विचार
शास्त्री, अपने लाल बहादुर शास्त्री; फिर से उठ खड़े हुए

आशुचित्र- पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु पर बनी फिल्म द ताशकंद फाइल्स पर चर्चा।

हाल ही में बेंगलुरु के इंडिक एकेडमी (आईए) के चौथे वार्षिक अधिवेशन सम्पन्न होने के मौके पर एक चैट शो का आयोजन किया गया। इस आयोजन में द ताशकंद फाइल्स, एक फिल्म जिसमें की भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमयी मृत्यु को दिखाया गया है, के निदेशक विवेक अग्निहोत्री के साथ एक विस्तार से बातचीत होनी थी।

आईए ने विवेक को इस बारे में एक किताब लिखने के लिए राजी किया था कि कैसे उन्होंने एक लाभदायक फिल्म बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम का निर्माण किया। इसके बाद उन्होंने अर्बन नक्सल्स नामक पुस्तक लिखी जो कि सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तक बनी।

इंडिक एकेडमी उनकी नई फिल्म की एक बौद्धिक साझेदार है और इस सहयोग को साथ लाने वाले एक सदस्य से विवेक अग्निहोत्री के साथ फिल्म के निर्माण कार्य को लेकर इंडिक चैट का आयोजन करने के लिए कहा गया था।

उन्होंने आईए पैनल के लिए छह सदस्यों को चुना। इनमें से मैं भी एक था।

“अरे, मैं ही क्यों, 77 सालों में?,” मैंने उन्हें मैसेज किया।

उन्होंने जवाब दिया, “क्योंकि आप 77 वर्ष के हैं, आपको एक बड़ा किरदार निभाना है।

कोई भी इस सहकर्मी को कभी ना नहीं कहता। वह आईए के कई चैट शो की अनुभवी निर्माता हैं।

मैं कुछ देर सोच में पड़ गया कि मैं निश्चित रूप से चैट शो में सबसे बुजुर्ग रहूँगा। मैं भारत के सभी प्रधानमंत्रियों के पूरे कार्यकाल में रहा हूँ। यह भी एक प्रकार का दावा है।

मैं ऐसा क्या याद दिलाऊँ जिस तक वर्तमान में उपलब्ध स्रोतों के माध्यम से चैट रूम का कोई भी व्यक्ति नहीं पहुँच सकता है?

जब किसी की उम्र बढ़ती है तो यह प्राकृतिक है कि काफी कुछ देखा और सुना होगा। कई बातें इकट्ठा होकर यादों के ढेर में दब जाती हैं। क्या वे घटनाएँ हमेशा के लिए भुला दी जाती हैं? मैंने पाया कि ऐसा नहीं है। मैंने पाया कि मैं शास्त्री जी के दिनों के बारे में अपनी जानकारी का ढेर निकाल सकता हूँ। और फिर मेरी ज्वलंत यादों का सिलसिला चल पड़ा।

मैं 5 साल का था जब जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने और 21 साल का था जब उनकी मृत्यु हो गई। उनके कार्यकाल के दौरान भारत उनके साथ था। अधिकांश देश उन्हें पसंद करता था। दूरंदेश हमें उनकी त्रुटियाँ पता चलीं, लेकिन उस समय कुछ ही लोग उनपर सवाल उठाते थे। देश उनके बिना असुरक्षित महसूस करता था। नेहरू के बाद, कौन? ’एक ऐसा सवाल था, जो बार-बार हमें कचोट रहा था। हम काफी असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

तब लाल बहादुर ने जवाहर लाल का अनुसरण किया। वे एक छोटे कद और आकर्षक मुस्कान वाले व्यक्ति थे। कोई बड़ी ही आसानी से उन्हें कम आँक सकता था, जैसे कि पाकिस्तानियों ने 1965 में किया था। पाकिस्तान को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।

वे जल्द ही हम सबके मन में बस गए। वह जवाहर लाल जैसे चिंताग्रस्त व अनिर्णायक नहीं बल्कि निडर और अथक थे।

1965 के युद्ध में तीन हफ्तों के भीतर, भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को वापस भगाया, उनका पीछा करते हुए उनके इलाके में घुस गए और उनकी जमीन के विशाल हिस्से पर कब्जा कर लिया और लाहौर के द्वार पर खड़े हो गए। भारत के रेगिस्तानों में मलबे के रूप में बिखरे हुए पाकिस्तान के वॉन्टेड पैटन टैंक बिखरे पड़े हैं।

लाहौर की सीमा पर भारतीय सेना

युद्ध के दौरान शास्त्री जी महान ऊँचाइयों तक पहुँचे। उन्होंने भारतीयों से भोजन की कमी को पूरा करने के लिए दिन का एक वक्त का भोजन न करने का आह्वान किया। पूरे देश ने सोमवार को ‘शास्त्री जी व्रत’ के रूप में मनाया। उन्होंने नागरिकों से युद्ध के प्रयास के लिए अपने आभूषण दान करने को कहा। लाखों लोग ऐसा करने पर बाध्य हो गए।

जब भारतीयों ने इस महान, प्रेरक नेता के पीछे चलना शुरू ही किया था कि उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

बस ऐसे ही?

