विचार
सुभाष चंद्र बोसः समर्थन और विश्वासघात
सुभाष चंद्र बोसः समर्थन और विश्वासघात

प्रसंग
  • सुभाष चंद्र बोस ने भारत की आजादी के लिए (विशेष मैत्री संबंध वाले देशों) एक्सिस शक्तियों के मदद माँगी, लेकिन अंग्रेजों की नरसंहारात्मक नीतियों में साथ मिलकर काम करने वाले मार्क्सवादियों के विरोध में उन्होंने खुद को अपनी ही नीतियों से दूर कर लिया।
  • आजाद हिंद सरकार की 75वीं वर्षगाँठ पर आइये देखते हैं कि कौन नेताजी बोस के समर्थक थे और कौन विश्वासघाती।

जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस (1897-1945?) भारत की आज़ादी के लिए बड़ा जोखिम लेकर लड़ रहे थे, तो कई ऐसी ताकतें थीं जिन्होंने उनको समर्थन दिया और यहाँ तक कि जब वे नाज़ी मदद पाने के लिए उनके निराशाजनक फैसले को लेकर दो राय थे, चुपचाप उनको देखा। इसके अलावा कुछ ऐसी भी ताकतें थीं जिन्होंने खुलेआम उनका विरोध किया, उनके प्रयासों को क्षति पहुँचाई, बर्बाद किया, यहाँ तक कि अंग्रेजों के लिए उनके साथ विश्वासघात किया। इसलिए, आजाद हिंद सरकार की 75वीं वर्षगाँठ पर आइये हम देखते हैं कि कौन नेताजी बोस के समर्थक थे और कौन विश्वासघाती।

रास बिहारी बोस (1886-1945), एक महान भारतीय क्रांतिकारी और 1916 से जापान में निर्वासित, पूरे एशियावाद के वकील थे। उनको जापान में एशियाई देशों को उपनिवेशवाद से आजाद करने का एक अवसर मिला। साथ ही, वह जापान की साम्राज्यवादी योजनाओं को लेकर बहुत सहज नहीं थे। हालाँकि दूसरे विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने चुप्पी साध ली और केवल भारत की आज़ादी पर ध्यान देने लगे, 1934 की शुरूआत में ही उन्होंने जापान को चेतावनी दे दी थी कि वह संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) और (उस समय गैर-कम्यूनिस्ट) चीन के साथ-साथ सोवियत संघ का विरोध न करे। उन्होंने चेतावनी दी थी “एक अमेरिकी जापानी युद्ध उन दो महान ताकतों को कमजोर कर देगा जो ग्रेट ब्रिटेन के कड़े प्रतिद्वंद्वी हैं। उन अमेरिकियों और जापानियों को जो सच्चे देशभक्त हैं उनको अमेरिका-जापान की दोस्ती को बढ़ावा देने के लिए अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए।”

रास बिहारी बोस ने थाईलैंड का दौरा भी किया और वहाँ पर देशभक्त भारतीयों के लिए एक आधार नेटवर्क बनाया। बोस ने बैंकॉक में भारतीय स्वतंत्रता लीग (आईआईएल) की स्थापना की और मलाया में इसकी शाखाएँ स्थापित की गईं। जापान के हाथों सिंगापुर के हारने के बाद, रास बिहारी बोस ने आजाद हिंद फौज (आईएनए) का गठन किया था। इस फौज को रास बिहारी बोस द्वारा सुभाष चंद्र बोस को सौंप दिया गया था।

इस मिशन में, विनायक दामोदर सावरकर की भूमिका को कमतर नहीं देखा जा सकता है। रास बिहारी बोस और सावरकर ने हिन्दू महासभा के माध्यम से संबंध स्थापित किए थे, जिसकी जापानी शाखा की अगुवाई रास बिहारी बोस द्वारा की जाती थी। सावरकर ने ही बोस को विदेश जाने और वहाँ से लड़ाई करने के लिए कहा था। उसी समय वह, भारतीय युवाओं को सेना में शामिल होने और युद्ध का प्रशिक्षण हासिल करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। 21 जून 1940 को बोस की मुलाकात सावरकर से हुई। सावरकर ने बोस को भारत छोड़कर यूरोप जाने और वहाँ पर भारतीय सैनिकों को व्यवस्थित करने तथा जापान द्वारा ब्रिटेन पर युद्ध की घोषणा करते ही तुरंत हमला करने की सलाह दी थी। (एसएन सेन, हिस्ट्री ऑफ दि फ्रीडम मूवमेंट इन इंडिया (1857-1947))। जुलाई 1940 मे बोस को गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन जनवरी 1941 में वह बच निकले और भारत छोड़कर चले गए। जब बोस ने भारत की आजादी के लिए युद्ध और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थिति का फायदा उठाने का फैसला लिया, तो उनके इस मिशन में सावरकर और रास बिहारी बोस अहम सहयोगी बन गए।

