विचार
अम्बेडकर जिन्हें वे नहीं चाहते कि आप जानें !
BR Ambekar

सम्भवतः बाबा साहेब के विचारों को पहले पहल तवज्जो न दी गई हो और फिर उनको ग़लत ढंग से लोगों के सामने लाया गया हो क्योंकि बुद्धिजीवी वर्ग को पता था कि वो विचार उनके ‘वामपंथी-उदारवादी’ कथानक के लिए मुफ़ीद नहीं होंगे। एक सक्षम विद्वान और देशभक्त, डॉ.अम्बेडकर ने विभिन्न विषयों, घटनाओं, समस्याओं और बहस-मुबाहिसोें को न केवल बहुत गहराई से देखा-परखा, साथ ही साथ उनके बारे में लिखा भी था। उनमें से सात ऐसी मुख्य बातें जिन्हंे मुख्यधारा का मीडिया हो या वामपंथी शिक्षाविद्, नहीं चाहते कि आपको पता चलें।

1. डॉ.अम्बेडकर उपनिषद् के महावाक्यों को लोकतंत्र का आध्यात्मिक आधार मानते थे

जात-पात तोड़क मण्डल को दिये गये अपने प्रसिद्ध भाषण में डॉ.अम्बेडकर ने सुझाव दिया था कि हिंदुओं को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों पर आधारित समाज के निर्माण के लिए अपने शास्त्रों से बाहर कहीं से प्रेरणा लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें इन मूल्यों के लिए उपनिषदों का अध्ययन करना चाहिए। बाद में, हिंदुत्व की पहेलियां किताब में हिंदुत्व पर अपने भीषण आक्रमण में अपने इस विचार पर वापिस लौटते हुए उन्होंने इसे विस्तार से समझाया भी। उन्होंने तीन महावाक्यों:‘सर्वम् खल्विदम् ब्रह्मा’, अहम् ब्रह्मास्मि, तत्वमासि का संयुक्त उद्देश्य बताते हुए लिखा, ”हम सभी एक ही ईश्वर की संतानें हैं। लोकतंत्र के समर्थन के लिए ये आधार बेहद कमज़ोर होगा। यही वजह कि जहाँ भी लोकतंत्र का आधार इस विचार को माना गया वहाँ उसकी स्थिति डाँवाडोल है। जबकि एक बार अगर यह मान लिया जाय कि आप और हम सभी एक ही लौकिक सिद्धांत का एक हिस्सा हैं, लोकतांत्रिक जीवन पद्धति के अलावा किसी और सिद्धांत के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। यह सिद्धांत केवल लोकतंत्र का उपदेश नहीं देता बल्कि इससे लोकतंत्र हममें से प्रत्येक के लिए एक बाध्यता बन जाता है।

2. डॉ.अम्बेडकर हिंदू सिविल कोड को एकीकृत सिविल कोड के लक्ष्य में कदम मानते थे

डॉ.अम्बेडकर जिन्होंने स्मृति परम्परा को उसके अमानवीय और अतिप्राचीन होने के कारण सीधे-सीधे अस्वीकार कर दिया था उनका मानना था कि इन्हीं परम्पराओं को इनके अमानवीय तत्वों से मुक्त करके एक ऐसी हिंदू नियमावली की स्थापना की जा सकती है, जिसमें सामाजिक लोकतंत्र और लैंगिक समानता के लिए पर्याप्त स्थान हो।

वे हिंदू कोड बिल को समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर एकीकृत हिंदू समाज के निर्माण में एक अतिमहत्त्वपूर्ण अंग मानते थे।11 जनवरी, 1950 को दिये गये एक भाषण में उन्होंने घोषणा की:

“ये बिल प्रगतिशील है। ये भारतीय संविधान के अंतर्गत आने वाले सभी नागरिकों के लिए एकमात्र सिविल लाॅ लाने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है। ये नियमावली हिंदू धार्मिक ग्रंथों पर आधारित है।”

जहाँ नेहरू के लिए हिंदू कोड बिल परम्परावादी हिंदुओं और राष्ट्रवादी हिंदुओं के बीच अंतर्विरोध पैदा करने का एक औज़ार भर था, तो वहीं डॉ.अम्बेडकर के लिए हिंदू कोड बिल एक मज़बूत और स्वस्थ हिंदू समाज के निर्माण का साधन था जो आधुनिक भारतीय राष्ट्र का आधार बन सकता था।

