विचार
तालिबान 2.0 भारत के लिए चिंता का विषय क्यों व कैसी नीति से सुलझ सकती है समस्या

संघर्ष ग्रस्त देश अफगानिस्तान से अमेरिका के नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं की वापसी के साथ ही तालिबान बड़े पैमाने पर बढ़ रहा है। तालिबान विद्रोहियों ने अमू दरिया से लेकर पड़ोसी देश ताजिकिस्तान की सीमा तक बाहर निकलने के सभी रास्तों पर कब्ज़ा कर लिया है और देश के प्रमुख शहरों और सामरिक राजमार्गों के सीमावर्ती क्षेत्रों की घेराबंदी कर दी है।

अफगान सुरक्षा बल तालिबान विद्रोहियों के विरुद्ध वीरतापूर्ण लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन देश के कई प्रांत या तो तालिबान के नियंत्रण में हैं या फिर वहाँ पर उनकी मज़बूत उपस्थिति है। तालिबान की पुनरावृत्ति (तालिबान 2.0) का वैश्विक शांति और सुरक्षा पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा; दक्षिण एशियाई क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है।

क्या अमरीका का अफगानिस्तान छोड़ना एक समझदार रणनीति है?

11 सितंबर 2021 को अमेरिका पर 9/11 आतंकवादी हमले की 20वीं वर्षगाँठ होगी; राष्ट्रपति बाइडन कुछ महीनों में अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला लेंगे। नाटो सेनाएँ पिछले 20 वर्षों से तालिबान विद्रोहियों से अफगान लोगों को सुरक्षा प्रदान कर रही थीं।

नाटो सैनिकों के वहाँ से बाहर निकलने से अराजकता पैदा हो रही है और तालिबान शक्तिशाली हो रहा है क्योंकि देश में अभी तक संस्थाकरण और लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया पर्याप्त रूप से पूरी नहीं हुई है। अफगानिस्तान से अमेरिका के नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं के बाहर निकलने को लेकर विभिन्न रणनीतिक विद्वानों और संस्थानों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं।

ब्रुकिंग्स संस्था की एक वरिष्ठ फेलो वेंडा फेलबाब-ब्राउन बाइडन प्रशासन के अफगानिस्तान से सभी अमेरिकी सैनिकों को वापस लेने के निर्णय को एक बुद्धिमान निर्णय के रूप में देखती हैं; हालाँकि, वे बाहर निकलने के बाद अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिरता के बारे में चिंतित है और कहती हैं-

दुर्भाग्य से, एक तेज़ और अत्यधिक खंडित और खूनी गृहयुद्ध हो सकता है, और कम से कम, औपचारिक सत्ता के लिए तालिबान का प्रभुत्व देश की राजनीतिक व्यवस्था में दर्दनाक परिवर्तन लाएगा।

वेंडा फेलबाब-ब्राउन

किंतु वे कहती हैं कि चूँकि अफगानिस्तान में अमरीकी हस्तक्षेप अब वहाँ की बुनियादी राजनीतिक और सैन्य गतिशीलता को बदलने की क्षमता खो चुका है, अतः वहाँ अमेरिकी सेनाओं को बनाए रखना अनावश्यक था।

बाइडन प्रशासन के अनुमान कि अफगानिस्तान में बने रहना उन्हें तालिबान के साथ युद्ध में वापस धकेल सकता है और यह राष्ट्रीय हित में नहीं था, से सहमति रखते हुए वेंडा फेलबाब-ब्राउन इस कदम को आवश्यक मानती हैं।

सामरिक विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलेनी अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी की आलोचना करते हैं और बाइडन के तर्कों– “अमेरिका को अफगानिस्तान में राष्ट्र निर्माण के लिए नहीं जाना” और “वहाँ बने रहने का मतलब होगा अमेरिकी सैनिकों को हताहतों-नुकसान की तरफ ले जाना है”– पर प्रश्न उठाते हुए कहते हैं कि यह अफगान के लोग हैं जो वास्तव में खतरे में हैं।

इसके अलावा, उनका कहना है कि अमेरिका अफगानियों को एक लूटने वाली इस्लामी ताकत की दया पर छोड़ रहा है– एक बर्बर व्यवहार के लंबे इतिहास वाले आतंकी संगठन के साथ। अफ़ग़ानिस्तान से अमरीकी सैनिकों का वापस जाना अफगान की लोकतांत्रिक सरकार की स्थिरता और उसके लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय और वैश्विक शांति और सुरक्षा के मामले में कभी भी एक स्मार्ट रणनीति नहीं हो सकती है।

हम याद कर सकते हैं कि दक्षिण वियतनाम में 1973 में और कंबोडिया में 1975 में अमेरिकी सेनाओं के बाहर निकलने के बाद क्या हुआ था। अफगानिस्तान में अधूरा अमेरिकी युद्ध का हश्र वैसा ही होने वाला है जैसा कि पिछले दो के साथ हुआ था।

वैश्विक सुरक्षा के लिए चिंताएँ  

तालिबान सबसे घातक आतंकी संगठन है जिसके संबंध अल-कायदा से हैं। अल-कायदा वही आतंकी संगठन है जिसने एक बार वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और अमेरिका के रक्षा विभाग के मुख्यालय भवन पेंटागन पर आतंकी हमला कर अमेरिकी आधिपत्य को चुनौती दी थी।

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमला

अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा अव्यवस्था और हिंसा को बढ़ावा देने से वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। अन्य इस्लामी आतंकवादी संगठनों के समान, तालिबान भी रूढ़िवादी है और सामाजिक-राजनीतिक सुधारों के खिलाफ है।

