विचार
पराली जलाने की समस्या का उपाय किसानों की जागरूकता, सरकार के सहयोग में निहित

दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए पर्यावरण प्रदूषण (निषेध और नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) के स्थान पर वायु गुणवत्ता प्रबंधन के लिए एक आयोग गठित किया गया था। सोमवार (23 नवंबर) को एक बैठक के बाद बयान आया कि वायु प्रदूषण रोकने के लिए पराली जलाने पर नियंत्रण के लिए उपयुक्त रणनीति और नीतियाँ बनाई जाएँगी।

प्रश्न यह उठता है कि क्या पराली जलाने का कोई विकल्प नहीं है और यदि है तो उसे लागू क्यों नहीं किया जा रहा। इस विषय पर एलायंस फॉर सस्टेनेबल एंड होलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) द्वारा आयोजित एक वेबिनार में खेती विरासत मिशन (पंजाब)कुदरती खेती अभियान (हरियाणा) और सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के प्रतिनिधियों, वक्ताओं और किसानों ने चर्चा की थी।

चर्चा में उभरकर आया कि ओर जहाँ दिल्ली सरकार पूसा बायोडिकम्पोज़र पर ज़ोर देने की बात कर रही है, वहीं कई सरकारें ऐसी हैं जो स्थाई उपायों का समर्थन और प्रोत्साहन नहीं कर रही हैं। दिल्ली की आप सरकार राजधानी में प्रदूषण के लिए लगातार हरियाणा और पंजाब सरकारों पर आरोप लगा रही है।

खेती विरासत मिशन के उमेंद्र दत्त ने कहा, “हमें यह याद रखना चाहिए कि दिल्ली का वायु प्रदूषण संकट कई कारणों से है, न कि केवल किसानों द्वारा पुआल जलाने से।” हालाँकि ध्यान दिया जाना चाहिए कि कई दिन ऐसे भी रहे दिल्ली में जब प्रदूषण में एक-तिहाई से अधिक योगदान पराली के जलने से था।

दत्त ने सरकारों और न्यायालयों को दिल्ली में प्रदूषणकारी उद्योगों और निजी वाहनों के मुद्दों से निपटने के लिए राजनीतिक साहस दिखाने को भी कहा। “पुआल जलाने की समस्या किसानों के लिए स्थाई आजीविका, उनकी मिट्टी के स्वास्थ्य, उनके कृषि अर्थशास्त्र, श्रम उपलब्धता, संसाधन क्षरण, उनके स्वयं के स्वास्थ्य आदि से जुड़ी हुई है। इसलिए हम इस समस्या के समाधान के लिए उपयुक्त उपायों को बढ़ावा देना चाहेंगे। बेहतर होगा कि नीति निर्माता अपने नुस्खे और समाधान के लिए इसे शुरुआती बिंदु बनाएँ, ताकि किसान इस संकट निवारण में सार्थक सहयोग दे सकें”।, वेबिनार में दत्त ने अपनी बात रखी।

पराली की समस्या से निपटने के लिए हैप्पी सीडर और सुपर सीडर जैसी मशीनों का विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद किसान इसका उपयोग क्यों नहीं कर रहे हैं, यह समझाते हुए हरियाणा के जींद जिले के एक किसान मनबीर रेढू ने बताया कि इन मशीनों पर दी जा रही सब्सिडी पर्याप्त नहीं है। महंगी होने के कारण किसान इन मशीनों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने आगे कहा, “हमें छोटी कुशल मशीनरी को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, न कि बड़ी कंपनियों की इन बड़ी मशीनों को।”

हैप्पी सीडर

लुधियाना (पंजाब) के एक किसान डॉ हरमिंदर सिद्धू के अनुसार पराली की समस्या का समग्र और स्थाई समाधान हो तो “उचित प्रशिक्षण के साथ, रोटावेटर और हैप्पी सीडर्स जैसे मशीनरी का उपयोग पुआल को जलाने के बजाय मिट्टी के सुधार के लिए किया जा सकता है। पराल के साथ आच्छादन करने पर खरपतवारनाशी पर होने वाले खर्च की बचत होती है। गेहूँ की सीधी बुवाई से बुआई पर होने वाले खर्चे में भी बचत होती है”।

कुदरती खेती अभियान के डॉ राजेंद्र चौधरी ने बताया कि जैविक किसानों को पुआल जलाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है; पंजाब और हरियाणा दोनों में जैविक किसान धान समेत किसी भी फसल के अवशेष को नहीं जलाते। ऐसा होने का कारण समझाते हुए चौधरी ने कहा, “किसान पुआल प्रबंधन पर हुए अतिरिक्त खर्च को मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए गए निवेश के रूप में देखते हैं। कई ऐसे भी जैविक किसान हैं जो अन्य किसानों से पुआल खरीद रहे हैं और अपने जैविक खेतों में मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए उस  का उपयोग कर रहे हैं”।