सावरकर की भूमिका के बारे में बोस ने खुद बताया था। 25 जून 1944 को आजाद हिंद रेडियो ने इस प्रकार सावरकर की प्रशंसा की थीः

“जब राजनीतिक गुमराही और दूरदर्शिता की कमी के कारण, कांग्रेस पार्टी का हर नेता हिंद फौज के जवानों को भाड़े का सिपाही कहकर निंदित कर रहा है, वैसे समय में यह जानकर अपार खुशी हो रही है कि वीर सावरकर निर्भयतापूर्वक भारत के युवाओं को फौज में शामिल होने के लिए लगातार भेज रहे हैं। ये सूचीबद्ध युवा हमारी आजाद हिंद फौज के लिए सैनिकों और प्रशिक्षित पुरूषों के लिए स्वयं को हमें सौंपते हैं।”

बोस के मिशन की एक अन्य अहम समर्थक अनुशीलन समिति थी। यह एक बंगाली क्रांतिकारी संगठन था जिसके मूल सिद्धान्त स्वामी विवेकानंद और श्री अरबिंदो के सिद्धान्तों पर आधारित थे। यहाँ तक कि बाद में जब उनपर रूसी क्रांति का प्रभाव पड़ा, उन्होंने अपनी राष्ट्रीय पहचान और आजादी को बरकरार रखा था। सावरकर से मिलने के बाद बोस ने विदेश जाने का फैसला लिया, अनुशीलन समिति तैयार हो गयी। डॉ. मंजू गोपाल मुखर्जी लिखते हैं:

“इस मिशन में अनुशीलन समिति ने बोस की मदद की थी। सावरकर और रास बिहारी बोस के साथ संपर्क स्थापित किया गया था। अनुशीलन के त्रिदिब चौधरी इस मार्ग से बोस के भागने की संभावनाओं का पता लगाने और पहाड़ी जनजातियों की सहायता प्राप्त करने के लिए उत्तर पश्चिम फ्रंटियर प्रांत में एक सर्वेक्षण के लिए गए।”

‘सुभाष चंद्र एंड दि रिवॉल्यूशनरीज’ इन नेताजी सुभाष चंद्र बोस एंड इंडियन फ्रीडम स्ट्रगलः सुभाष चंद्र बोसः हीज आइडियाज़ एंड विजन  संपादन रत्ना घोष, 2006

संयोग से, नागपुर के एक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार समिति के एक पूर्व सदस्य निकले। हेडगेवार की मृत्यु से कुछ दिन पहले ही हितवाद (23 जून 1940) और एक अंग्रेजी पत्रिका मॉर्डन रिव्यू  दोनों ने ही बोस और हेडगेवार की मुलाकात की सूचना दी थीः “डॉ. हेडगेवार की 51 साल की उम्र में ही उच्च रक्तचाप के कारण नागपुर में मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु से सिर्फ एक दिन पहले ही सुभाष चंद्र बोस उन्हें देखने गए थे।”

