विचार
सावरकर नहीं सर सैयद थे दो राष्ट्रों के सिद्धांत के प्रवर्तक

आशुचित्र- भारत में दो राष्ट्रों के सिद्धांत के प्रणेता सर सैयद अहमद खां हैं जिनके विचार को अंततः जिन्ना ने फलीभूत कर पाकिस्तान की स्थापना की।

जब भी द्विराष्ट्रवाद की बात चलती है तो अक्सर हिंदू महासभा के नेता विनायक दामोदर सावरकर का नाम लिया जाता है। उनकी 1925 में प्रकाशित हिंदुत्व  पुस्तक का हवाला दिया जाता है। लेकिन उनकी यह पुस्तक हिंदू राष्ट्र की बात भले ही करती हो मगर द्विराष्ट्रवाद की वकालत नहीं करती।

भारत में दो राष्ट्रों का सिद्धांत जिसने सबसे पहले प्रतिपादित किया उसके बारे में बात की ही नहीं जाती उन्हें तो उदारवादी मुस्लिम का तमगा प्रदान किया जाता है। ये शख्सियत हैं- सर सैयद अहमद खां जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक भी थे। उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रणेता, मुस्लिम उदारवाद का मसीहा, मुस्लिम नव जागरण का अग्रदूत आदि बताया जाता है। मगर लगता है कि ऐसा कहने वालों ने केवल सर सैयद के जीवन के एक हिस्से को ही पढ़ा है जो प्रचलित है। इसलिए वे असली सर सैयद को नहीं जान पाए। मोहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान का पिता कहा जाता है। जब पाकिस्तान के आंदोलन की पड़ताल की जाती है तो इस आंदोलन के तार अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद खान के साथ जुड़े हुए मिलते हैं इसलिए उन्हें पाकिस्तान का पितामह कहा जाता है। उन्हें द्विराष्ट्रवाद का जनक भी कहा जाता है। उनके इस सिद्धांत को ही आगे चलकर इक़बाल और जिन्ना ने विकसित किया जो पाकिस्तान के निर्माण का सैद्धांतिक आधार बना। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ रमेशचंद्र मजूमदार कहते हैं- “सर सैय्यद अहमद खान ने दो राष्ट्रों के सिद्धांतों का प्रचार किया जो बाद में अलीगढ़ आंदोलन की नींव बना… इसके बाद मुस्लिम अलग राष्ट्र है इस सिद्धांत को गेंद की तरह इससे ऐसी गति मिलती रही कि उससे पैदा हुई समस्या को पाकिस्तान निर्माण के ज़रिए हल किया गया।”

सर सैयद द्वारा प्रतिपादित द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के कारण 50 साल बाद उभरी पाकिस्तान की माँग में कुछ भी सैद्धांतिक तौर पर नया जोड़ने की ज़रूरत नहीं पड़ी। जिन्ना के जीवनीकार हेक्टर बोलियो लिखते हैं- “वे भारत के पहले मुस्लिम थे जिन्होंने विभाजन के बारे में बोलने का साहस किया और यह पहचाना कि हिंदू-मुस्लिम एकता असंभव है, उन्हें अलग होना चाहिए।” बाद में जिन्ना की इच्छा के अनुसार जो हुआ उसका पितृत्व सर सैयद का है। पाकिस्तान शासन द्वारा प्रकाशित आज़ादी के आंदोलन  के इतिहास में मोइनुल हक कहते हैं- “सच में हिंद पाकिस्तान में मुस्लिम राष्ट्र स्थापित करने वाले संस्थापकों में से थे वे। उनके द्वारा ही डाली गई नींव पर कायदे आज़म ने इमारत बना कर पूरी की।”

पाकिस्तानी विश्वविद्यालयों में मान्यता प्राप्त “अ शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ़ पाकिस्तान” के खंड 4 के नौवें अध्याय में मुस्लिम राष्ट्रवाद का आरंभ बिंदू 1857 के युद्ध में असफलता की प्रतिक्रिया को बताया गया है। मुसलमानों के प्रति ब्रिटिश आक्रोश को कम करने और ब्रिटिश सरकार व मुसलमानों के बीच सहयोग का पुल बनाने के लिए उन्होंने योजनाबद्ध प्रयास आरंभ किया। ब्रिटिश आक्रोश को कम करने के लिए उन्होंने 1858 में “रिसाला अस बाब-ए-बगावत ए हिंद” (भारतीय विद्रोह की कारण मीमांसा) शीर्षक पुस्तिका लिखी, जिसमें उन्होंने प्रमाणित करने की कोशिश की कि इस क्रांति के लिए मुसलामन नहीं, हिंदू जिम्मेदार थे।