कहीं दूर ताशकंद में,सुबह 2 बजे।

जब वे अकेला सोए हुए थे, अनासक्त।

वह भी दिल के दौरे से?

और न ही कोई पोस्ट्मॉर्टम होता है, न तो उसकी मांग उठाई जाती है?

“क्या!”, देश में अविश्वास की भावना थी। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि उनकी मृत्यु स्वाभाविक थी।

भारत में किसी को भी नहीं था; तब भी और अब भी।

लेकिन उन्हें भुला दिया गया।

क्या फिल्म मुझे सच्चाई के करीब ले जाएगी?

मेरी मेज़बान, जो कि बेहद कर्मठ हैं, उन्होंने हमे ट्रेलर दिखाया जो कि यूट्यूब पर काफी चर्चा में था। उन्होंने कैमरे के लिए चैट शुरू होने के एक घंटे पहले फिल्म के कुछ हिस्सों को देखने के लिए हमें इकट्ठा किया।

लेखक, स्तंभकार, और लोकप्रिय सोशल मीडिया व्यक्तित्व शेफाली वैद्य, जिन्हें मेज़बानी के लिए चुना गया था, ने हमें थोड़ा सहज कराया और कहा, “मैं आपका परिचय दूँगी और फिर आपको खुद को अभिव्यक्त करना है। स्वतंत्र महसूस कीजिए। मैं कोई एंकर नहीं, बल्कि आपकी तरह एक प्रतिभागी हूँ।”

हमने शूटिंग के लिए शांग्रीला होटल तक का लंबा सफर दो कारों में बैठकर तय किया। मैं घबराया हुआ था, मगर उत्साहित था; मैंने पहले कभी फिल्मी कैमरों का सामना नहीं किया था।

मेरे और शेफाली के अलावा, गुरु प्रकाश, विनय मंगल, अर्जुन कादियान और हम में से सबसे छोटे, गायत्री अय्यर थे। वे सभी अपने व्यक्तिगत क्षेत्रों में निपुण हैं।

विवेक इस शो के लिए दुबई से आए थे। वह एक बेहद मिलनसार व्यक्ति हैं। उसके बाद एक व्यक्ति आया, जो कि एक सादे शर्ट और सैंडल में था- पुरस्कार विजेता अभिनेता, प्रकाश बेलावाड़ी, वह आदमी जो फिल्म में एक सेवानिवृत्त रॉ प्रमुख की भूमिका निभाता है। और एक नौजवान खूबसूरत महिला थीं, पता चला कि वह श्वेता बसु प्रसाद थीं, जो कि फिल्म में एक तेज तर्रार, कभी न विचलित होने वाली पत्रकार की भूमिका में हैं, जिन्हें मैंने जल्दबाजी में देखा था। इतनी कम में उम्र कोई इतना गहन किरदार निभा सकता है यह मानना मुश्किल था।

फिर चैट शो की शुरुआत हुई।

शेफाली ने जल्द ही हमारा परिचय कराया और फिर बातचीत चालू हो गई।

विवेक ने इस फिल्म को करने का कारण बताया।

उन्होंने कहा कि उन्हें लंबे समय से इस रहस्य में रुचि थी, मगर उनकी कहानी के लिए कोई आधिकारिक दस्तावेज नहीं मिला। तब उन्होंने लोगों से इसके बारे में जानकारी इकट्ठा करना शुरू किया।

विवेक ने बताया, “तब मैंने निर्णय लिया कि इस कहानी पर एक सामूहिक शोधकार्य किया जाना चाहिए। समकालीन स्रोतों से मेरे निवेदन पर अथाह सामग्री मिलने लगी। क्षेत्रीय मीडिया ने ऐसा कार्य किया कि उसके सामने मुख्यधारा मीडिया भी लज्जित हो जाए। अकेले लड़ने वाले कई लोगों ने कहानी पर लगातार नज़र रखना जारी कर दिया। छत्तीसगढ़ में एक अज्ञात बुजुर्ग व्यक्ति ने उन सूचनाओं के ढेर को साझा किया जो उसने वर्षों से एकत्र की थी। कई लोगों ने मेरी मदद करने के लिए कदम बढ़ाया और मुझसे आग्रह किया..”