3. डॉ.अम्बेडकर पाकिस्तान के सिंधु नदी के पानी पर भारतीय किसानों के प्रथम अधिकार को मान्यता दिये बग़ैर पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी देने के विरोध में थे 

ब्रिटिश उपनिवेशवादी सरकार की सूचना मंत्रालय की एम्पायर डिविज़न के निदेशक और वाइसराय के संवैधानिक सलाहकार जैसे महत्त्वपूर्ण पदों पर रहे ब्रिटिश अर्थशास्त्री हेनरी विन्सेंट हॉडसन अपनी किताब ‘द ग्रेट डिवाइड: ब्रिटैन-इंडिया-पाकिस्तान’ (1969)  में डॉ.अम्बेडकर के पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी देने से इंकार करने और माउंटबेटेन ने कैसे पाकिस्तान की ओर हस्तक्षेप किया इस बारे में विस्तृत ब्यौरा दिया है।

”3 मई, 1948 को भारत और पाकिस्तान के मंत्रिमंडल के प्रतिनिधियों की एक बैठक में डॉ.अम्बेडकर ने ज़ोर देकर कहा कि पाकिस्तान को तब तक सिंधु का पानी नहीं दिया जा सकता जब तक कि पाकिस्तान भारत का क़ानूनी दावा कि सिंधु नदी के पानी पर पूर्वी पंजाब का हक़ है और उसका अपनी इच्छानुसार उपयोग करना पूर्वी पंजाब का अधिकार है। पाकित्सान के मुख्य प्रतिनिधि, ग़ुलाम मोहम्मद, जब इस बैठक के बाद लाॅर्ड माउंटबेटन से मिलने आये तो इस बात से बुरी तरह परेशान थे। इस पर वायसराॅय ने पं. नेहरू को फ़ोन किया और उन्हें बताया कि ये बहुत ही घृणास्पद है कि मुश्किल में फँसे किसानों और शरणार्थियों को परेशान किया जा रहा है जबकि इस मामले पर अभी भी बातचीत चल रही है। पं. नेहरू ने उन्हें सम्मेलन को आगे बढ़ाने और इस मामले में अपने स्तर से हस्तक्षेप करने का आश्वासन दिया।

4. डॉ.अम्बेडकर संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे

जैसाकि अब सभी को ज्ञात है, डॉ.अम्बेडकर संस्कृत को भारत की राष्ट्रीय भाषा बनाना चाहते थे। 11 सितम्बर सन् 1949 को द संडे हिंदुस्तान स्टैण्डर्ड ने बताया कि क़ानून मंत्री के रूप में बाबा साहेब संघ की आाधिकारिक भाषा के रूप में संस्कृत चाहते थे। अखिल भारतीय अनुसूचित जाति संघ की कार्यकारी समिति में डॉ.अम्बेडकर ने दोहराया।

बाद में, जब भाषाई राज्यों का सृजन एक ज्वलंत मुद्दा बन गया तो डॉ.अम्बेडकर ऐसे राज्यों के निर्माण के पक्ष में थे, हालाँकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि भाषाई राज्यों के निर्माण में एक अंतर्निहित ख़तरा था, उनका मानना था कि यह एक ऐसा ख़तरा था जिसे एक बुद्धिमान और दृढ़ राजनीतिज्ञ पलट भी सकता था।

आखिर में डॉ.अम्बेडकर ने निम्नलिखित मज़बूत सिफ़ारिश की थी-

”इस ख़तरे से मुक़ाबला करने का एकमात्र तरीक़ा जो मैं समझ सकता हूँ, वो यह है कि संविधान में व्यवस्था की जाय कि कोई भी क्षेत्रीय भाषा किसी राज्य की आधिकारिक भाषा नहीं होगी। राज्य  की आधिकारिक भाषा हिंदी होगी और जब उपयुक्त समय आने पर अंग्रेज़ी को ये अधिकार चला जायेगा। चूँकि भारत एकजुट होकर एकसमान संस्कृति विकसित करना चाहते हैं इसलिए यह सभी भारतीयों का बाध्य दायित्व है कि वे हिंदी को अपनी भाषा के रूप में अपनायें। कोई भी भारतीय जो हिंदी को भाषायी राज्य के अभिन्न हिस्से के रूप में नहीं अपनाता है, उसे भारतीय होने का कोई अधिकार नहीं है। वह भौगोलिक सीमाओं के अतिरिक्त किसी भी प्रकार सच्चा भारतीय नहीं हो सकता।”