सर सैय्यद भले ही मुस्लिमों में अंग्रेज़ी शिक्षा के पक्षधर थे मगर मुस्लिम धर्म, इतिहास परंपरा, राज्य और उसके प्रतीकों और भाषा पर उन्हें बहुत अभिमान था। 1867 में अंग्रेज़ सरकार ने हिंदी और देवनागरी के इस्तेमाल का आदेश जारी किया। उत्तर प्रदेश की बहुसंख्य जनता हिंदू थी। उसके लिए उर्दू लिपी बहुत कठिन थी। इसलिए यह आदेश उचित ही था। मगर इसमें मुस्लिमों की अस्मिता आड़े आ गई। सर सैयद इस बात से बहुत बैचेन थे कि अब राज्य के बाद हमारी भाषा भी गई। तब उन्होंने डिफेन्स ऑफ उर्दू सोसायटी की स्थापना की। डॉ इकराम ने कहा है कि आधुनिक मुस्लिम अलगाव की शुरुआत सर सैय्यद के हिंदी बनाम उर्दू का मुद्दा हाथ में लेने से हुई।

सर सैयद को अक्सर उदारवादी और हिंदू मुस्लिम एकता के पक्षधर के रूप में पेश किया जाता है। 1967से 1987 तक के बीच सर सैय्यद गोल-मोल तरीके से ही सही हिंदू मुस्लिम मेलजोल की बात करते थे। उनके इस वाक्य का अक्सर हवाला दिया जाता है कि हिंदू और मुस्लिम वधू की दो आँखों की तरह है। पहले वे हिंदू और मुस्लिमों को दो कौमे बताते थे तो उसका मतलब होता था दो समाज। मगर 1887 से कौम शब्द का उपयोग राष्ट्र के संदर्भ में करने लगे थे। खुलकर द्विराष्ट्रवाद के समर्थन में बोलने लगे थे।

उन्होंने 28 दिसंबर 1887 को लखनऊ में और 14 मार्च 1888 को मेरठ में जो लंबे भाषण दिए, उनमें यह मुद्दा उठाया। दरअसल 1885 में कांग्रेस की स्थापना हुई और दो सालों में ही सर सैय्यद के ध्यान में आया कि कांग्रेस हिंदू और मुसलमानों और सभी के लिए सेक्युलर होने के बावजूद बह बहुसंख्यक हिंदुओं की ही संस्था रहनेवाली है। इसके ज़रिए हिंदू राजनीतिक तौर पर संगठित होंगे। भविष्य में लोकतांत्रिक व्यवस्था आने पर बहुसंख्य हिंदुओं को ही लाभ होगा। इसके बाद उन्हें हिंदुओं का खुला विरोध करने की ज़रूरत महसूस होने लगी।

14 मार्च 1888 को मेरठ में दिया गया उनका भाषण बेहद भड़काऊ था। इसमें वे हिंदुओं और मुसलमानों को दो राष्ट्र मानने लगे थे। उन्होंने यह बहस छेड़ दी थी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद सत्ता किसके हाथ में आएगी। और उनका दृढ़ विश्वास था कि हिंदू-मुस्लिम मिलकर इस देश पर शासन नहीं कर सकते। उन्हें लगता था कि केवल गृहयुद्ध से ही इसका फैसला हो सकता है। अपने भाषण में उन्होंने कहा- “सबसे पहला सवाल यह है कि इस देश की सत्ता किसके हाथ में आनेवाली है? मान लीजिए, अंग्रेज़ अपनी सेना, तोपें, हथियार और बाकी सब लेकर देश छोड़कर चले गए तो इस देश का शासक कौन होगा? उस स्थिति में यह संभव है क्या कि हिंदू और मुस्लिम कौमें एक ही सिंहासन पर बैठें? निश्चित ही नहीं। उसके लिए ज़रूरी होगा कि दोनों एक दूसरे को जीतें, एक दूसरे को हराएँ। दोनों सत्ता में समान भागीदार बनेंगे, यह सिद्धांत व्यवहार में नहीं लाया जा सकेगा।” वे इससे ज़्यादा साफ साफ शब्दों में द्विराष्ट्रवाद को कैसे प्रकट कर सकते थे। फिर यह सीधा-सादा राष्ट्रवाद नहीं था वरन् एक देश से दूसरे देश को जीतकर उस पर राज्य करने का सिद्दांत था।

