विचार
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या हमारी बदलती सामाजिक व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करती

क्या रंगीन दुनिया अवसाद की ओर ले जाती है और मौत की ओर धकेलती है? सुशांत सिंह राजपूत का जाना बहुत कुछ कहता है। कुछ दिनों पूर्व रंगमंच कलाकार प्रेक्षा मेहता और उससे कुछ दिनों पूर्व पत्रकार रिजवाना तबस्सुम द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबरें आईं थीं। हाल में घटित ये दुर्घटनाएँ क्या संकेत देती हैं? क्या रंगीन दुनिया इंसानों में केवल सपने देखने का जज़्बा भर देती है, उससे अधिक कुछ नहीं। 

अपनी फिल्मों में उत्साही, साहसी, हिम्मती, खुशमिजाज़ और महत्वाकांक्षी भूमिका निभाने वाले सुशांत सिंह राजपूत द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर पर सहसा विश्वास नहीं होता। अपनी फिल्म ‘छिछोरे’ में अपने बेटे से वे कहते हैं, “ज़िंदगी में ज़िंदगी से बढ़कर कुछ नहीं होता।”

बिहार के छोटे से शहर पूर्णिया से ताल्लुक रखने वाले इस सामान्य पृष्ठभूमि के व्यक्ति ने मुंबई की मुख्य धारा सिनेमा में अपने दम पर सफलता की गाथा लिखी थी। टेलीविज़न से फिल्म तक उन्होंने अपने बल पर पहचान कायम की थी। मुंबई फिल्म उद्योग में अपने दम पर पहचान कायम करना कितना मुश्किल भरा सफर होता है इससे सब परिचित हैं। 

ऐसे में सुशांत सिंह राजपूत कमज़ोर दिल के व्यक्ति तो कभी हो ही नहीं सकते। इस फिल्म उद्योग में तो बाहर का कोई व्यक्ति बिना संघर्ष और जज़्बे के अपनी पहचान बना ही नहीं सकता। जीवन का महत्त्व और संघर्ष की परिभाषा तो इस शख्स के लिए कतई मुश्किल नहीं हो सकती।

तो क्या परिवार या अपनों से दूर होना उनके लिए घातक सिद्ध हुआ। सुशांत सिंह राजपूत ने अपनी मृत्यु से सिर्फ 10 दिन पूर्व अपनी माँ को सोशल मीडिया मंच ‘इंस्टाग्राम’ पर एक पोस्ट लिखी थी, “निगोशिएटिंग_बिटविन__टू।” यही भीतर का समन्वय या संतुलन जब टूट जाता है तब इंसान जीने से बेहतर मरना समझता है।

उनकी यह पोस्ट काफी कुछ कहती है। वास्तव में इंसान सफलताओं की अंधी होड़ में बहुत कुछ भूल जाता है। ऐसे में उसे सबसे अधिक ज़रूरत होती है अपनों की, उनकी संवेदनाओं की। दुर्भाग्यवश आज के दौर का सफल व्यक्ति बहुधा इन सबसे दूर होता जा रहा है।  

हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति भी इस हेतु काफी कुछ ज़िम्मेदार है। यहाँ सफलता का मतलब पद, पैसा, रसूख। हद से ज्यादा भौतिकवाद। हमारी शिक्षा व्यवस्था का केंद्र-बिंदु भौतिकवाद होता जा रहा है जो कि एक अनैतिक समाज के निर्माण में मुख्य भूमिका निभा रहा है। दुख होता है उस देश के लिए जहाँ मर्यादा, मूल्य, परिवार, समाज, मानवीय आदर्शों की स्थापना ही सब कुछ होता था, वहाँ ऐसी स्थिति निर्मित हो चुकी है।  