हालाँकि, एक वैचारिक व्यवस्था मौजूद थी जिसको पूरी तरह से उनके अतिरिक्त क्षेत्रीय स्वामियों द्वारा निर्देशित किया गया था। जब गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने नाज़ियों का विरोध किया और इस बात को लेकर भ्रमित थे कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय उत्पन्न होने वाली स्थिति का फायदा उठाने के लिए उनको क्या कदम उठाने चाहिए, वे कुछ अतिरिक्त क्षेत्रीय जन्मभूमि के लिए अपनी देश भक्ति से ओत-प्रोत नहीं थे। जब सावरकर और बी आर अम्बेडकर ने यह फैसला लिया कि भारतीय युवाओं को युद्ध द्वारा प्रदान किए गए अवसर का लाभ उठाना चाहिए और सेना में शामिल होना चाहिए, वे अपनी इस धारणा से निर्देशित थे कि राष्ट्र के लिए क्या अच्छा था। उन्होंने युद्ध में ब्रिटिश भारतीय सेना को भारतीयकृत करने की संभावना पहले से कहीं अधिक देखी थी और देखा कि अंग्रेजों के जाने के बाद यह भारत की सेवा करेगी। उनका दृष्टिकोण इतिहास द्वारा न्यायोचित है।

इन नेताओं के विपरीत, कम्युनिस्टों ने केवल अपने उपनिवेशवाद के मार्क्सवादी नजरिए से इस युद्ध को देखा। जब सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएसयू) और स्टालिन हिटलर के साथ शांति में थे, उनके लिए युद्ध पूँजीवादी साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा राज्य संबंधी था इस तरह से वे अंग्रेजों और युद्ध का विरोध कर रहे थे। जब नाजियों ने सोवियत संघ पर हमला किया तो रातोरात यह युद्ध ‘पीपुल्स वॉर’ बन गया। उन्होंने राष्ट्रीय नेताओं और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की निन्दा करनी शुरू कर दी।

सुभाष चंद्र बोस का अपमान करता हुआ कलाकारों द्वारा बनाया गया कार्टून। इस कार्टून में बोस को एक बौने और बिल्ली के रूप में चित्रित किया गया है जिसको एक जापानी के द्वारा निर्देशित किया जा रहा है या नाजियों के मनोरंजन के लिए वह उसको उठाए हुए है। मार्क्सवादियों ने खुले तौर पर नस्लवाद का इस्तेमाल करने में जरा भी संकोच नहीं किया। एक कार्टून में, उन्होंने नेताजी को जापानी युद्ध के राक्षस के क्रूर चेहरे के लिए मुखौटे के रूप में चित्रित किया था। जबकि नेताजी के मुखौटे वाले चेहरे को निष्पक्ष और सफेद दिखाया गया, जापानी के क्रूर चेहरे को पूरी तरह से काला और स्याह दिखाया गया था।

पीपुल्स वॉर पत्रिका के माध्यम से, सीपीआई ने नेताजी बोस को “जापानी फसिस्टवाद का दौड़ने वाले कुत्ता” कहकर उनके खिलाफ एक अभद्र आंदोलन शुरू किया था। वे किसी के चरित्र की हत्या करने में जरा भी संकोच नहीं करते थे। उन्होंने आधिकारित तौर पर लिखा कि बोस रंगून की एक विला में विलासी जीवन जी रहे थे जिसमें उनको विशेष मैत्री संबंध वाले देशों (एक्सिस शक्तियों) द्वारा भ्रष्ट धन दिया गया था। यहाँ तक कि उन्होंने बोस को विलासी वस्तुओं के लिए धन मुहैया कराने वाले बैंक – साउथ रीजन्स डेवलपमेंट बैंक – का नाम जानने का भी दावा किया था। 10 जनवरी 1943 के मुद्दे पर, पत्रिका में कहा गया कि अगर “बोस की भाड़े की आजाद फौज, डकैती और लूटपाट….छीना-झपटी और चोरी जैसे कामों को अंजाम देने के लिए भारत की मिट्टी पर कदम रखने की हिम्मत करती है” तो यह “हमारे लोगों के गुस्से और आक्रोश आ सामना करेगी ।”