उन्होंने आगे कहा- “इसी समय आपको इस बात पर ध्यान में देना चाहिए कि मुसलमान हिंदुओं से कम भले हों मगर वे दुर्बल हैं, ऐसा मत समझिए। उनमें अपने स्थान को टिकाए रखने का सामर्थ्य है। लेकिन समझिए कि नहीं है तो हमारे पठान बंधु पर्वतों और पहाड़ों से निकलकर सरहद से लेकर बंगाल तक खून की नदियाँ बहा देंगे। अंग्रेज़ों के जाने के बाद यहाँ कौन विजयी होगा, यह अल्लाह की इच्छा पर निर्भर है। लेकिन जब तक एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को जीतकर आज्ञाकारी नहीं बनाएगा तब तक इस देश में शांति स्थापित नहीं हो सकती।” यहाँ सर सैयद ने आनेवाले समय में हिंदुओं के खिलाफ सशस्त्र जिहाद की घोषणा की है। उन्होंने कहा कि भारत में प्रतिनिधिक सरकार नहीं आ सकती क्योंकि प्रतिनिधिक शासन के लिए शासक और शासित लोग एक ही समाज के होने चाहिए।”

फिर मुसलमानों को उत्तेजित करते हुए उन्होंने कहा- “जैसे अंग्रेज़ों ने यह देश जीता वैसे ही हमने भी इसे अपने आधीन रखकर गुलाम बनाया हुआ था। वैसा ही अंग्रेज़ों ने हमारे बारे में किया हुआ है। …अल्लाह ने अंग्रेज़ों को हमारे शासक के रूप में नियुक्त किया हुआ है। …उनके राज्य को मज़बूत बनाने के लिए जो करना आवश्यक है उसे ईमानदारी से कीजिए। …आप यह समझ सकते हैं मगर जिन्होंने इस देश पर कभी शासन किया ही नहीं, जिन्होंने कोई विजय हासिल की ही नहीं, उन्हें (हिंदुओं को) यह बात समझ में नहीं आएगी। मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ कि आपने बहुत से देशों पर राज्य किया है। आपको पता है राज कैसे किया जाता है। आपने 700 साल भारत पर राज किया है। अनेक सदियाँ कई देशों को अपने आधीन रखा है। मैं आगे कहना चाहता हूँ कि भविष्य में भी हमें किताबी लोगों की शासित प्रजा बनने के बजाय (अनेकेश्वरवादी) हिंदुओं की प्रजा नहीं बनना है।”

