिरपेक्ष स्थान पर स्वीकार किया ही नहीं है, जैसे कि जिन्नाह, सइद अहमद और सभी द्विदेशीय सिद्धांत के प्रणेता सही कह रहे हों।

अगर भारतीय मुस्लिमों को व्यक्तिगत रूप से अपनी अपेक्षाओं, आशाओं, आकांक्षाओं, सपनों और ज़रूरतों के अनुसार वोट देना होता तो हमारे पास एक उदारवादी मुस्लिम जनसंख्या होती। लेकिन ऐसा नहीं है। कांग्रेस ने मुस्लिम समुदायों के नेताओं से इस शर्त पर कि उनके समुदाय से उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत दूर रखा जाएगा, मुस्लिम वोट बटोरने का एक चलन बना दिया है।

इसका परिणाम यह है कि मुस्लिम जनसंख्या के बच्चे जो मदरसे में शिक्षा ग्रहण करते हैं, वे गणित, विज्ञान, भूगोल जैसे विषयों को पढ़ने से वंचित रह जाते हैं। मुस्लिम महिलाओं को गणतंत्र के अन्य नागरिकों के समान अधिकार और सुरक्षा उपलब्ध नहीं है और उनका जीवन मुस्लिम क़ानून के अनुसार चलता है, जो उस धर्मनिरपेक्ष उदार वादे के सपने से दूर हैं जहाँ सभी भारतीय क़ानून के सामने बराबर हैं। इन मुस्लिमों पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि देश आज़ाद हुआ, या देश का विभाजन हुआ।

कश्मीर के बाहर स्वतंत्र भारत में कोई भी ऐसा मुस्लिम नेता नहीं है जिसने मुस्लिमों या गैर-मुस्लिमों को उदारवादी और प्रतिनिधि लोकतंत्र का वादा कर मुस्लिमों और गैर-मुस्लिमों की आज़ादी व कल्याण के लिए काम किया हो। हमने सिर्फ नाम मात्र के मुस्लिम नेता देखे हैं जिनके पास सत्ता का दलाल बनने और मौलवियों और इमामों के अनुसार चलने के अलावा और कोई काम नहीं था, जिनका हमेशा से उद्देश्य रहा है कि समुदाय को इस्लाम में बांधकर रखें, इसका उदारीकरण न होने दें, इसे सशक्त न होने दें और न ही उदार, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनने दें।

कांग्रेस को धर्मनिरपेक्ष उदार पार्टी के अपने सिद्धांतों के अनुसार, धर्मनिरपेक्ष और समान अधिकार व सुरक्षा का कानून लाना चाहिए था जैसा कि इसने कैबिनेट मिशन योजना का पहला प्रस्ताव ठुकरा कर किया था। नेहरू ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकार करके सही किया था लेकिन कांग्रेस न सिर्फ अपने वादे में विफल हुई है बल्कि मुस्लिम लीग के विरोधी के स्थान से गिरकर यह देश के भीतर द्विदेशीय सिद्धांत की परिचालक बन गई है, और किसलिए, केवल और केवल अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए।

नेहरू पर निशाना साधना आसान है। समान नागरिक संहिता लाना मुश्किल है। मैं भारतीय जनाता पार्टी को समान नागरिक संहिता लागू करते हुए और धर्मनिरपेक्षता के अपने वादे पर खरा उतरते हुए देखना चाहता हूँ। यह जिन्नाह और द्विदेशीय सिद्धांत की असल हार होगी।

हरबीर सिंह राजनीतिक विश्लेषक व लेखक हैं।

यह लेख व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है।