करनाल (हरियाणा) के एक जैविक किसान जितेंद्र मिगलानी न केवल अपने धान के पुआल का प्रयोग आच्छादन और पशु चारे के रूप में करते हैं बल्कि पड़ोसी किसानों से भी पुआल खरीदते हैं। बेलिंग मशीनों के उपयोग और पुआल की बंडलिंग ने उनके लिए कुछ जगह बचाने में मदद की है। पराल से आच्छादन (मल्चिंग) करने से खरपतवार प्रबंधन पर उनकी लागत बच जाती है, और पानी का संरक्षण भी होता है।

पराली जलाने का विकल्प देती उन्नाव की गौशाला (चित्र साभार- गाँव कनेक्शन)

“मैं उस दिन की तैयारी कर रहा हूँ जब सरकार मौजूदा सब्सिडी वापस ले सकती है। मैंने अपना खुद का बाज़ार भी बनाया है, जहाँ खराब होने वाले उत्पादों को भले ही बाज़ार भाव पर बेचना पड़े, परंतु टिकाऊ वस्तुओं पर मैं 25 प्रतिशत प्रीमियम कमाता हूँ।”, अपनी वित्तीय योजनाओंपर मिगलानी ने प्रकाश डाला।

सेंटरर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर के डॉ जीवी रमनजनेयुलु के अनुसार समस्या का वास्तविक या स्थाई समाधान धान-गेहूँ के फसल चक्र से हटकर, अन्य मौसमी फसलों की तरफ जाना है, इससे उत्पादित होने वाले पुआल की मात्रा कम होगी और खरीफ की फसल की कटाई और रबी की फसल की बुवाई की बीच की अवधि बढ़ेगी।

हालांकि, वर्तमान में यह मुद्दा सब्सिडी और प्रोत्साहन के एक जटिल जाल में उलझा हुआ है जैसे कि मुफ्त बिजली और इन फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य केकारण भी अधिक प्रोत्साहन मिलता है। पुआल जलाने की समस्या के कई समाधान हैं और इसके प्रसार के लिए उन्होंने ‘किसान की किसान से सीखने’ की एक मजबूत प्रणाली बनाने का सुझाव दिया।

“किसानों की क्षमता निर्माण के साथ-साथ किसानों के साथ विस्तृत संवाद की भी आवश्यकता है। फसल चक्र में बदलाव, मिट्टी की उर्वरता के लिए पराल का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रयोग और, इसके साथ ही, गैर-कृषि कार्य में पुआल का उपयोग करना जैसे कई समाधान हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि फसल चक्र में बदलाव के लिए नई प्रोत्साहन नीति की आवश्यकता होगी, उदाहरण के लिए, दालों और तिलहन के लिए उचित कीमत पर सुनिश्चित खरीद के अलावा इन की खेती करने के लिए भी प्रोत्साहन देना होगा।”, रमनजनेयुलु ने कहा।

हरियाणा के जींद की किसान-प्रशिक्षक सविता मलिक ने पुआल जलाने पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया और कहा कि किसानों को धरती माता का अधिक सम्मान और देखभाल करना सीखना चाहिए। “मेरे लिए, धरती माँ मेरी माँ की तरह है। जब तक हम उसकी देखभाल करना नहीं सीखते, तब तक हममें से किसी का कोई भविष्य नहीं है। कृषि अवशेष को आग लगाना एक ऐसी चीज़ है, जिससे बचा जा सकता है और मैं किसानों से कुछ पैसे बचाने के लिए आग न लगाने का आग्रह करती हूँ।”, मलिक ने वेबिनार में अपने विचार रखे।

विभिन्न विशेषज्ञों और किसानों की बातों से पराली की समस्या से निपटने के लिए हम निष्कर्ष के रूप में निम्नलिखित कुछ उपायों पर विचार कर सकते हैं-

  • सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रणाली में कुछ परिवर्तन कर किसानों को धान और गेहूँ के अलावा दाल या तेलबीजों की फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है ताकि पराली जलाने की आवश्यकता ही न हो।
  • डिकम्पोज़र्स जैसे जैव टीकों के साथ मिट्टी की उर्वरता वृद्धि के लिए पुआल की जुताई या खाद तैयार करने के लिए पुआल का उपयोग किया जा सकता है।
  • अगली फसल की बिजाई से पहले उपलब्ध समय को बढ़ाने के लिए धान की छोटी अवधि की किस्मों का उपयोग। इससे पराली को प्राकृतिक रूप से मिट्टी में मिलने का समय मिलेगा और किसानों को इसे जलाने की आवश्यकता नहीं होगी।
  • एकीकृत खेती प्रणाली के तहत पशु चारे के रूप में धान के भूसे का उपयोग किया जा सकता है लेकिन धान का भूसा गेहूँ के भूसे से हीन है इस भ्रांति को मिटाना होगा। कुछ किसान ने बताया कि जानवर धान के भूसे को पसंद करते हैं, यहाँ तक कि दूध में मामूली बढ़ोतरी भी होती है।
  • हैप्पी सीडर जैसी मशीनों को बढ़ावा देना और यह जागरूकता लाना कि इसकी सहायता से गेहूँ की बुवाई का खर्च कम हो जाता है।