अफगानिस्तान में उनकी जीत न केवल दक्षिण एशिया को अस्थिर करेगी बल्कि 2014 में सीरिया और लेवांत क्षेत्र में इस्लामिक स्टेट के उदय की तरह ही इसका वैश्विक प्रभाव पड़ेगा। तालिबान अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे कई राष्ट्र-राज्यों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुनौतियाँ पेश करेगा, क्योंकि वे अमेरिकी सेनाओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अत्याधुनिक हथियारों पर कब्ज़ा कर रहे हैं।

यह एक लंबे समय के लिए वैश्विक शांति और सुरक्षा को चुनौती देगा। साथ ही यह पाकिस्तान आधारित आतंकवादी संगठनों को तालिबान शासित क्षेत्रों में अधिक रणनीतिक लाभ प्राप्त करने की गुंजाइश भी प्रदान कर सकता है और राष्ट्रीय-सुरक्षा के साथ-साथ मानव-सुरक्षा के लिए बाधा उत्पन्न करेगा।

अफगान भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

शांति और विकास से जुड़े कम-से-कस तीन कारण हैं जो अफगानिस्तान को भारत के लिए महत्वपूर्ण बनाते हैं। सबसे पहला, अफगानिस्तान की रणनीतिक स्थिति भारत की सुरक्षा के लिए मायने रखती है क्योंकि यह मध्य एशियाई गणराज्यों (सीएआर) में प्रवेश करने का द्वार है।

पाकिस्तान और चीन को प्रति-संतुलित करने में भी यह महत्वपूर्ण है। सीएआर के साथ व्यापार के लिए भारत हिंद महासागर के समुद्री संचार रास्तों के माध्यम से ग्वादर बंदरगाह का उपयोग करता है, और बाद में डेलाराम राजमार्ग, जिसे भारत ने अफगानिस्तान में बनवाया है और जो सीएआर को जोड़ता है, द्वारा मध्य एशिया में व्यापार को आगे बढ़ता है।

यह मार्ग चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के साथ भी प्रतिस्पर्धा करता है और आवश्यक राजनीतिक स्थिरता को देखते हुए बीआरआई के विकल्प के रूप में भी काम करता है। दूसरा, चूँकि भारत ने अफगानिस्तान के विकास और पुनर्निर्माण में एक बड़ी राशि का निवेश किया है, एक स्थिर और शांतिपूर्ण अफगानिस्तान भारत के पक्ष में है।

अफगान-भारत मैत्री बांध का संयुक्त रूप से लोकार्पण करते नरेंद्र मोदी, अशरफ गनी

इसकी अफगान लोगों की भी ज़रूरत है क्योंकि जहाँ तक अफगानिस्तान में भारत के हस्तक्षेप का सवाल है तो यह मानवीय और सृजनात्मक है। भारत ने चिकित्सा सुविधाओं के साथ बांधों, राजमार्गों और संसद भवन सहित प्रमुख परियोजनाओं का निर्माण किया है।

भारत उन देशों में से एक है जो अफगान सेनाओं को प्रशिक्षित करता है और बंदूक के बजाय मतपत्र के माध्यम से राजनीतिक परिवर्तन का प्रयास भी करता है। संक्षेप में, तालिबान के पुनर्जन्म के बाद अफगानिस्तान में शांति बहाली की भारतीय उम्मीद खतरे में होगी।

तीसरा, अफगानिस्तान में शांति घटने के कारण भारत अफगान प्रवासियों का घर बन गया है। तालिबान 2.0 में रोहिंग्याओं की तरह अवैध प्रवासन हो सकता है जो भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न करेगा। अगर अफगानिस्तान स्थिर, खुला और शांतिपूर्ण देश नहीं रह जाता है तो भारत को इस्लामी चरमपंथियों से लड़ने में बड़ी चुनौती पेश आएगी।

भारत के लिए नीति विकल्प

अफगानिस्तान दुनिया की महाशक्तियों का कब्रिस्तान रहा है और यह हमें बताता है कि अफगानिस्तान में कठोर शक्ति (हार्ड पावर) काम नहीं करती। भारत के पास तालिबान के बढ़ते होने के वर्तमान संदर्भ में बातचीत और अनुनय के सीमित विकल्प हैं।

भारत कभी भी ऐसे गैर-सरकारी कर्ताओं का समर्थन नहीं करता है, लेकिन वर्तमान स्थिति में यह आवश्यक होगा कि अफगानिस्तान में शांति स्थापित की जानी चाहिए। चूँकि अफगानिस्तान में भारत के राष्ट्रीय हित दाँव पर हैं, इसलिए बेहतर होगा कि तालिबान के अधिकारियों और अफगान की चुनी हुई सरकार को बातचीत की मेज़ पर बुलाया जाए।

इससे पहले 1990 और 2000 के दशक में भारत तालिबान विद्रोहियों के साथ किसी भी तरह के कूटनीतिक व्यवहार और बातचीत का विरोध करता था, लेकिन अब अफगानिस्तान के प्रति भारत की रणनीति विकसित और व्यावहारिक हुई है।

नौवें हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में, जिसका विषय ‘शांति और विकास के लिए आम सहमति को मजबूत करना’ था, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि भारत अफगान सरकार और तालिबान के बीच बातचीत में तेज़ी लाने के लिए किए जा रहे सभी प्रयासों का समर्थन कर रहा है।

नई दिल्ली दोनों को बातचीत के पटल पर लाने और उन्हें एक साझा कार्यक्रम पर लाने की इच्छा को दर्शाती है ताकि शांति और सौहार्द सुनिश्चित किया जा सके।

लेखक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी, बिहार में शांति और संघर्ष अध्ययन पढ़ाते हैं।