आत्महत्या केवल एक व्यक्ति नहीं करता, बल्कि अपने अंत के साथ ही वह इस सामाजिक व्यवस्था पर भी प्रश्न चिह्न खड़े करता है। क्या हमारा समाज अपने आस-पड़ोस से विमुख होता जा रहा है। हम सब क्यों इस शहरीकरण की पश्चिमी प्रवृत्ति को सह रहे हैं। युवा पीढ़ी को भौतिकता की अनावश्यक, अनियंत्रित तथा दिशाहीन दौड़ से बचना चाहिए।

तमाम संघर्षों की राह में सुशांत सिंह राजपूत का चमककर उभर आना और फिर विलीन हो जाना। पूर्णिया से पटना का सफर, फिर इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करना, उसके बाद सिनेमा और टेलीविज़न में सफल होना, उनके संघर्ष और मेहनत का ही जीवंत सफर है जो अब कथा बन चुकी है। 

उन्होंने अपनी मेहनत से वह सब हासिल किया जो एक छपरा, पूर्णिया, देवरिया, पलवल या बलिया के लड़के के लिए काफी मुश्किल होता है, उनकी सफलता युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा स्रोत थी। उनका इस तरह से जाना इन छोटे शहरों के युवाओं को यह सोचने को कई बार मजबूर करेगा कि क्या यह सफलता जानलेवा भी हो सकती है।   

हो सकता है उनके इस अंत के पीछे कोई और कारण रहा हो। अवसाद, निजी रिश्ते हों या शायद कुछ और। पर क्या उन्होंने इसी अंत के लिए इतना संघर्ष किया था। यदि सनातन धर्म के पुनर्जन्म सिद्धांत को मान भी लें तो क्या उन्होंने अपने को तपाकर जो कुंदन जैसा जीवन प्राप्त किया था उसका अंत क्या संदेश देगा।

कई बार कोई समय हमारे मन को दूसरी अवस्था की ओर ले जाता है। एक स्वस्थ इंसान भी परिस्थितिवश अवसाद में चला जाता है। ऐसे में यह ज़रूरी है कि हम सभी आत्म दया, अपराध बोध आदि भावों के प्रति सचेत रहें। किसी भी अवसाद का सबसे बेहतर इलाज है- अपने आसपास किसी को अकेला नहीं छोड़ें, परस्पर बातचीत बनाए रखें।

खबरों के मुताबिक वे पिछले छ: माह से अवसाद से पीड़ित थे, ऐसे में उनका अकेले रहना क्या इस अंतिम यात्रा में उन्हें खींच ले गया। सोशल मीडिया या चैनलों पर प्रसारित खबरों को देखकर यह कहा जा सकता है कि समाज एवं मीडिया को इस प्रकार की खबरों के दौरान थोड़ा संतुलन रखना चाहिए। ताकि समाज में किसी प्रकार का नकारात्मक संदेश न जाए।  

आज की अंधी होड़ में यह समझ में ही नहीं आता कि कौन किस मानसिक अवसाद से जूझ रहा है, कौन किस तकलीफ में है। पैसा एवं सुविधाएँ खुशी या सुकून का एकमात्र पर्याय नहीं हैं।

देश में आत्महत्या की इस बढ़ती प्रवृति की रोकथाम के लिए यह ज़रूरी है कि युवा होते इस देश में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर शिक्षक, प्रशासक, समाज और सरकार मिलकर कुछ सोचे और जीवन की व्यावहारिक चुनौतियों से निपटने का पाठ्यक्रम बनाएँ और उसे अनिवार्य रूप से लागू करें।

यह भी ज़रूरी है कि बात करते रहिए, दो-चार दोस्त ऐसे रखिए जिनसे आप कुछ भी विमर्श कर सकते हैं और वे आपका आँकलन न करें। साथ ही हम सभी विनम्र रहें। और सबसे ज़रूरी माता-पिता, शिक्षक अपने बच्चों को मानसिक रूप से सशक्त बनाए। बच्चों को असफलता एवं संघर्ष का सामना करना ज़रूर सिखाएँ।  शिक्षा पद्धति में भारतीय जीवन मूल्यों की स्थापना बेहद ज़रूरी है।