इन सभी चित्रणों में बोस को जिसमें सबसे बुरे रूप में चित्रित किया गया था वह आकाल पीड़ित बच्चों पर जापानी बम के साथ बोस को गिरते हुए चित्रित करना। इस कार्टून को 1942 में प्रकाशित किया गया था। उसी साल सर जॉन हर्बर्ट ने बंगाल के जिलों से 24 घंटे के अंदर अतिरिक्त चावलों को हटाने का आदेश दिया था और अधिकारियों ने हजारों टन चावल की बर्बादी की सूचना दी थी। ब्रिटिश सैनिकों ने बंगाल के गाँवों पर कब्जा कर वहां के लोगों के साथ मारपीट की थी और महिलाओं का बलात्कार किया था। एक गाँव (मसूरिया) में ब्रिटिश सैनिकों द्वारा 46 महिलाओं का बलात्कार किया गया था जबकि अनाज को जब्त कर लिया गया था और बर्बाद कर दिया गया था। हिन्दुओं पर चर्चिल का ‘गुप्त युद्ध’, बंगाल अकाल, शुरू हो गया था। जब तक चर्चिल का ‘होलोकॉस्ट’ समाप्त हुआ तब तक लाखों बंगाली, हिन्दू और मुस्लिम दोनों अपनी जान से हाथ धो चुके थे।

इतिहासकार जेम्स  हार्टफील्ड लिखते हैं:

लेकिन भारतीयों ने ब्रिटिश समर्थित अधिकारियों की भुखमरी से राहत के लिए चावल की मांग करने के प्रयासों का जोरदार विरोध किया। उन्होंने अपनी राहत समितियों की स्थापना की जिनका संचालन श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे लोग कर रहे थे, जिन्होंने यह कहते हुए किसानों को सरकारी एजेंटों के पास अनाज बेचने से मना कर दिया था कि अधिकारी वर्ग सेना और निर्यात के लिए अनाज का उपयोग कर रहा है। सुभाष चंद्र बोस ने बर्मन नेता बा माव के समर्थन से रेड क्रॉस के माध्यम से बंगाल को बर्मी चावल देने की पेशकश की- जिसे सीमा पार आने में कुछ ही समय बाकी था। दरअसल भारत में बोस के समर्थक मुखर्जी राहत समितियों में चावल का वितरण करने में सक्रिय थे जिसे ब्रिटिश स्वयं हथियाने की कोशिश कर रहे थे। ब्रिटिश अधिकारियों ने बोस के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और ब्रिटिश राज्य के मुक़ाबले भारत को भूखा मारता हुआ देखना पसंद किया।  

जेम्स हार्टफील्ड, अनपैट्रियोटिक हिस्ट्री ऑफ दि सेकेंड वर्ल्ड वार (2012)

मार्क्सवादियों ने न केवल बंगाल के अकाल के दौरान अंग्रेजों का समर्थन किया बल्कि अंग्रेजों के समर्थन में बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ एक सांप्रदायिक प्रचार भी शुरू किया। कॉमरेड पी. सी. जोशी ने अपने आक्षेप में मुखरजी पर इशारा करते हुए कहाः “डॉ. श्यामाप्रसाद ने नेतृत्व किया, हिंदू संगठन ने धन संचय किया और तय किया कि क्या किया जाए। पंचवे स्तम्भ ने करकर्ताओं को उपलब्ध कराया। यह गुटबंदियों, मुनाफाखोरों और देशद्रोहियों का एक विचित्र संयोजन है। और पांचवां स्तंभ कौन था? अग्रिम गुट और अनुशीलन समिति।” यहां तक कि पीपुल्स वार ने एक ऐसा कार्टून प्रकाशित किया जिसमें बोस अकाल पीड़ित भारतीय बच्चों की हत्या करते हुए दिख रहे थे।

लेकिन मार्क्सवादी विश्वासघात और बोस का पीठ पीछे वार करना कल्पना से परे हो गया। एक कम्युनिस्ट भारतीय था जिसने अपने वास्तविक वैचारिक संबंध को छिपाते हुए बोस के राष्ट्रवादी सहयोगी के रूप में कार्य किया। उसके विश्वासघात ने बोस की योजनाओं को भारी नुकसान पहुँचाया। इतिहासकार रोमेन हेस लिखते हैं:

बोस के निर्देशों ने इस दृढ़ आस्था को प्रतिबिंबित किया कि यह घटना एक्सिस द्वारा भारत पर हमला करने और क्रांति के विफल होने से पहले की थी। जैसा कि घटनाओं ने सिद्ध किया कि बोस वास्तव में बिल्कुल सही थे जब उन्होंने भारत में एक सीमान्त क्रांति, एक विस्फोटक स्थिति की भविष्यवाणी की थी। बोस के निर्देशन ने अंग्रेजों के लिए गंभीर समस्याएं पैदा की होंतीं अगर तलवार ने उन्हें (अंग्रेजों को) सोवियत खुफिया जानकारी नहीं दी होती। भगत राम तलवार एक कम्युनिस्ट थे, बोस ने कभी संदेह नहीं किया कि वह सोवियत एजेंट भी थे। उसने न केवल सोवियत, जो कि उन्हें नुकसान पहुंचाकर संतुष्ट हो रहा था, के सामने बोस की योजनाओं का खुलासा किया बल्कि मास्को और लंदन दोनों में सूचना पहुंचाते हुए एक्सिस योजनाओं के बारे में काबुल में जर्मन और इटली के दूतावासों से जितनी खुफिया जानकारी इकट्ठा कर सकता था उतनी की।

रोमेन हेस, बोस इन नाज़ी जर्मनी, रैंडम हाउस, 2011

इस प्रकार, बोस की योजनाओं को नाकाम करके और उनके खिलाफ एक घातक अभियान में शामिल होकर मार्क्सवादियों ने सक्रिय रूप से अंग्रेजों की नरसंहार नीतियों के साथ सहयोग किया।

आइए मतभेद पर विचार करें। सुभाष चंद्र बोस ने, नाज़ियों से युद्ध में भारतीय कैदियों का उपयोग करते समय भी, नाज़ियों के जातिवादी सिद्धांतों को कभी स्वीकार नहीं किया और अपनी कमजोर स्थिति के बावजूद उनका विरोध किया। इतिहासकार डॉ डैनियल ब्रुकेनहॉस लिखते हैं:

1933 और 1936 के बीच, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के पूर्व महासचिव और कलकत्ता के मेयर सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में भारतीयों को जातीय भेदभाव से बचाने के लिए एक अभियान चलाया। जर्मनी के कई दौरों में, बोस ने भारतीय हितों के समर्थन के लिए जर्मन विदेश कार्यालय के कर्मचारियों से मुलाकात की। भारत में उनकी अच्छी प्रतिष्ठा और राजनीतिक सहयोगियों के साथ उनका उत्कृष्ट संपर्क होने के कारण, बोस ने जर्मनी में जो कुछ भी सीखा था उसे भारतीय पाठकों को बताने के माध्यम से जर्मन सरकार पर काफी दबाव डालने में सक्षम थे।

पोलिसिंग ट्रांसनेशनल प्रोटेस्टः लिबरल इंपीरियलिज्म ऐन्ड दि सर्विलांस ऑफ ऐंटीकॉनोलिस्ट्स इन यूरोप, 1905-1945, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2017

1936 में, जब हिटलर ने भारतीयों के खिलाफ कुछ अपमानजनक टिप्पणी की, नेताजी ने तीक्ष्ण भाषा में उसकी निंदा करने में संकोच नहीं किया:

पिछले कुछ हफ्तों से जर्मन फ्यूहरर द्वारा भारतीय लोगों के बारे में अपमानजनक टिप्पणियों पर मेरा मन बहुत अशांत हो गया है। यह पहली बार नहीं है कि नाजी जर्मनी के उत्कृष्ट नेताओं ने भारत का अपमान किया है। यह स्पष्ट है कि जर्मनी आज भारत का अपमान करके इंग्लैंड के साथ साँठ-गांठ करने के लिए दृढ़ संकल्पित है। अगर जर्मन अंग्रेजों के तलवे चाटना चाहते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं हो सकती है, लेकिन अगर वे सोचते हैं कि भारत का अपमान हम सह लेंगे तो वे गलती कर रहे हैं। मुझे इस बात का इशारा मिलते हुए खुशी हो रही है कि भारत में जनता की राय पहले से ही इस सवाल पर प्रकट हुई है और मुझे उम्मीद है कि हम यह प्रदर्शित करने में सक्षम होंगे कि भारतीय लोगों को अब माफी देने के साथ अपमानित नहीं किया जा सकता है।