ये सिफ़ारिश केवल हिंदी को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने की सिफ़ारिश नहीं है। साथ ही साथ ये भारत को सांस्कृतिक रूप से एकजुट राज्य के रूप में करने की आवश्यकता पर भी बल देती है। यह राष्ट्रवाद की क्षेत्रीय अवधारणा को ख़ारिज कर देता है, और वास्तविकता में राष्ट्रवाद के आधार के रूप में मज़बूत सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वकालत करतात है।”

5. डॉ.अम्बेडकर भारतीय सेना को भारत के शत्रुतापूर्ण तत्वों से मुक्त करना चाहते थे

विभाजन-पूर्व की भारतीय सेना की जनसांख्यिकी के अपने निर्दयतापूर्ण विश्लेषण में, डॉ.अम्बेडकर ने दिखाया कि भारतीय सेना में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में इस्लामवादियों का बहुत उच्च अनुपात था। उन्होंने इस ब्रिटिश तर्क को भी ग़लत घोषित किया कि उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के मुस्लिम योद्धा क़ौम से ताल्लुक़ रखते थे जबकि हिंदू ऐसे नहीं थे। उन्होंने बताया कि यह वास्तव मंे ”1857 का विद्रोह था जोकि उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के लोगों की भारतीय सेना में प्रधानता का कारण था।“ ना कि योद्धा और ग़ैर योद्धा क़ौम का प्रश्न, जोकि पूरी तरह से ‘मनमाना और कृत्रिम’ विभेद था।

विभाजन-पूर्व की भारतीय सेना में हिंदुओं के खि़लाफ़ सभी असमानताओं और अंतर्निहित असुरक्षा को संबोधित करते हुए डॉ.अम्बेडकर ने ”भारतीय सेना में मुस्लिम प्रधानता से छुटकारा“ पाने की आवश्यकता के बारे में लिखा।

सेना के बजट पर ख़र्च होने वाले 52 करोड़ रुपये की राशि का एक बड़ा हिस्सा हिंदू प्रांतों द्वारा दिया जाता है और जिस सेना पर ख़र्च होता है, वो अधिकांशतः ग़ैर-हिंदुओं से बनी हुई है। कितने हिंदू इस दुखांत नाटक के बारे में जानते हैं ? कितने ये जानते हैं कि ये दुखांत नाटक किसकी क़ीमत पर खेला जा रहा है ? आज हिंदू इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हैं क्योंकि वो इसे रोक नहीं सकते। प्रश्न तो यह है कि क्या वो इस दुखांत नाटक को जारी रहने की अनुमति देंगे।

जबकि भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन के फाॅर्मूले पर डॉ.अम्बेडकर के पूर्ण आबादी के आदान-प्रदान के बयान के बारे में सभी जानते हैं, भारतीय राष्ट्रीय जीवन के विरोधी शत्रुतापूर्ण तत्वों से भारतीय संस्थानों को मुक्त रखने के उनके विचार ज़्यादा मशहूर नहीं हैं।

6. दलितों के मक़सद के लिए मिशनरी से मिलने वाले समर्थन को डॉ.अम्बेडकर संदेहपूर्ण ढंग से देखते थे

प्रफ़ेसर लक्ष्मी नरसू की किताब ‘द एसेंशल्स आॅफ़ बुद्धिज़्म’ की अपनी भूमिका में उन्होंने कहा कि सामाजिक सुधार के लिए मिलने वाला मिशनरी समर्थन किसी वास्तविक चिंता की वजह से नहीं, बल्कि धर्मपरिवर्तन के साधन के रूप मंे था।

‘यही समय था जब ईसाई मिशनरी न केवल सामाजिक सुधारों को समर्थन दे रहे थे बल्कि इसे बड़े ही उत्साह से रूढ़िवादी हिंदुत्व और ईसाईयत में धर्मपरिवर्तन के बीच में कहीं देखते थे। इस तरह के प्रगतिशील आंदोलनों को धर्मपरिवर्तन के रास्ते में वास्तविक बाधा है, अपने विचारों को इस तरह बदलने में उन्हें ज़्यादा समय नहीं लगा।’

