विचार
रेणू का स्मरण हो आता है जब लेखन में संवेदनशीलता और अबोध सत्यता नहीं दिखती

आज हिंदी के मूर्धन्य लेखक, कथाकार एवं पत्रकार फणीश्वर नाथ रेणु का जन्मदिन है। एक सशक्त, संवेदनशील बुद्धिजीवी वह प्रकाशपुंज होता है जिसे जाने के पश्चात् याद करने पर यह हर्ष भी होता है कि एक समय हमारा समाज ऐसी महान विभूति के स्नेह से सिंचित रहा, और कहीं एक क्लेश भी होता है कि आज ऐसे लेखक कहाँ हैं।

कहीं न कहीं पत्रकारिता के टीवी पत्रकारिता तक सीमित हो जाने की पत्रकारिता जगत को ही एक बड़ी क्षति यह रही कि लेखन, विचार और संवेदना का स्थान फोटोजेनिक छवि, अंग्रेज़ी ज्ञान और स्वर संचालन की कुशलता ने ले ली।

एक आधुनिक परिवेश, स्टूडियो की चटक रोशनी ने नीम अंधेरे में लिखे लेखों के लिए स्थान नहीं छोड़ा। इसका सबसे बड़ा प्रभाव यह रहा कि पत्रकारिता शहरों में सिमटती चली गई जहाँ पत्रकार ज़मीनी हक़ीक़त के नाम पर चुनावों के समय कस्बों तक उतरते हैं और एक पर्यटक की दृष्टि से धरातल के सत्य को देखकर लौट आते हैं।

भाषा पर इसका नकारात्मक प्रभाव जो रहा सो तो है ही, रिपोर्ताज की प्रमाणिकता पर इसका ऐसा प्रभाव हुआ कि जनसामान्य का विश्वास बुद्धिजीवियों और पत्रकारों दोनों पर नहीं रहा। ऐसे में रेणू के कोसी में बाढ़ पर लिखे संवेदनशील लेख को पढ़ने के बाद मुजफ्फरपुर में अस्पताल में क्रांति मचाती हुई आधुनिक पत्रकारिता को देखें तो एक विचित्र-सी बौद्धिक, वैचारिक और नैतिक रिक्तता से जूझता समाज दिखता है जिसके पास उसकी मूक विवशता को स्वर देने वाली कलम भी नहीं है।

रेणू के लेखन की सत्यता उसे अन्य लेखकों से भिन्न करती है। प्रेमचंद ने भी ग्रामीण जीवन के विषय में लिखा और बहुत ज़मीनी सत्य लिखा परंतु रेणू की शैली में विचित्र-सी अबोध सत्यता है। रेणू के लेखन में सत्य, संवेदना के अलावा एक नया पक्ष है- स्वर और संगीत। रेणू का पहला उपन्यास ‘मैला आँचल’ 1954 में स्व-प्रकाशित हुआ। बाद में राजकमल प्रकाशन ने इसे पुनः प्रकाशित किया। इसपर पहली उत्साहप्रद समीक्षा करते हुए नलिनविलोचन शर्मा ने खुले हृदय से लिखा था –

‘मैला आँचल’ फणीश्वरनाथ रेणू का प्रथम उपन्यास है। यह ऐसा उपन्यास है जो लेखक की प्रथम कृति होने पर भी उसे ऐसी प्रतिष्ठा दिला दे कि वो चाहे तो कुछ और न भी लिखे।

‘मैला आँचल’ की प्रसिद्धि का परिणाम यह हुआ कि कुछ लोगों ने इसे सत्य के इतना निकट पाया कि स्वयं को इसमें खोज कर रेणू पर मानहानि का दावा ठोंक दिया, वहीं साहित्य के साहूकार भी उनके पीछे पिल पड़े- कभी भाषा की शुद्धता को लेकर तो कभी मैला आँचल को सतीनाथ भादुड़ी के ‘ढोंढाईचरितमानस’ की नक़ल बताकर। सतीनाथ ने इसपर स्वयं लिखा- “मैला आँचल एक मौलिक कृति है और उस के लेखक पर ऐसा आरोप लगाना अन्याय होगा।”