मिहिर बोस, राज, सीक्रेट्स, रिवोल्यूशनः अ लाइफ ऑफ सुभाष चन्द्र बोस, 2004

बोस ने भी समर्थन किया कि भारतीय छात्रों को जर्मन उत्पादों का बहिष्कार करना चाहिए और जर्मनी को आर्थिक रूप से आघात पहुंचाना चाहिए। जब उन्होंने जर्मनी के जातीय सिद्धांतों को उनके आंतरिक मामले के रूप में माना, चब उन्होंने स्पष्ट किया कि जहां तक उनका संबंध था, उन्होंने जातीय सिद्धांत को वैज्ञानिक आधार नहीं माना। उन्होंने साफ तौर पर कहा, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम इसके खिलाफ कितना ठोस वैज्ञानिक कारण पेश कर सकते हैं”, नाज़ियों ने अपने जाति सिद्धांत को नहीं त्यागा। लेकिन उन्होंने उन्हें चेतावनी दी कि उन्हें भारतीयों को उनके जाति सिद्धांत पर भड़काया नहीं जाना चाहिए और जब वह नहीं चाहते थे कि वे जर्मन प्रेस में भारतीयों के पक्ष में कुछ लिखें तो उन्होंने मांग की कि उन्हें “भारत के खिलाफ लिखना” नहीं चाहिए।

साथ ही, उन्होंने एक्सिस ताकतों से खुद को दूर करने के लिए सावधानी बरती और फिर से यही कहा कि उनके साथ उनका सहयोग केवल भारतीय आजादी में उनकी सहायता तक ही सीमित था। 17 जून 1942 को उन्होंने कहा कि जर्मनी या इटली या जापान की आंतरिक नीतियों से हमारा कोई वास्ता नहीं है। उन्होंने घोषणा की, “बाहरी क्षेत्र में त्रिपक्षीय शक्तियों के साथ पूर्ण सहयोग के लिए खड़े होने पर मैं स्वतंत्र भारतीय राष्ट्र की आंतरिक नीति में हस्तक्षेप कभी सहन नहीं करूंगा।” सबसे महत्वपूर्ण रूप से उन्होंने बतायाः

… जहां तक सामाजिक आर्थिक समस्याओं के संबंध में किसी को भी अंतिम रूप से यह मानने की गलती नहीं करनी चाहिए कि त्रिपक्षीय शक्तियों के साथ बाहरी सहयोग का अर्थ आंतरिक मामलों में उनके प्रभुत्व या उनकी विचारधारा की स्वीकृति थी।

आज़ाद हिंद: राइटिंग्स एंड स्पीच, 1941-1943, ओरिएंट ब्लैक्सवान, 2002

हर किसी को ध्यान देना चाहिए कि बोस तबाही से अवगत नहीं थे लेकिन फिर भी उन्होंने नाज़ियों की जातीय नीतियों और सिद्धांतों से स्वयं को बहुत दूर रखा। भारत की आजादी के लिए एक्सिस ताकतों के समर्थन की मांग करने का मतलब उनके जातीय सिद्धांतों तथा नरसंहार नीतियों को स्वीकार करना कभी न था।

इसके विपरीत, मार्क्सवादियों ने विशेष रूप से बंगाल के अकाल के संदर्भ में अंग्रेजों की नरसंहार नीतियों के साथ मिलकर काम किया। बोस की पीठ पर वार करने और उनकी योजनाओं को विफल करने में उन्होंने संकोच नहीं किया। उन्होंने अंग्रेजों से प्राप्त समर्थन की तरह उनके वैचारिक कट्टरपंथ और अन्य निहित हितों के कारण भारत के साथ विश्वासघात किया। 2016 के अंत में, वामपंथी पत्रिकाओं ने प्रचारकों की तरह कार्य किया जिन्होंने इस बार श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बदनाम करने के लिए अंग्रेजों का समर्थन किया और बोस को नकार दिया। (वामपंथियों के आरोप पर स्वराज्य की प्रतिक्रिया यहां देखें)

इसलिए सुभाष चंद्र बोस की इस 121वीं जयंती पर, आइए हम उनके महान त्याग और भारत को आजाद कराने के लिए उनके आत्मबलिदानी युद्ध में उनका साथ देने वाले लोगों और सेना को याद करें और हमें उन्हें भी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने बोस के साथ विश्वासघात करके उनकी पीठ में छुरा घोंपा और आजादी को हम से दूर रखा।

अरविंदन स्वराज्य के एक सहायक संपादक हैं।