2 दिसंबर 1887 को लखनऊ में मुस्लिम समाज के सामने उनके द्वारा दिया गया 15 पृष्ठों का भाषण उपलब्ध है। इसमें उन्होंने बताया है कि वर्तमान राजनीतिक स्थिति में मुसलमानों की क्या भूमिका होनी चाहिए। यह बताते हुए वे स्पष्ट करते हैं कि किस तरह लोकतंत्र निरर्थक है। वे कहते हैं- “कांग्रेस की दूसरी माँग वाइसरॉय की कार्यकारिणी के सदस्यों को चुनने की है। समझो ऐसा हुआ कि सारे मुस्लिमों ने मुस्लिम उम्मीदवारों को वोट दिए तो हर एक को कितने वोट पड़ेंगे। यह तो तय है कि हिंदुओं की संख्या चार गुना ज़्यादा होने के कारण उनके चार गुना ज़्यादा सदस्य आएँगे, मगर तब मुस्लिमों के हित कैसे सुरक्षित रहेंगे। …अब यह सोचिए कि कुल सदस्यों में आधे सदस्य हिंदू और आधे मुसलमान होंगे और वे स्वतंत्र रूप से अपने अपने सदस्य चुनेंगे। मगर आज हिंदुओं से बराबरी करनेवाला एक भी मुस्लिम नहीं है।” इस तरह सर सैयद अहमद आनुपातिक प्रतिनिधित्व तो छोड़ दीजिए वरन् समान प्रतिनिधित्व से भी संतुष्ट नहीं थे। उन्हें युद्ध ही एकमात्र विकल्प लगता था, उनकी नज़र में मुसलमान फिर भारत के शासक बने यही समस्या का हल था। उन्होंने आगे कहा- “पल भर सोचें कि आप कौन हैं? आपका राष्ट्र कौनसा है? हम वे लोग हैं जिन्होंने भारत पर छः-सात सदियों तक राज किया है। हमारे हाथ से ही सत्ता अंग्रेज़ों के पास गई। हमारा (मुस्लिम) राष्ट्र उनके खून का बना है जिन्होंने सऊदी अरब ही नहीं, एशिया और यूरोप को अपने पाँवों तले रौंदा है। हमारा राष्ट्र वह है जिसने तलवार से एकधर्मीय भारत को जीता है। मुसलमान अगर सरकार के खिलाफ आंदोलन करें तो वह हिंदुओं के आंदोलन की तरह नरम नहीं होगा। तब आंदोलन के खिलाफ सरकार को सेना बुलानी पड़ेगी, बंदूकें इस्तेमाल करनी पड़ेंगी।जेल भरने के लिए नए कानून बनाने होंगे।”

हमीद दलवई ने उनके बारे में कहा था- “1887 बद्रुदीन तैयबजी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। उनसे कुछ मुद्धों पर सर सैयद के मतभेद थे। तब तैयबजी को लिखे पत्र में सर सैयद ने कहा था- “असल में कांग्रेस निशस्त्र गृहयुद्ध खेल रही है। इस गृहयुद्ध का मकसद यह है कि देश का राज्य किसके (हिंदुओंं या मुसलमानों) हाथों में आएगा। हम भी गृहयुद्ध चाहते हैं मगर वह निशस्त्र नहीं होगा। यदि अंग्रेज़ सरकार इस देश के आंतरिक शासन को इस देश के लोगों के हाथों में सौंपना चाहती है तो राज्य सौंपने से पहले एक स्पर्धा परीक्षा होनी चाहिए। जो इस स्पर्धा में विजयी होगा उसी के हाथों में सत्ता सौंपी जानी चाहिए। लेकिन इस परीक्षा में हमें हमारे पूर्वजों की कलम इस्तेमाल करने देने चाहिए। यह कलम सार्वभौमत्व की सनदें लिखने वाली असली कलम है (यानी तलवार)। इस परीक्षा में जो विजयी हो, उसे देश का राज दिया जाए।”

अलीगढ़ संस्थान के 1 अप्रैल 1890 के राज-पत्र में उन्होंने भविष्ययवाणी की थी- “यदि सरकार ने इस देश में जनतांत्रिक सरकार स्थापित की तो दस देश के विभिन्न धर्मों के अनुयायियों में गृहयुद्ध हुए बिना नहीं रहेगा।” 1893 में एक लेख में उन्होंने धमकी दी थी- “इस राष्ट्र में मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं लेकिन इसके बावजूद परंपरा यह है कि जब बहुसंख्यक उन्हें दबाने की कोशिश करते हैं तो वे हाथों में तलवारे ले लेते हैं। यदि ऐसा हुआ तो 1857 से भी भयानक आपत्ति आए बिना नहीं रहेगी।”

सर सैयद की विचारधारा की खासियत यह थी कि उन्होंने मुस्लिम हितों का स्वतंत्र और अलग तरीके से विचार करना शुरू किया। इस तरह हिंदुओं और मुस्लिमों में एक भेद निर्माण किया इसलिए उन्हें अलगाववाद का पिता भी कहा जाता है। इस अलगाववाद और द्विराष्ट्रवाद की परिणिति अगले कालखंड में विभाजन में हुई। इसलिए उनके बिना इन मुद्दों पर विचार किया ही नहीं जा सकता। सर सैयद की इसी विचारधारा का प्रवाह उनसे जिन्ना तक निरंतर बहता रहा।

सतीश पेडनेकर ‘आईएसआईएस और इस्लाम में सिविल वार’ पुस्तक के लेखक हैं।