इस छिटपुट विरोध से निकलकर रेणू की ‘परति: परिकथा’ 1957 में आई और साहित्य जगत ने उसका मुक्त हृदय से स्वागत किया। रेणू के लेखन में कहीं समाजवाद है तो सही परंतु वह न तो कम्युनिस्ट होता है और न ही नेहरू के सोवियत समाजवाद से छले जाने को तैयार है। वे एक जगह कहते है- “गँवई आदमी, जयजयकार करते समय, सबसे अंत में ‘सब संतन की जय’ करना नहीं भूलता। ‘ओरिजिन ऑफ़ दी स्पीशीज़’ पढ़ने के बाद भी वह एट्टी परसेंट सनातनी ही रहा, सब दिन।” रेणू स्वीकारते हैं। यही सहजता, बल-सुलभ सत्यता रेणू और प्रेमचंद को अन्य विचारधारा के लेखकों से भिन्न करती है। सत्य, धरातल पर, खेमों में नहीं बँटता है।

रेणू विचारों के लेखक हैं, विचारधारा के नहीं। 1949 के किसान आंदोलन के रिपोर्ताज में बिना किसी लाग लपेट के रेणू लिखते हैं- “भरपेट जनसेवा की कसमें खाकर प्रधानमंत्री जी स्प्रिंगदार पलंग पर करवट बदल रहे हैं। जाड़े की सुबह की मीठी नींद। कंपन… शून्य… ईथर। रोजी, रोटी कपडा दो, नहीं तो गद्दी छोड़ दो। हम गद्दी नहीं छोड़ेंगे। गांधी जी का नाम लो, क्या सुबह सुबह रोटी की रट लगा रखी है तुमने। नेहरू जी की बात सुनो, टबों में खेती करो, गमलों में अन्न उपजाओ, शकरकंद खाओ।”

रेणू का लेखन पारदर्शी है। जब वह लिखते हैं तो सत्य और पाठक के मध्य कोई नहीं होता, लेखक भी नहीं। लेखक माध्यम मात्र रहता है।  इसलिए रेणू का लेखन मन को छू जाता है, समाज को बदलने के संभावना रखता है। वह मंच से खड़ा होकर गरजता नहीं है, वह उग्रता के आखिरी बिंदु पर जाकर भी मित्रवत पाठक के कंधे पर हाथ रखकर कहता है-” बंधु, क्या हम बदलेंगे नहीं?”

वे अपने शब्दों में सत्य को जीवंत कर देते हैं और इस तीव्रता के साथ कि सत्य सिर्फ सत्य रह जाता है, राजनीति और विचारधारा के परे।  जब वह ‘हड्डियों का पुल’ में लिखते हैं- “सारे जिले की धरती पर हड्डियाँ बिखर रही हैं। आसमान में गिद्धों का दल चक्कर मार रहा है, चील झपट्टे मार रहे हैं , कुत्ते, गीदड़ों और दम तोड़ते इंसानों में छीना झपटी हो रही है। हवा में लाशों की सड़ाँघ फैल रही है।” -तो संवेदना का तार अंतरात्मा को झंझोर देता है।

1930 का विद्रोही लेखक 1960 के अंत तक उचट गया है। राजनैतिक नारों का खोखलापन उसके सामने अपनी हास्यास्पद वीभत्सता के साथ उद्घाटित है। ‘पार्टी का भूत’ में रेणू कहते हैं- “यारों की शक्ल से अजी डरता हूँ इसलिए कि किस पार्टी के आप हैं? वह पूछ न बैठें।”

1966 पहुँचने तक रेणू खुद से पूछते हैं- “तुमने कभी कोसी कवलित जनों, अकाल पीड़ितों और शरणार्थियों के दुःख दर्द को भोगकर जीती जागती छवियाँ आँकी थी? क्या हो गया तुझे जो इस तरह बोतल प्रसाद हो गया तू?”

आज जब लेखक, पत्रकार, साहित्यकार एक महत्वाकांक्षी विक्षिप्तता में डूबकर स्वयं को सत्ता के निर्माता मान बैठे हैं और जनता के विचारों, मनोभावों को स्वर देने के स्थान पर जनता को हेय मान बैठे हैं, साहित्य और पाठक के मध्य संवाद के स्थान पर परस्पर अविश्वास का कलुष घोले बैठे हैं, आवश्यक है कि वे भी रेणू की भाँति स्वयं से यह प्रश्न पूछ सकें। इसी प्रश्न से और इसके उत्तर से ही साहित्य और पत्रकारिता प्रासंगिक हो सकेगी। इसीलिए आज हमें रेणू की आवश्यकता पड़ी है।