वे इस रहस्य में इतना रम गए थे कि वे जल्द ही इसपर कार्य करने से खुद को नहीं रोक पाए। उन्होंने नसीरुद्दीन शाह, मिथुन चक्रवर्ती और अपनी पत्नी पल्लवी जोशी जैसे बड़े नाम गिनाए। वह आश्चर्यचकित हुए जब उन सभी ने उन्हें कहानी करने के लिए प्रेरित किया।

इस प्रकार कलाकार साथ जुड़े।

श्वेता एक ऐसी पीढ़ी की हैं, जिन्होंने शास्त्री जी के बारे में कम ही सुना है। वे कहती हैं कि रहस्य जानने के बाद उनमें बदलाव आया है।  फिल्म में उनके दृश्यों से मैं बता सकता था कि वे अब एक ऐसी महिला हैं जिसे सत्य जानने में रुचि है। हमारे प्रधानमंत्री के साथ हुए अन्याय और एक पत्रकार की तरह वे सत्य जानने के लिए जिन लोगों से मिलती हैं, उनके आकस्मिक रवैये ने उनपर काफी गहरा असर डाला है। उनका प्रदर्शन बेहद ही शानदार है। हमारी बातचीत के बीच कई बार उनकी आँखें भी भर आईं।

फिल्म में रॉ प्रमुख प्रकाश एक शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं। वे बताते हैं कि संदिग्ध को लेकर वे क्या सोचते हैं। उनके उत्तराधिकारी आज भी शैतानी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। वे इससे परेशान हैं लेकिन इस बात से संतुष्ट भी हैं कि उन सबने साथ मिलकर इस कहानी को आगे लाने का कार्य किया।

विवेक आगे कहते हैं, “जब हमने शूटिंग शुरू की, तब तक कलाकार अपनी भूमिकाओं को समझ चुके थे और खुद को अपने किरदारों में ढाल लिया था। एक 14 मिनट लंबा दृश्य है जिसमें जाँच समिति को पीएम की मौत के मुद्दे पर चर्चा करनी थी। मैंने बस दृश्य की जानकारी दी और कमरे से बाहर निकल गया।”

जब वह वापस लौटे तो वह कलाकारों को अपने संबंधित बिंदुओं के लिए जुनून को देखकर दंग रह गए। दृश्य की तीव्रता आप पर भी हावी हो जाती है।

उनका कहना है कि श्वेता के पास उस दृश्य का कोई ब्योरा नहीं था जहाँ गृह सचिव ने उन्हें कहा था कि ये नेहरू का भारत है।

उन्होंने बताया, “उसने ज़ोर से गुस्से से चीखकर हम सबको हैरान कर दिया, ‘शास्त्री जी का क्यों नहीं?'”

मैंने गायत्री द्वारा एक प्रश्न का उत्तर दिया था कि 53 साल पहले क्या हुआ था, इस पर अब बात होनी चाहिए। मैंने कहा, “ऐसा इसलिए क्योंकि यदि वे 50 साल पहले हुआ था इतनी आसानी से दफन कर सकते हैं, तो भारत में 200, 500 साल पहले जो हुआ उसे दफनाना कितना आसान होगा?”

यदि श्वेता की पीढ़ी यह विचार करने लगे कि शास्त्रीजी के साथ क्या हुआ था, तो वे यह पूछने के लिए मजबूर हो जाएँगे कि पिछली कई शताब्दियों से हमारी धरती के उजड़ने का कारण क्या है।

मेरे लिए, यही वजह है कि यह फिल्म मायने रखती है। ऐसे समय में जब हमें लगता है कि सोशल मीडिया कथात्मक (नैरेटिव) को नियंत्रित करता है, विवेक अग्निहोत्री ने फिल्म के माध्यम को एक सत्य के खोज के उपकरण के रूप में पुनर्जीवित किया है।

इंडिक चैट

विवेक कहते हैं कि कई लोग उनसे पूछते हैं, “क्या? आखिर एक मरे हुए आदमी पर फिल्म क्यों?”

मुझे लगता है कि उन्होंने लाल बहादुर को एक बार फिर से खड़ा किया है।

जाइए और फिल्म देखिये। मैं तो जाऊँगा। मैंने जो कुछ देखा है उससे प्रतीत होता है कि हमें एक परिवर्तनकारी अनुभव होगा।

यह फिल्म एक थ्रिलर है, जो कि सभी को बदलकर और हिलाकर रख देगी।

जब आप फिल्म देख चुके होंगे, तो इंडिक चैट लाइव – द ताशकंद फाइल्स पर इंडिक एकेडमी राउंड टेबल भी ज़रूर देखें, जिसका मैंने यहाँ वर्णन किया है। यह कहानी में एक बड़ी गहराई जोड़ देगा जो फिल्म आपको बताना चाहती है।