ये दिलचस्प है कि ‘कलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ.अम्बेडकर (भाग-17) में अनुसूचित समाज के एक और बड़े नेता बाबू जगजीवन राम का एक पत्र भी शामिल किया गया है। ये पत्र ब्रिटिश सीआईडी की बिहार प्रांत की फ़ाइल से मिला है और ये एक विशेष अफ़सर की 9 मार्च, 1937 की रिपोर्ट का हिस्सा है।

बाबा साहेब को ‘मेरे प्रिय डाॅक्टर साहब’ के रूप में सम्बोधित करते हुए बाबू जगजीवन राम ने इलाहाबाद के के एक ‘श्री बलदेव प्रसाद जायसवाल’ के खिलाफ़ चेतावनी दी थी। ”बिहार का कोई भी व्यक्ति उसके साथ नहीं है, उनका यहाँ स्थित एक कैथलिक चर्च में दफ़्तर है और सबकुछ मिशनरीज़ द्वारा किया जा रहा है।“ बाबू जगजीवन राम ने आगे लिखा और बताया, ”वह एक सौ से अधिक दलित वर्गों का आयोजन नहीं कर सकेंगे। हाँ वह हज़ार से भी ज़्यादा मुस्लिमों और ईसाइयों को बुला सकते हैं, जैसाकि उन्होंने लखनऊ में किया था। मुझे इस तरीक़े पर सख़्त ऐतराज़ है। हमें असली दलित वर्ग का सम्मेलन करना चाहिए।”

पत्र से पता चलता है कि दोनों ही नेताओं को अनुसूचित समुदायों की गतिविधियों में मिशनरियों के दख़ल देने के सिद्धांत के विरुद्ध थे। ब्रिटिश सीआईडी की फ़ाइल में इस पत्र के मिलने से ही उन दोनों नेताओं में ब्रिटिश उपनिवेशवादी सरकार की दिलचस्पी और उनके खि़लाफ़ उसकी भागीदारी का पता चलता है।

7. डॉ.अम्बेडकर चाहते थे कि भारतीय राष्ट्र/राज्य हिंदुत्व के लिए एक पुरोहित सेवा चलाये

अपनी किताब ‘द अन्नाहिलेशन ऑफ़ कास्ट’  में डॉ.अम्बेडकर चाहते थे कि राज्य प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर ही पुरोहितों की एक परिषद् बनाये। उनका मानना था कि इस तरह से पुरोहित सेवा वंशानुगत नहीं रह जायेगी। उनके अनुसार, प्रत्येक हिंदू को पुरोहित होने के लिए पात्र होना चाहिए। हिंदू पुरोहितों के लिए परीक्षा ‘सरकार द्वारा निर्धारित’ की जानी चाहिए। ऐसे पुरोहित, जिनके पास कोई सनद नहीं है, ऐसे पुरोहितों द्वारा किये गये किसी भी आयोजन को क़ानूनी तौर पर वैध न माना जाये, साथ ही ऐसे किसी भी व्यक्ति को जिसे सनद नहीं प्राप्त है, उसका पुरोहित का कार्य करना दण्डनीय अपराध माना जाये।

आगे उन्होंने कहा कि आई.सी.एस. (इंडियन सिविल सर्विस, तब) के अधिकारियों की ही तरह पुरोहितों की संख्या भी राज्य की आवश्यकता के अनुसार सीमित रखी जाये।

हालाँकि दूर से देखने में लगता है और शायद ठीक भी है कि राज्य का किसी धर्म में हस्तक्षेप न्यायोचित नहीं है और इससे राज्य हिंदू धर्म का संरक्षक भी बन जाता है। यदि भारतीय राष्ट्र/राज्य को भ्रष्टाचारमुक्त पुरोहित सेवा परिषद् का निर्माण करना है, जो लगातार स्वयं को अपडेट रखे और आज की स्थिति के अनुसार स्वयं को परिवर्तित-परिवर्दि्धत करती रहे, तो राजनीतिक हिंदुओं के लिए एक पुरोहित परिषद् से ज़्यादा वांछनीय अन्य कुछ भी नहीं हो सकता।

दिलचस्प बात ये है कि डॉ.अम्बेडकर का ये सपना जल्द ही मध्य प्रदेश सरकार की एक अत्यंत व्यावहारिक योजना के ज़रिये सच हो सकता है।